हिन्दी संस्करण
अध्याय 20
'बेशक हमें श्रीमती कारफ़्राई के यहाँ भोजन पर जाना चाहिए, प्रिये,' आर्चर ने कहा। नाश्ते की मेज़ के पार से पत्नी ने चिंतित नज़र से उसे देखा। बरसाती, वीरान शरद के लंदन में आर्चर दंपती बस दो लोगों को जानते थे; और उन्हीं से जान-बूझकर बच रहे थे — पुराने न्यूयॉर्क के दस्तूर में परदेस में ख़ुद बढ़कर परिचितों से मिलना 'शिष्टता के विरुद्ध' था।
श्रीमती आर्चर और जेनी ने यूरोप में इस नियम को कठोरता से निभाया। सहयात्रियों की हर मैत्री-भरी पहल का उत्तर ऐसी बर्फ़ीली रुखाई से मिलता कि होटल-कर्मचारियों के सिवा किसी 'अजनबी' से एक शब्द न बोलने का कीर्तिमान लगभग बन जाता। देशवासियों से वे और रूखी थीं; सो शिवर्स या मिंगट का कोई न टकराए, तो विदेश के महीने माँ-बेटी अकेले काटतीं। पर अचानक मुलाक़ातें हो ही जातीं।
बोत्ज़ेन में एक रात सामने के कमरे में ठहरी दो अंग्रेज़ महिलाओं में से एक ने श्रीमती आर्चर का दरवाज़ा खटखटाया और मालिश का तेल माँगा। उसकी बहन — श्रीमती कारफ़्राई — को अचानक ब्रॉन्काइटिस का दौरा पड़ा था; और श्रीमती आर्चर, जो घरेलू दवा-पेटी के बिना कभी सफ़र न करती थीं, संयोग से वह दवा दे सकीं। श्रीमती कारफ़्राई काफ़ी बीमार थीं; साथ में केवल बहन मिस हार्ल थी, इसलिए आर्चर माँ-बेटी की सेवा और उनकी कुशल नौकरानी की मदद के लिए वे कृतज्ञता से भर उठीं। बोत्ज़ेन छोड़ते समय श्रीमती आर्चर ने सोचा भी न था कि
श्रीमती कारफ़्राई और मिस हार्ल से फिर मिलना होगा। उनकी नज़र में, जिस 'अजनबी' की संयोग से मदद की हो उस पर ख़ुद को थोपने से बड़ी अशिष्टता कोई न थी। पर कारफ़्राई बहनों को इसकी ख़बर तक न थी; उन 'प्यारे अमेरिकियों' से, जिन्होंने बोत्ज़ेन में उन पर इतनी कृपा की थी, वे जीवन-भर के रिश्ते से बँध गईं। मार्मिक निष्ठा से वे हर मौक़ा ताकतीं, और माँ-बेटी कब लंदन से गुज़रेंगी, अद्भुत सटीकता से भाँप लेतीं। रिश्ता अटूट हो गया; ब्राउन होटल पहुँचते ही श्रीमती आर्चर और जेनी को दो स्नेही सहेलियाँ प्रतीक्षा करती मिलतीं — जो उन्हीं की तरह शीशे के बक्सों में फ़र्न उगातीं, मैक्रमे की झालर बुनतीं, बैरोनेस बुन्सेन के संस्मरण पढ़तीं और लंदन के प्रमुख धर्मोपदेशकों पर राय रखतीं। श्रीमती आर्चर कहतीं, कारफ़्राई-परिचय से लंदन 'बिलकुल दूसरा शहर' लगने लगा; और न्यूलैंड की सगाई तक मैत्री इतनी गहरी थी कि विवाह-निमंत्रण भेजना 'स्वाभाविक कर्तव्य' ठहरा; जवाब में शीशे में जड़े आल्प्स के सूखे फूल आए। और घाट पर, जब न्यूलैंड और मे इंग्लैंड रवाना हो रहे थे, माँ के अंतिम शब्द थे: 'मे को श्रीमती कारफ़्राई से मिलाने ज़रूर ले जाना।' न्यूलैंड और उसकी पत्नी का ऐसा कोई इरादा न था;
पर श्रीमती कारफ़्राई ने अपनी अचूक सूझ से उन्हें ढूँढ़ निकाला और भोजन का निमंत्रण भेज दिया; इसी निमंत्रण के कारण मे आर्चर चाय और मफ़िन के आगे माथे पर बल डाले बैठी थी। 'तुम्हारे लिए तो ठीक है, न्यूलैंड; तुम उन्हें जानते हो। पर अनजान लोगों के बीच मैं अटपटा महसूस करूँगी। और पहनूँगी क्या?' न्यूलैंड कुर्सी पर पीछे टिककर मुस्कराया। वह पहले से भी सुंदर लग रही थी, पहले से भी अधिक डायना-सी; इंग्लैंड की नम हवा ने उसके गालों की रंगत और गुलाबी कर दी थी, चेहरे की कठोर रेखाएँ नरम कर दी थीं; या शायद यह भीतर की ख़ुशी थी, जो बर्फ़ के नीचे रोशनी-सी झलक रही थी। 'पहनोगी क्या, प्रिये? पिछले हफ़्ते ही तो पेरिस से पूरा संदूक़ आया था?' 'हाँ, वही तो। मतलब, समझ नहीं आता कौन-सी पोशाक ठीक रहेगी।' उसने हल्का-सा मुँह फुलाया। 'लंदन में मैंने कभी भोजन पर बाहर खाना नहीं खाया, और मैं हास्यास्पद नहीं दिखना चाहती।' 'पर अंग्रेज़ महिलाएँ भी तो शाम को बाक़ी सबकी तरह ही सजती हैं?' 'न्यूलैंड! कैसी बातें करते हो! वे तो थिएटर में पुराने बॉल-गाउन और नंगे सिर जाती हैं।' 'तो शायद घर पर नए बॉल-गाउन पहनती हों;
पर श्रीमती कारफ़्राई और मिस हार्ल नहीं पहनेंगी। वे मेरी माँ जैसी टोपियाँ लगाएँगी — और शालें; बहुत मुलायम शालें।' 'हाँ, पर बाक़ी औरतें क्या पहनेंगी?' 'तुमसे अच्छा तो कुछ नहीं, प्रिये।' उसे अचरज हुआ कि मे में जेनी जैसी पोशाक-चिंता कहाँ से आ गई। मे ने आह भरकर कुर्सी पीछे खिसकाई। 'शुक्रिया, न्यूलैंड; पर इससे मेरी कोई मदद नहीं हुई।' उसे एक सूझ आई। 'अपना शादी का जोड़ा क्यों नहीं पहन लेतीं? वह तो कभी ग़लत नहीं हो सकता।' 'काश! पर वह तो पेरिस भेजा है, सर्दियों के लिए ठीक कराने। वर्थ ने अभी लौटाया नहीं।' 'अच्छा, तो...' न्यूलैंड उठ खड़ा हुआ। 'देखो, कोहरा छँट रहा है। अभी नेशनल गैलरी चलें तो तस्वीरें देखने का कुछ वक़्त मिल जाएगा।' आर्चर दंपती तीन महीने के हनीमून के बाद घर लौट रहे थे। सहेलियों को लिखे पत्रों में मे ने इस यात्रा का सार
बस इतना दिया था: 'परम आनंद'। इटली की झीलों पर वे नहीं गए; आर्चर ने मान लिया कि वह जगह पत्नी को रास न आएगी। मे (पेरिस के दर्ज़ियों के साथ एक महीना बिताकर) जुलाई में पहाड़ चढ़ना और अगस्त में समुद्र-स्नान चाहती थी। योजना ज्यों-की-त्यों निभी: जुलाई इंटरलाकेन-ग्रिंडलवाल्ड में, अगस्त नॉर्मंडी के शांत एत्रेता में। पहाड़ों में एक-दो बार आर्चर ने दक्षिण की ओर इशारा किया: 'वह रहा इटली'; और जेंटियन के फूलों में खड़ी मे ने मुस्कराकर कहा: 'अगली सर्दियों में वहाँ चलें तो कितना अच्छा हो — बशर्ते तुम्हें न्यूयॉर्क में न रहना पड़े।' पर सच तो यह था कि यात्रा में मे की रुचि आर्चर की उम्मीद से कहीं कम निकली। पोशाकें बन जाने के बाद उसके लिए यात्रा बस टहलने,
घुड़सवारी, तैराकी और नए-नए सीखे लॉन-टेनिस का विस्तृत मैदान थी। आख़िर लंदन पहुँचकर (जहाँ आर्चर को कपड़े सिलवाने दो हफ़्ते रुकना था) मे ने खुलकर न्यूयॉर्क लौटने की बेताबी जताई। लंदन में उसे बस थिएटर और दुकानों में दिलचस्पी थी; और थिएटर भी पेरिस के उन गीत-कैफ़े से फीके लगे जहाँ रेस्तराँ की छत से नीचे 'कोकोत' दर्शकों को देखने का नया अनुभव मिला था, और पति ने गीतों के बोल दुल्हन के कानों लायक़ बनाकर सुनाए थे। आर्चर विवाह के बारे में विरासत में मिली सारी पुरानी धारणाओं पर लौट आया था। परंपरा के अनुरूप मे के साथ वैसा ही बरताव करना
जैसा मित्र अपनी पत्नियों से करते थे, कुँवारेपन के उन्मुक्त सिद्धांतों को निभाने से कहीं आसान निकला। जिस पत्नी को अपनी परतंत्रता का आभास तक न हो, उसे आज़ाद करने की कोशिश बेमानी थी; और वह जान चुका था कि मे अपनी आज़ादी का एक ही उपयोग करेगी — उसे पति-भक्ति की वेदी पर चढ़ा देना। जन्मजात गरिमा उसे यह भेंट कभी दीन होकर देने से बचाए रखती; और शायद किसी दिन (जैसा एक बार हुआ था) वह उसे वापस लेने की ताक़त भी पा लेती, अगर उसे लगता कि पति की भलाई इसी में है। पर विवाह की उसकी सीधी-सादी, प्रश्नहीन समझ में ऐसा संकट तभी आ सकता था जब पति खुल्लमखुल्ला बेवफ़ाई करे; और आर्चर के प्रति उसकी भावनाओं की कोमलता ऐसी कल्पना को असंभव बना देती थी। जो भी हो, मे सदा वफ़ादार, साहसी और शिकायत-रहित रहेगी; और यही बात आर्चर को भी वही गुण निभाने की सौगंध दिलाती थी। यह सब उसे पुराने ढर्रे की ओर खींच लाया। अगर उसकी सादगी किसी संकीर्ण मन की सादगी होती,
तो वह झुँझलाकर विद्रोह कर बैठता। पर मे का स्वभाव, चेहरे की ही तरह, उसी सुघड़ साँचे में ढला था; और वह आर्चर के भीतर बसी हर पुरानी परंपरा और श्रद्धा की अधिष्ठात्री देवी बन गई। ये गुण यात्रा को रोचक भले न बनाते हों, पर इनसे मे बड़ी सहज, सुखद संगिनी थी; और आर्चर देख रहा था कि सही परिवेश में ये गुण अपनी जगह पा लेंगे। उसे दबने का डर न था: उसका बौद्धिक और कलात्मक जीवन पहले की तरह घर के दायरे से बाहर चलता रहेगा; और घर में कुछ भी घुटा-घुटा न होगा — पत्नी के पास लौटना कभी खुले मैदान से बंद कमरे में आने जैसा न लगेगा। और बच्चे होंगे, तो दोनों की ज़िंदगियों के ख़ाली कोने भर जाएँगे। मेफ़ेयर से साउथ केंसिंग्टन तक की लंबी, धीमी सवारी में यही सब उसके दिमाग़ में घूमता रहा — जहाँ श्रीमती कारफ़्राई रहती थीं। आर्चर भी उनके आतिथ्य से बचना ही चाहता था: पारिवारिक परंपरा के मुताबिक़ वह हमेशा एक दर्शक की तरह, तटस्थ अजनबी बनकर यात्रा करता था। सिर्फ़ एक बार, हार्वर्ड से निकलते ही, उसने फ़्लोरेंस में
कुछ मस्ती-भरे हफ़्ते अजीब यूरोपीकृत अमेरिकियों संग बिताए थे — महलों में ख़िताबधारी महिलाओं के साथ रात-भर नाच, क्लब के छैलों के साथ आधे दिन जुआ। सब बड़ी मौज लगते हुए भी कार्निवल जितना बेमानी था। वे विचित्र स्त्रियाँ अपने उलझे प्रेम-प्रसंगों में डूबी थीं, जिन्हें वे हर मिलने वाले को सुनाती फिरतीं; और चमकदार युवा अफ़सर व रँगी हुई हज़रतें उन राज़ों के पात्र बनते। पर वे आर्चर की दुनिया से इतने दूर, महँगे महकते ग्रीनहाउस-पौधों जैसे थे, कि कल्पना को देर तक बाँध न सके। ऐसे समाज में पत्नी को ले जाना सोचा भी नहीं जा सकता था; और वैसे भी, यात्रा में किसी समाज ने उसकी मौजूदगी की विशेष चाह नहीं दिखाई। लंदन पहुँचने के कुछ ही समय बाद उसकी टक्कर ड्यूक ऑफ़ सेंट ऑस्ट्री से हो गई;
ड्यूक ने उसे तुरंत पहचानकर गर्मजोशी से कहा: 'मिलने आइए, ज़रूर'; पर कोई भी होश वाला अमेरिकी ऐसे न्योते पर अमल करने की न सोचता, और मुलाक़ात वहीं ख़त्म हो गई। वे मे की अंग्रेज़ मौसी — बैंकर की पत्नी — से भी बचे रहे, जो अब तक यॉर्कशायर में थीं; सच तो यह है कि उन्होंने लंदन-यात्रा जान-बूझकर पतझड़ तक टाली थी, ताकि अनजान रिश्तेदारों के आगे भरे मौसम में पहुँचना दिखावा न लगे। 'श्रीमती कारफ़्राई के यहाँ शायद ही कोई होगा — इस मौसम में लंदन वीराना है। और तुमने ज़रूरत से ज़्यादा सज-धज कर ली है,' आर्चर ने कहा। बग़ल में बैठी मे इतनी बेदाग़ चमक रही थी — हंस-रोम किनारी वाले आसमानी लबादे में — कि उसे लंदन की कालिख में यों बाहर निकालना ही पाप लगे। 'मैं नहीं चाहती वे समझें कि हम जंगलियों की तरह कपड़े पहनते हैं,' मे ने ऐसी हिक़ारत से कहा कि पोकाहोंटस भी बुरा मान जाती; और आर्चर एक बार फिर चकित रह गया कि अमेरिकी स्त्रियाँ, कम-से-कम छिछोरी भी, पोशाक के सामाजिक महत्व को कैसी धार्मिक श्रद्धा देती हैं। 'यही इनका कवच है,' उसने सोचा, 'अनजान दुनिया के विरुद्ध ढाल भी, और ललकार भी।' और पहली बार वह समझा कि जिस मे ने उसे रिझाने को कभी एक रिबन तक न बाँधा, उसने इतनी गंभीरता से भारी वस्त्रागार क्यों चुना और सिलवाया। अनुमान सही निकला — श्रीमती कारफ़्राई की दावत छोटी ही थी।
लंबे, ठंडे बैठक-कक्ष में मेज़बान बहनों के अलावा बस एक और शाल ओढ़े महिला, उनके पति — एक सौम्य पादरी, एक चुप-सा लड़का जो श्रीमती कारफ़्राई का भतीजा था, और चमकीली आँखों वाला एक छोटा-सा साँवला सज्जन — भतीजे का शिक्षक, जिसका फ़्रांसीसी नाम लेकर परिचय कराया गया। इस धुँधले, फीके समूह में मे आर्चर सूर्यास्त में तैरती हंसिनी-सी उतरी। पति ने उसे कभी इतना दमकता, इतना सुंदर न देखा था; और वह जानता था कि यह लाली और सरसराहट भीषण संकोच के लक्षण हैं। 'क्या बात करूँ मैं इनसे!' — उसकी बेबस आँखें आर्चर से गुहार कर रही थीं। पर सौंदर्य, ख़ुद पर संदेह करते हुए भी, पुरुषों के हृदय में विश्वास जगा देता है; पादरी और फ़्रांसीसी नाम वाले शिक्षक ने जल्द ही उसे सहज करने की कोशिशें शुरू कर दीं। फिर भी भोज ढीला ही रहा। आर्चर ने देखा कि विदेशियों के आगे ख़ुद को जताने का मे का तरीक़ा था — ठेठ अपने वतन की बातों से चिपके रहना; उसका सौंदर्य प्रशंसा बुलाता, पर उसकी बातचीत उत्साह को ठंडा कर देती। पादरी ने जल्द हार मान ली; पर धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने वाला शिक्षक तब तक निभाता रहा जब तक महिलाएँ — सबकी स्पष्ट राहत के बीच — बैठक की ओर न उठ गईं।
पादरी शेरी का एक गिलास पीकर किसी सभा में चला गया; बीमार भतीजे को सोने भेज दिया गया। पर आर्चर और शिक्षक शराब के साथ बैठे रहे; और अचानक आर्चर ने पाया कि नेड विनसेट के साथ हुई आख़िरी बहस के बाद से ऐसी बातचीत उसने की ही नहीं थी। पता चला, कारफ़्राई-भतीजे को क्षय-रोग का ख़तरा था; हैरो छोड़कर उसे दो साल स्विट्ज़रलैंड की नरम जलवायु में, लेमान झील के किनारे रहना पड़ा था। किताबों का शौक़ीन लड़का महाशय रिवियेर को सौंपा गया था, जो उसे इंग्लैंड वापस लाए थे और बसंत में ऑक्सफ़र्ड जाने तक साथ रहेंगे; उसके बाद, रिवियेर ने सादगी से जोड़ा, उन्हें कोई और काम ढूँढ़ना होगा। आर्चर ने सोचा — इतनी रुचियों और प्रतिभाओं वाला आदमी बेकार नहीं रह सकता। वह क़रीब तीस का पुरुष था; चेहरा दुबला और बदसूरत (मे उसे ज़रूर 'मामूली शक्ल' कहती), पर विचारों की क्रीड़ा से वह चेहरा अनोखा जीवंत हो उठता था — और उस जोश में छिछोरेपन या सस्तेपन की छाया तक न थी।
रिवियेर के दिवंगत पिता किसी छोटे राजनयिक पद पर थे; बेटे को भी उसी राह चलना था, पर साहित्य की अदम्य भूख उसे पहले पत्रकारिता में, फिर लेखन में (ज़ाहिरा नाकाम) खींच ले गई, और अंत में — ऐसे उतार-चढ़ावों के बाद जिन्हें उसने गिनाया नहीं — वह स्विट्ज़रलैंड में अंग्रेज़ लड़कों का शिक्षक बना। उससे पहले वह बरसों पेरिस में रहा; गोंकूर बंधुओं की साहित्यिक 'अटारी' में आता-जाता रहा; मोपासां ने उसे लिखने की कोशिश छोड़ने की सलाह दी थी (आर्चर को यह भी चकाचौंध भरा सम्मान लगा!); और अपनी माँ के घर वह मेरिमे से अक्सर बातें करता था। ज़ाहिर था कि वह सदा से ग़रीब और फ़िक्रमंद रहा (माँ और अविवाहित बहन का भरण-पोषण भी उसी पर था); साहित्यिक आकांक्षाएँ नाकाम रहीं। सुनने में उसकी हालत नेड विनसेट से बेहतर न थी; पर वह ऐसी दुनिया में जिया था जहाँ, जैसा उसने कहा, विचार-प्रेमी कभी आत्मिक भूखा नहीं रहता। इसी प्रेम की भूख में बेचारा विनसेट घुल रहा था; और आर्चर उस जोशीले, कंगाल-मगर-अमीर युवक को दूसरों की ओर से ईर्ष्या करता देखता रहा।
'देखिए महाशय, बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखना, अपनी आलोचना-दृष्टि और रस-बोध को गिरवी न रखना — इसी की ख़ातिर मैंने पत्रकारिता छोड़ी और शिक्षकी व निजी सचिवगिरी जैसे कहीं नीरस काम अपनाए। मेहनत बेशक भारी है; पर आदमी अपनी आत्मिक आज़ादी बचा लेता है — जिसे हम फ़्रांसीसी में कहते हैं 'काँ-ता-स्वा'। अच्छी बातचीत सुनकर आदमी उसमें शामिल हो सकता है, या चुपचाप सुनते हुए मन-ही-मन जवाब दे सकता है। आह! अच्छी बातचीत — उससे बढ़कर क्या है? विचारों की हवा ही साँस लेने लायक़ इकलौती हवा है। इसीलिए मैंने कूटनीति और पत्रकारिता छोड़ने का कभी अफ़सोस नहीं किया — दोनों आत्म-त्याग के दो अलग रूप ही तो हैं।' उसने नई सिगरेट सुलगाते हुए आर्चर पर चमकती नज़रें गड़ाईं। 'देखिए, महाशय — ज़िंदगी को सीधी आँख देख पाने के लिए अटारी में रहना भी वाजिब सौदा है, है न? पर सच यह है कि अटारी का किराया भी तो चाहिए; और मैं मानता हूँ कि उम्र-भर निजी शिक्षक — या कोई भी 'निजी' कुछ — बने रहना बुखारेस्ट में दूसरा सचिव बनने जितना ही दिल बिठा देता है। कभी-कभी लगता है, कोई बड़ी छलाँग लगानी होगी। मसलन:
क्या आपको लगता है कि अमेरिका में — न्यूयॉर्क में — मेरे लायक़ कोई जगह होगी?' आर्चर ने अवाक होकर उसे देखा। न्यूयॉर्क — गोंकूर और फ़्लोबेर की संगत वाले, विचारों के जीवन को ही एकमात्र जीवन मानने वाले युवक के मुँह से! वह असमंजस में ताकता रहा — कैसे कहे कि यही ख़ूबियाँ न्यूयॉर्क में उसकी सबसे पक्की रुकावट बनेंगी। 'न्यूयॉर्क... न्यूयॉर्क ही क्यों?' वह हकलाया, समझ न पाते हुए कि उसका शहर ऐसे युवक को क्या दे सकता है जिसके लिए अच्छी बातचीत ही अकेली ज़रूरत हो। रिवियेर के पीले चेहरे पर अचानक लाली दौड़ गई। 'मुझे... मुझे लगा वह आपकी महानगरी है: क्या वहाँ बौद्धिक जीवन ज़्यादा सजीव नहीं?' फिर, यह भाव न छोड़ने को कि वह मदद माँग रहा था, जल्दी से बोला: 'यूँ ही कह दिया — ख़ुद से ही ज़्यादा। फ़िलहाल कोई संभावना दिखती नहीं—' और उठते हुए सहज भाव से जोड़ा: 'श्रीमती कारफ़्राई सोचती होंगी कि मुझे आपको अब तक
ऊपर ले आना चाहिए था।' घर लौटती सवारी में आर्चर इसी मुलाक़ात में डूबा रहा। रिवियेर के साथ बिताया घंटा फेफड़ों में ताज़ी हवा भरने जैसा था, और पहली उमंग यही थी कि कल उसे भोजन पर बुलाए। पर वह समझने लगा था कि विवाहित पुरुष अपनी पहली उमंगों पर तुरंत अमल क्यों नहीं कर पाते। 'वह शिक्षक दिलचस्प आदमी है: खाने के बाद किताबों और कई चीज़ों पर बड़ी अच्छी बातें हुईं,' उसने बग्घी में टटोलते हुए कहा। मे उन स्वप्निल चुप्पियों में से एक से जागी, जिनमें आर्चर ने कभी कितने ही अर्थ पढ़े थे — इससे पहले कि छह महीने के दांपत्य ने उनकी कुंजी थमा दी।
'वह छोटा-सा फ़्रांसीसी? कितनी मामूली शक्ल का था!' उसने ठंडे स्वर में कहा; और आर्चर भाँप गया कि मे मन-ही-मन इस निराशा को पाल रही थी कि लंदन में उन्हें एक पादरी और एक फ़्रांसीसी शिक्षक से मिलने बुलाया गया। यह घमंड नहीं था — यह पुराने न्यूयॉर्क का वह स्वाभिमान था जो परदेस में अपनी हैसियत का लिहाज़ माँगता है: मे के माता-पिता ने पाँचवें एवेन्यू पर कारफ़्राई बहनों का सत्कार किया होता, तो उनसे भारी-भरकम मेहमान ही मिलवाए होते। पर आर्चर चिढ़ा हुआ था; उसने टोक दिया: 'मामूली — कैसे मामूली?' 'क्यों, अपनी कक्षा के बाहर तो हर जगह। ये लोग समाज में हमेशा बेढंगे रहते हैं। पर हाँ,' उसने नरमी से जोड़ा, 'मैं यह नहीं जान सकती थी कि वह विद्वान भी है या नहीं।' 'विद्वान' शब्द पर आर्चर को 'मामूली' जितनी ही खीज हुई; पर वह डरने भी लगा था कि मे में जो-जो खलता है, उसी-उसी पर उसकी नज़र क्यों टिक जाती है। आख़िर उसकी दृष्टि उसी दुनिया की देन थी जिसमें वह ख़ुद पला था; वह उसे सदा स्वाभाविक मगर ग़ौर के काबिल नहीं मानता आया था। कुछ महीने पहले तक वह किसी ऐसी 'भली' स्त्री को न जानता था जो ज़िंदगी को इससे अलग नज़र से देखे; और पुरुष विवाह करे तो भली स्त्री से ही।
'अच्छा — तो फिर मैं रिवियेर को खाने पर नहीं बुलाऊँगा!' आर्चर हँसकर बोला। मे हक्की-बक्की रह गई: 'भला! कारफ़्राई बहनों के शिक्षक को?' 'ख़ैर, उनके साथ एक दिन नहीं, अगर तुम्हें ठीक न लगे। पर मैं उससे फिर बातें करना चाहता था। वह न्यूयॉर्क में काम ढूँढ़ रहा है।' मे का अचरज बढ़ता गया, बेरुख़ी भी; आर्चर को लगा कि वह कहीं यह न सोच रही हो कि पति पर 'विदेशीपन' का रंग चढ़ गया है। 'न्यूयॉर्क में काम? कैसा काम? वहाँ कोई फ़्रांसीसी शिक्षक नहीं रखता। वह करना क्या चाहता है?' 'मेरी समझ से, सबसे बढ़कर — अच्छी बातचीत का आनंद,' आर्चर ने जान-बूझकर उलटकर कहा। मे खिलखिला पड़ी: 'उफ़, न्यूलैंड, कैसी मज़ेदार बात! कितनी फ़्रांसीसी!'
कुल मिलाकर आर्चर को ख़ुशी ही हुई कि मे ने बात हँसी में उड़ा दी; रिवियेर से दोबारा मिलने पर न्यूयॉर्क वाला सवाल टालना मुश्किल होता; और उसे अपने न्यूयॉर्क की किसी तस्वीर में रिवियेर बैठता न दिखता। उसने एक झलक में देख लिया कि आगे की ज़िंदगी में उसके कितने ही सवाल इसी नकार की राह सुलझा करेंगे। पर किराया चुकाकर पत्नी के लंबे आँचल के पीछे घर में दाख़िल होते हुए उसने घिसे-पिटे वाक्य में तसल्ली ढूँढ़ी: शादी के पहले छह महीने ही सबसे कठिन होते हैं। 'उसके बाद शायद हम एक-दूसरे के कोने-किनारे घिसकर चिकने कर ही लेंगे,' उसने सोचा। पर बुरी बात यह थी कि मे का दबाव ठीक उन्हीं कोनों पर पड़ रहा था जिन्हें वह सबसे ज़्यादा सहेजना चाहता था।