हिन्दी संस्करण
अध्याय 24
उन्होंने धीरे-धीरे, सोच में डूबे हुए भोजन किया; बातचीत के दौर के बीच-बीच में छोटी ख़ामोशियाँ भी आती रहीं। जादू एक बार टूटा तो कहने को बहुत कुछ था; फिर भी ऐसे क्षण आते जब बोलना उनके मौन के लंबे युगल-गान की महज़ संगत बन जाता। आर्चर जान-बूझकर अपनी बातें नहीं टाल रहा था; पर उसकी कहानी का एक शब्द भी छोड़ना नहीं चाहता था, सो निजी मामले नहीं छेड़े। मेज़ पर झुकी, ठोड़ी जुड़े हाथों पर टिकाए, वह उसे बीते डेढ़ साल का हाल सुनाती रही। वह उस चीज़ से थक चुकी थी जिसे लोग 'सोसाइटी' कहते हैं। न्यूयॉर्क दयालु था, दबा देने की हद तक मेहमाननवाज़; वह स्वागत वह कभी नहीं भूलेगी। पर नयापन बीत जाने पर उसे लगा कि वह इतनी 'अलग' है कि न्यूयॉर्क की दिलचस्पियों में मन नहीं लगा सकती — इसलिए उसने वॉशिंगटन जाने की ठानी, जहाँ कहते हैं कि ज़्यादा तरह के लोग और विचार समा जाते हैं। वह वहीं बसकर बेचारी मेडोरा के लिए घर बनाना चाहती थी, जिसने बाक़ी रिश्तेदारों का धीरज ठीक उसी समय चुका दिया था जब उसे देखभाल की — और विवाह के ख़तरों से हिफ़ाज़त की — सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
'पर डॉ. कार्वर... डॉ. कार्वर से डर नहीं लगता? सुना है वह ब्लेंकर के घर आपके साथ ठहरे हैं।' वह मुस्कराई। 'अरे, कार्वर वाला ख़तरा टल गया। वह बहुत चतुर आदमी है। उसे अपनी योजनाओं के लिए बस एक अमीर पत्नी चाहिए, और मेडोरा तो महज़ अच्छे विज्ञापन का काम देती है — एक धर्मांतरित के रूप में।' 'किस चीज़ में धर्मांतरित?' 'हर तरह की नई, सनकभरी सामाजिक योजनाओं में। पर जानते हैं, ये मुझे हमारे मित्रों में दिखने वाली परंपरा की अंधी नक़ल से — वह भी परायों की परंपरा की नक़ल से — ज़्यादा दिलचस्प लगती हैं। अमेरिका खोजकर उसे किसी और देश की नक़ल बना देना कितनी नादानी है, है न?' उसने मुस्कराते हुए कहा। 'क्या आपको लगता है कोलंबस ने इतनी मशक़्क़त सिर्फ़ इसलिए की थी कि सेल्फ़्रिज मेरी दंपती के साथ ओपेरा देखने जाए?' आर्चर का चेहरा तप गया। 'और ब्यूफ़र्ट? ब्यूफ़र्ट से भी ये बातें करती हैं?' उसने अचानक पूछा। 'बहुत दिनों से उनसे मिली नहीं। पर पहले करती थी। और वह समझते थे।' 'आह, यही तो मैं हमेशा कहता था। आपको हम पसंद नहीं। और ब्यूफ़र्ट इसलिए पसंद है कि वह हमसे बिलकुल अलग है।' उसने ख़ाली कमरे, वीरान समुद्र-तट और किनारे-किनारे बसे सफ़ेद गाँव-घरों की क़तार पर नज़र दौड़ाई। 'हम जानलेवा हद तक उबाऊ हैं। न व्यक्तित्व, न रंग, न विविधता। मैं सोचता हूँ,' वह फूट पड़ा, 'आप लौट क्यों नहीं जातीं?'
उसकी आँखें गहरा गईं, और आर्चर को ग़ुस्से भरे जवाब की आशंका हुई। पर वह चुप रही, जैसे उसकी बात को मन में तौल रही हो, और आर्चर डरने लगा कि कहीं वह यह न कह दे कि वह ख़ुद भी यही सोचती है। आख़िर उसने कहा: 'शायद... आपकी वजह से।' यह इक़बाल भावना से रहित, सपाट सुर में हुआ — सुनने वाले के अहं को ज़रा भी न सहलाने वाले ढंग से। आर्चर कनपटियों तक लाल हो गया, पर हिलने या बोलने की हिम्मत न कर सका: उसका वह वाक्य किसी दुर्लभ तितली-सा था — ज़रा-सी हरकत पर उड़ जाए, पर छेड़ा न जाए तो और तितलियाँ खिंची आएँ। 'कम-से-कम,' वह आगे बोली, 'आप ही ने मुझे दिखाया कि एकरसता के नीचे ऐसी बारीक, संवेदनशील और सुकुमार चीज़ें छिपी हैं कि मेरी पुरानी ज़िंदगी की सबसे प्यारी चीज़ें भी उनके आगे सस्ती लगने लगीं। पता नहीं समझा पा रही हूँ या नहीं।' उसने उलझन में माथा सिकोड़ा। 'पर अब जाकर समझ आया है कि सबसे परिष्कृत सुखों के लिए कभी-कभी कितनी कठोर, कितनी कुरूप क़ीमत चुकानी पड़ती है।'
'परिष्कृत सुख... उन्हें कभी पाया, यही क्या कम है!' वह यही कहना चाहता था; पर उसकी आँखों की विनती ने उसे चुप करा दिया। 'मैं,' वह आगे बोली, 'आपके साथ — और अपने साथ भी — ईमानदार होना चाहती हूँ। बहुत दिनों से इस मौक़े की उम्मीद कर रही थी। आपको बताना चाहती थी कि आपने मेरी कितनी मदद की, आपने मुझे क्या बना दिया।' आर्चर भौंहें सिकोड़े एकटक देखता रहा। फिर हँसकर उसकी बात काट दी। 'और आपके ख़याल से आपने मुझे क्या बना दिया?' वह ज़रा पीली पड़ गई। 'आपको?' 'हाँ। क्योंकि आपने मुझे कहीं ज़्यादा बदला है जितना मैंने आपको। मैं वह आदमी हूँ जिसने एक औरत से शादी इसलिए की कि दूसरी औरत ने कहा था।' उसकी पीली रंगत पर पल-भर को लाली दौड़ गई। 'आपने वादा किया था। आज ऐसी बातें नहीं करेंगे।' 'आह — औरतें सब एक-सी! कोई भी बुरे मामले का सामना नहीं करना चाहती!' उसने आवाज़ धीमी की। 'तो क्या यह... मे के लिए बुरा है?'
खिड़की के पास खड़ा, उठे हुए पल्ले पर उँगलियाँ थपथपाता आर्चर रोम-रोम में वह तड़पती कोमलता महसूस कर रहा था जिससे उसने अपनी बहन का नाम लिया था। 'यही तो है जो हमें हमेशा सोचना चाहिए — आपने ख़ुद ही तो दिखाया था, है न?' उसने ज़ोर दिया। 'मैंने ख़ुद दिखाया था?' उसने दोहराया, ख़ाली निगाहें अब भी समुद्र पर। 'और अगर नहीं,' वह अपनी सोच को दर्द भरी लगन से आगे बढ़ाती रही, 'अगर त्याग करना, सबसे अच्छा खो देना इस लायक़ नहीं कि दूसरों को मोहभंग और दुख से बचाया जा सके — तो जिन बातों के लिए मैं घर लौटी, जिनके कारण मेरी दूसरी ज़िंदगी इतनी नंगी, इतनी दरिद्र लगी थी — क्योंकि वहाँ कोई उनकी परवाह नहीं करता था — वह सब झूठ या सपना ही तो ठहरेगा...' वह अपनी जगह से हटे बिना मुड़ा। 'और उस सूरत में आपके न लौटने की कोई वजह ही नहीं बचती?' उसने उसकी जगह नतीजा निकाला। उसकी आँखें बदहवास होकर उससे लिपटी थीं। 'ओह... सचमुच कोई वजह नहीं?' 'नहीं — अगर आपने अपना सब कुछ मेरी शादी की कामयाबी पर लगा दिया है,' उसने उग्र होकर कहा। 'मेरी शादी ऐसा तमाशा नहीं बनने वाली जिसके लिए यहाँ रुका जाए।' वह चुप रही, और वह कहता गया: 'क्या फ़ायदा? आपने मुझे पहली बार असली ज़िंदगी की झलक दी, और उसी क्षण नक़ली ज़िंदगी जारी रखने को कहा। यह इंसान की बर्दाश्त के बाहर है। बस इतनी-सी बात है।' 'ओह, ऐसा मत कहिए; मैं तो बर्दाश्त कर रही हूँ!'
वह रो पड़ी। उसकी बाँहें मेज़ के सहारे ढलक गईं, और वह बैठी रही — अपना चेहरा उसकी निगाहों के हवाले किए, जैसे किसी जानलेवा ख़तरे को न्योत रही हो। वह चेहरा उसे पूरा-पूरा उघाड़ रहा था, मानो वह उसकी आत्मा ही हो। आर्चर अवाक रह गया, उस चेहरे के अचानक कहे पर हक्का-बक्का। 'तुम भी... ओह, इतने समय से... तुम भी?' जवाब के बदले उसने आँखों में उमड़े आँसुओं को छलककर धीरे-धीरे बहने दिया। कमरे की आधी चौड़ाई अब भी उनके बीच थी, और दोनों में से किसी ने उसे पाटने की चेष्टा नहीं की। आर्चर को उसकी देहधारी उपस्थिति के प्रति अपनी अजीब बेरुख़ी पर अचरज हुआ: शायद उसे उसका होना भी न खटकता, अगर मेज़ पर छूटे उसके हाथों में से एक ने उसकी नज़र न खींची होती — ठीक वैसे, जैसे उस दिन तेईसवीं स्ट्रीट के छोटे घर में उसने उसी हाथ को घूरा था, ताकि चेहरा न देखना पड़े। अब उसकी कल्पना उस हाथ के गिर्द भँवर के किनारे-सी चक्कर काट रही थी; पर उसने पास जाने की कोशिश तक न की। वह उस प्रेम को जानता था जो दुलार से पलता और दुलार को पालता है; पर हड्डियों तक धँसी यह लगन ऐसी सतही तृप्तियों से भरने वाली नहीं थी। उसका एकमात्र भय था कोई ऐसी हरकत कर बैठना जो उसके शब्दों की गूँज और छाप मिटा दे। उसका एकमात्र विचार था कि अब वह फिर कभी पूरी तरह अकेला महसूस नहीं करेगा। पर अगले ही पल बरबादी और विनाश के बोध ने उसे दबोच लिया। वे इतने पास थे, सुरक्षित, बंद कमरे में; फिर भी अपनी-अपनी नियति से इस क़दर बँधे कि मानो दुनिया के दो छोरों पर हों।
'क्या फ़ायदा... आपको तो लौट ही जाना है।' वह बेबसी से फूट पड़ा। उसके शब्दों के पीछे बेचैन पुकार थी: 'आपको कैसे रोकूँ?' वह पलकें झुकाए निश्चल बैठी रही। 'अभी... नहीं लौटूँगी।' 'अभी नहीं? तो किसी दिन? कोई दिन जो आपने पहले से सोच रखा है?' तब उसने अपनी सबसे निर्मल आँखों से उसे देखा। 'वादा करती हूँ: जब तक आप डटे रहेंगे, नहीं। जब तक हम एक-दूसरे को यों सीधे देख सकते हैं।' आर्चर कुर्सी में धँस गया। उसका उत्तर दरअसल कह रहा था: 'आपने उँगली भर भी हिलाई तो मुझे वापस भेज देंगे — उन सारी घिनौनी चीज़ों की ओर जो आप जानते हैं, उन सारे प्रलोभनों की ओर जिन्हें आप आधा-अधूरा भाँपते हैं।' उसने यह इतना साफ़ समझा जैसे उसने कह ही दिया हो, और इस विचार ने उसे मेज़ के अपनी ओर वाले सिरे पर एक भावुक, श्रद्धामय समर्पण के साथ रोके रखा। 'आपके लिए यह भी कोई ज़िंदगी है!' वह कराहा। 'ओह... जब तक यह आपकी ज़िंदगी का हिस्सा है, चलेगी।' 'और मेरी ज़िंदगी आपकी का हिस्सा है?' उसने सिर हिलाया। 'और बस यही सब है — हम दोनों के लिए?' 'तो... यही सब है न?'
उस क्षण आर्चर उसके चेहरे की मिठास के सिवा सब कुछ भूलकर उछल खड़ा हुआ। वह भी उठी — न उसके स्वागत में, न भागने को; बल्कि शांत भाव से, जैसे सबसे कठिन काम निबटा चुकी हो और अब केवल प्रतीक्षा बाक़ी हो। इतनी शांति से कि जब वह पास आया, तो उसके बढ़े हुए हाथों ने उसे रोका नहीं — राह दिखाई। उसके हाथ उसके हाथों में आ गए; बाँहें तनी हुईं पर कठोर नहीं, उसे बस इतनी दूरी पर थामे रहीं कि उसका समर्पित चेहरा बाक़ी बातें कह सके। वे कितनी देर यों खड़े रहे — लंबा था वह समय या छोटा — कौन जाने। पर उसकी ख़ामोशी उसकी हर बात कह देने को काफ़ी थी, और आर्चर ने केवल एक बात गाँठ बाँधी: यह मिलन आख़िरी नहीं बनने देना है। उसे उन दोनों का भविष्य उसके हाथों में सौंपना था, और बस यही माँगना था कि वह उसे कसकर थामे रहे। 'उदास मत होइए... मेरी ख़ातिर।' उसने काँपती आवाज़ में कहा और हाथ खींच लिए। आर्चर ने पूछा: 'आप वापस नहीं जाएँगी न। नहीं जाएँगी?' — मानो बस यही एक बात हो जो वह किसी सूरत सह नहीं सकता। 'वापस नहीं जाऊँगी,'
उसने उत्तर दिया, और मुड़कर दरवाज़ा खोल साझा भोजन-कक्ष की ओर बढ़ गई। शोरगुल करते शिक्षक घाट जाने को सामान समेट रहे थे। रेत के पार सफ़ेद स्टीमर बँधा दिखता था, और धूप भरे पानी पर बोस्टन धुंध की धूमिल रेखा-सा फैला था।