हिंदी संस्करण

अध्याय 61

जिस दिन श्रीमती बेनेट ने अपनी दो सबसे अच्छी बेटियों को एक साथ ब्याह दिया, माँ के नाते वह उनके जीवन का सबसे सुखी दिन था। उसके बाद वे कितनी ख़ुशी और कितने गर्व से श्रीमती बिंगली से मिलने जाती रहीं और श्रीमती डार्सी की बातें करती रहीं — इसका अंदाज़ा लगाया ही जा सकता है। अगर यह कहा जा सकता कि इतनी बेटियों का घर बसा देने की उनकी वह गहरी चाह पूरी हो जाने से बाक़ी उम्र वे समझदार, मिलनसार और अच्छी-ख़ासी जानकारी रखने वाली औरत बन गई होतीं, तो अपने घर-भर की ख़ातिर कितना अच्छा होता। पर उन पर तब भी कभी-कभी नसों का दौरा पड़ जाता, और बेवक़ूफ़ वे हमेशा ही रहीं। शायद यह उनके पति के लिए अच्छा ही रहा, जो घर के इतने अनोखे सुख का मज़ा शायद ले ही न पाते। मिस्टर बेनेट को अपनी दूसरी बेटी की बहुत याद आती। उसी प्यार के चलते वे पहले से कहीं ज़्यादा बार घर से निकलने लगे। उन्हें पेम्बरली जाना अच्छा लगता था। ख़ासकर तब, जब किसी को उनके आने की उम्मीद तक न होती। मिस्टर बिंगली और जेन नेदरफ़ील्ड में बस एक ही साल रहे। माँ के इतने पास और मेरिटन के रिश्तेदारों के इतने पास यूँ बसे रहना — न बिंगली का नरम स्वभाव यह चाहता था, न जेन का अपनेपन भरा मन। तब उनकी दोनों बहनों की सबसे प्यारी चाहत भी पूरी हो गई। बिंगली ने डर्बीशायर से लगती हुई काउंटी में एक जागीर ख़रीद ली। जेन और एलिज़ाबेथ को बाक़ी सारे सुखों के ऊपर यह सुख भी मिला कि दोनों एक-दूसरे से तीस मील के भीतर रहने लगीं।

किटी अपना लगभग सारा वक़्त अपनी दोनों बड़ी बहनों के पास बिताने लगी, और इससे उसे बहुत फ़ायदा हुआ। पहले से कहीं बेहतर लोगों के बीच रहकर वह बहुत बदल गई। किटी का स्वभाव लिडिया जैसा नहीं था कि अपने पर कोई क़ाबू ही न रहे। लिडिया के नमूने से दूर होकर उसे ठीक ध्यान और ठीक राह मिली, तो उसकी चिढ़, उसका अनजानपन और उसका उकताया रहना — सब कम होता गया। लिडिया के साथ रहने से जो और नुक़सान हो सकते थे, उनसे भी उसे सँभालकर बचाया गया। श्रीमती विकहम नाचों और नौजवानों का लालच देकर उसे बार-बार अपने पास बुलाती रही। पर पिता ने कभी इजाज़त नहीं दी। घर पर बची अकेली बेटी अब मैरी थी। श्रीमती बेनेट से अकेले बैठा ही नहीं जाता था। सो अपने गुण और हुनर निखारने के काम से मैरी को मजबूरन बाहर खींच लिया गया। उसे दुनियादारी में पहले से कहीं ज़्यादा शामिल होना पड़ा। फिर भी सुबह-सुबह आने वाले मेहमानों को नैतिक उपदेश वह अब भी सुना सकती थी। और अब बहनों की सुंदरता से अपनी सूरत मिलाकर शर्मिंदा होने की नौबत भी नहीं आती थी। इसीलिए पिता को शक हुआ कि इस बदलाव को मैरी ने कुछ ख़ास बेमन से क़बूल नहीं किया।

बड़ी बहनों के ब्याह से विकहम और लिडिया में ज़रा भी बदलाव नहीं आया। विकहम ने इस बात को किसी दार्शनिक की तरह झेल लिया कि उनकी नमकहरामी और उनके झूठ का जो हिस्सा एलिज़ाबेथ को अब तक मालूम नहीं था, वह भी अब उसके सामने खुल जाएगा। फिर भी डार्सी को मना लिया जाए तो वे किसी दिन उनका ठिकाना बना ही देंगे — यह उम्मीद उन्होंने पूरी तरह नहीं छोड़ी। कम से कम ख़ुद विकहम न सही, उनकी पत्नी तो ऐसी उम्मीद पाले ही हुई थी। एलिज़ाबेथ के ब्याह पर बधाई देने के लिए लिडिया ने जो चिट्ठी भेजी, उसी से यह बात खुल गई। चिट्ठी में यह लिखा था। 'प्यारी लिज़ी, ब्याह की बधाई। तुम मिस्टर डार्सी से मेरे प्यारे विकहम के आधे जितना भी प्यार करती हो, तो बहुत ख़ुश रहोगी। तुम इतनी अमीर हो गई हो, यह सोचकर मेरा मन बहुत हल्का है। और जब कोई काम न हो, तो हमें भी याद कर लिया करना। विकहम को दरबार में कोई ओहदा मिल जाए, तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। मुझे लगता है, कोई मदद न करे तो हमारे पास अपना ख़र्च चलाने भर पैसा नहीं होगा। साल के तीन सौ से चार सौ पाउंड मिलें, ऐसी कोई भी जगह चल जाएगी। हाँ, तुम्हारा मन न हो तो मिस्टर डार्सी से मत कहना। प्यार सहित।' एलिज़ाबेथ का मन इस बात को छेड़ने का बिलकुल नहीं था। सो जवाब में उसने ऐसी सारी माँगों और ऐसी सारी आसों पर पानी फेर देने की कोशिश की। फिर भी अपने ख़र्च में से बचत करके जितना जुटा सकती थी, उतना वह बार-बार भेजती रही। दोनों को ठाठ-बाट पसंद था, और आगे की सुध किसी को नहीं थी। ऐसे दो लोगों के हाथ पैसा जाए, तो सिर्फ़ अपनी आमदनी से गुज़ारा करना उनके लिए हमेशा बहुत ही कम पड़ेगा — यह साफ़ था। जब भी उनकी छावनी बदलती, बिल चुकाने के लिए थोड़ी मदद माँगने वाली चिट्ठी जेन या एलिज़ाबेथ के पास ज़रूर पहुँच जाती। सुलह हो जाने पर वे फ़ौज छोड़कर अपना घर बसा सके, तब भी उनका जीना बहुत डाँवाडोल ही रहा। सस्ती जगह की तलाश में वे हमेशा इधर से उधर होते रहे, और ख़र्च हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा ही करते रहे। पत्नी के लिए विकहम के मन में जो प्यार था, वह जल्दी ही ठंडा पड़कर बेरुख़ी में बदल गया। लिडिया का प्यार कुछ और दिन टिका। जवानी और वैसा चाल-चलन, दोनों के बावजूद ब्याह से मिली इज़्ज़त पर लिडिया आख़िर तक अपना हक़ जताती रही। डार्सी ने विकहम को पेम्बरली में कभी नहीं आने दिया। पर एलिज़ाबेथ का ख़याल करके उनके काम-धंधे में मदद वे लगातार करते रहे। विकहम लंदन या बाथ घूमने निकल जाते, तो लिडिया कभी-कभी पेम्बरली आ जाती। और बिंगली दंपति के घर तो दोनों बार-बार, और हद से ज़्यादा दिनों तक टिक जाते। आख़िर बिंगली के भले स्वभाव की भी हद आ गई। नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि वे दोनों को चलता करने का इशारा देने की बात मुँह से कहने लगे।

डार्सी के ब्याह से मिस बिंगली को गहरा अपमान महसूस हुआ। पर पेम्बरली आने-जाने का अपना हक़ बचाए रखना ही उन्होंने समझदारी समझा। सो उन्होंने अपना सारा ग़ुस्सा पी लिया। जॉर्जियाना से वे पहले से ज़्यादा प्यार जताने लगीं, और डार्सी की ख़ातिरदारी लगभग पहले जितनी ही करने लगीं। एलिज़ाबेथ के साथ शिष्टाचार का जो कुछ बाक़ी रह गया था, वह भी उन्होंने पूरा चुका दिया।

अब पेम्बरली जॉर्जियाना का घर था। दोनों बहनों के बीच वैसा ही अपनापन बना, जैसा डार्सी देखना चाहते थे। दोनों एक-दूसरे को जी भरकर प्यार कर सकीं। जॉर्जियाना एलिज़ाबेथ को दुनिया में सबसे ऊँचा मानती थीं। पर शुरू-शुरू में एलिज़ाबेथ उनके भाई से जिस ज़िंदादिली और जिस शरारत से बात करती, उसे सुनकर उन्हें हैरानी से भी आगे कुछ हुआ — क़रीब-क़रीब डर। जॉर्जियाना के मन में भाई के लिए हमेशा से एक डर-मिला आदर रहा था। प्यार भी उस भाव को कभी दबा नहीं पाया। और अब वही भाई सबके सामने खुलकर हँसी का निशाना बन रहे थे। जॉर्जियाना ने वह सीखा, जो वे पहले जानती ही नहीं थीं। एलिज़ाबेथ से उन्होंने यह सीखा कि पत्नी अपने पति के साथ बहुत ही बेतकल्लुफ़ी से पेश आ सकती है। यानी उतनी बेतकल्लुफ़ी, जितनी भाई अपने से दस साल से भी ज़्यादा छोटी बहन को कभी न बरतने देते।

अपने भतीजे के ब्याह पर लेडी कैथरीन बुरी तरह भड़क उठीं। मँगनी की ख़बर देने वाली चिट्ठी का जवाब देते हुए उन्होंने अपनी क़ुदरती साफ़गोई को पूरी छूट दे दी। ख़ास तौर पर एलिज़ाबेथ के लिए उन्होंने ऐसी-ऐसी बातें लिख भेजीं कि उससे बुरा अपमान हो ही नहीं सकता था। इसी से कुछ समय के लिए आना-जाना ही बंद हो गया। पर आख़िर एलिज़ाबेथ के समझाने पर डार्सी ने वह अपमान भुला दिया और मेल-मिलाप की पहल की। थोड़ी और अकड़ दिखाकर मौसी ने भी अपना ग़ुस्सा छोड़ दिया। यह भतीजे के प्यार में हुआ, या इस मन से कि उनकी पत्नी कैसा चलन रखती है, यह देख तो लें — कहा नहीं जा सकता। घर की मालकिन ऐसी हो, और लंदन में दुकानदारी करने वाले मामा-मामी आ-आकर पेम्बरली के जंगल गंदे कर जाएँ — फिर भी लेडी कैथरीन ने बड़ी मेहरबानी करके ख़ुद पेम्बरली आना क़बूल कर लिया।

डार्सी दंपति और गार्डिनर दंपति के बीच हमेशा गहरी से गहरी नज़दीकी बनी रही। एलिज़ाबेथ ही नहीं, डार्सी भी उन्हें दिल से चाहते थे। एलिज़ाबेथ को डर्बीशायर ले आकर जिन लोगों ने दोनों को एक-दूसरे तक पहुँचा दिया था, उनका एहसान वे दोनों हमेशा सबसे गहरी गर्मजोशी से मानते रहे।