हिंदी संस्करण

अध्याय 15

मिस्टर कॉलिन्स समझदार आदमी नहीं थे। उनकी जन्मजात कमी न पढ़ाई से मिटी, न लोगों से मेलजोल बढ़ाने से। वे अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा एक अनपढ़ और कंजूस पिता की छाया में बिता चुके थे। कॉलेज तो गए, पर बस ज़रूरी बरस पूरे किए — वहाँ कोई काम का दोस्त नहीं बना पाए। पिता के दबाव में पले-बढ़े थे, इसलिए उनके स्वभाव में शुरू में बड़ी विनम्रता झलकती थी। पर एकांत में रहते-रहते उनका सुस्त दिमाग़ घमंड से भर गया था। ऊपर से जल्दी और अनायास मिली तरक़्क़ी ने उस घमंड को और बढ़ा दिया। अब वे ख़ुद को बड़ा आदमी समझने लगे थे, और इस भाव ने उनकी विनम्रता को काफ़ी हद तक दबा दिया था। हंसफ़र्ड का पादरी-पद ख़ाली हुआ, तो एक ख़ुशक़िस्मत इत्तिफ़ाक़ से उनकी सिफ़ारिश लेडी कैथरीन डी बर्ग तक पहुँच गई। उनके ऊँचे रुतबे की इज़्ज़त और अपनी आश्रयदात्री की चापलूसी — दोनों भाव उनके मन में घुल-मिल गए थे। इसमें ख़ुद अपने प्रति और पादरी की हैसियत व पल्ली के अधिकारों को लेकर बड़े गुमान का पुट भी जुड़ गया। नतीजा यह हुआ कि वे घमंडी होते हुए भी चापलूस थे, और गुमान तथा विनम्रता दोनों एक साथ लिए हुए थे। अब अच्छा घर और भरपूर आमदनी मिल चुकी थी, इसलिए वे ब्याह करने की सोच रहे थे। लॉन्गबर्न के परिवार से मेल-मिलाप बढ़ाने की कोशिश के साथ ही उन्होंने पत्नी के बारे में भी सोच लिया था। सुना था कि बेटियाँ सुंदर और सुशील हैं, इसलिए उन्हीं में से किसी एक को चुनने का इरादा था। उनके पिता की जागीर हड़प लेने का यही उनका मुआवज़ा था — यही सोचकर वे मन को समझाते थे। इसे वे मानो पाप-प्रायश्चित की योजना भी मानते थे। यह योजना उन्हें बढ़िया, हर तरह से गुणकारी और बिलकुल ठीक लगती थी। अपनी तरफ़ से तो यह ज़रूरत से ज़्यादा उदार और नि:स्वार्थ काम लगता था। बेटियों को अपनी आँखों से देखने के बाद भी योजना नहीं बदली। मिस बेनेट का प्यारा चेहरा देखकर उनका मन और पक्का हो गया। यह उनकी उस सख़्त सोच से भी मेल खाता था कि सबसे बड़ी बेटी को पहला हक़ मिलना चाहिए। इसलिए पहली शाम को ही उन्होंने जेन को अपनी पत्नी मान लिया। पर अगली सुबह उनका इरादा बदल गया। नाश्ते से पहले श्रीमती बेनेट के साथ अकेले हुई पंद्रह मिनट की बातचीत की वजह से। पादरी-निवास की बात से शुरू हुई बातचीत अपने आप उनके इस इक़रार तक पहुँच गई कि वे लॉन्गबर्न में ही उस घर की मालकिन पाना चाहते हैं। श्रीमती बेनेट बड़ी ख़ुशी से मुस्कराईं और लगभग हर बात में उन्हें उकसाती रहीं। पर साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि जिस जेन पर उन्होंने निशाना साधा है, बस उसी से बचें। 'छोटी बेटियों के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकती। पक्का वादा भी नहीं कर सकती। जहाँ तक मुझे पता है, किसी का मन पहले से कहीं नहीं लगा। पर बड़ी बेटी की बात तो ज़रूर करनी होगी। यह बताना मानो मेरा फ़र्ज़ है — उसके जल्दी ही सगाई हो जाने की पूरी-पूरी संभावना है।' अब मिस्टर कॉलिन्स को बस जेन की जगह एलिज़ाबेथ को चुनना था। श्रीमती बेनेट के आग सुलगाते-सुलगाते ही यह काम हो गया। उम्र और सुंदरता में जेन के ठीक बाद आने वाली एलिज़ाबेथ ने स्वाभाविक रूप से वह जगह ले ली। श्रीमती बेनेट ने उस इशारे को मन में सँजोकर रख लिया। उन्हें उम्मीद हो गई कि जल्द ही दो बेटियाँ ब्याही जाएँगी। जिस आदमी का नाम लेना उन्हें एक दिन पहले तक अच्छा नहीं लगता था, वही अब उनके मन को भा गया था।

मेरिटन तक पैदल जाने की लिडिया की योजना भी नहीं भूली थी। मैरी को छोड़कर बाक़ी सब बहनें साथ जाने पर राज़ी हो गईं। मिस्टर बेनेट के कहने पर मिस्टर कॉलिन्स भी साथ हो लिए। मिस्टर बेनेट तो उन्हें भेजकर पुस्तकालय अकेले पाने को बेताब थे। नाश्ते के बाद मिस्टर कॉलिन्स पुस्तकालय तक उनके पीछे-पीछे चले आए थे। वे किताबों में से सबसे बड़ी जिल्द वाली एक किताब पढ़ने का बहाना कर रहे थे। पर असल में लगभग बिना रुके हंसफ़र्ड के घर और बाग़ीचे की बातें सुनाते रहे। मिस्टर बेनेट का मन बहुत उचट गया। उन्हें हमेशा यह भरोसा रहा था कि पुस्तकालय में ही उन्हें चैन और सुकून मिलता है। घर के बाक़ी कमरों में मूर्खता और घमंड से आमना-सामना होने के लिए वे हमेशा तैयार रहते थे। पर यह जगह उन सबसे हमेशा आज़ाद रहती है — यह बात उन्होंने एलिज़ाबेथ से भी कभी कही थी। इसलिए उन्होंने बड़े शिष्ट ढंग से मिस्टर कॉलिन्स को फ़ौरन बेटियों के साथ टहलने जाने की सलाह दे डाली। मिस्टर कॉलिन्स पढ़ने वाले आदमी से कहीं ज़्यादा टहलने वाले आदमी लगते थे। वे भी बड़ी किताब बंद करके बाहर निकलने से बहुत ख़ुश हुए। मिस्टर कॉलिन्स बड़ी-बड़ी पर खोखली बातें करते रहे। चचेरी बहनों ने शिष्टाचारवश उनकी हाँ में हाँ मिलाई। इसी तरह सब मेरिटन में दाख़िल हुए। इसके बाद छोटी बहनों का ध्यान वे और नहीं बाँध पाए। लड़कियाँ फ़ौजी अफ़सरों को ढूँढ़ते हुए सीधे गली की तरफ़ नज़रें दौड़ाने लगीं। कोई बहुत सुंदर टोपी या दुकान की खिड़की में नई मलमल दिख जाए, तभी उनकी नज़रें कहीं और मुड़तीं।

पर जल्द ही लड़कियों की नज़रें सड़क के उस पार एक अफ़सर के साथ चल रहे एक अजनबी जवान आदमी पर टिक गईं। उसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। दिखने में वह पूरी तरह सज्जन लगता था। साथ चल रहा अफ़सर वही मिस्टर डेनी थे, जिनसे लिडिया लंदन से लौटने की तारीख़ पूछना चाहती थी। वे साथियों के पास से गुज़रते हुए नमस्ते बोले। सब उस अजनबी के रूप-रंग की तारीफ़ करते हुए यह जानना चाहते थे कि वह कौन है। किसी भी तरह पता लगाने की ठान चुकीं किटी और लिडिया आगे बढ़कर सामने की दुकान में कोई काम होने का बहाना करके सड़क पार करने लगीं। अच्छी क़िस्मत से, दोनों अभी फ़ुटपाथ पर चढ़ी ही थीं कि रुख़ बदलकर आ रहे दोनों सज्जन भी उसी जगह पहुँच गए। मिस्टर डेनी ने तुरंत बात शुरू कर दी। उन्होंने पूछा कि क्या वे अपने दोस्त मिस्टर विकहम से मिलवा सकते हैं, जो एक दिन पहले उनके साथ लंदन से लौटे थे और सौभाग्य से उनकी ही रेजिमेंट में अफ़सर का पद पा गए थे। सब कुछ ठीक वैसा ही लग रहा था जैसा होना चाहिए था — उस जवान आदमी के आकर्षण को पूरा करने के लिए बस वर्दी की ही कमी थी। उसका रूप भी उसके बहुत पक्ष में था। एक सुदर्शन आदमी के लिए ज़रूरी सारे बेहतरीन गुण उसमें थे — सुंदर चेहरा, अच्छा क़द-काठी, बेहद दिलकश चाल-ढाल। परिचय होते ही उसने बातचीत को अपने आप आगे बढ़ाने का सहज हुनर दिखाया। साथ ही वह बेहद शिष्ट और विनम्र भी बना रहा। सब वहीं खड़े होकर ख़ुशी-ख़ुशी बातें करने लगे। तभी घोड़े की टापों की आवाज़ सुनकर सबकी नज़रें उधर घूम गईं। मिस्टर डार्सी और मिस्टर बिंगली घोड़ों पर सड़क से आ रहे थे। दोनों सज्जनों ने साथ खड़ी लड़कियों को पहचान लिया और सीधे पास आए। हमेशा की तरह नमस्ते हुई। बातचीत ज़्यादातर मिस्टर बिंगली ने की, और उनका सबसे ज़्यादा ध्यान मिस बेनेट पर था। उन्होंने कहा कि वे जान-बूझकर जेन का हाल पूछने के लिए ही लॉन्गबर्न जा रहे हैं। मिस्टर डार्सी ने भी सिर झुकाकर उस बात का साथ दिया। वे अभी-अभी यह ठान ही रहे थे कि एलिज़ाबेथ पर नज़र नहीं टिकाएँगे। पर अजनबी को देखते ही उनकी नज़र वहीं अटक गई। एलिज़ाबेथ ने दोनों के एक-दूसरे को देखते समय के भाव पूरी तरह देख लिए। उस मुलाक़ात से आए बदलाव को देखकर वह हैरान रह गई। दोनों का रंग उड़ गया। एक का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया, दूसरे का लाल। थोड़ी देर बाद मिस्टर विकहम ने टोपी पर हाथ रखकर नमस्ते किया। मिस्टर डार्सी ने बड़ी बेदिली से बस इतना ही जवाब दिया। आख़िर इसका मतलब क्या था? समझ में ही नहीं आया। जानने की इच्छा भी दबाए नहीं दब रही थी। थोड़ी देर बाद मिस्टर बिंगली ने ऐसे विदा ली मानो अभी हुई बात का उन्हें कुछ पता ही न हो। फिर वे अपने दोस्त के साथ घोड़ा दौड़ाते हुए चले गए।

मिस्टर डेनी और मिस्टर विकहम लड़कियों के साथ मिस्टर फ़िलिप्स के घर तक पैदल गए, फिर नमस्ते करके चले गए। लिडिया ने अंदर आने की बड़ी ज़िद की। श्रीमती फ़िलिप्स ने भी बैठक की खिड़की झटके से खोलकर ज़ोर से आवाज़ लगाई। पर कुछ काम न आया। श्रीमती फ़िलिप्स को भांजियों से मिलना हमेशा अच्छा लगता था। हाल के कुछ दिन घर से दूर रहीं दोनों बड़ी भांजियाँ इस बार ख़ास तौर पर उन्हें भा गईं। वे बार-बार कहती रहीं कि दोनों के अचानक घर लौट आने से उन्हें कितना अचरज हुआ। घर की गाड़ी उन्हें लेने नहीं गई थी, इसलिए अगर रास्ते में उनकी अचानक मिस्टर जोन्स की दवा-दुकान के लड़के से भेंट न होती, तो उन्हें इस बात का पता ही न चलता। उस लड़के ने बताया था कि मिस बेनेट लौट आई हैं, इसलिए अब नेदरफ़ील्ड को और दवा भेजने की ज़रूरत नहीं। तभी जेन ने मिस्टर कॉलिन्स से उनका परिचय कराया। श्रीमती फ़िलिप्स को अपना ध्यान उनकी ख़ातिरदारी की तरफ़ मोड़ना पड़ा। उन्होंने बड़े शिष्ट ढंग से उनका स्वागत किया। मिस्टर कॉलिन्स ने उससे भी बढ़कर शिष्टता से जवाब दिया। उन्होंने बिना बताए अचानक चले आने की माफ़ी माँगी। साथ ही यह भी कहा कि जिन युवतियों ने उनका परिचय कराया, उनके रिश्तेदार होने के नाते ऐसी भेंट भी शायद माफ़ी लायक़ होगी, ऐसा मानने का साहस वे कर रहे हैं। श्रीमती फ़िलिप्स इस ज़्यादा शिष्टाचार से पूरी तरह दब गईं। पर एक अजनबी को देखने में लगा उनका ध्यान जल्दी ही दूसरे अजनबी को लेकर हैरानी और सवालों की तरफ़ मुड़ गया। उसके बारे में भांजियाँ उन्हें बस वही बता सकीं, जो वे ख़ुद पहले से जानती थीं — यह कि मिस्टर डेनी उसे लंदन से लाए थे, और यह कि वह मिलिशिया में लेफ़्टिनेंट का पद पाने वाला था। श्रीमती फ़िलिप्स ने बताया कि उन्होंने पिछले पूरे एक घंटे उसे सड़क पर आते-जाते देखा है। अगर मिस्टर विकहम फिर दिख जाते, तो किटी और लिडिया बिना शक यही करती रहतीं। पर बदक़िस्मती से अब खिड़की के बाहर से बस कुछ अफ़सर ही गुज़र रहे थे। उस अजनबी के मुक़ाबले वे 'उबाऊ और फीके लोग' बनकर रह गए। उनमें से कुछ अगले दिन फ़िलिप्स दंपती के साथ रात का खाना खाने वाले थे। श्रीमती फ़िलिप्स ने वादा किया कि अगर लॉन्गबर्न वाले शाम को आएँ, तो वे पति को मिस्टर विकहम के पास भेजकर उन्हें भी बुलवा लेंगी। सबने हामी भरी। श्रीमती फ़िलिप्स ने भरोसा दिलाया कि वे शोर-शराबे वाला मज़ेदार लॉटरी टिकट्स का खेल करवाएँगी, और उसके बाद हल्का-सा गरमागरम रात का खाना भी। इस मौज-मस्ती की सोचकर सब बहुत उत्साहित हो गए। दोनों तरफ़ ख़ुशी-ख़ुशी विदाई हुई। मिस्टर कॉलिन्स कमरे से निकलते हुए फिर माफ़ी माँगने लगे। श्रीमती फ़िलिप्स अपनी अथक मेहरबानी से बार-बार कहती रहीं कि इसकी ज़रा भी ज़रूरत नहीं।

घर तक पैदल जाते हुए एलिज़ाबेथ ने जेन को उन दोनों सज्जनों के बीच हुई बात सुनाई। अगर किसी एक का क़सूर दिखता, तो जेन उस एक का या दोनों का ही पक्ष लेतीं — फिर भी वह बात समझाने में वह अपनी छोटी बहन से बेहतर कुछ न कर सकीं।

लौटने पर मिस्टर कॉलिन्स ने श्रीमती फ़िलिप्स के बर्ताव और शिष्टाचार की बड़ी तारीफ़ की। श्रीमती बेनेट बहुत ख़ुश हुईं। उन्होंने दावे से कहा कि लेडी कैथरीन और उनकी बेटी को छोड़कर, उनसे बढ़कर सुरुचिपूर्ण महिला उन्होंने कभी नहीं देखी। श्रीमती फ़िलिप्स ने न सिर्फ़ बड़ी शिष्टता से उनका स्वागत किया, बल्कि उन्हें पहले से बिलकुल न जानते हुए भी अगले दिन शाम के न्योते में ख़ास तौर पर शामिल कर लिया। उनका ख़याल था कि इसमें उनकी भांजियों के रिश्तेदार होने की बात का भी कुछ असर रहा होगा। फिर भी अपनी पूरी ज़िंदगी में उन्हें इतना ध्यान कभी नहीं मिला था।