हिंदी संस्करण
अध्याय 54
दोनों के जाते ही एलिज़ाबेथ मन सँभालने के लिए बाहर टहलने निकल गई। यानी असल में वह उन्हीं ख़यालों को बेरोक-टोक चबाने निकली, जो मन को और भारी करने वाले थे। मिस्टर डार्सी का बरताव हैरान करने वाला भी था और दुखाने वाला भी। 'अगर वे सिर्फ़ चुप, गंभीर और बेपरवाह होने का दिखावा करने ही आए थे,' उसने ख़ुद से कहा। 'तो आख़िर आए ही क्यों?' कितना भी सोचा, ऐसा कोई जवाब नहीं मिला जिससे मन ख़ुश हो जाता। 'लंदन में तो वे मामा-मामी के साथ फिर भी नरमी और ख़ुशमिज़ाजी से पेश आ सकते थे। फिर मेरे साथ क्यों नहीं? मुझसे डर लगता है, तो यहाँ तक आए ही क्यों? अब मुझे चाहते नहीं, तो चुप क्यों हैं? कितना सताने वाला आदमी है! अब उनका ख़याल ही नहीं करूँगी।' बड़ी बहन पास आई और साथ चलने लगी। इससे एलिज़ाबेथ ने कुछ देर तक अनजाने ही अपना वह इरादा निभा लिया। जेन का चेहरा खिला हुआ था। मेहमानों से वह एलिज़ाबेथ के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा संतुष्ट लग रही थी। 'अब तो,' जेन ने कहा। 'पहली मुलाक़ात निपट गई, सो मेरा मन बिलकुल हल्का है। मुझे अपनी ताक़त का अंदाज़ा भी हो गया, और अब वे फिर आएँ तो मैं ज़रा भी नहीं घबराऊँगी। मुझे ख़ुशी है कि मंगलवार को वे यहीं खाना खाएँगे। तब सब देख लेंगे कि हम दोनों बस आम और बेपरवाह जान-पहचान वालों की तरह ही मिलते हैं।' 'हाँ, बहुत ही बेपरवाह,' एलिज़ाबेथ ने हँसते हुए कहा। 'अरे जेन! ज़रा सँभलकर।' 'प्यारी लिज़ी, तुम मुझे इतना कमज़ोर तो नहीं समझतीं कि अब कोई ख़तरा हो?' 'मुझे लगता है, इसका ख़तरा बहुत बड़ा है कि तुम उन्हें पहले की तरह ही गहरे प्यार में डाल दोगी।'
मंगलवार तक दोनों बहनों ने उन सज्जनों को फिर नहीं देखा। इस बीच आधे घंटे की उस मुलाक़ात में बिंगली ने जो ख़ुशमिज़ाजी और आम शिष्टाचार दिखाया, उसके सहारे श्रीमती बेनेट फिर से जी उठी अपनी तमाम सुखद योजनाओं में मन भरकर डूबी रहीं। मंगलवार को लॉन्गबर्न में बहुत से मेहमान जुटे। जिन दोनों का सबसे बेसब्री से इंतज़ार था, वे शिकारियों की तरह वक़्त के पक्के निकले और बिलकुल ठीक समय पर आ गए। सब लोग खाने के कमरे में पहुँचे, तो एलिज़ाबेथ ने बड़े ध्यान से देखा कि बिंगली वही जगह लेते हैं या नहीं, जहाँ वे पिछली हर महफ़िल में बैठते आए थे — उसकी बड़ी बहन के पास वाली जगह। माँ के मन में भी यही बात थी। सो उन्होंने बिंगली को अपने पास बैठने के लिए नहीं कहा। कमरे में आते वक़्त बिंगली झिझकते-से लगे। पर जेन ने संयोग से पीछे मुड़कर देखा। और संयोग से मुस्कुरा दी। बात तय हो गई। वे जेन के पास ही जा बैठे। एलिज़ाबेथ ने जीत के भाव से उनके दोस्त की ओर देखा। डार्सी ने वह नज़ारा इतनी बेपरवाही से सहा कि उसे शराफ़त ही कहना पड़े। पर बिंगली आधी हँसी और आधे डर वाले चेहरे से मिस्टर डार्सी को देख रहे थे — एलिज़ाबेथ की नज़र इस पर न पड़ी होती, तो वह मान लेती कि सुखी होने की इजाज़त बिंगली को अपने दोस्त से मिल चुकी है। पूरे खाने के दौरान बिंगली जिस ढंग से उसकी बड़ी बहन से पेश आए, उसमें साफ़ तारीफ़ झलकती थी। पहले से ज़्यादा सँभले हुए ज़रूर थे। फिर भी इतना ज़रूर था कि एलिज़ाबेथ को यक़ीन हो गया — उन्हें अपनी मरज़ी से चलने की पूरी छूट मिल जाए, तो जेन का और उनका अपना सुख पक्का है। इस नतीजे पर भरोसा करने की हिम्मत एलिज़ाबेथ को नहीं हुई। फिर भी उनका बरताव देखना उसे अच्छा लगा। उदास मन से जितनी चहक निकल सकती थी, उतनी इसी से निकल आई। मिस्टर डार्सी मेज़ के आर-पार सबसे दूर वाली जगह पर बैठे थे। माँ के एक तरफ़। एलिज़ाबेथ जानती थी कि ऐसी जगह से न किसी को सुख मिलेगा, न किसी का अच्छा रूप सामने आएगा। दोनों की बात सुन सकने जितनी पास वह नहीं थी। पर इतना दिख रहा था कि दोनों कितनी कम बार बोलते हैं, और जब बोलते हैं तो कितनी रस्मी और ठंडी बात करते हैं। माँ उनके साथ जो रूखा बरताव कर रही थीं, उसे देखकर डार्सी के एहसान का ख़याल एलिज़ाबेथ को और भी तकलीफ़ देने लगा। कभी-कभी तो उसका मन होता कि सब कुछ दे देती, बस इतना कहने का हक़ मिल जाता कि घर में उनकी भलाई न किसी से छिपी है, न किसी ने उसे बिना महसूस किए छोड़ा है।
शाम को एलिज़ाबेथ को उम्मीद थी कि उसे और मिस्टर डार्सी को एक साथ बैठने का कोई मौक़ा मिल जाएगा। वह यह भी चाहती थी कि भीतर आते वक़्त हुआ रस्मी नमस्कार ही इस मुलाक़ात में उन दोनों की सारी बातचीत बनकर न रह जाए। मन बेचैन और बेसब्र था। सो सज्जनों के आने से पहले बैठक में बीता वक़्त इतना लंबा और ऊबाऊ रहा कि वह ख़ुद बदतमीज़ी पर उतर आने को थी। उनके भीतर आने का वह एक पल ही तय करने वाला था कि उस शाम कोई सुख मिलेगा या नहीं। 'अगर तब भी वे मेरे पास नहीं आए,' उसने ख़ुद से कहा। 'तो मैं हमेशा के लिए हार मान लूँगी।' सज्जन आ गए। एलिज़ाबेथ को उनके चेहरे से यही लगा कि वे उसकी चाह पूरी कर देंगे। पर हाय! जिस मेज़ पर मिस बेनेट चाय बना रही थी और एलिज़ाबेथ कॉफ़ी उँडेल रही थी, उसके चारों ओर महिलाएँ इतनी सटकर जमी थीं कि ज़रा भी जगह नहीं बची। एलिज़ाबेथ के पास एक कुर्सी रखने की भी जगह नहीं थी। सज्जन क़रीब आए, तो एक नौजवान लड़की पहले से भी ज़्यादा सटकर बैठ गई और कान में बोली। 'मर्द आकर हमें अलग कर दें, यह तो हम होने ही नहीं देंगे। हमें उनकी ज़रूरत ही नहीं। है न?' डार्सी कमरे के दूसरे छोर पर चले गए। एलिज़ाबेथ की नज़र उनके पीछे-पीछे चलती रही। वे जिस किसी से बात करते, उससे उसे जलन होती। किसी और को कॉफ़ी थमाने भर का सब्र भी उसमें मुश्किल से बचा था। और फिर अपनी इस बेवक़ूफ़ी पर उसे ख़ुद ही ग़ुस्सा आ गया! 'एक ऐसा आदमी, जिसे एक बार ठुकराया जा चुका है! मैं इतनी बेवक़ूफ़ कैसे हो सकती हूँ कि उनका वह प्यार फिर जी उठने की उम्मीद करूँ? उसी औरत के आगे दूसरी बार ब्याह का प्रस्ताव रखने की कमज़ोरी किस मर्द को बुरी न लगेगी? मर्दों के मन को इससे बड़ी ज़िल्लत और कोई नहीं लगती।' पर डार्सी ख़ुद अपना कॉफ़ी का प्याला लौटाने आए, तो उसमें कुछ जान लौट आई। एलिज़ाबेथ ने मौक़ा पकड़ा और बोली। 'आपकी छोटी बहन अब भी पेम्बरली में हैं?' 'हाँ। क्रिसमस तक वे वहीं रहेंगी।' 'बिलकुल अकेली हैं? सारे दोस्त चले गए?' 'श्रीमती एनेस्ली उनके साथ हैं। बाक़ी लोग तीन हफ़्ते पहले स्कारबरो चले गए।' उसे और कुछ कहने को सूझा ही नहीं। पर डार्सी बात करना चाहते, तो इससे कहीं बेहतर ढंग से बात आगे बढ़ा सकते थे। फिर भी वे कुछ मिनट चुपचाप उसके पास खड़े रहे। आख़िर वही नौजवान लड़की एलिज़ाबेथ के कान में फिर कुछ कहने लगी, तो वे वहाँ से चले गए।
चाय का सामान हटा और ताश की मेज़ें लगीं, तो सारी महिलाएँ उठ खड़ी हुईं। एलिज़ाबेथ को उम्मीद थी कि डार्सी अभी उसके पास आ जाएँगे। पर माँ को तो व्हिस्ट के खिलाड़ी पूरे करने की ही जल्दी थी। पल भर में उन्होंने डार्सी की बलि चढ़ाकर उन्हें बाक़ी लोगों के साथ बिठा दिया। सारी योजना चौपट हो गई। अब उस शाम कोई सुख मिलने की गुंजाइश ही नहीं बची। दोनों अलग-अलग मेज़ों पर बँध गए। एलिज़ाबेथ के पास उम्मीद करने को बस एक ही बात बची। यही कि डार्सी की नज़र कमरे के उस पार उसकी ओर इतनी बार जाए कि उनका खेल भी उसी की तरह बिगड़ जाए। श्रीमती बेनेट का इरादा था कि नेदरफ़ील्ड के दोनों सज्जनों को रात के हल्के खाने तक रोक लें। पर बदक़िस्मती से उन्होंने अपनी गाड़ी सबसे पहले तैयार रखने का हुक्म दे रखा था। सो उन्हें रोकने का कोई मौक़ा ही नहीं मिला। मेहमान चले गए और सिर्फ़ घरवाले बचे, तो श्रीमती बेनेट बोलीं। 'बेटियो, आज का दिन कैसा रहा? मुझे तो लगता है, सब कुछ बहुत ही बढ़िया निपटा। सच कह रही हूँ। खाना इतना अच्छा पका था, जितना अच्छा आज तक मैंने कहीं नहीं देखा। हिरन का गोश्त ठीक उतना ही भुना था जितना चाहिए, और सबने कहा कि इतनी भरी हुई रान उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। सूप पिछले हफ़्ते लुकास परिवार के यहाँ वाले से पचास गुना बेहतर था। यहाँ तक कि मिस्टर डार्सी ने भी माना कि तीतर बहुत ही बढ़िया पके हैं। और उनके यहाँ तो कम से कम दो-तीन फ़्रांसीसी रसोइए होंगे ही। और मेरी प्यारी जेन, आज तुम जितनी सुंदर लग रही थीं, उतनी पहले कभी नहीं लगीं। श्रीमती लॉन्ग ने भी यही कहा। मैंने उनसे ख़ुद पूछा था कि तुम सुंदर नहीं लग रहीं क्या। और जानती हो, उन्होंने और क्या कहा? «अरे श्रीमती बेनेट। आख़िरकार आपकी बेटी नेदरफ़ील्ड में जा बसेगी!» सचमुच उन्होंने यही कहा। श्रीमती लॉन्ग से भली इंसान दुनिया में कोई नहीं। और उनकी भतीजियाँ भी बहुत सलीक़े वाली लड़कियाँ हैं। ज़रा भी सुंदर नहीं हैं, और यही मुझे बहुत भाता है।' कुल मिलाकर श्रीमती बेनेट का मन बहुत ख़ुश था। जेन के साथ बिंगली का बरताव उन्होंने भरपूर देख लिया था, और उन्हें यक़ीन हो गया कि आख़िर जेन उन्हें पा ही लेगी। मन ख़ुश हो, तो घर को होने वाले फ़ायदों के बारे में उनकी उम्मीदें अक़्ल की हद से बहुत आगे निकल जाती थीं। सो उन्हें बहुत निराशा हुई कि बिंगली ने अगले ही दिन फिर आकर ब्याह का प्रस्ताव नहीं रखा।
मिस बेनेट ने एलिज़ाबेथ से कहा। 'दिन सचमुच बहुत सुहावना रहा। जो लोग जुटे, वे बहुत सोच-समझकर बुलाए हुए लगे, और सबकी आपस में ख़ूब पटी। मेरा मन है कि आगे भी हम अक्सर यूँ ही मिलते रहें।' एलिज़ाबेथ मुस्कुरा दी। 'लिज़ी, ऐसा मत करो। मुझ पर शक मत करो। यह ज़िल्लत की बात है। अब मैंने उनकी बातचीत का मज़ा बस एक ख़ुशमिज़ाज और समझदार नौजवान की बातों जितना ही लेना सीख लिया है। भरोसा रखो, इससे ज़्यादा मेरी कोई चाह नहीं। उनका अब का ढंग देखकर मुझे पूरा यक़ीन हो गया है कि मेरा मन जीतने का ख़याल उन्हें कभी आया ही नहीं था। बस उनका मिज़ाज ही ऐसा है — किसी भी और मर्द से ज़्यादा मीठा बोलने वाला, और सबको ख़ुश रखने की चाह रखने वाला।' 'तुम सचमुच बहुत ज़ालिम हो,' छोटी बहन ने कहा। 'मुझे हँसने तो देती नहीं, और हर पल हँसने पर उकसाती रहती हो।' 'कभी-कभी किसी को यक़ीन दिलाना कितना मुश्किल हो जाता है! और कभी तो बिलकुल नामुमकिन! तुम मुझे यह क्यों मनवाना चाहती हो कि मैं जितना मानती हूँ, उससे कहीं ज़्यादा महसूस करती हूँ?' 'इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल है। हम सब दूसरों को सिखाना पसंद करते हैं। पर सिखा वही सकते हैं, जो जानने लायक़ ही नहीं होता। मुझे माफ़ कर दो। और तुम्हें बेपरवाह ही बने रहना है, तो अपने दिल की बात कहने के लिए मुझे मत चुनना।'