हिंदी संस्करण

अध्याय 55

इस मुलाक़ात के कुछ दिन बाद मिस्टर बिंगली फिर अकेले ही आ पहुँचे। उनके दोस्त उसी सुबह लंदन चले गए थे, पर दस दिन बाद लौटने वाले थे। बिंगली एक घंटे से ज़्यादा रुके, और उनका मन बहुत ख़ुश लग रहा था। श्रीमती बेनेट ने उन्हें खाने तक रुक जाने को कहा। पर बिंगली ने बहुत अफ़सोस जताते हुए बार-बार कहा कि उनका कहीं और का वादा बँधा है। 'अगली बार आप आएँ, तो उम्मीद है हमारी क़िस्मत ज़्यादा अच्छी होगी,' वे बोलीं। उन्होंने दो-चार बात ऐसी कहीं कि आने में उन्हें कभी कोई हिचक नहीं। यह भी कहा कि इजाज़त मिले, तो जल्द ही फिर हाज़िर हो जाएँगे। 'कल आ सकते हैं?' कल का कोई वादा उनका बँधा नहीं था। उन्होंने चहककर न्योता मान लिया। और वे आ गए। इतने सवेरे आ गए कि कोई भी महिला पूरे कपड़े तक नहीं पहन पाई थी। श्रीमती बेनेट घर के लबादे में ही, आधे बँधे बालों के साथ बेटियों के कमरे में दौड़ी आईं और पुकार उठीं। 'प्यारी जेन, जल्दी नीचे चलो। वे आ गए हैं। मिस्टर बिंगली आ गए हैं। सच कह रही हूँ। जल्दी करो! सारा, इधर आ और अभी मिस बेनेट को गाउन पहनाने में मदद कर। मिस लिज़ी के बालों की फ़िक्र मत कर।' 'जितनी जल्दी हो सकेगा, मैं नीचे आ जाऊँगी,' जेन ने कहा। 'पर किटी हम दोनों से ज़्यादा तैयार होगी। वह आधा घंटा पहले ऊपर चली गई थी।' 'अरे, किटी को छोड़! उसका इस बात से क्या लेना-देना? चलो, जल्दी करो! जल्दी! मेरी प्यारी बेटी, तुम्हारा कमरबंद कहाँ है?' पर माँ के बाहर जाते ही जेन ने कह दिया कि बहनों में से कोई साथ न चले, तो वह नीचे नहीं जाएगी।

दोनों को अकेला छोड़ देने की वही चाह उस शाम फिर सामने आई। चाय के बाद मिस्टर बेनेट हमेशा की तरह पुस्तकालय में चले गए। मैरी साज़ बजाने ऊपर चली गई। दख़ल देने वाले पाँच लोगों में से दो यूँ हट गए, तो श्रीमती बेनेट देर तक एलिज़ाबेथ और किटी को देखती हुई आँखों से इशारा करती रहीं। पर कुछ नहीं हुआ। एलिज़ाबेथ ने अनजान बने रहने का ढोंग किया। आख़िर किटी ने ताड़ लिया और भोलेपन से पूछा। 'क्या बात है, माँ? आप बार-बार मुझे आँखों से इशारा क्यों कर रही हैं? मुझे क्या करना है?' 'कुछ नहीं, बेटी। कुछ भी नहीं। मैंने तुझे इशारा नहीं किया।' वे पाँच मिनट और चुपचाप बैठी रहीं। पर इतना क़ीमती मौक़ा यूँ ही जाने देना उनसे हुआ नहीं। वे अचानक उठीं और किटी से बोलीं। 'इधर आ, बेटी। तुझसे कुछ कहना है।' और वे किटी को कमरे से बाहर ले गईं। जेन ने तुरंत एलिज़ाबेथ की ओर देखा। उस नज़र में यही था कि ऐसी साफ़ दिखती चाल उसे तकलीफ़ देती है, सो छोटी बहन इसमें न बहे। कुछ मिनट बाद श्रीमती बेनेट ने दरवाज़ा आधा खोलकर पुकारा। 'लिज़ी, बेटी। तुझसे कुछ कहना है।' एलिज़ाबेथ को बाहर जाना ही पड़ा। ड्योढ़ी में पहुँचते ही माँ बोलीं। 'उन दोनों को अकेला छोड़ देना ही अच्छा है न। किटी और मैं ऊपर मेरे कमरे में जाकर बैठेंगे।' एलिज़ाबेथ ने माँ को रोकने की कोशिश नहीं की। माँ और किटी आँखों से ओझल न हो गईं, तब तक वह चुपचाप ड्योढ़ी में ही रही। फिर बैठक में लौट गई। उस दिन श्रीमती बेनेट की योजना चली नहीं। बिंगली ने जेन के आगे प्यार का इक़रार नहीं किया — बस इस एक बात को छोड़ दें, तो वे हर तरह से मन मोह लेने वाले थे। सहज और खिले हुए मिज़ाज ने उस शाम को बेहद सुहाना बना दिया। माँ की बेतुकी दख़लंदाज़ी भी उन्होंने सह ली। सारी बेवक़ूफ़ी की बातें सुनीं, फिर भी सब्र से अपना चेहरा सँभाले रखा। बेटियाँ इस बात के लिए ख़ास तौर पर एहसानमंद थीं। रात के हल्के खाने तक रुकने के लिए उन्हें कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। जाने से पहले, ख़ास तौर पर अपनी और श्रीमती बेनेट की कोशिश से, यह तय हो गया कि अगली सुबह वे मिस्टर बेनेट के साथ शिकार पर जाएँगे। उस दिन के बाद जेन ने फिर कभी यह नहीं कहा कि वह बेपरवाह है। दोनों बहनों के बीच बिंगली की एक बात तक नहीं हुई। पर एलिज़ाबेथ इस सुखद भरोसे के साथ सोने गई कि मिस्टर डार्सी तय समय के भीतर लौट न आएँ, तो सब कुछ जल्द ही पूरा हो जाएगा। जितना भी सोचा, उसे लगभग यक़ीन ही रहा कि यह सब उन्हीं सज्जन की इजाज़त से हो रहा है।

बिंगली ने वादे का वक़्त बिलकुल ठीक निभाया। तय योजना के मुताबिक़ उन्होंने और मिस्टर बेनेट ने सुबह साथ बिताई। मिस्टर बेनेट का बरताव बिंगली की उम्मीद से कहीं ज़्यादा अपनापन भरा रहा। बिंगली में ऐसी कोई ढिठाई या बेवक़ूफ़ी थी ही नहीं, जो मिस्टर बेनेट की खिल्ली को न्योता देती। ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे घिन खाकर मिस्टर बेनेट चुप हो जाते। बिंगली से मिलने के बाद मिस्टर बेनेट पहले से कहीं ज़्यादा बोले, और उनकी सनक भी कम रही। ज़ाहिर है, बिंगली उनके साथ लौटे और खाना भी वहीं खाया। शाम होते ही श्रीमती बेनेट ने फिर तरकीब भिड़ाई। इरादा यह था कि बिंगली और अपनी बेटी के पास से सबको हटा दिया जाए। एलिज़ाबेथ को कुछ चिट्ठियाँ लिखनी थीं, सो चाय के थोड़ी ही देर बाद वह नाश्ते के कमरे में चली गई। बाक़ी सब ताश खेलने बैठने ही वाले थे। माँ की योजना बिगाड़ने के लिए उसका वहाँ रुकना ज़रूरी नहीं था। पर चिट्ठियाँ ख़त्म करके वह बैठक में लौटी, तो उसे डर हुआ कि माँ शायद उससे एक क़दम आगे निकल गईं। दरवाज़ा खोला, तो बड़ी बहन और बिंगली फ़ायरप्लेस के आगे साथ-साथ खड़े थे। लगता था, दोनों बहुत गंभीर बात कर रहे थे। इतने भर से शक न भी होता, तो दोनों जिस हड़बड़ी में मुड़े और एक-दूसरे से हटे, उनके चेहरे सब कुछ कह देते। दोनों काफ़ी झेंपे हुए लगे। पर एलिज़ाबेथ को अपनी हालत उनसे भी बुरी लगी। किसी के मुँह से एक शब्द नहीं निकला। एलिज़ाबेथ लौटने को मुड़ी ही थी कि बिंगली अचानक उठ खड़े हुए। उन्होंने जेन के कान में दो-चार बात कही और कमरे से बाहर भाग गए।

जेन ऐसी थी ही नहीं कि ख़ुशी की बात छिपा ले। और वह ख़ुशी एलिज़ाबेथ के साथ बाँटी जा सकती हो, तब तो बिलकुल नहीं। उसने फ़ौरन छोटी बहन को गले लगा लिया, और भरे मन से मान लिया कि वह दुनिया की सबसे सुखी इंसान है। 'यह ख़ुशी बहुत ज़्यादा है!' जेन ने जोड़ा। 'मेरे लायक़ नहीं है। मैं इस ख़ुशी के क़ाबिल ही नहीं। हाय, सब लोग सुखी क्यों नहीं हो सकते?' एलिज़ाबेथ ने ऐसे सच्चे मन से, इतनी गरमजोशी और ख़ुशी से बधाई दी कि शब्दों में वह पूरी उतर ही नहीं सकती। उसकी हर मीठी बात जेन के लिए नई ख़ुशी बनकर आई। पर जेन अभी छोटी बहन के पास और देर नहीं रुकना चाहती थी। जो कहना था, उसका आधा अभी बाक़ी ही था। 'मुझे अभी माँ के पास जाना है,' जेन पुकार उठी। 'उनकी इतनी प्यार भरी फ़िक्र को मैं हलके में नहीं ले सकती। और यह ख़बर वे किसी और के मुँह से सुनें, यह भी नहीं हो सकता। मिस्टर बिंगली तो पिताजी के पास पहुँच भी चुके हैं। हाय लिज़ी, ज़रा सोचो — जो बात मैं सुनाने जा रही हूँ, वह अपने सारे प्यारे लोगों को कितनी बड़ी ख़ुशी देगी! यह सुख मुझसे सहा कैसे जाएगा?' और जेन सीधे माँ के पास दौड़ गई। श्रीमती बेनेट जान-बूझकर ताश का खेल छोड़कर ऊपर किटी के साथ जा बैठी थीं। अकेली रह गई एलिज़ाबेथ मुस्कुरा दी। जिस बात ने पिछले कई महीने उसे लगातार बेचैन और दुखी रखा, वह आख़िर कितनी जल्दी और कितनी आसानी से निपट गई। 'तो यह है,' एलिज़ाबेथ ने ख़ुद से कहा। 'उस दोस्त की इतनी फ़िक्र और इतनी सावधानी का नतीजा! और उनकी बहन के तमाम झूठ और चालों का नतीजा भी! सबसे सुखी, सबसे समझदार और सबसे सही अंत!' कुछ मिनट बाद बिंगली भीतर आए। पिताजी से उनकी बात छोटी-सी और सीधे मतलब की रही लगती थी। दरवाज़ा खोलते ही उन्होंने बेचैनी से पूछा। 'आपकी बड़ी बहन कहाँ हैं?' 'ऊपर माँ के पास हैं। शायद अभी नीचे आ जाएँगी।' बिंगली ने दरवाज़ा बंद किया और पास आ गए। बोले कि अब वे उसके बहनोई बनने वाले हैं, सो उन्हें उसका आशीर्वाद और स्नेह चाहिए। एलिज़ाबेथ ने खुले और सच्चे मन से कहा कि इस नए रिश्ते के ख़याल से उसे कितनी ख़ुशी है। दोनों ने बड़े अपनेपन से हाथ मिलाया। बड़ी बहन के नीचे आने तक एलिज़ाबेथ को बिंगली की वे सारी बातें सुननी पड़ीं, जो वे अपने सुख और जेन के गुणों के बारे में कहते रहे। बिंगली प्यार में डूबे आदमी ज़रूर थे। फिर भी एलिज़ाबेथ को सच में लगा कि जिस सुख की वे आस लगाए हैं, उसकी बुनियाद बहुत मज़बूत है। वह बुनियाद थी जेन की बढ़िया परख और उसका बेहद अच्छा स्वभाव। और यह बात भी कि दोनों के मन और पसंद काफ़ी मिलते-जुलते हैं।

वह शाम सबके लिए बेहद ख़ुशी की रही। मिस बेनेट के मन की ख़ुशी ने उसके चेहरे पर मीठी और जीती-जागती चमक भर दी। जेन पहले से कहीं ज़्यादा सुंदर लग रही थी। किटी शरमाने का ढोंग करके मुस्कुराती रही, और चाहती रही कि उसकी बारी भी जल्द आ जाए। श्रीमती बेनेट ने आधे घंटे तक बिंगली से इसके सिवा कोई बात ही नहीं की। फिर भी अपने मन को भरने लायक़ गरम शब्दों में हामी और मंज़ूरी वे दे नहीं पाईं। मिस्टर बेनेट रात के हल्के खाने पर आ बैठे, तो उनकी आवाज़ और उनके ढंग से साफ़ दिख रहा था कि उन्हें भी सच में ख़ुशी है। पर मेहमान उस रात विदा लेकर चले नहीं गए, तब तक मिस्टर बेनेट ने उस बात का इशारा तक नहीं किया। बिंगली के जाते ही वे बेटी से बोले। 'जेन, बधाई हो। तुम बहुत सुखी औरत बनोगी।' जेन तुरंत पिताजी के पास गई, उन्हें चूमा, और उनके प्यार भरे मन के लिए शुक्रिया कहा। 'तुम अच्छी बच्ची हो,' उन्होंने जवाब दिया। 'तुम इतने सुख से अपना घर बसाओगी, यह सोचकर मुझे बहुत ख़ुशी है। मुझे ज़रा भी शक नहीं कि तुम दोनों बहुत अच्छे से निभाओगे। तुम्हारे स्वभाव बहुत मिलते हैं। दोनों इतना झुक जाने वाले हो कि कोई बात कभी तय ही नहीं होगी, और इतने भले हो कि सारे नौकर तुम्हें ठग लेंगे। और इतने उदार हो कि हमेशा आमदनी से ज़्यादा ख़र्च करोगे।' 'उम्मीद है ऐसा न हो। पैसे के मामले में मैं जल्दबाज़ी या बेसमझी करूँ, तो वह माफ़ी के लायक़ बात ही नहीं होगी।' 'आमदनी से ज़्यादा ख़र्च! सुनिए,' पत्नी पुकार उठीं। 'यह क्या कह रहे हैं आप? उनकी साल की आमदनी चार-पाँच हज़ार पाउंड है। शायद इससे भी कहीं ज़्यादा हो।' फिर वे बेटी से बोलीं। 'हाय मेरी प्यारी, प्यारी जेन। मैं कितनी सुखी हूँ! आज रात मुझे नींद ही नहीं आएगी। मुझे पता था कि ऐसा ही होगा। मैं हमेशा कहती थी कि आख़िर में यही होना चाहिए। मुझे पक्का यक़ीन था कि तुम यूँ ही बेवजह इतनी सुंदर नहीं हो सकतीं! पिछले साल वे पहली बार हर्टफ़र्डशायर आए थे, तब पहली ही नज़र में मैंने सोचा था कि तुम दोनों का जुड़ना कितना मुमकिन है — यह मुझे याद है। हाय, आज तक देखे सबसे ख़ूबसूरत नौजवान!' विकहम और लिडिया, दोनों भुला दिए गए। जेन अब बिना किसी मुक़ाबले के सबसे प्यारी बेटी बन गई। उस पल उन्हें बाक़ी बच्चों की कोई परवाह ही नहीं थी। छोटी बहनें जल्द ही जेन का मन रखने में लग गईं — आगे चलकर वह जो सुख बाँटेगी, उसमें उनका भी हिस्सा हो। मैरी ने नेदरफ़ील्ड का पुस्तकालय इस्तेमाल करने की इजाज़त माँगी। किटी ने बड़ी मिन्नत से कहा कि हर सर्दी में वहाँ कुछ नाच रखे जाएँ। ज़ाहिर है, उस दिन के बाद बिंगली रोज़ लॉन्गबर्न आने लगे। कई बार तो नाश्ते से भी पहले आ जाते, और हमेशा रात के हल्के खाने के बाद तक रुकते। इसमें बस एक ही दिन छूटा। उस दिन नफ़रत के लायक़ किसी जंगली पड़ोसी ने खाने पर बुला लिया था, और बिंगली को लगा कि न्योता मानना ही पड़ेगा।

अब एलिज़ाबेथ को बड़ी बहन से बात करने का वक़्त लगभग मिलता ही नहीं था। बिंगली सामने हों, तो जेन का मन किसी और की ओर जाता ही नहीं था। पर कभी-कभी दोनों को मजबूरी में अलग रहना पड़ता, और तब एलिज़ाबेथ दोनों के बहुत काम आती। जेन पास न होती, तो बिंगली उसी की बात छेड़ने के लिए हमेशा एलिज़ाबेथ के पास आ बैठते। और बिंगली चले जाते, तो जेन भी वही सहारा पाने के लिए हमेशा छोटी बहन को ही ढूँढ़ती। एक शाम जेन ने कहा। 'पिछले बसंत मैं लंदन में थी, यह उन्हें पता ही नहीं था — उन्होंने यह बता दिया, तो मुझे कितनी ख़ुशी हुई! मुझे भरोसा था कि ऐसा हो ही नहीं सकता।' 'मुझे भी यही लगता था,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'पर उन्होंने इसकी वजह क्या बताई?' 'ज़रूर उनकी बहनों का ही किया हुआ होगा। उन्हें अपने भाई का मेरे क़रीब आना पसंद नहीं था, यह तो साफ़ है। कई लिहाज़ से वे कहीं ज़्यादा फ़ायदे वाली लड़की चुन सकते थे, सो इसमें हैरानी की बात भी नहीं। पर वे देख लेंगी कि उनका भाई मेरे साथ सुखी है — और मुझे उम्मीद है, ऐसा ही होगा — तो वे मन मानना सीख जाएँगी। फिर हमारे बीच फिर से बनने लगेगी। हाँ, पहले जैसी बात तो कभी नहीं हो सकेगी।' 'तुमने आज तक जो कहा, उसमें यह सबसे कम माफ़ करने वाली बात है,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'भली जेन! मिस बिंगली के झूठे प्यार में तुम फिर से आ जाओ, यह देखना मुझे सचमुच बहुत बुरा लगेगा।' 'लिज़ी, तुम्हें यक़ीन होगा? पिछले साल नवंबर में जब वे लंदन गए, तब भी वे सचमुच मुझसे प्यार करते थे। उन्हें पक्का यक़ीन न हो गया होता कि मुझे कोई परवाह नहीं, तो उन्हें वापस आने से कोई भी बात न रोक पाती।' 'ग़लती तो उनसे ज़रूर ज़रा-सी हुई। फिर भी इससे उनका विनम्र स्वभाव ही झलकता है।' इस बात के बाद जेन सहज ही उनकी झिझक और अपने गुणों को कम आँकने के स्वभाव की जी भरकर तारीफ़ करने लगी। बिंगली ने अपने दोस्त की दख़लंदाज़ी की बात नहीं खोली — यह जानकर एलिज़ाबेथ ख़ुश हुई। जेन का मन दुनिया में सबसे उदार और सबसे जल्दी माफ़ कर देने वाला था। फिर भी एलिज़ाबेथ जानती थी कि यह बात पता चल जाए, तो जेन के मन में डार्सी के लिए पूर्वाग्रह आए बिना नहीं रहेगा। 'आज तक जितने लोग जिए, उन सबमें सबसे भाग्यशाली तो मैं ही हूँ!' जेन पुकार उठी। 'हाय लिज़ी, हमारे घर में से चुनकर मुझ पर ही सबसे बड़ा आशीर्वाद क्यों उतरा? काश मैं तुम्हें भी यूँ ही सुखी देख पाती! काश तुम्हारे लिए भी ठीक ऐसा ही एक और आदमी होता!' 'ऐसे चालीस आदमी भी दे दो, तो भी मैं तुम्हारे जितनी सुखी नहीं हो सकती। जब तक तुम्हारा-सा स्वभाव और तुम्हारी-सी भलाई न मिल जाए, तब तक तुम्हारा-सा सुख भी नहीं मिलेगा। नहीं, नहीं। मेरा मामला मुझ पर ही छोड़ दो। क़िस्मत बहुत ही अच्छी रही, तो शायद किसी दिन एक और मिस्टर कॉलिन्स मिल जाएँ।' लॉन्गबर्न वाले घर की यह बात ज़्यादा दिन छिपी नहीं रह सकती थी। श्रीमती बेनेट को यह ख़ास हक़ मिला कि वे श्रीमती फ़िलिप्स के कान में यह बात डालें। और श्रीमती फ़िलिप्स ने बिना किसी की इजाज़त लिए वही बात मेरिटन के हर पड़ोसी तक पहुँचाने की हिम्मत कर दिखाई। बेनेट परिवार जल्द ही दुनिया का सबसे भाग्यशाली घराना कहलाने लगा। हालाँकि कुछ ही हफ़्ते पहले, जब लिडिया पहली बार भागी थी, तब तो यह बात लगभग साबित ही हो चुकी लगती थी कि यह घराना बदनसीबी के लिए ही चुना गया है।