हिन्दी संस्करण
अध्याय 22
'ब्लेंकर परिवार के लिए पार्टी? ब्लेंकर लोगों के लिए?' श्री वेलैंड ने छुरी-काँटा मेज़ पर रख दिए और दोपहर के भोजन की मेज़ के पार पत्नी को अचरज और अविश्वास से देखा। पत्नी ने सुनहरे फ्रेम का चश्मा ठीक करते हुए नाटकीय स्वर में निमंत्रण ज़ोर से पढ़ा: 'प्रोफ़ेसर एमर्सन सिलर्टन और श्रीमती सिलर्टन, वेलैंड दंपती को 25 अगस्त, ठीक 3 बजे, बुधवार अपराह्न क्लब की बैठक में सादर आमंत्रित करते हैं — श्रीमती ब्लेंकर और ब्लेंकर बहनों से भेंट के लिए। स्थान: रेड गेबल्स, कैथरीन स्ट्रीट। उत्तर अपेक्षित है।' 'हे भगवान...' श्री वेलैंड ने ऐसे हाँफते हुए कहा जैसे यह बेतुकी बात मानने के लिए निमंत्रण दो बार पढ़ना ज़रूरी हो। 'बेचारी एमी सिलर्टन... उसका पति आगे क्या करेगा, कोई नहीं जानता,' श्रीमती वेलैंड ने आह भरी। 'लगता है अब उसने ब्लेंकर परिवार खोज निकाला है।' प्रोफ़ेसर एमर्सन सिलर्टन न्यूपोर्ट समाज के लिए ऐसा काँटा था जिसे निकाला नहीं जा सकता था — उसकी जड़ें इतनी प्रतिष्ठित थीं कि अनदेखा करना भी असंभव था। लोग कहते थे, वह 'हर सुविधा पाया हुआ' आदमी है। उसके पिता सिलर्टन जैक्सन के चाचा थे; माँ बोस्टन के पेनीलो घराने की थीं। दोनों ओर धन और प्रतिष्ठा, जोड़ी एक-दूसरे के योग्य। श्रीमती वेलैंड अक्सर कहतीं: एमर्सन सिलर्टन को न पुरातत्ववेत्ता बनने की ज़रूरत थी, न किसी चीज़ का प्रोफ़ेसर बनने की; न सर्दियाँ न्यूपोर्ट में बिताने की, न बाक़ी क्रांतिकारी हरकतों की। पर अगर परंपरा तोड़नी ही थी और समाज के रिवाज ठुकराने ही थे, तो कम-से-कम बेचारी एमी डैगोनेट से शादी न करता — जिसे 'दूसरी तरह की ज़िंदगी' की उम्मीद का हक़ था,
और जिसके पास अपनी बग्घी रखने लायक़ पैसा भी था। मिंगट ख़ानदान में कोई नहीं समझ पाता था कि एमी सिलर्टन ऐसे सनकी पति की हरकतें चुपचाप क्यों सहती रही — जो घर को लंबे बालों वाले मर्दों और छोटे बालों वाली औरतों से भर देता था, और यात्रा पर पत्नी को पेरिस या इटली के बजाय युकातान की क़ब्रें खोदने ले जाता था। पर सिलर्टन दंपती, ख़ुद को औरों से अलग जाने बिना, अपनी ज़िद भरी ज़िंदगी जिए जा रहे थे। उनकी उबाऊ सालाना बाग़-पार्टी में, सिलर्टन-पेनीलो-डैगोनेट रिश्ते के लिहाज़ से, चट्टान-किनारे के हर घराने को पर्ची डालकर एक अनिच्छुक प्रतिनिधि भेजना ही पड़ता था। 'ग़नीमत है, कप रेस का दिन नहीं चुना,' श्रीमती वेलैंड बोलीं। 'याद है? दो साल पहले जूलिया मिंगट के चाय-नृत्य वाले दिन उन्होंने एक अश्वेत सज्जन के लिए पार्टी दी थी। शुक्र है, इस बार कोई टकराव नहीं। हाँ, हममें से कुछ को तो जाना ही होगा।' श्री वेलैंड ने चिंतित आह भरी। ''कुछ' का क्या मतलब, भई... कई लोग? तीन बजे बड़ा बेढब वक़्त है। साढ़े तीन पर मुझे दवा लेनी होती है — बेनकॉम का नया इलाज बिना नियम के बेकार है; और बाद में पहुँचूँ तो बग्घी की सैर छूट जाएगी।' इस ख़याल से उन्होंने फिर छुरी-काँटा रख दिए, और बारीक झुर्रियों वाले गालों पर बेचैनी की परछाईं उतर आई। 'आपको जाने की ज़रूरत ही नहीं, जी,' पत्नी ने उस प्रसन्नता से कहा जो अब यंत्रवत हो चली थी। 'मुझे वैसे भी बेलव्यू एवेन्यू के उस छोर पर कुछ कार्ड छोड़ने हैं; साढ़े तीन के क़रीब झाँक आऊँगी, इतना कि बेचारी एमी ख़ुद को उपेक्षित न समझे।' उन्होंने हिचकते हुए बेटी को देखा। 'और अगर न्यूलैंड दोपहर में व्यस्त हो, तो मे पिता को टट्टू-गाड़ी में घुमा लाए और नई लगाम भी परख ले।'
वेलैंड घराने का उसूल था कि दिन का हर घंटा पहले से तय हो। 'वक़्त काटने' की नौबत की आशंका (ख़ासकर ताश न खेलने वालों के लिए) श्रीमती वेलैंड को वैसे ही सताती थी जैसे परोपकारी को बेरोज़गारी की समस्या। दूसरा उसूल था कि माता-पिता विवाहित बच्चों की योजनाओं में (कम-से-कम दिखने में) दख़ल न दें; और मे की स्वतंत्रता का मान रखते हुए श्री वेलैंड की माँगें साधना ऐसा पेचीदा हुनर था कि श्रीमती वेलैंड का एक पल भी ख़ाली न बचता। 'ज़रूर, मैं पापा के साथ जाऊँगी; न्यूलैंड अपने लिए कुछ न कुछ ढूँढ़ ही लेंगे,' मे ने ऐसे कोमल स्वर में कहा जो पति को उसकी चुप्पी की याद दिला रहा था। दामाद की दिन-योजना की लापरवाही पर श्रीमती वेलैंड की खीज बनी रहती थी। ससुराल के इस पखवाड़े में, दोपहर कैसे बिताओगे पूछे जाने पर वह कई बार उलटबाँसी में बोला: 'हूँ... इस बार सोचता हूँ वक़्त ख़र्च करने के बजाय बचाकर रख लूँ।' एक बार तो, जब मे और उसकी माँ टलती आ रही मुलाक़ातों के लिए निकलीं, उसने क़बूल किया कि पूरी दोपहर घर के नीचे समुद्र-तट पर एक चट्टान की ओट में लेटा रहा। 'न्यूलैंड कभी आगे की नहीं सोचता,' श्रीमती वेलैंड ने एक बार बेटी से दबे स्वर में कहा। मे ने शांत भाव से कहा: 'हाँ, पर देखिए, फ़र्क़ नहीं पड़ता: कुछ करने को न हो तो वे किताब पढ़ लेते हैं।' 'अच्छा... बिलकुल अपने पिता जैसा!' श्रीमती वेलैंड ने ऐसे सहमति दी मानो कोई पुश्तैनी विचित्रता क्षमा कर रही हों। उसके बाद न्यूलैंड के ख़ाली वक़्त की बात अपने आप दब गई। फिर भी, सिलर्टन-निमंत्रण का दिन क़रीब आते ही,
मे पति की दिनचर्या सँवारने की चिंता दिखाने लगी। उसने चिवर्स के घर टेनिस मैच का प्रस्ताव रखा, या जूलियस ब्यूफ़र्ट की नौका पर सैर का — उसे कुछ घंटे अकेला छोड़ने की भरपाई का उसका ढंग। 'छह बजे तक लौट आऊँगी, जानते हो न, प्रिय; पापा उसके बाद कभी बग्घी से नहीं निकलते।' पति ने जब कहा कि वह गाड़ी किराए पर लेकर द्वीप के उत्तर के अश्वशाला जाएगा, उसके ब्रूम के लिए दूसरा घोड़ा देखने — तभी मे को चैन आया। वह घोड़ा वे बहुत दिनों से खोज रहे थे, सो यह प्रस्ताव मे को इतना भाया कि उसने माँ की ओर ऐसे देखा मानो आँखों से कह रही हो: 'देखिए, मेरे पति भी हमारे जितनी ही अच्छी तरह वक़्त की योजना बना लेते हैं।' यह योजना उसी दिन आर्चर के मन में
जड़ पकड़ चुकी थी जिस दिन सिलर्टन-निमंत्रण का पहला ज़िक्र हुआ; पर उसने इसे छिपाए रखा — खुल गया तो पूरा न हो पाए। उसने पहले से गाड़ी और दो बूढ़े किराये के घोड़े तय कर रखे थे, जो समतल सड़क पर अब भी अठारह मील दौड़ लेते थे। दो बजे, जल्दी-जल्दी दोपहर का खाना निपटाकर, वह फुर्ती से गाड़ी में कूदा और चल पड़ा। दिन बेदाग़ था। उत्तर की हवा गहरे नीले आकाश में छोटे सफ़ेद बादल उड़ाए लिए जाती थी, नीचे समुद्र जगमगा रहा था। बेलव्यू एवेन्यू उस घड़ी सुनसान थी; आर्चर ने साईस को मिल स्ट्रीट के नुक्कड़ पर उतारा और पुरानी बीच रोड पकड़कर ईस्टमैन तट पार किया। भीतर वही अकथ रोमांच था जो स्कूल की आधी छुट्टी पर होता था। इसी चाल से वह तीन से पहले पैराडाइज़ चट्टानों की अश्वशाला पहुँच जाएगा; घोड़ा देख (जँचे तो आज़मा) लेने पर भी चार सुनहरे घंटे बचेंगे। सिलर्टन की पार्टी की ख़बर सुनते ही उसने मान लिया था कि मार्कीज़ा मैनसन ज़रूर ब्लेंकर परिवार के साथ न्यूपोर्ट आएगी,
और उसी मौक़े पर ओलेंस्का फिर नानी के साथ दिन बिताने जाएगी। किसी के न होने का लाभ उठाकर एलेन के ठिकाने को देख आना कोई बड़ी बात न थी, और इससे उसकी धुँधली जिज्ञासा शांत हो सकती थी। आर्चर को यक़ीन नहीं था कि वह काउंटेस ओलेंस्का को फिर देखना चाहता है। पर खाड़ी के ऊपर की पगडंडी से उसे निहारने के बाद से वह — तर्कहीन, अवर्णनीय ढंग से — उस जगह को देखना चाहता था जहाँ वह रहती थी; कल्पना की एलेन की हलचल का पीछा करना चाहता था, जैसे मंडप में सचमुच की एलेन को देखा था। यह तड़प रात-दिन उसका पीछा न छोड़ती थी: एक अनवरत, अनाम प्यास — जैसे रोगी को अचानक किसी ऐसे खाने-पीने की तलब उठे जो बरसों पहले चखकर भुला दिया हो। आर्चर को होश ही न था कि वह ओलेंस्का से बात करना या उसकी आवाज़ सुनना चाहता है; इसलिए वह इस तड़प के पार देख सकता था न यह सोच पाता था कि यह ले कहाँ जाएगी। पर उसे लगता था: जिस ज़मीन पर वह चलती थी, उसे और उसके इर्द-गिर्द के आकाश-समुद्र को स्मृति में बसा ले, तो बाक़ी दुनिया कुछ कम सूनी लगेगी।
अश्वशाला में एक नज़र में समझ गया: घोड़ा मन का नहीं। फिर भी, वक़्त में कंजूसी न दिखे, सो कुछ देर सवारी की। पर तीन बजते ही उसने रास झटकी और पोर्ट्समथ की राह पकड़ ली। हवा थम गई थी; क्षितिज पर पतली धुंध बता रही थी कि ज्वार बदलते ही कोहरा साकोनेट नदी के साथ ऊपर चढ़ आएगा। पर आसपास के खेत और जंगल अभी सुनहरी धूप में डूबे थे। वह बग़ीचों में बसे स्लेटी फ़ार्महाउसों, घास के मैदानों, बलूत के जंगलों और उन गाँवों से गुज़रा जिनकी सफ़ेद मीनारें आकाश में नुकीली उठी थीं। रास्ता भटका, खेतों में काम करते लोगों से राह पूछी, और तब कहीं सुनहरी गोल्डनरॉड और काँटेदार झाड़ियों से घिरी एक तंग पगडंडी पर मुड़ा। पगडंडी के छोर पर नदी नीली चमक रही थी। बाईं ओर, बलूत और मेपल के जंगल के आगे, एक पुराना जर्जर घर दिखा — जिसकी तख़्ता-दीवारों की सफ़ेदी उखड़ चुकी थी।
दरवाज़े के सामने वैसा खुला छप्पर था जिसमें न्यू इंग्लैंड के लोग खेती के औज़ार रखते हैं और मेहमान अपने घोड़े बाँधते हैं। आर्चर उतरा, जोड़ी छप्पर में बाँधी और घर की ओर बढ़ा। सामने का लॉन उपेक्षित पड़ा घास के मैदान में बदल चुका था; बाईं ओर डेहलिया और ज़ंग खाई गुलाब की झाड़ियों से भरा, बेतरतीब बढ़ा बॉक्सवुड का बग़ीचा था। बग़ीचे के बीच कभी सफ़ेद रही जालीदार बनावट का प्रेत-सा ग्रीष्म-मंडप खड़ा था, जिसके ऊपर लकड़ी का क्यूपिड, धनुष-बाण खोकर भी, अब तक व्यर्थ निशाना साधे था। आर्चर कुछ देर फाटक से टिका रहा। आसपास कोई नहीं दिखता था; खुली खिड़कियों से कोई आवाज़ नहीं आती थी। दरवाज़े के आगे एक बूढ़ा, सलेटी न्यूफ़ाउंडलैंड कुत्ता ऊँघ रहा था — बाण-हीन क्यूपिड जैसा ही निकम्मा पहरेदार। यह शांत, ढहता ठिकाना शोरगुल वाले ब्लेंकर परिवार का घर है — यह बात उसे अजीब लगी; पर उसे यक़ीन था कि वह ग़लत नहीं है। बड़ी देर वह वहीं खड़ा दृश्य निहारता रहा, धीरे-धीरे उसके उनींदे जादू में डूबता गया; फिर बीतते वक़्त के एहसास से चौंका। बस, इतना देख लिया — अब लौट चलूँ? वह हिचकिचाया। अचानक घर का भीतर देखने की इच्छा जागी — मानो उस कमरे की कल्पना करना चाहता हो जहाँ ओलेंस्का बैठती होगी। दरवाज़े तक जाकर घंटी बजाने से उसे कौन रोकता था; और अगर वह, जैसा अनुमान था, सबके साथ बाहर गई होती,
तो अपना नाम बताकर बैठक में जा सकता था और संदेश छोड़ सकता था। पर घर की ओर जाने के बजाय वह लॉन पार कर बग़ीचे की तरफ़ चला। बॉक्सवुड के बग़ीचे में घुसते ही ग्रीष्म-मंडप में कोई चटख रंग दिखा; अगले ही पल पहचान गया कि वह गुलाबी छतरी है। छतरी ने उसे चुंबक-सा खींच लिया। उसे पक्का यक़ीन था: 'यह उसकी है।' आर्चर मंडप में गया, डगमग बेंच पर बैठा, रेशमी छतरी उठाई और मूठ को ग़ौर से देखा। मूठ किसी दुर्लभ, सुगंधित लकड़ी की बनी थी। आर्चर ने उसे होंठों से लगा लिया। उसी क्षण झाड़ियों से रगड़ खाती स्कर्ट की सरसराहट सुनाई दी। वह छतरी दोनों हाथों में थामे निश्चल बैठा रहा; आँखें उठाए बिना सरसराहट को पास आने दिया।
और वह तो हमेशा से जानता था कि ऐसा क्षण कभी भी आ सकता है... 'अरे, मिस्टर आर्चर!' किसी युवती की ऊँची आवाज़ ने उसे पुकारा। आर्चर ने नज़र उठाई: सामने ब्लेंकर बहनों में सबसे छोटी और सबसे भारी-भरकम लड़की खड़ी थी — बिखरे सुनहरे बाल, पुरानी मलमल की पोशाक। एक गाल पर तकिये के निशान-सा लाल दाग़ था, और अधजगी आँखें उसे उलझन से, पर अपनेपन से देख रही थीं। 'हे भगवान, आप कहाँ से प्रकट हुए? मैं झूले में गहरी नींद सो गई होऊँगी। सब लोग न्यूपोर्ट गए हैं। घंटी बजाई आपने?' वह अब भी नींद में लिपटी बोले जा रही थी। आर्चर उससे भी ज़्यादा घबराया हुआ था। 'मैं... नहीं... यानी, बजाने ही वाला था। द्वीप पर एक घोड़ा देखने आया था; सोचा, शायद श्रीमती ब्लेंकर और मेहमान मिल जाएँ। पर घर ख़ाली लगा... तो बैठकर इंतज़ार करने लगा।' मिस ब्लेंकर नींद झटककर बढ़ती दिलचस्पी से देखने लगी। 'घर सचमुच ख़ाली है। माँ नहीं हैं, मार्कीज़ा नहीं — कोई नहीं।' उसने हल्की उलाहना-भरी सूरत बनाई। 'पता नहीं था आपको? प्रोफ़ेसर सिलर्टन आज दोपहर माँ और हम सबके लिए बाग़-पार्टी दे रहे हैं। मैं नहीं जा सकी — गला ख़राब है; माँ को शाम की वापसी का डर था। कितनी निराशा की बात है न? पर हाँ,' उसने चहकते हुए जोड़ा, 'अगर पता होता कि आप आएँगे, तो मुझे इतना अफ़सोस न होता!' उसकी भोंडी नख़रेबाज़ी के लक्षण उभरने लगे,
तो आर्चर ने झट बात काटी: 'पर मादाम ओलेंस्का? वे भी न्यूपोर्ट गई हैं?' मिस ब्लेंकर ने चौंककर देखा। 'मादाम ओलेंस्का? आपको नहीं मालूम, उन्हें बुलावा आ गया? वे चली गईं।' 'चली गईं?' तभी उसकी नज़र छतरी पर पड़ी। 'अरे, मेरी प्यारी छतरी तो यहाँ है! अपनी सहेली केटी को दी थी, उसके रिबनों से मेल खाती थी; वह लापरवाह यहीं गिराकर चलती बनी। हम ब्लेंकर लोग ऐसे ही हैं... सच्चे बोहीमियन!' मज़बूत हाथ से छतरी खोलकर उसने गुलाबी गुंबद सिर पर तान लिया। 'हाँ, एलेन कल चली गईं। हमें उन्हें एलेन कहने की इजाज़त है, जानते हैं? बोस्टन से तार आया था; बोलीं, शायद दो दिन लगें। उनके बाल बाँधने का ढंग कितना प्यारा है, है न?' वह चहचहाती रही। आर्चर उसके आर-पार देखता रहा, मानो वह पारदर्शी हो; नज़र में बस वह तुच्छ छतरी थी जो उसके हँसते सिर पर मेहराब-सी तनी थी। थोड़ी देर बाद उसने सँभलकर पूछा: 'आपको मालूम है, मादाम ओलेंस्का बोस्टन क्यों गईं? कोई बुरी ख़बर तो नहीं?' मिस ब्लेंकर ने इसे हँसते हुए नामुमकिन-सा माना। 'अरे नहीं, ऐसा नहीं होगा। तार में क्या था, उन्होंने हमें नहीं बताया। शायद मार्कीज़ा को भनक न लगने देना चाहती थीं। कैसा रूमानी अंदाज़ है उनका, है न? जब श्रीमती स्कॉट-सिडन्स 'लेडी जेराल्डीन की प्रणय-गाथा' पढ़ती हैं, बिलकुल वैसी नहीं लगतीं?
कभी सुना नहीं आपने?' आर्चर के दिमाग़ में विचारों का रेला उमड़ रहा था। पूरा भविष्य जैसे अचानक आँखों के आगे खुल गया; और उस अनंत सूनेपन के आर-पार उसे एक आदमी की छोटी होती, मिटती आकृति दिखी — जिसके साथ कभी कुछ नहीं घटेगा। उसने चारों ओर देखा: बिन सँवरा बग़ीचा, ढहता घर, बलूत का जंगल जिसके नीचे साँझ उतर रही थी। यही वह जगह थी जहाँ ओलेंस्का को होना चाहिए था; पर वह दूर थी, और यह गुलाबी छतरी तक उसकी नहीं थी... आर्चर ने माथा सिकोड़ा, हिचकिचाया। 'क्या आप जानती हैं... मैं कल बोस्टन जा रहा हूँ। अगर उनसे मिल सकूँ...' उसने भाँप लिया कि मिस ब्लेंकर की दिलचस्पी घट रही है, हालाँकि मुस्कान वैसी ही थी। 'अरे वाह, ज़रूर! कितना अच्छा सोचा आपने! वे पार्कर हाउस में ठहरी हैं; इस मौसम में वहाँ रहना तो भयानक होगा।'
उसके बाद की बातचीत आर्चर को टुकड़ों में ही याद रही। लड़की ने आग्रह किया कि परिवार के लौटने तक रुकें और साथ खाना खाकर जाएँ; पर उसने मिस ब्लेंकर की मिन्नतों का डटकर प्रतिरोध किया। आख़िरकार, उसे बग़ल में लिए, वह लकड़ी के क्यूपिड की नज़रों से बाहर निकला, घोड़े खोले और गाड़ी पर चढ़ा। गली का मोड़ मुड़ते हुए उसने देखा — मिस ब्लेंकर फाटक पर खड़ी गुलाबी छतरी हिला रही थी।