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अध्याय 21

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एक छोटा चमकीला लॉन ढलान बनता हुआ बड़े चमकीले समुद्र तक उतरता था। घास के किनारे सुर्ख़ जेरेनियम और रंगीन पत्तियाँ लगी थीं; चॉकलेटी रंग से पुते लोहे के गमले समुद्र तक जाती बल खाती राह पर बराबर दूरी पर खड़े थे, और सँवारी हुई बजरी के ऊपर पेटूनिया की मालाएँ झूलती थीं। चट्टान के किनारे और चौकोर लकड़ी के मकान के बीच (मकान भी चॉकलेटी था, बस बरामदे की टीन की छत पर शामियाने जैसी पीली-भूरी धारियाँ थीं) झाड़ियों की ओट में दो बड़े निशाने गड़े थे। लॉन के दूसरी ओर सचमुच का एक तंबू तना था, जिसके चारों ओर बेंचें और बाग़ की कुर्सियाँ थीं। गर्मियों की पोशाकों में महिलाएँ और स्लेटी कोट व ऊँचे हैट वाले पुरुष घास पर खड़े या बेंचों पर बैठे थे; बीच-बीच में कलफ़ लगी मलमल पहने कोई छरहरी लड़की धनुष लिए तंबू से निकलती, निशाने पर तीर छोड़ती, और दर्शक बातचीत रोककर नतीजा देखते।

न्यूलैंड आर्चर मकान के बरामदे में खड़ा यह दृश्य कौतूहल से देख रहा था। चमकती सीढ़ियों के दोनों ओर पीले चीनी-मिट्टी के पायों पर नीले चीनी-मिट्टी के बड़े गमले रखे थे, जिनमें नुकीले हरे पौधे उगे थे; बरामदे के नीचे लाल जेरेनियम से घिरी नीली हाइड्रेंजिया की क़तार थी। उसके पीछे, बैठक के काँच-द्वारों से, लहराते लेस के परदों के बीच चमकते फ़र्श, फूलदार कपड़े से मढ़ी कुर्सियाँ और चाँदी से लदी मख़मली मेज़ें झलक रही थीं। न्यूपोर्ट का तीरंदाज़ी क्लब अगस्त की अपनी सभा हर साल ब्यूफ़र्ट के घर करता था। इस खेल का अब तक क्रोके के सिवा कोई प्रतिद्वंद्वी न था; अब लॉन-टेनिस उसे पछाड़ रहा था, पर टेनिस अभी भी सामाजिक जमावड़ों के लिए फूहड़ माना जाता था। सो सुंदर पोशाकें और सुघड़ मुद्राएँ दिखाने के अवसर के रूप में धनुष-बाण की अपनी क़ीमत बनी हुई थी। आर्चर इस जाने-पहचाने दृश्य को अचरज से देख रहा था। हैरानी थी कि उसकी हर भावना बदल चुकी थी, फिर भी ज़िंदगी पुराने ढर्रे पर बही जा रही थी। और यह बदलाव न्यूपोर्ट में ही सबसे साफ़ महसूस होता था। पिछली सर्दियों में न्यूयॉर्क में वह मे के साथ हरियाई-पीली दीवारों और पॉम्पेई शैली के द्वार वाले नए घर में बस गया था। दफ़्तर की दिनचर्या में लौटकर उसने अपने पुराने स्व से जुड़ा धागा थामा था; मे की बग्घी के लिए शानदार भूरा घोड़ा चुनने का आनंद भी था (गाड़ी वेलैंड परिवार ने भेंट की थी), और परिवार की शंकाओं के बावजूद अपने

सपने के मुताबिक़ नया पुस्तकालय सजाने का सुख भी: गहरे उभरे वॉलपेपर, ईस्टलेक अलमारियाँ, 'खरी' कुर्सियाँ और मेज़ें। सेंचुरी क्लब में विनसेट से फिर भेंट हुई; निकरबॉकर में अपने दायरे के बाँके नौजवानों से। क़ानून के काम, घर या बाहर के भोज और ओपेरा की शामों के बीच बहती ज़िंदगी उसे अब भी असली और अनिवार्य लगती थी। पर न्यूपोर्ट हर कर्तव्य से भागकर केवल आराम और मौज की आबोहवा में जा बसना था। आर्चर ने मे को मेन के तट से दूर एक निर्जन टापू (जिसका नाम ही, ठीक-ठीक, माउंट डेज़र्ट था) पर गर्मियाँ बिताने का सुझाव दिया था। वहाँ बोस्टन और फ़िलाडेल्फ़िया के कुछ साहसी लोग 'देसी' झोपड़ियों में डेरा डाले थे, और वहाँ के जादुई नज़ारों तथा जंगलों-नदियों के बीच शिकारियों-सी जंगली ज़िंदगी की ख़बरें आती थीं। पर वेलैंड परिवार गर्मियाँ हमेशा न्यूपोर्ट में बिताता था। चट्टान पर बने चौकोर मकानों में से एक उनका था, और दामाद को कोई बहाना न सूझा कि वह और मे उनके साथ क्यों न रहें। श्रीमती वेलैंड ने चुभते स्वर में कहा भी कि मे पेरिस में गर्मियों की पोशाकें आज़माते-आज़माते थक गई, अगर वह उन्हें पहन ही न सके तो क्या फ़ायदा; ऐसे तर्कों का जवाब आर्चर को अब तक नहीं मिला था। ख़ुद मे भी नहीं समझ पाती थी कि गर्मियाँ इतने समझदार और सुखद ढंग से बिताने में पति को क्या अड़चन है। उसने याद दिलाया कि कुँवारेपन में उसे न्यूपोर्ट पसंद था; यह अकाट्य सच था,

सो वह बस इतना कह सका कि अब तो हम साथ होंगे, और भी अच्छा लगेगा। पर ब्यूफ़र्ट के बरामदे से जगमगाते लॉन को देखते हुए उसे सिहरन के साथ बोध हुआ कि यह जगह उसे बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी। मे का दोष न था। यात्रा में कभी-कभी दोनों की लय ज़रा बिगड़ जाती थी; पर जानी-पहचानी परिस्थितियों में लौटते ही सब फिर सध गया। आर्चर हमेशा से जानता था कि मे उसे निराश नहीं करेगी, और अनुमान सही निकला। उसने विवाह किया था (अधिकांश पुरुषों की तरह) क्योंकि जब लक्ष्यहीन इश्क़बाज़ियों का सिलसिला असमय ऊब पर ख़त्म हो रहा था, तभी उसे एक मोहक लड़की मिली — शांति, स्थिरता, साथ और अटल कर्तव्य-भावना की प्रतिमूर्ति। वह नहीं कह सकता था कि चुनाव ग़लत था, क्योंकि मे उसकी हर अपेक्षा पूरी करती थी। न्यूयॉर्क की सबसे सुंदर, सबसे चहेती स्त्री का पति होना बड़ा संतोष था; ऊपर से वह सबसे मीठे, समझदार स्वभाव की पत्नी थी — इन ख़ूबियों से आर्चर कभी उदासीन न रहा। रही ब्याह की पूर्वसंध्या की वह क्षणिक हलचल — अब वह उसे अपने छोड़े हुए प्रयोगों में आख़िरी मानता था। यह ख़याल कि उसने कभी होश-हवास में काउंटेस ओलेंस्का से विवाह का सपना देखा होगा, लगभग असंभव लगने लगा था; वह स्मृति में बस प्रेतों की क़तार की सबसे करुण, सबसे मार्मिक छाया रह गई थी। पर इन सब बौद्धिक क़वायदों और अतीत मिटाने की कोशिशों से मन सूना और गूँजता रह गया था; और उसे लगा कि ब्यूफ़र्ट के लॉन पर चहकते लोग ऐसे हैं जैसे

क़ब्रिस्तान में खेलते बच्चे। तभी बग़ल में स्कर्ट की सरसराहट हुई और मार्कीज़ा मैनसन बैठक की खिड़की से लचकती हुई प्रकट हुई। हमेशा की तरह वह निराले ठाठ से सजी थी: ढीले लेगहॉर्न हैट पर मुरझाई जाली के कई फेरे, और नक़्क़ाशीदार हाथीदाँत की मूठ वाली छोटी काली मख़मली छतरी, जो हैट के कहीं बड़े किनारे पर हास्यास्पद ढंग से टिकी थी। 'अरे न्यूलैंड! पता ही नहीं चला कि तुम और मे आ गए। कल ही आए? हाँ, दफ़्तर का काम... समझती हूँ। जानती हूँ, कई पति सप्ताहांत के सिवा यहाँ पत्नियों से नहीं मिल पाते।' उसने सिर टेढ़ा किया और अधमुँदी आँखों से उसे अलसाई नज़र से देखा। 'मैं एलेन से अक्सर कहती हूँ — विवाह एक लंबा बलिदान है।' आर्चर का दिल उसी अजीब झटके से रुक-सा गया जो वह पहले एक बार झेल चुका था — मानो उसके और बाहरी दुनिया के बीच कोई दरवाज़ा भड़ाक से बंद हो गया हो। पर यह टूटन लंबी न रही; जल्द ही उसने सुना कि किसी सवाल के जवाब में, जो शायद वह पूछ बैठा था, मार्कीज़ा कह रही थी: 'नहीं, मैं यहाँ नहीं ठहरी; पोर्ट्समथ में ब्लेंकर परिवार के पास हूँ। आज ब्यूफ़र्ट ने कृपा कर अपने मशहूर घोड़े भेज दिए, ताकि रेजिना की बाग़-पार्टी की एक झलक तो देख सकूँ।

पर आज शाम मैं देहाती जीवन में लौट जाऊँगी। ब्लेंकर लोग सचमुच निराले जीव हैं। उन्होंने पोर्ट्समथ में एक पुराना आदिम फ़ार्महाउस किराए पर लिया है और वहाँ चुनिंदा लोगों को बुलाते रहते हैं...' वह हैट के किनारे तले ज़रा झुकी और हल्की लाली के साथ बोली: 'इस हफ़्ते डॉ. अगाथन कार्वर वहाँ आंतरिक विचार की बैठकों की शृंखला चला रहे हैं। इन सांसारिक रंगरलियों की पार्टी से कैसा विरोधाभास! पर मैं तो सदा विरोधाभासों में ही जी हूँ! मेरे लिए एकमात्र मृत्यु है एकरसता। मैं एलेन से हमेशा कहती हूँ — एकरसता से बचना, वही सब घातक पापों की जननी है। पर मेरी बेचारी बच्ची इन दिनों उन्माद के, संसार से विरक्ति के दौर से गुज़र रही है। जानते हो, उसने न्यूपोर्ट के सारे न्योते ठुकरा दिए — नानी मिंगट के पास ठहरने का न्योता भी! यक़ीन करोगे? मैं बड़ी मुश्किल से उसे ब्लेंकर के घर तक ला पाई! जो ज़िंदगी वह जी रही है, वह रुग्ण है, अप्राकृतिक है। आह, काश उसने मेरी बात तब मानी होती जब अवसर था... जब दरवाज़ा अभी खुला था...' फिर एकाएक बात का रुख़ बदलकर वह चहकी: 'अब चलें, वह रोमांचक मुक़ाबला देखें?

सुना है मे भी उतरी है।' ब्यूफ़र्ट तंबू से निकला और टहलता-सा लॉन पार कर उनकी ओर आया। लंबा, भारी-भरकम, ज़रूरत से ज़्यादा कसे लंदनी कोट में, कोट पर अपने ही ग्रीनहाउस का एक आर्किड। दो-तीन महीने बाद उसे देखकर आर्चर उसकी सूरत के बदलाव पर चौंका। भरी गर्मी की चौंधियाती धूप में उसका लाल चेहरा और भी भारी, फूला-फूला लगता था; अगर वह ताने हुए कंधों से सीधा न चलता, तो ठूँस-ठूँसकर खिलाया, ज़रूरत से ज़्यादा सजाया कोई बूढ़ा ही लगता। ब्यूफ़र्ट के बारे में हज़ार अफ़वाहें उड़ रही थीं। वसंत में वह अपनी नई भाप-नौका लेकर वेस्ट इंडीज़ की लंबी सैर पर गया; कहते थे, कई ठिकानों पर उसके साथ मिस फ़ैनी रिंग-जैसी दिखने वाली एक स्त्री देखी गई। क्लाइड में बनी उस नौका में टाइलों वाले स्नानघर और अनसुने ऐशो-आराम थे; कहा जाता था कि उस पर पाँच लाख डॉलर लगे। लौटकर उसने पत्नी को मोतियों का हार दिया — प्रायश्चित्त की भेंटों जैसा ही शानदार। उसकी दौलत ये ख़र्च झेल सकती थी, फिर भी बेचैन करने वाली अफ़वाहें पाँचवें एवेन्यू से वॉल स्ट्रीट तक फैलती रहीं। कोई कहता, उसने रेलवे में ग़लत सट्टा खेला;

कोई फुसफुसाता कि शहर की सबसे लालची तवायफ़ों में से एक उसे निचोड़ रही है। दिवालियेपन की हर अफ़वाह का जवाब ब्यूफ़र्ट किसी नई फ़िज़ूलख़र्ची से देता: आर्किड का नया ग्रीनहाउस, दौड़ के नए घोड़े, या संग्रह में कोई नया मेसोनिए या कैबानेल। वह अपनी चिर-परिचित उपहास-भरी मुस्कान लिए मेडोरा और न्यूलैंड की ओर बढ़ा। 'क्यों मेडोरा! घोड़ों ने अपना काम किया? चालीस मिनट... ख़ैर, आपकी नसों का ख़याल रखना था, उस लिहाज़ से बुरा नहीं।' उसने आर्चर से हाथ मिलाया, फिर घूमकर मेडोरा की दूसरी ओर जा खड़ा हुआ और धीमे स्वर में कुछ कहा, जो साथियों को सुनाई न दिया। मार्कीज़ा ने अपने विदेशी अंदाज़ में हाथ नचाकर 'क वुले वू?' (क्या किया जाए?) कहा, जिससे ब्यूफ़र्ट के माथे की सिलवट और गहरी हो गई। पर उसने आर्चर की ओर देखकर बधाई की काफ़ी विश्वसनीय मुस्कान ओढ़ी: 'जानते हो, पहला इनाम मे ही ले जाएगी?' 'तो इनाम घर में ही रहेगा,' मेडोरा ने हल्की हँसी के साथ कहा। तभी वे तंबू तक पहुँचे, और हलके बैंगनी मलमल और लहराते आवरणों में लिपटी श्रीमती ब्यूफ़र्ट ने किशोरी-से भाव के साथ उनका स्वागत किया।

मे वेलैंड उसी क्षण तंबू से निकल रही थी। सफ़ेद पोशाक, कमर पर हल्का हरा फ़ीता, हैट पर बेल की पत्तियों का हार — उसमें वही डायना-देवी सा गर्व था जो सगाई के दिन ब्यूफ़र्ट के नृत्य-कक्ष में प्रवेश करते समय था। लगता था, बीच के समय में उसकी आँखों के पीछे से एक भी विचार, हृदय से एक भी भाव नहीं गुज़रा; और पति जानता था कि दोनों उसमें हैं, फिर भी दंग रह गया कि अनुभव उस पर कोई निशान छोड़े बिना कैसे फिसल जाता है। धनुष-बाण थामे वह घास पर खिंची चाक की रेखा पर खड़ी हुई, धनुष कंधे तक उठाया और निशाना साधा। मुद्रा में ऐसी शास्त्रीय गरिमा थी कि जमावड़े में प्रशंसा की सरसराहट दौड़ गई, और आर्चर ने स्वामित्व की वह गर्म उमंग महसूस की जो उसे अक्सर क्षणिक संतोषों से छलती थी। उसकी प्रतिद्वंद्वी — रेजी शिवर्स की पत्नी, मेरी बहनें, और थोर्ली, डैगोनेट व मिंगट घरानों की कई गुलाबी चेहरों वाली युवतियाँ — पीछे बेचैन झुंड में खड़ी थीं: अंक-पट्ट पर झुके भूरे और सुनहरे सिर, हल्की मलमलें और फूलों वाले हैट मिलकर एक कोमल इंद्रधनुष बन गए थे। सब जवान थीं, सुंदर थीं, गर्मियों के फूलों-सी खिली हुईं; पर

किसी में भी उसकी पत्नी जैसी अप्सरा-सी सहजता न थी, जब वह मांसपेशियाँ कसे, प्रसन्न तनी भौंहों के साथ पूरा मन लगाकर निशाना साध रही थी। 'क़सम से,' आर्चर ने लॉरेंस लेफ़र्ट्स को बुदबुदाते सुना, 'धनुष ऐसा कोई नहीं थामता'; और ब्यूफ़र्ट ने ताना मारा: 'हाँ, पर यही एक क़िस्म का निशाना है जो वह कभी भेद पाएगी।' आर्चर के भीतर बेतुका क्रोध भड़क उठा। मेज़बान का मे की 'शालीनता' का यह हिक़ारत-भरा बखान वही तो था जो पति को सुनकर ख़ुश होना चाहिए। कोई फूहड़ आदमी उसे आकर्षक न पाए — यह तो उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण था; फिर भी उन शब्दों से उसके सीने में हल्की ठंडी कँपकँपी रह गई। और अगर 'शालीनता', अपनी पराकाष्ठा पर, केवल एक नकार हो — शून्य के आगे तना परदा? आख़िरी तीर ठीक बीच में उतारकर गुलाबी चेहरे से शांत लौटती मे को देखते हुए उसने सोचा कि उसने वह परदा आज तक एक बार भी नहीं उठाया। मे ने प्रतिद्वंद्वियों और बाक़ी सबकी बधाइयाँ उसी सरल, स्थिर मुस्कान से स्वीकारीं जो उसका मुकुट थी। कोई उसकी जीत से जल न सकता था, क्योंकि वह ऐसा भाव देती थी कि हार में भी वह ऐसी ही शांत रहती। पर जैसे ही उसकी आँखें पति से मिलीं,

उसका चेहरा उस ख़ुशी से खिल उठा जो उसने पति के चेहरे पर देखी। श्रीमती वेलैंड की टोकरी-नुमा टट्टू-गाड़ी उनकी राह देख रही थी; वे बिखरती गाड़ियों के बीच से निकल पड़े — रास मे के हाथ में, आर्चर उसके पास। दोपहर बाद की धूप अब भी लॉन और झाड़ियों पर ठहरी थी; बेलव्यू एवेन्यू पर विक्टोरिया, डॉगकार्ट, लैंडो और विज़-आ-वी आ-जा रहे थे — सजे-धजे लोग, पार्टी से लौटते या ओशन ड्राइव की सैर से घर जाते। 'नानी के यहाँ चलें?' मे ने अचानक कहा। 'मैं ख़ुद उन्हें बताना चाहती हूँ कि इनाम जीत लिया। रात के खाने में अभी बहुत वक़्त है।' आर्चर मान गया, और मे ने टट्टुओं को नैरागैन्सेट एवेन्यू की ओर मोड़ा, स्प्रिंग स्ट्रीट पार की और पथरीले उजाड़ की ओर बढ़ चली। वह इलाक़ा फ़ैशन से कोसों दूर था, पर परिपाटियों को ठेंगा दिखाने वाली और पैसे में किफ़ायती कैथरीन महान ने जवानी में वहीं, खाड़ी के सामने की सस्ती ज़मीन पर, कई छतों और आड़े शहतीरों वाला सजावटी ढंग का बंगला बनवाया था। बौने बलूतों के बीच उसके बरामदे टापुओं से जड़े पानी पर खुलते थे।

बल खाती राह जेरेनियम के ढूहों के बीच से ऊपर चढ़ती थी, जिनमें लोहे के हिरन और नीले काँच के गोले चमकते थे, और धारीदार छत तले पॉलिश किए अखरोटी दरवाज़े तक जाती थी। भीतर काले-पीले सितारों वाले फ़र्श का तंग गलियारा चार छोटे चौकोर कमरों में खुलता था, जिनकी छतों पर किसी इतालवी चित्रकार ने ओलंपस के सारे देवता उकेर दिए थे। देह के बोझ ने जब श्रीमती मिंगट को घर में बाँध दिया, तो इनमें से एक कमरा शयनकक्ष बन गया; बग़ल के कमरे में वह दिन बिताती थी — खुले दरवाज़े और खिड़की के बीच बड़ी आरामकुर्सी पर विराजमान, हाथ के ताड़-पंखे को अनवरत झलती हुई। उसका विराट वक्ष पंखे को शरीर से इतनी दूर रखता कि हवा बस कुर्सी की बाँहों पर पड़े झालरों को हिला पाती। आर्चर के ब्याह को जल्दी कराने में हाथ बँटाने के बाद से बूढ़ी कैथरीन उस पर वह गर्मजोशी लुटाती थी जो उपकार करने वाले के मन में उपकृत के लिए उपज आती है। उसे पक्का यक़ीन था कि इस जल्दबाज़ी की वजह बेक़ाबू इश्क़ था; और आवेग की प्रशंसक होने के नाते (बशर्ते उसमें पैसा न उड़े) वह हर भेंट पर उसे साज़िशी आँख मारती और ढके-छिपे इशारे करती, जिन्हें सौभाग्य से मे ताड़ नहीं पाती थी। प्रतियोगिता के बाद मे के सीने पर टँका हीरों जड़ा तीर उसने बड़े ग़ौर से जाँचा; बोली कि उसके ज़माने में नक़्क़ाशीदार ब्रोच ही बहुत होता, पर यह मानना पड़ेगा कि ब्यूफ़र्ट काम बड़े पैमाने पर करता है।

'यह तो लगभग विरासत है, बच्ची।' बुढ़िया खिलखिलाई। 'अपनी सबसे बड़ी बेटी के नाम कर देना।' उसने मे की गोरी बाँह चिकोटी, और मे का चेहरा लाल हो उठा। 'अरे! मैंने ऐसा क्या कह दिया जो लाल पड़ गई? क्या इरादा सिर्फ़ बेटे जनने का है?' और जब मे माथे तक तमतमा गई तो कैथरीन ठहाका मारकर बोली: 'अच्छा, यह भी नहीं कहने का? हे राम! जब मेरे बच्चे गिड़गिड़ाते हैं कि छत के इन देवताओं को मिटवा दो, तो मैं यही कहती हूँ — शुक्र है, अब भी एक जन बचा है जिसे किसी बात से झेंप नहीं आती!' आर्चर ठठाकर हँसा, और मे भी आँखों तक लाल होकर हँस पड़ी। 'चलो, अब पार्टी का पूरा हाल सुनाओ, क्योंकि उस बुद्धू मेडोरा से तो ढंग की बात कभी नहीं मिलेगी।' नानी ने आगे कहा। मे चौंकी: 'मेडोरा बुआ? वे पोर्ट्समथ नहीं लौट गईं?' कैथरीन ने इत्मीनान से जवाब दिया: 'हाँ, पर पहले यहाँ रुककर एलेन को लेती जाएगी। अरे, तुम्हें पता नहीं कि एलेन आज का दिन मेरे साथ बिता रही है? सारी गर्मियाँ न आने की उसकी यह ज़िद निरा पागलपन है। पर जवानों से बहस करना मैंने पचास साल पहले छोड़ दिया।' वह बरामदे से परे लॉन झाँकने को झुकी और तीखी आवाज़ में पुकारा: 'एलेन! एलेन!' कोई उत्तर नहीं। खीजकर श्रीमती मिंगट ने चमकते फ़र्श पर छड़ी ठोकी। पुकार सुनकर चटख पगड़ी बाँधे एक अश्वेत नौकरानी आई और बताया कि उसने मिस एलेन को समुद्र-तट की पगडंडी से नीचे जाते देखा है। तब श्रीमती मिंगट आर्चर से बोली: 'अच्छे नाती की तरह जाकर उसे ले आओ। तब तक यह सुंदरी मुझे पार्टी का हाल सुनाएगी।'

आर्चर सपने में चलता-सा उठा। आख़िरी मुलाक़ात के बाद के डेढ़ साल में उसने एलेन ओलेंस्का का नाम बार-बार सुना था; उसके जीवन की मुख्य घटनाएँ तक जानता था। जानता था कि पिछली गर्मियाँ उसने न्यूपोर्ट में ख़ूब मेल-जोल के साथ बिताईं, और पतझड़ में ब्यूफ़र्ट की बड़ी मशक़्क़त से ढूँढ़ी 'बेजोड़ कोठी' अचानक किराए पर उठाकर वॉशिंगटन जा बसी। सर्दियों में सुना गया (जैसा वॉशिंगटन की हर सुंदरी के बारे में कहा जाता है) कि वह उस 'चमकदार कूटनीतिक समाज' में दमक रही है जो सरकार की सामाजिक कमियाँ पूरी करता माना जाता है। आर्चर ने ये सब बातें — उसकी सूरत, बातचीत, विचारों और मित्रताओं के परस्पर विरोधी क़िस्से — उसी विरक्ति से सुनी थीं जैसे किसी चिर-दिवंगत की चर्चा हो; एलेन उसकी चेतना में अब सजीव उपस्थिति न थी। पर तीरंदाज़ी के मैदान में जब मेडोरा ने उसका नाम लिया, एलेन ओलेंस्का फिर जीती-जागती होकर उसके मन में उतर आई। मार्कीज़ा के भोंडे उच्चारण ने आग की रोशनी वाले छोटे बैठकख़ाने और सूनी गली में गूँजते बग्घी के पहियों की तस्वीर जगा दी। उसे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आई: टस्कनी के किसान बच्चे राह-किनारे की गुफा में पुआल का गट्ठर जलाकर क़ब्र-से अँधेरे में सोए पुराने चित्र उजागर करते हैं...

घर के टीले से समुद्र-तट को उतरती राह पानी के किनारे बनी सैरगाह से जा मिलती थी, जिस पर रोते विलो लगे थे। पत्तों के परदों के बीच से आर्चर को लाइम रॉक की झिलमिल दिखी: सफ़ेद मीनार और वह छोटा घर, जहाँ वीर प्रकाश-स्तंभ रक्षिका आइडा लुईस अपने आदरणीय अंतिम दिन बिता रही थी। उसके परे गोट द्वीप की समतल ज़मीन और सरकारी इमारतों की बदसूरत चिमनियाँ थीं; खाड़ी सुनहरी आभा में उत्तर की ओर बौने बलूतों वाले प्रूडेंस द्वीप तक फैली थी, और कोनानिकट का किनारा शाम की धुंध में धुँधला रहा था। सैरगाह के छोर पर लकड़ी की छोटी जेटी पानी में उतरती थी, जिसके सिरे पर पगोडा-जैसा मंडप बना था; मंडप में, तट की ओर पीठ किए, एक स्त्री जँगले से टिकी खड़ी थी। आर्चर नींद से जागे आदमी की तरह ठिठक गया। अतीत का दृश्य सपना था; असलियत वह थी जो टीले के घर में उसकी बाट जोह रही थी: द्वार के सामने अंडाकार घेरे में घूमती श्रीमती वेलैंड की टट्टू-गाड़ी; ओलंपस के रुष्ट देवताओं तले बैठी, गुप्त आशाओं से दमकती मे; बेलव्यू एवेन्यू के छोर पर वेलैंड कोठी, और हाथ में घड़ी थामे, बदहज़मी के मारे-सा अधीर होकर बैठक में टहलते श्री वेलैंड। उस घर में हर घड़ी सबको पता रहता था कि क्या हो रहा है।

'मैं हूँ ही क्या? बस एक दामाद...' आर्चर ने सोचा। जेटी के सिरे की आकृति हिली नहीं। नौजवान देर तक ढलान के बीच खड़ा खाड़ी में आते-जाते बजरों, पालदार नौकाओं और कोयले के बजरे खींचते शोर मचाते टगबोटों को देखता रहा। मंडप की स्त्री भी उसी दृश्य में खोई लगती थी। फ़ोर्ट ऐडम्स की धूसर बुर्जियों के पार लंबा सूर्यास्त हज़ार लपटों में बिखर रहा था, और उस आभा ने लाइम रॉक और तट के बीच के जलमार्ग से निकलती एक छोटी पालनौका के पाल को जगमगा दिया। देखते-देखते आर्चर को शॉग्रॉन नाटक का वह दृश्य याद आया: मोंटेग्यू, एडा डायस का फ़ीता होंठों से लगाता है, और उसे पता तक नहीं कि वह कमरे में है। 'वह नहीं जानती। उसे गुमान तक नहीं। और अगर वह मेरे पीछे आ खड़ी हो, तो क्या मैं जान जाऊँगा?' वह बुदबुदाया। फिर सहसा: 'अगर उस पाल के लाइम रॉक की बत्ती पार करने से पहले वह नहीं मुड़ी, तो मैं लौट जाऊँगा।' नाव भाटे के साथ सरकती गई। वह लाइम रॉक के आगे से गुज़री, आइडा लुईस का घर ढाँपा, प्रकाश-स्तंभ की मीनार लाँघ गई। आर्चर तब तक रुका रहा जब तक द्वीप की आख़िरी चट्टान और नाव की दुम के बीच झिलमिल पानी की चौड़ी पट्टी न खुल गई। मंडप की आकृति फिर भी निश्चल थी। नौजवान मुड़ा और टीला चढ़ गया।

धुँधलके में घर लौटते हुए मे बोली: 'अफ़सोस, एलेन नहीं मिली। मैं उससे फिर मिलना चाहती थी। पर शायद उसे परवाह भी न होती — वह इतनी बदल गई है।' 'बदल गई?' पति ने बेरंग आवाज़ में दोहराया; निगाहें टट्टुओं के फड़कते कानों पर टिकी रहीं। 'मतलब, दोस्तों से उदासीन हो गई है। न्यूयॉर्क और अपना घर छोड़कर अजीब लोगों में वक़्त बिताती है। सोचो, ब्लेंकर के घर उसे कैसा अखरता होगा! कहती है, मेडोरा बुआ को एक और बेतुकी शादी से रोकने के लिए है; पर कभी-कभी लगता है, हम लोग शायद उसे हमेशा उबाऊ ही लगे।' आर्चर चुप रहा। मे ने जवाब की प्रतीक्षा किए बिना, अपनी साफ़ आवाज़ में पहले कभी न सुनी दृढ़ता के साथ कहा: 'आख़िर मुझे लगता है, कहीं वह अपने पति के साथ ज़्यादा सुखी न होती।' आर्चर ठहाका मार उठा। 'कैसी पावन सादगी!' वह बोला; और मे की चकित निगाह पर जोड़ा: 'लगता है, तुम्हारे मुँह से इतनी निर्दय बात मैंने कभी नहीं सुनी।' 'निर्दय?' 'कहते हैं, नरक में तड़पते पापियों का तमाशा देखना फ़रिश्तों का शौक़ है। पर वे भी यह तो नहीं मानते कि लोग नरक में ज़्यादा सुखी हैं।' 'तब तो अफ़सोस की बात है कि उसने विदेश में शादी की,' मे ने उसी कोमल स्थिरता से कहा जिससे उसकी माँ श्री वेलैंड की सनकें झेलती थीं; और आर्चर ने महसूस किया कि उसे चुपचाप बेतुके पतियों के ख़ाने में सरका दिया गया है। वे बेलव्यू एवेन्यू से नीचे उतरे,

और लोहे के लैंप उठाए तराशे लकड़ी के खंभों के बीच से भीतर मुड़े — यही वेलैंड कोठी का प्रवेश था। खिड़कियों में बत्तियाँ जगमगा रही थीं, और गाड़ी रुकते ही आर्चर को ठीक वैसा ही ससुर दिख गया जैसा उसने सोचा था: हाथ में घड़ी, बैठक में चहलक़दमी करते, चेहरे पर वह पीड़ित भाव जिसे वे बरसों पहले क्रोध से कहीं ज़्यादा कारगर पा चुके थे। पत्नी के पीछे-पीछे ड्योढ़ी में आते हुए नौजवान ने भावनाओं की अजीब पलटी महसूस की। वेलैंड घराने की विलासिता और छोटी-छोटी माँगों से गाढ़ा वहाँ का माहौल उसे हमेशा मीठी दवा-सा शांत करता था: भारी क़ालीन, चौकस नौकर, घड़ियों की अनुशासित टिक-टिक, ड्योढ़ी की मेज़ पर बराबर जमा होते कार्ड और निमंत्रण — तानाशाह छोटी-छोटी बातों की वह ज़ंजीर, जो एक घंटे को अगले से और घर के हर सदस्य को बाक़ी सबसे बाँधे रखती थी। ऐसे सुव्यवस्थित, समृद्ध जीवन के आगे हर दूसरा जीवन अवास्तविक और डाँवाँडोल लगता था। पर अब अवास्तविक और निरर्थक वेलैंड कोठी और वहाँ उसकी प्रतीक्षा करता जीवन हो गया था; और समुद्र-तट की ढलान पर ठिठककर दुविधा में बीता वह छोटा-सा क्षण उसकी रगों में बहते लहू जितना पास आ गया था।

रात भर वह फूलदार शयनकक्ष में मे के पास जागा रहा — क़ालीन पर उतरती चाँदनी देखता, एलेन ओलेंस्का को सोचता, जो ब्यूफ़र्ट के घोड़ों के पीछे झिलमिलाते तट से घर लौट रही थी।