हिंदी संस्करण

अध्याय 58

एलिज़ाबेथ को आधा-अधूरा अंदाज़ा था कि बिंगली के पास दोस्त की ओर से वही बहाने वाली चिट्ठी पहुँचेगी। पर लेडी कैथरीन के आने के कुछ ही दिन बाद बिंगली मिस्टर डार्सी को लॉन्गबर्न ले आने में कामयाब रहे। दोनों सज्जन जल्दी पहुँच गए। बिंगली जेन के साथ अकेले रहना चाहते थे, सो उन्होंने सबको साथ टहलने चलने को कहा। श्रीमती बेनेट मिस्टर डार्सी से मौसी की मुलाक़ात का ज़िक्र छेड़तीं, उससे पहले ही। एलिज़ाबेथ को हर पल उसी बात का डर लगा हुआ था। सबने हाँ कर दी। श्रीमती बेनेट को टहलने की आदत नहीं थी, और मैरी को फ़ुरसत नहीं मिलती थी। बाक़ी पाँच लोग साथ निकल पड़े। पर बिंगली और जेन ने जल्दी ही दूसरों को आगे निकल जाने दिया। दोनों पीछे रह गए। एलिज़ाबेथ, किटी और मिस्टर डार्सी को आपस में एक-दूसरे का मन बहलाना था। किसी की ज़बान से मुश्किल से ही कोई बात निकली। किटी मिस्टर डार्सी से इतना डरती थी कि बोल ही नहीं पाई। एलिज़ाबेथ मन ही मन जान लड़ा देने वाला एक फ़ैसला कर रही थी। शायद वे भी वैसा ही कोई फ़ैसला कर रहे थे। किटी मरिया से मिलना चाहती थी। सो वे लुकास परिवार के घर की तरफ़ चल पड़े। एलिज़ाबेथ को लगा कि उस मुलाक़ात में सबका जाना ज़रूरी नहीं। किटी उन दोनों को छोड़कर चली गई, तो एलिज़ाबेथ ने हिम्मत बाँधी और मिस्टर डार्सी के साथ अकेली आगे बढ़ती रही। अब अपना फ़ैसला पूरा करने का वक़्त था। हिम्मत बची हुई थी, तभी उसने तुरंत बात छेड़ दी।

'मिस्टर डार्सी, मैं बहुत ख़ुदग़रज़ हूँ। अपना मन हलका करने के लिए मैं यह सोचना ही नहीं चाहती कि इससे इनके मन को कितनी बड़ी ठेस पहुँचेगी। अपनी बेचारी छोटी बहन पर की गई आपकी बेहद मेहरबानी के लिए अब मैं शुक्रिया कहे बिना नहीं रह सकती। जब से वह बात मुझे मालूम हुई, तब से मैं कितनी एहसानमंद रही हूँ — यह कहने को मन तड़प उठा। घर के बाक़ी लोगों को भी मालूम होता, तो बात सिर्फ़ मेरे शुक्रिया तक नहीं रुकती।' मिस्टर डार्सी ने हैरान और भावनाओं से भरी आवाज़ में जवाब दिया। 'मुझे अफ़सोस है कि आपको वह बात मालूम हो गई, जिसे ग़लत ढंग से देखा जाए तो वह आपको परेशान कर सकती है। बहुत ही अफ़सोस है। मुझे नहीं लगा था कि श्रीमती गार्डिनर इस तरह भेद नहीं रख पाएँगी।' 'मामी को दोष मत दीजिए। लिडिया ने बिना सोचे कुछ कह दिया, तभी पहली बार मुझे पता चला कि इस मामले में इनका हाथ रहा है। फिर पूरी बात जाने बिना मुझसे रहा ही नहीं गया। उन दोनों को ढूँढ़ने के लिए इतनी दौड़-धूप की, इतनी शर्मिंदगी झेली — इस बड़े दिल के लिए मैं अपने पूरे परिवार की ओर से बार-बार शुक्रिया कहती हूँ।' 'शुक्रिया कहना ही है,' उन्होंने जवाब दिया, 'तो सिर्फ़ अपनी ओर से कहिए। आपको सुखी देखने की चाह ने मुझे चलाने वाली दूसरी वजहों को और बल दिया — इससे मैं इनकार नहीं करूँगा। पर आपके घरवालों का मुझ पर कोई क़र्ज़ नहीं। उनका जितना भी आदर करूँ, मुझे लगता है कि मैंने सिर्फ़ आपके बारे में सोचा था।' एलिज़ाबेथ इतनी घबरा गई कि एक शब्द भी न बोल सकी। पल भर बाद उन्होंने जोड़ा। 'आपका दिल इतना बड़ा है कि आप मेरी भावनाओं से खेलेंगी नहीं। पिछले अप्रैल वाली भावनाएँ अब भी वही हैं, तो अभी कह दीजिए। मेरा प्यार और मेरी चाह नहीं बदली है। पर आपका एक शब्द काफ़ी है — फिर इस बात पर मैं हमेशा के लिए चुप हो जाऊँगा।' एलिज़ाबेथ समझ गई कि इस घड़ी उनकी हालत उसकी अपनी हालत से कहीं ज़्यादा अजीब और बेचैन है। अब उसे ज़बरदस्ती ही सही, बोलना था। शब्द आसानी से नहीं निकले। फिर भी उसने बता दिया कि उनके कहे उस वक़्त के बाद से उसका मन बहुत बदल चुका है। और यह भी तुरंत कह दिया कि अभी सुनी बात को वह एहसान और ख़ुशी के साथ क़बूल करती है। इस जवाब ने जो ख़ुशी दी, वैसी ख़ुशी उन्होंने पहले कभी महसूस नहीं की होगी। गहरे प्यार में डूबा आदमी जितनी गरमजोशी और सच्चाई से अपना मन खोल सकता है, उन्होंने उतना ही खोला। एलिज़ाबेथ उनकी आँखों में देख पाती, तो देखती कि चेहरे पर फैली वह सच्ची ख़ुशी उन पर कितनी फबती है। देख तो नहीं सकी। पर सुन ज़रूर सकती थी। मिस्टर डार्सी ने बताया कि वह उनके लिए कितनी अहम है, और उनके मन के भीतर क्या-क्या है। वह प्यार हर बार सुनने पर और क़ीमती लगता गया।

वे किस तरफ़ जा रहे हैं, इसका होश रखे बिना दोनों चलते रहे। सोचने, महसूस करने और कहने को इतना कुछ था। किसी और बात पर ज़रा भी ध्यान नहीं गया। एलिज़ाबेथ को जल्दी ही पता चल गया कि दोनों के बीच यह समझ बनने में मिस्टर डार्सी की मौसी का भी हाथ रहा। लेडी कैथरीन लंदन से गुज़रते हुए सचमुच उनसे मिलने गई थीं। लॉन्गबर्न तक जाने की बात, उसकी वजह, और एलिज़ाबेथ से हुई बातचीत का सार — सब सुना डाला। एलिज़ाबेथ की जिन-जिन बातों को वे उसकी हठ और बेशर्मी की निशानी मानती थीं, उन सब पर उन्होंने ज़ोर देकर दोहराया। उन्हें भरोसा था कि यह सब सुनाने से भतीजे से वह वादा लेने में मदद मिलेगी, जो उन्हें ख़ुद नहीं मिल पाया था। पर लेडी कैथरीन के लिए बदक़िस्मती यह रही कि नतीजा ठीक उल्टा निकला। उन्होंने कहा। 'आपने मुझे ऐसी उम्मीद दी, जिसकी पहले मैं मुश्किल से ही हिम्मत कर पाता था। आपका स्वभाव मैं अच्छी तरह जानता हूँ। मुझे कभी न अपनाने का पक्का इरादा आपने कर लिया होता, तो लेडी कैथरीन से साफ़ और खुलकर यह कह देतीं — इसका मुझे यक़ीन था।' एलिज़ाबेथ का चेहरा लाल हुआ और वह हँस पड़ी। 'हाँ, मेरी साफ़गोई आप जानते ही हैं, सो यक़ीन कर लिया होगा कि मैं ऐसा कर सकती हूँ। इनके मुँह पर इतनी बुरी तरह इल्ज़ाम लगा चुकी थी, तो इनके सारे रिश्तेदारों के आगे वैसा ही कहने में मुझे क्या झिझक होती।' 'आपने जो कुछ कहा, उसमें ऐसा क्या था जिसका मैं हक़दार नहीं था? इल्ज़ामों की बुनियाद ग़लत थी और ग़लत समझ से बनी थी — यह सच है। पर उस दिन आपके साथ मेरा जो बरताव रहा, वह सबसे कड़ी फटकार का ही हक़दार था। वह माफ़ी के लायक़ नहीं था। उसे याद करते ही मन घिन से भर जाता है।' 'उस रात के क़सूर में बड़ा हिस्सा किसका था, इस पर हम झगड़ा न करें।' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'सख़्ती से देखें तो दोनों में से किसी का बरताव बेदाग़ नहीं था। फिर भी उम्मीद है कि उसके बाद से हम दोनों की शिष्टता कुछ बेहतर हुई है।' 'मैं ख़ुद से इतनी आसानी से सुलह नहीं कर सकता। उस दिन मैंने जो कहा, जो किया, मेरा ढंग और पूरी बातचीत में मेरे इस्तेमाल किए शब्द — यह सब याद आते ही आज भी तकलीफ़ होती है। पिछले कई महीने ऐसे ही बीते हैं। आपने जो फटकार बिल्कुल सही मौक़े पर लगाई, वह मैं कभी नहीं भूलूँगा। «अगर आप कुछ और शालीनता से पेश आते।» यही आपके शब्द थे। वे शब्द मुझे कितना सालते रहे, आपको मालूम नहीं। आप अंदाज़ा भी मुश्किल से लगा पाएँगी। बस इतना क़बूल करता हूँ कि उन्हें सही मानने लायक़ समझ लौटने में मुझे कुछ वक़्त लगा।' 'मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वह बात इस क़दर मन में बैठ जाएगी। आप उसे इस तरह लेंगे, यह मैंने ज़रा भी नहीं सोचा था।' 'यह मान लेना मेरे लिए आसान है। तब आप मुझे ऐसा आदमी समझती थीं, जिसके भीतर सही भावना नाम की कोई चीज़ ही नहीं। ज़रूर ऐसा ही रहा होगा। जब आपने कहा कि मैं चाहे किसी भी ढंग से प्रस्ताव रखता, आपको उसे स्वीकार करने पर राज़ी नहीं कर सकता था — उस वक़्त आपके चेहरे का भाव मैं कभी नहीं भूलूँगा।' 'अरे, उस वक़्त कही बातें दोहराइए मत। वैसी यादों में कुछ भी अच्छा नहीं। यक़ीन मानिए, मैं बहुत दिनों तक सच में शर्मिंदा रही हूँ।'

मिस्टर डार्सी ने अपनी लिखी चिट्ठी का ज़िक्र छेड़ा। 'उस चिट्ठी ने,' उन्होंने कहा, 'आपको मेरे बारे में कुछ बेहतर सोचने पर पहुँचाया? पढ़ते हुए उसकी बातों पर आपको ज़रा भी यक़ीन हुआ?' एलिज़ाबेथ ने बताया कि उस चिट्ठी का उस पर क्या असर हुआ। यह भी कहा कि पहले पाले हुए सारे पूर्वाग्रह किस तरह धीरे-धीरे मिटते चले गए। 'मैं जानता था कि मेरे लिखे शब्द आपको तकलीफ़ देंगे। पर वह ज़रूरी था।' उन्होंने कहा। 'उम्मीद है, वह चिट्ठी आपने नष्ट कर दी होगी। ख़ास तौर पर एक हिस्सा ऐसा है, जिसे आप दोबारा पढ़ सकती हैं — यह सोचकर ही मुझे डर लगता है। शुरुआत वाला हिस्सा। कुछ ऐसे शब्द याद आते हैं, जिनके बाद आपका मुझसे नफ़रत करना जायज़ ही था।' 'उस चिट्ठी को जलाना मेरा स्नेह बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, ऐसा आपको लगता हो, तो मैं उसे ज़रूर जला दूँगी। पर मेरी राय बिल्कुल नहीं बदलेगी, ऐसा मानने की वजह हम दोनों में से किसी के पास नहीं है। फिर भी उम्मीद है कि वह इतनी आसानी से भी नहीं बदलती, जितना उस बात से झलकता है।' मिस्टर डार्सी ने जवाब दिया। 'वह चिट्ठी लिखते वक़्त मुझे लगता था कि मैं पूरी तरह शांत और ठंडे दिमाग़ का हूँ। पर बाद में समझ आया। वह चिट्ठी बेहद कड़वाहट भरे मन से लिखी गई थी।' 'शायद शुरुआत कड़वी रही हो, पर अंत वैसा नहीं था। विदाई की पंक्तियों में तो सिर्फ़ करुणा भरी है। पर चिट्ठी की बात अब और मत सोचिए। जिसने वह लिखी और जिसने पाई, दोनों के मन अब उस वक़्त से बहुत अलग हो चुके हैं। उससे जुड़ी हर बुरी बात भुला देनी चाहिए। मेरा थोड़ा दर्शन भी आपको सीखना होगा। बीती बातों में से उतना ही याद कीजिए, जितने से ख़ुशी मिले।' 'आप में ऐसा दर्शन है, यह मैं नहीं मान सकता। बीती बातें याद करने पर ख़ुद को कोसने लायक़ आपके पास कुछ है ही नहीं। उससे मिलने वाला संतोष दर्शन नहीं, उससे कहीं अच्छी चीज़ है — कुछ भी न जानने से आने वाला संतोष। पर मेरे साथ ऐसा नहीं है। तकलीफ़ देने वाली यादें बीच में आ ही जाती हैं। न उन्हें हटाया जा सकता है, न हटाना चाहिए। मैं ज़िंदगी भर उसूलों में नहीं, पर बरताव में ख़ुदग़रज़ रहा। बचपन में मुझे सिखाया गया कि सही क्या है। पर अपने मिज़ाज को सुधारना नहीं सिखाया गया। अच्छे उसूल मुझे मिले। पर राह दिखाने वाला कोई नहीं था, सो मैंने उन उसूलों को घमंड और अकड़ के साथ निभाया। बदक़िस्मती से मैं इकलौता बेटा था, और कई बरसों तक इकलौती संतान भी। सो माँ-बाप ने मुझे सिर चढ़ा लिया। वे दोनों भले इंसान थे। पिताजी तो ख़ास तौर पर दयालु और नरम दिल के थे। पर उन्होंने मुझे ख़ुदग़रज़ और दूसरों को दबाने वाला बनने दिया, बल्कि उकसाया भी। लगभग वही सिखाया भी। यही कि अपने घरवालों के सिवा किसी की परवाह न करूँ, और बाक़ी सारी दुनिया को नीचा समझूँ। कम से कम इतना ज़रूर मानूँ कि उनकी अक्ल और उनकी क़ीमत मेरी अपनी अक्ल और क़ीमत से कमतर है। आठ बरस से अट्ठाईस बरस तक मैं ऐसा ही रहा। सबसे प्यारी, सबसे सुंदर एलिज़ाबेथ, आप न होतीं तो शायद आज भी वैसा ही होता! मुझ पर आपका कितना बड़ा एहसान है, यह आपको मालूम नहीं। आपने मुझे एक सबक़ दिया — पहले-पहल बहुत तकलीफ़देह, पर उससे ज़्यादा फ़ायदेमंद कोई नहीं। आपकी वजह से मैं सही मायने में विनम्र हुआ। मैं यह ज़रा भी शक किए बिना गया था कि मुझे क़बूल कर लिया जाएगा। आपने दिखा दिया कि जो औरत ख़ुश किए जाने के लायक़ है, उसे ख़ुश करने के लिए मेरे पास जो कुछ था, वह कितना कम पड़ता है।' 'क्या आपको सचमुच यक़ीन था कि मैं हाँ कह दूँगी?' 'हाँ, था। मेरी इस ख़ुदपसंदी के बारे में आप क्या सोचेंगी? मुझे लगता था कि आप मेरे प्रस्ताव की चाह रखती हैं और उसका इंतज़ार भी कर रही हैं।' 'लगता है, मेरे बरताव में भी कोई ख़ामी रही होगी। पर यक़ीन दिलाती हूँ, वह जान-बूझकर नहीं था। धोखा देने का इरादा मेरा कभी नहीं रहा। बस अपने चंचल स्वभाव की वजह से कभी-कभी ग़लत बरत गई होऊँगी। उस शाम के बाद आपने मुझसे कितनी नफ़रत की होगी!' 'आपसे नफ़रत! शुरू में शायद ग़ुस्सा रहा हो। पर वह ग़ुस्सा जल्दी ही उस तरफ़ मुड़ने लगा, जिस तरफ़ उसे मुड़ना चाहिए था।' 'पेम्बरली में मुलाक़ात हुई, तब आपने मेरे बारे में क्या सोचा — यह पूछते हुए लगभग डर लगता है। मेरे वहाँ आ जाने पर क्या आपने मुझे दोष दिया?' 'नहीं। हैरानी के सिवा मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ।' 'मेरी हैरानी भी उससे कम नहीं थी। मेरा मन कहता था कि किसी ख़ास शिष्टाचार की हक़दार मैं नहीं हूँ। मानती हूँ, मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था कि जितना मेरा हक़ बनता है, उससे ज़्यादा मान मिलेगा।' मिस्टर डार्सी ने जवाब दिया। 'उस वक़्त मेरा इरादा यही था कि जितना शिष्टाचार मुझसे बन पड़े, सब दिखा दूँ। मैं जताना चाहता था कि बीती बातों का बैर पाल लूँ, इतना छोटा दिल मेरा नहीं है। आपकी फटकार मैंने मन में बैठा ली है, यह दिखाकर मैं माफ़ी पाना चाहता था और अपने बारे में आपकी बुरी राय कुछ नरम करना चाहता था। इसके बाद कोई और चाह कितनी जल्दी बीच में आ घुसी, यह बता पाना मुश्किल है। मेरे ख़याल से आपको देखने के आधे घंटे बाद ही।' फिर मिस्टर डार्सी ने बताया कि एलिज़ाबेथ से जान-पहचान होने पर जॉर्जियाना कितनी ख़ुश हुई थी। यह भी कहा कि मुलाक़ातें अचानक टूट जाने से वह कितनी निराश हुई। बात अपने आप उस वजह तक पहुँच गई, जिससे मुलाक़ातें टूटी थीं। एलिज़ाबेथ को जल्दी ही पता चल गया कि उसकी छोटी बहन को ढूँढ़ने के लिए डर्बीशायर से उसके पीछे जाने का इरादा वे सराय छोड़ने से पहले ही बना चुके थे। वहाँ वे जो गंभीर और गहरी सोच में डूबे दिखे थे, उसकी वजह भी बस यही थी — वह काम पूरा करने में उठने वाली उधेड़बुन। एलिज़ाबेथ ने फिर से शुक्रिया कहा। पर यह बात दोनों के लिए इतनी तकलीफ़देह थी कि वे उस पर ज़्यादा देर नहीं रुके।

दोनों कई मील तक धीरे-धीरे चलते रहे। बातों में इतने खोए थे कि इसका ज़रा भी होश नहीं रहा। आख़िर घड़ी देखी, तब पता चला कि घर लौटने का वक़्त हो चुका है। 'मिस्टर बिंगली और जेन कहाँ चले गए होंगे?' दोनों को यही उत्सुकता हुई। और इसी से बात अपने आप उन दोनों के मामले पर आ गई। मिस्टर डार्सी उनकी मँगनी से बहुत ख़ुश थे। बिंगली ने सबसे पहले यह ख़बर उन्हीं को दी थी। एलिज़ाबेथ ने कहा। 'मुझे पूछना होगा कि आपको हैरानी हुई या नहीं।' 'ज़रा भी हैरानी नहीं हुई। जाते वक़्त ही मुझे लग गया था कि यह बात जल्दी होने वाली है।' 'यानी आपने अपनी इजाज़त दे दी थी। मुझे यही लगा था।' मिस्टर डार्सी ने इस बात पर एतराज़ जताया। पर एलिज़ाबेथ को पता चल गया कि असल में बात लगभग ऐसी ही थी। उन्होंने कहा। 'लंदन के लिए निकलने से एक शाम पहले मैंने बिंगली के आगे वह बात क़बूल कर ली, जो बहुत पहले कह देनी चाहिए थी। पहले उनके मामले में मेरा दख़ल देना कितना बेतुका और कितना गुस्ताख़ था — यह दिखाने वाली बाद की सारी बातें मैंने बता दीं। वे बहुत हैरान हुए। उन्हें ज़रा भी शक नहीं था। मैंने यह भी कहा कि आपकी बड़ी बहन के मन में उनके लिए कुछ नहीं है, ऐसा मेरा अंदाज़ा ग़लत था — अब मुझे यही लगता है। यह देखना आसान था कि वे आज भी आपकी बड़ी बहन को चाहते हैं। सो इसमें भी मुझे ज़रा भी शक नहीं रहा कि दोनों साथ में सुखी रहेंगे।' अपने दोस्त को राह दिखाने का उनका ढंग इतना सहज था कि एलिज़ाबेथ मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। 'जब आपने कहा कि मेरी बड़ी बहन उन्हें चाहती हैं,' उसने कहा, 'तो क्या यह आपने ख़ुद देखकर कहा? या पिछले बसंत में मेरे बताए पर ही भरोसा किया?' 'यह मैंने ख़ुद देखकर तय किया था। हाल में दो बार यहाँ आने के दौरान मैंने आपकी बड़ी बहन को ग़ौर से देखा, और उनके प्यार का यक़ीन हो गया।' 'और आपका यह यक़ीन सुनते ही उन्होंने फ़ौरन मान लिया होगा।' 'हाँ। बिंगली बिना बनावट के विनम्र इंसान हैं। इतने बड़े मामले में उन्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं था, सो अपनी परख पर भी यक़ीन नहीं कर सके। पर मेरी परख पर भरोसा था, इसलिए सब कुछ आसान हो गया। एक बात मुझे क़बूल करनी पड़ी। उसी की वजह से वे कुछ समय के लिए नाराज़ हुए, और नाराज़ होना बनता भी था। पिछली सर्दियों में आपकी बड़ी बहन तीन महीने लंदन में रहीं, यह मुझे मालूम था और मैंने जान-बूझकर उनसे छिपाए रखा — यह बात मैं उनसे छिपा नहीं सकता था। वे नाराज़ हुए। पर मुझे यक़ीन है कि उनकी नाराज़गी तभी तक रही, जब तक आपकी बड़ी बहन के मन को लेकर उन्हें ज़रा भी शक था। अब उन्होंने मुझे दिल से माफ़ कर दिया है।' एलिज़ाबेथ का मन हुआ कि कह दे — मिस्टर बिंगली इतने बढ़िया दोस्त हैं कि उन्हें इतनी आसानी से राह पर लाया जा सकता है, सो उनकी क़ीमत आँकी ही नहीं जा सकती। पर उसने ख़ुद को रोक लिया। मिस्टर डार्सी को अपने ऊपर हँसी सह लेना अभी सीखना बाक़ी था। और यह भी याद आया कि शुरुआत करने के लिए वक़्त कुछ जल्दी है। अपनी ख़ुशी के बाद सबसे बड़ी ख़ुशी बिंगली की ही होगी — यह तस्वीर पहले से देखते हुए वे घर पहुँचने तक बात करते रहे। दोनों ड्योढ़ी में जुदा हुए।