हिंदी संस्करण
अध्याय 60
एलिज़ाबेथ का मन जल्दी ही फिर शरारती हो उठा। उसकी चाह थी कि मिस्टर डार्सी बताएँ कि आख़िर वे उससे प्यार करने कैसे लगे। 'आपने शुरुआत कैसे कर ली? एक बार शुरू हो जाने के बाद आप इतने अच्छे ढंग से आगे बढ़ते चले गए — यह तो मैं समझ सकती हूँ। पर सबसे पहले आपका मन डोला किस बात से?' 'उसकी नींव कब पड़ी, कहाँ पड़ी, किस चेहरे या किस बात से पड़ी — मैं कोई एक घड़ी तय नहीं कर सकता। बहुत पुरानी बात है। जब तक मुझे यह मालूम हुआ कि मैंने प्यार करना शुरू कर दिया है, तब तक मैं उसके बीचोबीच पहुँच चुका था।' 'मेरी सुंदरता के आगे तो आप शुरू से ही नहीं झुके। और मेरे तौर-तरीक़ों की तो बात ही छोड़िए। इनके साथ मेरा बरताव तो कम से कम हमेशा बदतमीज़ी की हद पर ही रहा। जब भी मैंने इनसे बात की, चोट न पहुँचाने से ज़्यादा चोट पहुँचाने का ही मन रहा। अब सच-सच बताइए। मेरी गुस्ताख़ी पर आप रीझ गए थे?' 'मैं आपके मन की ज़िंदादिली पर रीझ गया था।' 'आप उसे सीधे गुस्ताख़ी ही कह सकते हैं। दोनों में फ़र्क़ कुछ ख़ास था ही नहीं। असल बात यह है कि इन्हें अदब से, आदर से और बिन माँगे जताई जाने वाली फ़िक्र से उकताहट हो चुकी थी। जो औरतें इनकी तारीफ़ पाने के लिए ही बोलती थीं, देखती थीं और सोचती थीं, उनसे इनका जी भर गया था। मैं उन सबसे बहुत अलग थी, इसीलिए मैंने इन्हें जगा दिया और इनका ध्यान खींच लिया। ये सचमुच भले इंसान न होते, तो मुझसे नफ़रत ही करते। पर अपना असली रूप छिपाने की चाहे कितनी ही कोशिश करें, इनके भाव हमेशा नेक और खरे रहे। जो लोग इनका दिल जीतने के लिए इतनी दौड़-धूप करते थे, उन्हें मन ही मन ये पूरी तरह हिकारत से देखते थे। लीजिए, सफ़ाई देने की मेहनत मैंने आपके लिए बचा दी। सारी बातें मिलाकर सोचूँ, तो अब मुझे लगने लगा है कि यह सब पूरी तरह ठीक ही बैठता है। हाँ, मुझमें सचमुच कोई ख़ूबी है भी या नहीं, यह इन्हें बिलकुल मालूम नहीं था। पर प्यार में पड़ते वक़्त यह सोचता कौन है?' 'नेदरफ़ील्ड में जेन बीमार थी, तब आपने जिस अपनेपन से उसकी तीमारदारी की — उसमें कोई ख़ूबी नहीं थी?' 'सबसे प्यारी जेन के लिए इससे कम कौन करता? पर हाँ, उसे मेरा गुण ज़रूर बना दीजिए। मेरी ख़ूबियों की हिफ़ाज़त तो अब इन्हें ही करनी है, सो जितना बढ़ा-चढ़ाकर कह सकें, कहिए। बदले में मुझे भी चिढ़ाने और झगड़ने के मौक़े जितनी बार मिल सकें, ढूँढ़ते रहना चाहिए। लीजिए, अभी से शुरू करती हूँ। आख़िर में आप असली बात कहने से इतना क्यों हिचके? पहली बार आए, और फिर यहाँ खाने पर आए — तब आप मेरे सामने इतने शरमाए हुए क्यों थे? और सबसे पहली बार आए, तब तो ऐसा चेहरा क्यों बना रखा था, जैसे मुझमें आपकी ज़रा भी दिलचस्पी न हो?' 'क्योंकि आप बड़ी गंभीरता से चुप बैठी थीं, और आपने मुझे ज़रा भी हिम्मत नहीं बँधाई।' 'पर मैं तो झेंपी हुई थी।' 'मैं भी था।' 'खाने पर आए थे, तब तो आप मुझसे और ज़्यादा बात कर सकते थे।' 'कम महसूस करने वाला आदमी कर सकता था।' 'कैसी बदनसीबी है कि आपके पास देने को एक ठीक-ठाक जवाब भी है, और मुझमें इतनी समझ भी है कि मैं उसे मान लूँ! मैं आपको यूँ ही छोड़ देती, तो आप न जाने कब तक ऐसे ही रहते। मैंने ख़ुद न पूछा होता, तो आप कब कहते? लिडिया पर की गई आपकी मेहरबानी का शुक्रिया कहने का जो इरादा मैंने बाँधा था, उसने ज़रूर बहुत असर किया। डर है कि कहीं ज़रूरत से ज़्यादा ही न कर दिया हो। वादा तोड़ने से ही हमारा सुख निकला, तो फिर उस सीख का क्या हुआ? वह बात तो मुझे कहनी ही नहीं चाहिए थी। यह तो ठीक नहीं।' 'दुखी होने की ज़रूरत नहीं। सीख अपनी जगह पूरी तरह सही रहेगी। लेडी कैथरीन ने हमें अलग करने की जो नाजायज़ कोशिश की, उसी से मेरे सारे शक मिट गए। आज का यह सुख मुझे इसलिए नहीं मिला कि आपने शुक्रिया कहने का इतना जतन किया। मेरा मन इस बात का भी नहीं था कि आप मौक़ा बनाएँ, तब तक राह देखता रहूँ। मौसी ने जो सुनाया, उससे मुझमें उम्मीद जागी, और मैंने ठान लिया कि सब कुछ अभी जान लूँगा।' 'लेडी कैथरीन ने इतनी बड़ी भलाई कर दी कि उसका हिसाब ही नहीं — उन्हें तो ख़ुश होना चाहिए। दूसरों के काम आना उन्हें भाता भी तो है। पर यह बताइए। नेदरफ़ील्ड आप आख़िर किस काम से उतरे थे? बस लॉन्गबर्न तक घोड़ा दौड़ाकर आने और झेंप जाने के लिए? या मन में इससे भी गंभीर कोई नतीजा था?' 'असली मक़सद यह था कि मैं आपको देखूँ, और यह जाँच लूँ कि कभी आपके मन में अपने लिए प्यार जगा सकने की उम्मीद बची है या नहीं। जो मक़सद मैंने बताया — नहीं, जो मक़सद मैंने ख़ुद अपने आगे रखा — वह यह था कि देखूँ, आपकी बड़ी बहन के मन में बिंगली के लिए अब भी कुछ है या नहीं। ऐसा होता, तो जो बात मैंने बाद में सचमुच उनसे कह दी, वही कहने का इरादा था।'
'उन पर क्या बीतने वाली है, यह लेडी कैथरीन को बताने की हिम्मत आप कभी जुटा पाएँगे?' 'एलिज़ाबेथ, हिम्मत से ज़्यादा तो वक़्त की कमी पड़ेगी। फिर भी यह काम करना ही है। आप एक काग़ज़ दे दें, तो मैं अभी कर लेता हूँ।' 'मुझे भी एक चिट्ठी न लिखनी होती, तो मैं पास बैठकर आपकी सधी हुई लिखावट निहारती — जैसे किसी और नौजवान लड़की ने कभी निहारी थी। पर मेरी भी एक मामी हैं, जिनकी अनदेखी अब और नहीं की जा सकती।'
लोग मिस्टर डार्सी और उसके बीच की नज़दीकी को कहीं ज़्यादा बड़ा मान बैठे थे। यह बात क़बूल करने का मन नहीं था, सो एलिज़ाबेथ ने अब तक श्रीमती गार्डिनर की उस लंबी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया था। पर अब वह ऐसी ख़बर दे सकती थी, जिससे मामी को सबसे ज़्यादा ख़ुशी होती। मामा-मामी तीन दिन की ख़ुशी पहले ही गँवा चुके हैं — यह सोचकर उसे लगभग शर्म आई। एलिज़ाबेथ ने तुरंत यह लिखा। 'प्यारी मामी, आपकी वह लंबी चिट्ठी मिली — इतनी भरी-पूरी, इतनी अपनेपन वाली, इतनी मन भर देने वाली। फिर भी मैं जल्दी शुक्रिया नहीं कह सकी, जबकि कहना तो चाहिए ही था। पर सच बताऊँ, मैं इतनी चिढ़ी हुई थी कि लिख ही नहीं सकी। जो हुआ ही नहीं था, आपने उससे कहीं ज़्यादा अंदाज़ा लगा लिया था। पर अब जितना जी चाहे, अंदाज़ा लगाइए। अपनी कल्पना को खुला छोड़ दीजिए, और यह बात जितनी दूर तक जाने दे, उतनी दूर तक उसे उड़ने दीजिए। बस यही न मान बैठिए कि मेरा ब्याह हो भी चुका है — इसके सिवा आप बहुत ग़लत नहीं होंगी। जवाब बहुत जल्दी लिखिएगा, और उनकी तारीफ़ पिछली बार से कहीं ज़्यादा कीजिएगा। हम झीलों वाले इलाक़े में नहीं गए — इसके लिए मैं बार-बार शुक्रिया कहती हूँ। वहाँ जाने की चाह रखने जितनी बेवक़ूफ़ी मैंने कैसे कर ली थी! टट्टुओं वाली आपकी सोच बहुत बढ़िया है। हम रोज़ पार्क का एक चक्कर लगाया करेंगे। मैं दुनिया की सबसे सुखी इंसान हूँ। यह बात पहले भी लोग कह चुके होंगे, पर इतने हक़ के साथ कोई नहीं कह पाया होगा। मैं तो जेन से भी ज़्यादा सुखी हूँ। वह सिर्फ़ मुस्कुराती है, और मैं हँसती हूँ। मिस्टर डार्सी दुनिया भर का सारा प्यार आपको भेज रहे हैं — जितना मुझमें से बचा सकते हैं, उतना सारा। क्रिसमस पर आप सबको पेम्बरली आना ही है। प्यार सहित।' मिस्टर डार्सी ने लेडी कैथरीन को जो चिट्ठी लिखी, उसका सुर अलग था। और मिस्टर कॉलिन्स की पिछली चिट्ठी के जवाब में मिस्टर बेनेट ने जो लिखा, वह इन दोनों से भी अलग था। 'प्रिय महोदय, एक बार फिर आपसे बधाई की माँग करनी पड़ रही है। एलिज़ाबेथ जल्द ही मिस्टर डार्सी की पत्नी बन जाएगी। लेडी कैथरीन को जितना हो सके, दिलासा दीजिए। पर मैं आपकी जगह होता, तो भतीजे का पक्ष लेता। उनके पास देने को ज़्यादा है। सच्चे मन से।' होने वाले ब्याह पर मिस बिंगली ने अपने भाई को जो बधाई भेजी, उसमें वह सब कुछ था जो अपनापन जताता है और सच्चा नहीं होता। जेन को भी चिट्ठी लिखकर उन्होंने अपनी ख़ुशी जताई, और पहले किए हुए स्नेह के सारे दावे दोहरा दिए। जेन धोखे में नहीं आई, फिर भी उसका मन भीग गया। भरोसा उस पर ज़रा भी नहीं था, तब भी वह ऐसा जवाब लिखे बिना नहीं रह सकी, जो उसकी अपनी नज़र में मिस बिंगली के हक़ से कहीं ज़्यादा गर्मजोशी भरा था। यही ख़बर पाकर मिस डार्सी को जो ख़ुशी हुई, वह उतनी ही सच्ची थी, जितनी वह ख़ुशी, जो उनके भाई को यह ख़बर भेजते हुए हुई थी। अपनी सारी ख़ुशी और अपनी होने वाली भाभी का प्यार पाने की वह गहरी चाह — यह सब भरने के लिए काग़ज़ के चार पन्ने भी कम पड़ गए।
मिस्टर कॉलिन्स का जवाब और उनकी पत्नी की बधाई, दोनों एलिज़ाबेथ तक पहुँचते, उससे पहले ही लॉन्गबर्न वालों को ख़बर मिल गई कि कॉलिन्स दंपति ख़ुद लूकस लॉज आ पहुँचे हैं। यूँ अचानक चले आने की वजह जल्द ही खुल गई। भतीजे की चिट्ठी पढ़कर लेडी कैथरीन इतनी भड़क उठी थीं कि पूछिए मत। शार्लट को इस ब्याह की सच्ची ख़ुशी थी, सो वह चाहती थी कि यह तूफ़ान गुज़र जाने तक कहीं और हट जाए। ऐसे मौक़े पर सहेली का आ जाना एलिज़ाबेथ के लिए सचमुच ख़ुशी की बात थी। पर मुलाक़ातों के दौरान जब वह देखती कि शार्लट के पति अपने दिखावटी और चापलूसी भरे अदब के हर नमूने से मिस्टर डार्सी को हलकान कर रहे हैं, तो कभी-कभी उसे लगता कि इस ख़ुशी की क़ीमत बहुत भारी पड़ रही है। फिर भी डार्सी ने हैरान कर देने वाले धीरज से यह सब झेल लिया। सर विलियम लुकास ने जब उन्हें बधाई दी कि वे इस इलाक़े का सबसे चमकीला नगीना ले जा रहे हैं, और यह उम्मीद जताई कि सेंट जेम्स दरबार में सबकी मुलाक़ातें अक्सर होती रहेंगी, तब भी वे इसे ख़ासे ठहराव से सुन सके। कंधे उचकाए भी, तो तभी, जब सर विलियम आँखों से ओझल हो चुके थे। श्रीमती फ़िलिप्स का ओछापन उनके धीरज पर एक और बोझ था — शायद उससे भी भारी। अपनी बहन श्रीमती बेनेट की तरह श्रीमती फ़िलिप्स भी डार्सी से बहुत दबती थीं। इसीलिए बिंगली की ख़ुशमिज़ाजी जितनी बेतकल्लुफ़ी की छूट देती थी, उतने खुलेपन से वे उनसे बात नहीं कर पाती थीं। पर जब भी वे मुँह खोलतीं, ओछापन निकले बिना रह ही नहीं सकता था। डार्सी के लिए मन में जो आदर था, उसकी वजह से वे कम ज़रूर बोलती थीं, पर उससे उनमें सलीक़ा नहीं आ सकता था। एलिज़ाबेथ ने अपनी ओर से जो कुछ बन पड़ा, सब किया कि इन दोनों की बार-बार उमड़ती दिलचस्पी से डार्सी बचे रहें। वह हमेशा कोशिश करती कि वे या तो उसके पास रहें, या घर के उन लोगों के पास, जिनसे बात करने में उन्हें नीचा न देखना पड़े। इस सब से जो असहज भाव पैदा हुए, उन्होंने मँगनी के दिनों का बहुत-सा मज़ा छीन लिया। पर आगे के दिनों की आस उन्होंने और बढ़ा दी। जो लोग दोनों में से किसी को भी शायद ही कोई ख़ुशी दे पाते थे, उनसे दूर — पेम्बरली में घर-परिवार के बीच आराम और सलीक़े से बीतने वाले दिनों की वह ख़ुशी-ख़ुशी राह देखती रही।