हिन्दी संस्करण
अध्याय 23
अगली सुबह फ़ॉल रिवर ट्रेन से उतरते ही आर्चर ने भाप से भरे भरी गर्मियों के बोस्टन में क़दम रखा। स्टेशन के पास की गलियाँ बीयर, कॉफ़ी और सड़ते फलों की गंध से भरी थीं, और केवल कमीज़ पहने लोग वहाँ से ऐसे बेपरवाह गुज़र रहे थे जैसे किराएदार गुसलख़ाने की ओर जा रहे हों। आर्चर बग्घी लेकर नाश्ते के लिए समरसेट क्लब गया। संभ्रांत मोहल्ले भी उस सलीक़े से दूर दिखे जो यूरोप के शहर भीषण गर्मी में भी नहीं खोते। छींट के कपड़ों वाली चौकीदारिनें अमीर घरों की सीढ़ियों पर अलसाई बैठी थीं, और कॉमन ऐसा बिखरा पड़ा था जैसे किसी मेले का मैदान पिकनिक के अगले दिन। अगर आर्चर एलेन ओलेंस्का के लिए कोई अनहोनी जगह सोचता भी, तो गर्मी से निढाल, ख़ाली पड़े इस बोस्टन से बेतुकी जगह
उसे न सूझती। उसने चाव और तरतीब से नाश्ता किया। ख़रबूज़े की फाँक से शुरुआत की, और टोस्ट व अंडे का इंतज़ार करते हुए अख़बार खोल लिया। कल रात मे से यह कहने के बाद से कि बोस्टन में काम है, रात की फ़ॉल रिवर नाव से जाएगा और अगली शाम न्यूयॉर्क लौटेगा — वह अपने भीतर नई ऊर्जा और उमंग महसूस कर रहा था। योजना का यह अचानक बदलाव खटका भी नहीं, क्योंकि हफ़्ते की शुरुआत में उसे वैसे भी न्यूयॉर्क लौटना था; और पोर्ट्समथ से लौटने पर ड्योढ़ी की मेज़ के कोने पर नियति ने जो दफ़्तर की चिट्ठी नुमायाँ रख छोड़ी थी, वही सफ़ाई के लिए काफ़ी थी। सब कुछ इतनी आसानी से हो गया, इस पर उसे शर्म-सी भी आई: एक असहज पल के लिए उसे लॉरेंस लेफ़र्ट्स की वे चालाकियाँ याद आ गईं जिनसे वह अपनी आज़ादी पक्की करता था। पर यह ख़याल देर तक नहीं सताया; वह आत्म-विश्लेषण के मूड में नहीं था। नाश्ते के बाद सिगरेट सुलगाकर उसने कमर्शियल एडवर्टाइज़र पलटा। दो-तीन परिचित आए, जाने-पहचाने अभिवादन हुए: दुनिया वैसी की वैसी थी, और इस एकरूपता से उसे अजीब उलझन हुई — मानो वह समय और स्थान के चौखटे से बाहर हो, फिर भी उसी दुनिया के भीतर। घड़ी देखी: साढ़े नौ। वह लेखन-कक्ष में गया, कुछ पंक्तियाँ लिखीं और हरकारे से कहा कि बग्घी लेकर पार्कर हाउस जाए और जवाब की प्रतीक्षा करे। फिर दूसरा अख़बार खोलकर अंदाज़ने लगा कि वहाँ पहुँचने में कितना वक़्त लगेगा।
'साहब, मैडम बाहर गई हुई थीं।' थोड़ी देर बाद कोहनी के पास वेटर की आवाज़ आई। आर्चर ऐसे हकलाया जैसे कोई अनजानी विदेशी भाषा सुनी हो: 'बाहर?' वह उठकर बरामदे में आया। ज़रूर कोई भूल हुई है: इतनी सुबह वह बाहर नहीं जा सकती। उसे अपने ऊपर ग़ुस्सा आया: पहुँचते ही चिट्ठी क्यों नहीं भेजी? टोपी और छड़ी लेकर वह सड़क पर निकल आया। शहर अचानक ऐसा लगा जैसे दूर देश से आए मुसाफ़िर को लगे — अजनबी, विशाल और वीरान। सीढ़ियों पर पल-भर ठिठककर उसने तय किया कि ख़ुद पार्कर हाउस जाएगा। हो सकता है हरकारे ने ग़लत समझा हो,
और वह अब भी वहीं हो। वह कॉमन के पार चल पड़ा। तभी उसने उसे देखा — पेड़ तले पहली बेंच पर बैठी। सिर पर स्लेटी रेशमी छतरी ताने। उसने उसके लिए गुलाबी छतरी की कल्पना कैसे कर ली थी? पास पहुँचते हुए उसकी शिथिल मुद्रा ने उसे धक्का दिया: वह वहाँ ऐसे बैठी थी जैसे कोई जिसके पास करने को कुछ न बचा हो। उसे उसकी झुकी हुई पार्श्व-रेखा दिखी, गहरे हैट के नीचे गर्दन पर नीचा बँधा बालों का जूड़ा, और छतरी थामे हाथ पर लंबा, सिलवटों भरा दस्ताना। वह एक-दो क़दम और बढ़ा, और उसने सिर घुमाकर उसे देखा। 'अरे...' उसने चौंकी हुई आवाज़ में कहा; पहली बार आर्चर ने उसके चेहरे पर हड़बड़ाहट देखी। फिर धीरे-धीरे वह भाव शांत अचरज की मुस्कान में घुल गया। 'अरे...' उसने फिर बुदबुदाया, इस बार नरम सुर में, जब वह खड़ा उसे निहार रहा था। और उठे बिना उसने बेंच पर उसके लिए जगह बना दी।
'मैं काम से आया हूँ — अभी-अभी पहुँचा,' आर्चर ने सफ़ाई दी, और न जाने क्यों हैरान होने का अभिनय करने लगा। 'पर आप इस वीराने में क्या कर रही हैं...?' उसे होश न था कि क्या कह रहा है: लगता था, वह अनंत दूरियों के पार से उसे पुकार रहा है, और डर था कि पहुँचने से पहले वह फिर ओझल न हो जाए। 'मैं? अरे, मैं भी काम से आई हूँ।' उसने चेहरा उसकी ओर घुमाया ताकि निगाहें मिलें। शब्द उसके कानों तक मुश्किल से पहुँचे। उसे केवल उसकी आवाज़ का भान था — और इस अचरज भरे तथ्य का कि उस आवाज़ की गूँज तक उसकी स्मृति में नहीं बची थी। उसे यह भी याद न रहा था कि वह आवाज़ धीमी थी, व्यंजनों में हल्का खुरदरापन लिए। 'आपने बाल अलग ढंग से बाँधे हैं,' उसने कहा, और दिल ऐसे धड़का जैसे कुछ अटल कह बैठा हो। 'अलग? नहीं — नस्तासिया के बिना बस इतना ही बन पड़ता है।' 'नस्तासिया? वह साथ नहीं आई?' 'नहीं, मैं अकेली हूँ। दो दिन के काम के लिए उसे लाना बेकार था।' 'अकेली — पार्कर हाउस में?' उसने पुरानी शरारत की चमक के साथ उसे देखा। 'ख़तरनाक लगता है?' 'नहीं, ख़तरनाक नहीं, पर...' 'रिवाज के ख़िलाफ़? समझ गई।
शायद है भी।' वह पल-भर सोच में डूबी। 'यह तो सोचा ही नहीं था — अभी-अभी मैंने इससे कहीं ज़्यादा रिवाज-विरुद्ध काम किया है।' उसकी आँखों में हल्की विडंबना झलकी। 'मैंने अपना ही पैसा वापस लेने से इनकार कर दिया।' आर्चर झटके से उठा और कुछ क़दम पीछे हट गया। उसने छतरी समेट ली थी और बेख़याली में बजरी पर आकृतियाँ खींच रही थी। थोड़ी देर में वह लौटकर उसके सामने खड़ा हुआ। 'कोई... आपसे मिलने आया था?' 'हाँ।' 'वही पेशकश लेकर?' उसने सिर हिलाया। 'और आपने इनकार किया — शर्तों की वजह से?' थोड़ी देर बाद उसने उत्तर दिया: 'इनकार कर दिया।' आर्चर फिर उसके बग़ल में बैठ गया। 'शर्तें क्या थीं?' 'कुछ बहुत भारी नहीं: कभी-कभार उसकी मेज़ के सिरे पर बैठना।' फिर सन्नाटा छा गया। आर्चर का दिल उसी अजीब ढंग से भिंच गया था, और वह उपयुक्त शब्द टटोल रहा था। 'वह आपको हर क़ीमत पर वापस चाहता है?' 'ख़ैर — क़ीमत काफ़ी बड़ी है। कम-से-कम मेरे लिए तो बड़ी रक़म है।' आर्चर ठिठका, फिर ज़रूरी लगा सवाल घुमाकर पूछा: 'आप उससे मिलने आई हैं?' वह टकटकी बाँधे देखती रही, फिर हँस पड़ी। 'उससे मिलने — मेरे पति से? यहाँ? इस मौसम में वह हमेशा काउज़ या बाडेन में रहता है।' 'उसने किसी को भेजा है?'
'हाँ।' 'चिट्ठी लेकर?' उसने सिर हिलाया। 'नहीं, बस एक संदेश। वह चिट्ठी कभी नहीं लिखता। मुझे उसकी शायद एक ही चिट्ठी मिली होगी।' इस ज़िक्र से उसका चेहरा लाल हो गया, और वह लाली आर्चर के चेहरे पर भी उतर आई। 'वह लिखता क्यों नहीं?' 'क्यों लिखे? सेक्रेटरी किसलिए होते हैं?' युवक का चेहरा और लाल हो गया। उसने वह शब्द ऐसे कहा था जैसे उसके शब्दकोश में उसका कोई ख़ास वज़न न हो। पल-भर को उसकी ज़बान पर आया: 'तो उसने अपना सेक्रेटरी भेजा है?' पर काउंट ओलेंस्की की पत्नी को लिखी उस इकलौती चिट्ठी की याद बहुत ताज़ा थी। वह झिझका, फिर नए सिरे से पूछा: 'और वह आदमी?' 'दूत? वह दूत...' ओलेंस्का ने मुस्कान बनाए हुए जवाब दिया, 'अब तक जा भी सकता था; पर वह शाम तक रुकने पर अड़ा रहा... शायद... शायद कोई गुंजाइश बच जाए, इस उम्मीद में...' 'और आप उस गुंजाइश पर सोचने बाहर निकलीं?' 'नहीं, बस हवा खाने निकली थी। होटल में दम घुटता है। दोपहर की ट्रेन से पोर्ट्समथ लौट जाऊँगी।' वे कुछ देर चुप बैठे रहे, एक-दूसरे को देखे बिना, सामने से गुज़रते लोगों को ताकते। आख़िर उसने फिर उसके चेहरे की ओर देखा और कहा:
'आप बदले नहीं हैं।' वह कहना चाहता था: 'मैं बदल गया था — आपको दोबारा देखने तक'; पर उसके बदले वह झटके से उठा और मैले, उमस भरे पार्क पर नज़र दौड़ाई। 'यहाँ तो बुरा हाल है। थोड़ी देर खाड़ी की ओर चलें? हवा चलेगी, ठंडक रहेगी। पॉइंट आर्ली वाला स्टीमर ले सकते हैं।' उसने हिचकिचाते हुए उसकी ओर देखा, और वह कहता गया: 'सोमवार की सुबह है, नाव पर कोई नहीं होगा। मेरी ट्रेन शाम को है — न्यूयॉर्क लौट रहा हूँ। क्यों नहीं?' उसने उसे निहारते हुए आग्रह किया; और फिर जैसे फूट पड़ा: 'हमने वह सब नहीं किया जो हमसे बन पड़ता था?' 'ओह...' वह फिर धीमे से बुदबुदाई। वह उठी, छतरी खोली और चारों ओर ऐसे देखा मानो जगह से ही पूछ रही हो कि यहाँ रुका नहीं जा सकता। फिर उसकी निगाहें उसके चेहरे पर लौट आईं। 'आपको मुझसे ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।' 'आप जो चाहें वही कहूँगा; या कुछ भी नहीं कहूँगा। आप न कहें तो मुँह भी नहीं खोलूँगा। इससे किसी का क्या बिगड़ता है? मैं तो बस आपकी बातें सुनना चाहता हूँ,' वह हकलाया। उसने तामचीनी की ज़ंजीर से लटकी छोटी सुनहरी घड़ी निकाली। 'अरे, मिनट मत गिनिए,' वह फूट पड़ा। 'आज का दिन मुझे दे दीजिए। मैं आपको उस आदमी से दूर ले जाना चाहता हूँ। उसने कितने बजे आने को कहा था?' उसके चेहरे पर फिर लाली दौड़ गई। 'ग्यारह बजे।' 'तो हमें अभी चलना होगा।'
'चिंता मत कीजिए। मैं न लौटूँ, बस इतनी-सी बात है।' 'आपको भी डरने की ज़रूरत नहीं — अगर मेरे साथ चलें। क़सम से, मैं बस आपकी बातें सुनना चाहता हूँ। जानना चाहता हूँ, इतने दिन कैसे बीते। लगता है सौ साल हो गए मिले हुए; शायद अगली मुलाक़ात में और सौ लग जाएँ।' वह अब भी हिचकिचा रही थी, बेचैन आँखों से उसका चेहरा देखती। 'नानी के घर आई थी उस दिन, आप समुद्र-तट पर मुझे लेने क्यों नहीं आए?' उसने पूछा। 'क्योंकि आपने मुड़कर नहीं देखा। आपको पता ही नहीं था कि मैं वहाँ हूँ। मैंने क़सम खाई थी — आप न मुड़ीं तो नहीं जाऊँगा।' अपने बचकाने इक़बाल पर वह हँस पड़ा। 'पर मैंने जान-बूझकर मुड़कर नहीं देखा।' 'जान-बूझकर?' 'मुझे पता था आप वहाँ हैं। बग्घी भीतर आई तो मैंने टट्टू पहचान लिए। इसीलिए समुद्र-तट पर चली गई।' 'मुझसे जितना हो सके दूर जाने के लिए?' उसने धीमी आवाज़ में दोहराया: 'आपसे जितना हो सके दूर जाने के लिए।' वह फिर लड़कों जैसी तृप्ति से हँसा। 'देख लीजिए, कोई फ़ायदा नहीं। अब कह ही दूँ,' उसने जोड़ा, 'मैं यहाँ आया ही आपको ढूँढ़ने था। पर देखिए, हमें अभी निकलना होगा, वरना नाव छूट जाएगी।' 'हमारी नाव?' वह उलझन में माथा सिकोड़ती रही, फिर मुस्कराई। 'अच्छा, पर पहले होटल जाना होगा: एक रुक़्क़ा छोड़ना है।' 'जितने चाहें रुक़्क़े। यहीं लिख लीजिए।' उसने नोटकेस और नए फ़ैशन का एक फ़ाउंटेन पेन निकाला।
'लिफ़ाफ़ा भी है। देखिए, सब कुछ पहले से तय है! लीजिए, काग़ज़ घुटने पर रखिए; मैं पल-भर में पेन जगा देता हूँ। इसे फुसलाना पड़ता है... ठहरिए।' उसने पेन वाला हाथ बेंच की पीठ पर थपथपाया। 'जैसे थर्मामीटर का पारा झटकते हैं — बस एक तरकीब। अब लिखिए।' वह हँसी, और नोटकेस पर बिछे काग़ज़ पर झुककर लिखने लगी। आर्चर कुछ दूर टहलने लगा, भीड़ को बिना देखे ताकता। राहगीर ठिठककर यह नज़ारा देखते: बेंच पर घुटने पर चिट्ठी लिखती बनी-ठनी महिला। ओलेंस्का ने काग़ज़ लिफ़ाफ़े में डाला, नाम लिखा और जेब में रख लिया। फिर वह भी उठ खड़ी हुई। वे बीकन स्ट्रीट की ओर बढ़े, और क्लब के पास आर्चर को वही 'हर्डिक' बग्घी दिखी जो उसका रुक़्क़ा पार्कर हाउस पहुँचा चुकी थी।
कोचवान घोड़े को सुस्ताने देकर नुक्कड़ की टोंटी पर माथा भिगो रहा था। 'कहा था न, सब पहले से तय है! देखिए, हमारे लिए बग्घी हाज़िर है!' उस शहर में, जहाँ किराये की बग्घियों के अड्डे अब भी केवल 'विलायत' में मिलने वाला अजूबा थे, ऐसी चमत्कारी सवारी हाथ लगने पर दोनों हँस पड़े। आर्चर ने घड़ी देखी और हिसाब लगाया कि स्टीमर घाट से पहले पार्कर हाउस होते जाने का समय है। वे तपती सड़कों पर खड़खड़ाते हुए दौड़े और होटल के दरवाज़े पर रुके। आर्चर ने चिट्ठी के लिए हाथ बढ़ाया। 'मैं दे आऊँ?' उसने पूछा; पर ओलेंस्का ने सिर हिलाया, फुर्ती से बग्घी से उतरी
और शीशे के दरवाज़े के भीतर ओझल हो गई। अभी साढ़े दस ही बजे थे; पर क्या पता वह दूत, जवाब की राह देखते-देखते ऊबकर, वक़्त काटने का कोई उपाय न पाकर, उन्हीं मुसाफ़िरों के बीच ठंडे शरबत लिए बैठा हो जिन पर आर्चर की नज़र उसके भीतर जाते समय पड़ी थी। आर्चर बग्घी के आगे टहल-टहलकर बेचैनी से इंतज़ार करने लगा। नस्तासिया जैसी आँखों वाले एक सिसिली लड़के ने उसके जूते चमकाने की पेशकश की; एक आयरिश अधेड़ स्त्री आड़ू बेचने की कोशिश करती रही; और हर कुछ मिनट पर दरवाज़ा खुलता, पीछे को खिसकाए भूसे के हैट पहने, गर्मी से बेहाल आदमी निकलते और गुज़रते-गुज़रते उसे घूर जाते। उसे अचरज हुआ कि दरवाज़ा इतनी बार खुलता है, और निकलने वाले सब आपस में कितने एक-से दिखते हैं — और उन तमाम गर्मी से बेहाल आदमियों जैसे भी, जो उस घड़ी देश-भर के होटलों के घूमते दरवाज़ों से आ-जा रहे थे। और तभी अचानक एक चेहरा गुज़रा जिसे वह बाक़ियों से जोड़ नहीं पाया। बस एक झलक — आर्चर उस समय अपनी चहलक़दमी के सबसे दूर सिरे पर था: दुबले चेहरों, थके चेहरों, गोल-मटोल हैरान चेहरों और पिचके ठुड्डी वाले सीधे-सादे चेहरों के बीच एक नितांत अलग चेहरा।
उस चेहरे में एक साथ कई बातें थीं: वह किसी नौजवान का चेहरा था — वह भी पीला, गर्मी या फ़िक्र से निढाल, पर किसी तरह ज़्यादा जीवंत, ज़्यादा सजग — या शायद इतना अलग था, इसीलिए ऐसा लगा। आर्चर ने पल-भर स्मृति का महीन धागा टटोला; पर धागा टूट गया और चेहरा दूर होता गया — ज़ाहिरन किसी विदेशी कारोबारी का चेहरा, इस परिवेश में दोहरा परदेसी। वह भीड़ की धारा में खो गया, और आर्चर फिर अपनी गश्त पर लौट आया। वह नहीं चाहता था कि होटल की नज़रों के सामने घड़ी हाथ में लिए दिखे, सो उसने वक़्त का अंदाज़ा मन में लगाया: वह इतनी देर से नहीं निकली, इसका मतलब ज़रूर दूत से टकरा गई है और उसने उसे रोक रखा है। इस ख़याल से उसकी बेचैनी तड़प बनती गई। 'अभी न निकली तो भीतर जाकर ढूँढ़ूँगा,' वह बुदबुदाया। तभी दरवाज़ा फिर खुला और वह उसके बग़ल में आ खड़ी हुई। वे बग्घी में बैठे, और घड़ी निकालने पर आर्चर ने देखा कि वह केवल तीन मिनट भीतर रही थी। ढीले शीशों की उस खड़खड़ाहट में, जो बातचीत असंभव कर देती थी, वे ऊबड़-खाबड़ पत्थरों पर दौड़ते घाट तक पहुँचे। आधी ख़ाली नाव की बेंच पर अग़ल-बग़ल बैठे, उन्होंने पाया कि उनके पास कहने को
शायद ही कुछ है। या यों कहें, जो कहना था वह दोनों के साथ होने की उस मुक्ति और एकांत भरी धन्य चुप्पी में ही सबसे अच्छे ढंग से कहा जा रहा था। पतवार-पहिए घूमने लगे और घाट व जहाज़ गर्मी की धुंध में धुँधलाते दूर खिसकने लगे, तो आर्चर को लगा कि जाना-पहचाना पुराना संसार भी साथ ही दूर सरक रहा है। उसका मन हुआ कि ओलेंस्का से पूछे, क्या उसे भी वैसा ही लग रहा है — जैसे वे किसी ऐसे लंबे सफ़र पर निकले हों जहाँ से शायद लौटना न हो। पर वह कहने से डर गया — किसी भी ऐसे शब्द से डर गया जो उसके नाज़ुक भरोसे को डिगा दे; सच तो यह है कि वह उस भरोसे से दग़ा नहीं करना चाहता था। ऐसे दिन और रातें रही थीं जब उनके चुंबन की याद उसके होंठ जला देती थी; कल पोर्ट्समथ के रास्ते में भी उसकी याद लौ की तरह उसे झुलसा गई थी। पर अब वह उसके पास थी, और दोनों इस अनजान दुनिया में बहे जा रहे थे; वे मानो निकटता की उस गहराई तक आ पहुँचे थे जिसे एक स्पर्श भी तोड़ सकता था। जहाज़ बंदरगाह से निकलकर खुले समुद्र की ओर मुड़ा तो हवा चल पड़ी, और तेल-सी चिकनी खाड़ी फुहार उड़ाती लहरियों में टूट गई। उमस की धुंध शहर पर अब भी टँगी थी, पर आगे लहराते पानी और धूप में चमकते प्रकाश-स्तंभों वाले दूर के अंतरीपों की एक ताज़ा दुनिया खुल रही थी। ओलेंस्का जहाज़ के जँगले से टिकी, अधखुले होंठों से ठंडक पी रही थी। हैट पर लंबा घूँघट लिपटा था पर चेहरा खुला था, और आर्चर उसके शांत, प्रसन्न भाव पर मुग्ध होता रहा। वह इस जोखिम भरे सैर को सहज मानकर चल रही थी: अनचाही मुलाक़ातों से न डरती हुई, न ही (जो और बुरा होता) उनकी संभावना से रोमांचित।
सराय के मामूली भोजन-कक्ष में, जिसे आर्चर अपने लिए पाने की आस रखता था, छुट्टी मनाती भोली नौजवान टोली शोर मचा रही थी — मालिक बोला, स्कूल-शिक्षक हैं। आर्चर का दिल बैठ गया। 'नामुमकिन है। अलग कमरा माँगता हूँ।'
ओलेंस्का ने आपत्ति नहीं की; वह कमरा ढूँढ़ने गया तो प्रतीक्षा करती रही। कमरा समुद्र की ओर खुले लंबे बरामदे से लगा था; खिड़कियों से समुद्र दिखता था। सादा, ठंडा कमरा; चारख़ाने मेज़पोश पर अचार का मर्तबान और जाली तले ब्लूबेरी पाई। चोरी-छिपे मिलने वाले प्रेमियों का ठिकाना मानने में न आने जितना भोला यह कमरा मानो दोनों को राहत दे रहा था; और आर्चर ने वह राहत उस मुस्कान में पढ़ ली जिसके साथ ओलेंस्का उसके सामने बैठी। अपने पति से — और अफ़वाहों के मुताबिक़ किसी दूसरे मर्द के साथ — भाग निकली स्त्री ने शायद हर स्थिति को सहज मान लेना सीख लिया हो। पर उसकी स्थिरता में कुछ था जो आर्चर की विडंबना कुंद कर देता था। शांत, सरल बरताव से उसने सारे रिवाज बुहार दिए थे: लगा, ढेरों बातें साझा करने वाले दो पुराने दोस्तों का एकांत चाहना सबसे स्वाभाविक बात है...