हिंदी संस्करण

अध्याय 57

इस अजीब मुलाक़ात ने एलिज़ाबेथ का मन बुरी तरह उलझा दिया। वह जल्दी शांत नहीं हुआ। कई घंटों तक उसने उस बात को न सोचने की कोशिश की, पर हो ही नहीं सका। लेडी कैथरीन रोज़िंग्स से यहाँ तक ख़ास इसीलिए चली आई थीं कि मिस्टर डार्सी और एलिज़ाबेथ की सचमुच मँगनी हो चुकी है, इस अटकल को तोड़ दें। कैसी ख़ूब सोची हुई तरकीब थी! पर दोनों की मँगनी की वह अफ़वाह शुरू कहाँ से हुई, यह उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। फिर ध्यान आया कि मिस्टर डार्सी बिंगली के गहरे दोस्त हैं और वह ख़ुद जेन की छोटी बहन — इतना ही काफ़ी था। एक ब्याह सामने देखकर सब लोग दूसरे ब्याह की भी बड़ी चाह रखने लगे थे। ऐसा ख़याल उठ ही सकता था। एलिज़ाबेथ के मन में भी यह उम्मीद थी कि बहन के ब्याह के बाद मिस्टर डार्सी से मुलाक़ातें और बढ़ेंगी। सो अफ़वाह कैसे फैली, इसका अंदाज़ा भी उसे लग गया। लूकस लॉज के पड़ोसियों ने कॉलिन्स दंपति के साथ जो बातें कीं, उन्हीं के रास्ते वह बात लेडी कैथरीन तक पहुँची होगी। उन पड़ोसियों ने बस इतना किया था — जिसे एलिज़ाबेथ कभी आगे चलकर हो सकने वाली बात मानती थी, उसे उन्होंने लगभग पक्की और अभी-अभी होने वाली ठहरा दिया। पर लेडी कैथरीन की बातें दोबारा सोचीं, तो एलिज़ाबेथ को कुछ डर हुआ कि उस औरत के यूँ दख़ल देते रहने से आगे क्या होगा। ब्याह रोकने की ठान ली है — यह सुनकर लगा कि वे भतीजे से सीधे बात करने की सोच रही होंगी। मौसी मिस्टर डार्सी के आगे भी ठीक इसी तरह गिनाने लगें कि उससे नाता जोड़ने में कौन-कौन सी मुसीबतें हैं, तो वे उसे कैसे लेंगे? एलिज़ाबेथ कुछ भी तय करने की हिम्मत नहीं कर सकी। मिस्टर डार्सी अपनी मौसी को कितना चाहते हैं, और उनकी परख पर कितना भरोसा करते हैं — यह भी उसे मालूम नहीं था। फिर भी यही सोचना ज़्यादा स्वाभाविक था कि वे उसके मुक़ाबले लेडी कैथरीन को कहीं ऊँचा मानते होंगे। जिस औरत के नज़दीकी रिश्तेदारों का दर्जा उनसे बहुत अलग है, उससे ब्याह करने पर कौन-कौन सी बदनसीबी आएगी — मौसी एक-एक करके यह गिनाएँ, तो वे मिस्टर डार्सी की सबसे कमज़ोर जगह पर ही हाथ रख देंगी। मान-मर्यादा को लेकर उनकी सोच याद करें, तो जो बातें एलिज़ाबेथ को हलकी और हास्यास्पद लगती थीं, वही उन्हें ख़ासी समझदारी और तर्क भरी लग सकती थीं। वे पहले से ही दुविधा में थे कि क्या करें — और सचमुच ऐसा लगने के मौक़े कई बार आए थे — तो नज़दीकी रिश्तेदार की सलाह और मिन्नत उनकी सारी दुविधा ख़त्म कर सकती थी। और यह भी हो सकता था कि वे जल्द ही यह ठान लें कि बेदाग़ मान-मर्यादा जितनी ख़ुशी की इजाज़त देती है, उतने में ही सुखी रहेंगे। तब वे लौटकर नहीं आएँगे। लेडी कैथरीन लंदन जाते हुए रास्ते में उनसे मिल भी सकती थीं। और नेदरफ़ील्ड लौट आने का जो वादा उन्होंने बिंगली से किया था, वह भी वे नहीं निभाएँगे। 'सो कुछ ही दिनों में उस दोस्त के पास यह बहाना पहुँच जाए कि वे वादा नहीं निभा सकते,' एलिज़ाबेथ ने आगे सोचा, 'तो मैं समझ जाऊँगी कि इसका मतलब क्या है। तब मैं यह उम्मीद भी छोड़ दूँगी और यह चाह भी कि वे मुझसे उसी तरह प्यार करते हैं। मेरा प्यार और मेरा हाथ, दोनों उन्हें मिल सकते थे — फिर भी वे बस मेरे लिए अफ़सोस करके ही संतुष्ट रह जाते हैं, तो जल्द ही मैं भी उनके लिए ज़रा भी अफ़सोस नहीं करूँगी।' मेहमान कौन थीं, यह सुनकर घर के बाक़ी लोग बहुत हैरान हुए। पर जिस अटकल ने श्रीमती बेनेट की उत्सुकता शांत की थी, उसी से उन्होंने भी बड़ी कृपा करके ख़ुद को समझा लिया। सो एलिज़ाबेथ को इस बात पर बहुत ज़्यादा परेशान करने वाले सवाल नहीं झेलने पड़े।

अगली सुबह एलिज़ाबेथ नीचे उतर रही थी, तभी पुस्तकालय से बाहर आते पिताजी से उसका सामना हो गया। पिताजी के हाथ में एक चिट्ठी थी। 'लिज़ी,' पिताजी बोले। 'मैं तुम्हें ही ढूँढ़ने जा रहा था। मेरे कमरे में आ जाओ।' एलिज़ाबेथ पिताजी के पीछे चली। पिताजी जो सुनाने वाले हैं, उसका उस चिट्ठी से नाता ज़रूर होगा — यही लगा। इससे उसकी उत्सुकता और बढ़ गई। अचानक ख़याल आया कि कहीं यह चिट्ठी लेडी कैथरीन की तो नहीं। आगे जो सफ़ाई देनी पड़ेगी, उसका डर उसे लगा। पिताजी के पीछे-पीछे वह फ़ायरप्लेस के पास पहुँची। फिर दोनों बैठ गए। पिताजी बोले। 'आज सुबह मुझे एक चिट्ठी मिली, जिसने मुझे बहुत ही हैरान कर दिया। मामला ज़्यादातर तुमसे जुड़ा है, सो तुम्हें भी पता होना चाहिए कि उसमें क्या लिखा है। मुझे तो पहले मालूम ही नहीं था कि मेरी दो-दो बेटियों का ब्याह होने वाला है। इतनी बड़ी फ़तह पाने पर तुम्हें बधाई।' पल भर में उसे यक़ीन हो गया कि चिट्ठी मौसी की नहीं, भतीजे की है। एलिज़ाबेथ के गाल लाल हो गए। मिस्टर डार्सी ने जैसे-तैसे अपने मन की बात कह तो दी — इस पर ख़ुश हो? या यह कि चिट्ठी उन्होंने उसे नहीं, पिताजी को भेजी — इस पर ग़ुस्सा करे? एलिज़ाबेथ तय ही नहीं कर पाई कि किस ओर जाए। तभी पिताजी ने आगे कहा। 'चेहरे पर चोर दिख रहा है। जवान लड़कियों की नज़र ऐसी बातों में बहुत तेज़ होती है। पर मैं दावे से कहता हूँ कि तुम्हारी इतनी पैनी समझ से भी उस चाहने वाले का नाम पकड़ में नहीं आएगा। यह चिट्ठी मिस्टर कॉलिन्स की है।' 'मिस्टर कॉलिन्स की! उनके पास कहने को क्या हो सकता है?' 'कहने को बहुत ही काम की बातें हैं, ज़ाहिर है। शुरुआत तो बड़ी बेटी के होने वाले ब्याह की बधाई से होती है। लगता है, भले मन वाले और बातूनी लुकास लोगों में से किसी ने उन्हें बता दिया। वह हिस्सा पढ़कर तुम्हारी बेसब्री से नहीं खेलूँगा। तुमसे जुड़ा हिस्सा यह रहा। «इस मंगल अवसर पर श्रीमती कॉलिन्स की और मेरी हार्दिक बधाई इस प्रकार निवेदित कर देने के पश्चात्, अब मैं उसी सूत्र से ज्ञात हुए एक अन्य विषय पर संक्षिप्त परामर्श जोड़ना चाहता हूँ। कहा जा रहा है कि ज्येष्ठ पुत्री के बेनेट नाम त्याग देने के उपरांत आपकी पुत्री एलिज़ाबेथ भी अधिक समय तक वह नाम धारण नहीं करेंगी। उन्होंने जिन्हें अपने जीवन-साथी के रूप में चुना है, वे इस देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक माने जाने योग्य हैं।» लिज़ी, अंदाज़ा लगा सकती हो कि किसकी बात हो रही है? «ये युवा सज्जन उस सब से विशेष रूप से संपन्न हैं, जिसकी मानव-हृदय सर्वाधिक कामना कर सकता है — उत्तम संपत्ति, कुलीन संबंधी और विस्तृत संरक्षण। किंतु इन समस्त प्रलोभनों के होते हुए भी, मैं अपनी चचेरी बहन एलिज़ाबेथ को तथा आपको यह चेतावनी देना चाहता हूँ कि इन सज्जन का प्रस्ताव अत्यंत शीघ्रता से स्वीकार कर लेने पर कैसी विपत्ति आ सकती है। निस्संदेह आप दोनों उस अवसर को तत्काल पकड़ लेना चाहेंगे।» लिज़ी, समझ आया कि ये सज्जन कौन हैं? पर अब भेद खुलता है। «मेरे इस प्रकार सावधान करने का कारण यह है। यह मानने का आधार है कि उनकी मौसी लेडी कैथरीन डी बर्ग इस विवाह को अच्छी दृष्टि से नहीं देखतीं।» देखो तो, मिस्टर डार्सी निकले! लो लिज़ी। इस बार तो लगता है मैंने तुम्हें चौंका ही दिया। मिस्टर कॉलिन्स या लुकास वाले हमारे जान-पहचान वालों में से किसी को भी चुन लेते, तो क्या सिर्फ़ उस नाम भर से अपनी बात के झूठ होने का इससे पक्का सबूत दे पाते? मिस्टर डार्सी — जो किसी औरत की ओर तब तक देखते तक नहीं, जब तक उसमें कोई ऐब न ढूँढ़ना हो, और जिसने शायद ज़िंदगी भर में तुम्हें एक बार भी नहीं देखा होगा! क्या ख़ूब!'

एलिज़ाबेथ ने पिताजी के मज़ाक़ में साथ हँसने की कोशिश की। पर बड़ी मुश्किल से बस एक बनावटी मुस्कान ही निकल पाई। पिताजी की हाज़िरजवाबी कभी इतनी नागवार जगह की ओर नहीं मुड़ी थी। 'मज़ेदार नहीं है?' 'जी हाँ। आगे पढ़िए।' '«बीती रात मैंने लेडी कैथरीन के समक्ष इस विवाह की संभावना का उल्लेख किया, तो उन्होंने अपनी सदा की कृपापूर्ण उदारता से तत्काल ही इस विषय पर अपने विचार प्रकट कर दिए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मेरी चचेरी बहन के पक्ष की कुछ पारिवारिक आपत्तियों के कारण वे इस विवाह को — जिसे उन्होंने कलंकपूर्ण विवाह कहा — कभी स्वीकृति नहीं देंगी। मैंने यह अपना कर्तव्य समझा कि यह समाचार यथाशीघ्र पहुँचा दूँ, जिससे मेरी चचेरी बहन और उनके कुलीन प्रशंसक यह जानते हुए क़दम उठाएँ कि वे कर क्या रहे हैं, और विधिवत् अनुमति के बिना किसी विवाह में उतावली से न कूद पड़ें।» मिस्टर कॉलिन्स ने आगे यह भी जोड़ा है। «चचेरी बहन लिडिया का दुखद प्रसंग इतनी भली-भाँति शांत हो गया, इससे मुझे हार्दिक प्रसन्नता है। किंतु चिंता इस बात की है कि विवाह से पूर्व दोनों का साथ रहना इतने व्यापक रूप से विदित हो गया। फिर भी अपने पद के कर्तव्य की उपेक्षा मैं नहीं कर सकता, इसलिए यह सुनकर अपना आश्चर्य प्रकट किए बिना नहीं रह सकता कि विवाह होते ही आपने उस युवा दंपति को अपने घर में स्वीकार कर लिया। वह तो दुराचार को प्रोत्साहन देना ही था। मैं लॉन्गबर्न का पल्ली-पादरी होता, तो अत्यंत दृढ़ता से इसका विरोध करता। ईसाई होने के नाते आपको उन्हें क्षमा तो अवश्य करनी चाहिए, किंतु उन्हें फिर कभी अपनी आँखों के सामने न आने दीजिए, और न ही उनका नाम अपने कानों तक पहुँचने दीजिए।» यही है उनकी समझ की ईसाई क्षमा! बाक़ी चिट्ठी में बस अपनी प्यारी शार्लट की हालत और एक नन्ही जैतून की डाल के आने की उम्मीद की बातें हैं। पर लिज़ी, तुम्हारे चेहरे पर तो मज़ा आने के निशान ही नहीं। ऐसी हलकी अफ़वाह से बुरा मान जाने का दिखावा करके नख़रे तो नहीं दिखाओगी? हम जीते ही किसलिए हैं — पड़ोसियों को हँसने का सामान देने के लिए, और अपनी बारी आने पर उन पर हँसने के लिए, और किसलिए?' 'अरे,' एलिज़ाबेथ बोल उठी। 'बहुत ही मज़ेदार है। पर कितनी अजीब बात है!' 'हाँ, मज़ा तो इसी बात का है। किसी और आदमी को चुना होता, तो कुछ भी न होता। पर उनकी पूरी-पूरी बेपरवाही और तुम्हारी खुली नफ़रत — इन्हीं की वजह से बात इतनी मज़ेदार बेतुकी बन गई! लिखने से मुझे कितनी ही चिढ़ क्यों न हो, मिस्टर कॉलिन्स से चिट्ठी-पत्री करना मैं किसी भी क़ीमत पर नहीं छोड़ूँगा। उनकी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं अपने दामाद की बेशर्मी और पाखंड को चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न आँकूँ, मिस्टर कॉलिन्स को विकहम से ज़्यादा पसंद किए बिना रह ही नहीं पाता। पर लिज़ी, लेडी कैथरीन ने इस अफ़वाह के बारे में क्या कहा? क्या वे अपनी मंज़ूरी देने से इनकार करने आई थीं?' बेटी ने जवाब में सिर्फ़ हँसी दी। पिताजी ने यह बात ज़रा भी शक किए बिना पूछी थी, इसलिए दोबारा पूछे जाने पर भी उसे तकलीफ़ नहीं हुई। अपने सच्चे मन से अलग चेहरा बनाना एलिज़ाबेथ को इससे पहले कभी इतना मुश्किल नहीं लगा था। रोने का मन था और हँसना पड़ रहा था। मिस्टर डार्सी की बेपरवाही को लेकर पिताजी ने जो कहा, उसने उसे बेहद निर्दयता से शर्मिंदा किया। अचरज इस बात का था कि पिताजी को इतना भी नहीं सूझा। या फिर उसे यही डरना पड़ा कि पिताजी ने बहुत कम नहीं देखा — बल्कि उसने ख़ुद ही बहुत ज़्यादा कल्पना कर ली है।