हिंदी संस्करण
अध्याय 44
एलिज़ाबेथ ने मान लिया था कि मिस डार्सी के पेम्बरली पहुँचने के ठीक अगले दिन मिस्टर डार्सी अपनी छोटी बहन को लेकर मिलने आएँगे। इसलिए उसने तय किया कि उस पूरी सुबह वह सराय से दूर नहीं जाएगी। पर उसका अंदाज़ा ग़लत निकला। वे मेहमान तो उसी सुबह आ पहुँचे, जो सबके अपने लैम्बटन पहुँचने के ठीक अगले दिन की थी। गार्डिनर परिवार कुछ नए जान-पहचान वालों के साथ क़स्बे में घूमकर अभी-अभी सराय लौटा था। उस शाम उन्हीं लोगों के साथ खाना तय था, सो सब कपड़े बदलने ही वाले थे। तभी गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी। खिड़की के पास जाकर देखा तो एक सज्जन और एक महिला दोपहिया गाड़ी में सड़क पर ऊपर की ओर आ रहे थे। एलिज़ाबेथ ने गाड़ी और घोड़ों की साज-सज्जा फ़ौरन पहचान ली। बात क्या है, यह भी समझ गई। जिस ख़ास मेहमान की उम्मीद थी, उसके आने की ख़बर उसने अपने रिश्तेदारों को दी, तो दोनों हैरान रह गए। मामा-मामी तो लगभग सन्न रह गए। यह बात कहते वक़्त एलिज़ाबेथ की घबराई हुई मुद्रा, यह मुलाक़ात, और पिछले दिन की कई बातें — इन सबने दोनों के मन में एक नया ख़याल जगा दिया। इससे पहले ऐसा सोचने की कोई वजह ही नहीं थी। पर अब इस तरह अचानक दिखाई गई इस दिलचस्पी की और कोई व्याख्या नहीं थी, सिवाय इसके कि डार्सी के मन में उनकी भांजी के लिए कुछ है। जब तक ये ख़याल मामा-मामी के मन में आते-जाते रहे, एलिज़ाबेथ का मन पल-पल और ज़्यादा उलझता गया। इस क़दर बेचैन हो जाने पर उसे ख़ुद अपने पर हैरानी हुई। बेचैनी की एक वजह यह डर भी था कि भाई ने कहीं उसकी तारीफ़ ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं कर दी। वह हमेशा से कहीं बेहतर छाप छोड़ना चाहती थी। और इसीलिए लगा, जैसे किसी को ख़ुश करने की सारी क़ाबिलियत उसमें से ग़ायब हो गई हो। कहीं खिड़की पर खड़ी दिख न जाए, इस डर से एलिज़ाबेथ पीछे हट गई। मन शांत करने के लिए वह कमरे में इधर-उधर टहलती रही। पर मामा-मामी की हैरानी और जिज्ञासा से भरी नज़रें देखकर सब कुछ और मुश्किल हो गया। मिस डार्सी और उनके भाई अंदर आए, और वह डरावना परिचय हो ही गया। एलिज़ाबेथ यह देखकर हैरान थी कि उसकी नई जान-पहचान वाली लड़की भी कम-से-कम उतनी ही घबराई हुई है, जितनी वह ख़ुद। लैम्बटन आने के बाद से उसने सुना था कि मिस डार्सी बेहद घमंडी हैं। पर कुछ ही मिनट देखने के बाद उसे यक़ीन हो गया कि वे बस बेहद शर्मीली हैं। एक अक्षर से लंबी कोई बात उनके मुँह से सुनना मुश्किल था। मिस डार्सी लंबी थीं, और डील-डौल में एलिज़ाबेथ से भारी। उम्र सोलह से कुछ ही ऊपर थी, फिर भी देह पूरी बढ़ चुकी थी और रूप में सयानापन और शालीनता थी। भाई जितनी सुंदर वे नहीं थीं। पर चेहरे से समझदारी और मीठा स्वभाव झलकता था, और तौर-तरीक़े बेहद विनम्र और नरम थे। एलिज़ाबेथ को लगा था कि उसका सामना मिस्टर डार्सी जैसी ही पैनी और ज़रा भी न घबराने वाली किसी लड़की से होगा। सो बिल्कुल अलग मन की लड़की पाकर उसे बड़ी राहत मिली।
साथ बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि डार्सी ने बताया, बिंगली भी मिलने आ रहे हैं। एलिज़ाबेथ को ख़ुशी जताने और उस मेहमान के लिए ख़ुद को तैयार करने का वक़्त मुश्किल से मिला। सीढ़ियों पर बिंगली के तेज़ क़दमों की आवाज़ आई, और अगले ही पल वे कमरे में थे। उन पर एलिज़ाबेथ का जो ग़ुस्सा था, वह बहुत पहले ही पूरी तरह मिट चुका था। थोड़ा-बहुत बचा भी होता, तो फिर मिलने की ख़ुशी को इतने सादे और गर्मजोशी भरे ढंग से जताने वाले उनके बरताव के आगे टिक नहीं पाता। उन्होंने अपनेपन से, पर कुछ मोटे तौर पर, घरवालों की ख़ैरियत पूछी। हमेशा की तरह चेहरा और लहजा वही मीठा और सहज था। गार्डिनर दंपती के लिए भी वे एलिज़ाबेथ जितने ही दिलचस्प इंसान थे। दोनों बहुत समय से उनसे मिलना चाहते थे। सच कहें तो सामने बैठा पूरा जमघट ही उनके मन में गहरी दिलचस्पी जगा रहा था। मिस्टर डार्सी और अपनी भांजी को लेकर अभी-अभी जो शक जगा था, उसकी वजह से दोनों ने उन्हें गंभीरता से, पर छिपाकर परखा। जल्दी ही उन्हें यक़ीन हो गया कि कम-से-कम एक पक्ष तो जानता है कि प्यार क्या होता है। महिला की भावनाओं पर थोड़ा शक बाक़ी रहा। पर सज्जन का मन तारीफ़ से भरा है, यह बिल्कुल साफ़ था। एलिज़ाबेथ को भी बहुत कुछ करना था। वह हर मेहमान का मन भाँपना चाहती थी। अपना मन भी शांत करना था, और सब पर अच्छी छाप भी छोड़नी थी। आख़िरी काम में नाकाम होने का डर सबसे बड़ा था। पर कामयाबी की उम्मीद भी उसी में सबसे ज़्यादा थी। क्योंकि जिन्हें वह ख़ुश करना चाहती थी, वे पहले से ही उसे अच्छा मानने का मन बना चुके थे। बिंगली ख़ुशी-ख़ुशी, जॉर्जियाना पूरे जोश से और डार्सी पक्का इरादा करके उसे पसंद करने को तैयार थे। बिंगली को देखते ही उसका ध्यान अपने-आप बड़ी बहन की तरफ़ चला गया। आह, कितना जानना चाहती थी वह कि उनका ध्यान भी उधर ही जाता है या नहीं! कभी-कभी उसे लगा, वे पहले से कम बोल रहे हैं। एक-दो बार तो वे उसकी तरफ़ देखते हुए जेन से मिलती-जुलती कोई झलक ढूँढ़ते-से लगे, और यह उसे अच्छा लगा। हो सकता है, यह उसका अपना वहम रहा हो। पर जिन्हें जेन की टक्कर का बताया गया था, उन मिस डार्सी के साथ उनका बरताव तो ग़लत समझा ही नहीं जा सकता था। दोनों में से किसी की नज़र में कोई ख़ास लगाव नहीं दिखा। उन दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं था, जो उनकी बहन की उम्मीदों को सहारा देता। इस बात से उसका मन जल्दी ही हल्का हो गया। मेहमानों के जाने से पहले हुई दो-तीन छोटी बातें भी, बेचैन मन से देखने पर, जेन की मीठी याद ज़ाहिर कर रही थीं। हिम्मत होती, तो वे उसका नाम भी लेना चाहते, यह भी झलक गया। बाक़ी लोग आपस में बातें कर रहे थे, तभी बिंगली ने सच्चे अफ़सोस से भरी आवाज़ में कहा, 'मिस बेनेट से मिले तो बहुत ही अरसा हो गया।' एलिज़ाबेथ जवाब देती, उससे पहले ही उन्होंने जोड़ा, 'आठ महीने से ऊपर हो गए। छब्बीस नवंबर को नेदरफ़ील्ड में हम सब साथ नाचे थे, उसके बाद से मुलाक़ात ही नहीं हुई।' उनकी याददाश्त इतनी पक्की देखकर एलिज़ाबेथ को अच्छा लगा। बाद में, जब कोई और सुन नहीं रहा था, उन्होंने पूछा कि क्या उसकी सारी बहनें लॉन्गबर्न में ही हैं। इस सवाल में या पहले कही बात में अपने-आप कोई बड़ा मतलब नहीं था। पर उनके चेहरे और अंदाज़ ने उन शब्दों में मतलब भर दिया। ख़ुद मिस्टर डार्सी को परखने के मौक़े ज़्यादा नहीं मिले। पर जब-जब नज़र उठी, उसने उनके चेहरे पर सबको ख़ुश रखने वाला भाव देखा। उनकी हर बात में जो लहजा था, वह वहाँ बैठे लोगों के लिए किसी शान या हिक़ारत से कोसों दूर था। पिछले दिन देखा बदलाव पल भर का ही रहा हो, तो भी एक दिन से ज़्यादा टिका है, इसका यक़ीन हो गया। कुछ महीने पहले जिन लोगों से जान-पहचान रखना भी वे शर्म की बात मानते, उन्हीं से अब वे मिलना-जुलना चाहते थे। उन पर अच्छी छाप छोड़ने की कोशिश भी दिख रही थी। सिर्फ़ उसके साथ नहीं, जिन रिश्तेदारों को उन्होंने सबके सामने नीचा दिखाया था, उनके साथ भी वे मेहरबानी से पेश आए। एलिज़ाबेथ को हंसफ़र्ड के पादरी-घर में हुई आख़िरी तीखी बातचीत याद आ गई। फ़र्क़ और बदलाव इतना बड़ा था और मन को इतना गहरा छू गया कि उसे अपनी हैरानी छिपाने के लिए ज़ोर लगाना पड़ा। नेदरफ़ील्ड के अपने प्यारे दोस्तों या रोज़िंग्स के ऊँचे ख़ानदानी रिश्तेदारों के बीच भी उसने उन्हें दूसरों को ख़ुश करने की ऐसी कोशिश करते कभी नहीं देखा था। और यह उन लोगों के सामने, जिन्हें ख़ुश करके उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होना था, बल्कि जिनसे जान-पहचान भर से नेदरफ़ील्ड और रोज़िंग्स की महिलाओं का मज़ाक़ और ताना ही मिलता। वे अपना घमंड और अपनी अकड़ी हुई बेरुख़ी छोड़ रहे थे।
मेहमान आधे घंटे से भी ज़्यादा रुके। उठकर चलने को हुए, तो मिस्टर डार्सी ने अपनी बहन से कहा कि वह गार्डिनर दंपती और मिस बेनेट को, उनके इस इलाक़े से जाने से पहले, पेम्बरली में खाने पर बुलाने की बात कहे। मिस डार्सी झिझक गईं, मेहमान बुलाने की आदत उन्हें शायद नहीं थी। फिर भी उन्होंने ख़ुशी से कह दिया। श्रीमती गार्डिनर ने भांजी की तरफ़ देखा, यह जानने को कि इस न्योते से सबसे ज़्यादा जुड़ी वही है, तो क्या वह जाना चाहेगी। पर एलिज़ाबेथ ने मुँह दूसरी ओर मोड़ रखा था। श्रीमती गार्डिनर ने समझा कि यह न्योता नापसंद होने से नहीं, बल्कि पल भर की घबराहट से है। लोगों में घुलना-मिलना पसंद करने वाले पति को ख़ुशी से हामी भरते देखकर उन्होंने भी जाने का वादा कर दिया। दिन दो दिन बाद का तय हुआ।
बिंगली ने कहा कि एलिज़ाबेथ से फिर मिलना पक्का है, इसकी उन्हें ख़ुशी है। उनके पास उससे कहने को अब भी बहुत कुछ है, और हर्टफ़र्डशायर के सारे दोस्तों के बारे में पूछने को भी। एलिज़ाबेथ ने इन सब बातों का मतलब यही लगाया कि वे उसकी बड़ी बहन की ख़बर सुनना चाहते हैं, और वह ख़ुश हुई। इस वजह से, और कई और वजहों से, मेहमानों के जाने के बाद वह पिछले आधे घंटे को कुछ संतोष के साथ याद कर सकी। हालाँकि जब वह वक़्त बीत रहा था, तब उसने उसका मज़ा शायद ही लिया हो। उसका मन अकेले रहने का था। उसे मामा-मामी के सवालों और इशारों से डर लग रहा था। सो बिंगली की तारीफ़ भर सुनने तक वह वहाँ रुकी, फिर कपड़े बदलने के लिए जल्दी से निकल गई। पर गार्डिनर दंपती की जिज्ञासा से डरने की ज़रूरत नहीं थी। दोनों का इरादा ज़बरदस्ती कुछ उगलवाने का नहीं था। यह साफ़ था कि एलिज़ाबेथ मिस्टर डार्सी को उनके अंदाज़े से कहीं ज़्यादा अच्छी तरह जानती है। यह भी साफ़ था कि वे उसे गहरा प्यार करते हैं। दिलचस्पी की बातें बहुत थीं, पर पूछने लायक़ एक भी नहीं। अब मिस्टर डार्सी को अच्छा माना जाए या नहीं, यह भी दोनों के लिए एक उलझन बन गया। जितना वे ख़ुद जानते थे, उसमें कोई ऐब नहीं मिला। उनकी शिष्टता से मन डोले बिना नहीं रहा। बाक़ी सारी बातें छोड़कर, सिर्फ़ अपने अनुभव और एक नौकर की बात से उनके स्वभाव का चित्र बनाते, तो वह कैसा होता। हर्टफ़र्डशायर में डार्सी को जानने वाले लोग उस चित्र में उन्हें पहचान ही न पाते। पर अब दोनों के पास घर की प्रबंधिका की बात मानने की वजह थी। जो नौकर उन्हें चार साल की उम्र से जानती हो और ख़ुद भी शालीन दिखती हो, उसकी गवाही को जल्दबाज़ी में ठुकराना ठीक नहीं, यह भी दोनों जल्दी ही समझ गए। लैम्बटन के जान-पहचान वालों से जो सुना, उससे भी उस गवाही का वज़न ख़ास कम नहीं हुआ। उन पर इल्ज़ाम बस घमंड का था। शायद वे सचमुच घमंडी हों। और न भी हों, तो जिस छोटे बाज़ार-क़स्बे में उनका घराना आता ही नहीं, वहाँ के लोग उन्हें घमंडी कह ही देते। पर यह सब मानते थे कि वे उदार इंसान हैं और ग़रीबों के लिए बहुत भलाई करते हैं। विकहम के बारे में इन यात्रियों को भी जल्दी ही पता चल गया कि यहाँ उनकी कोई ख़ास इज़्ज़त नहीं है। अपने संरक्षक के बेटे से जुड़े असली हालात ठीक से किसी को मालूम नहीं थे। पर यह सबको पता था कि डर्बीशायर छोड़ते वक़्त वे बहुत क़र्ज़ छोड़ गए थे, और मिस्टर डार्सी ने बाद में वह चुकाया।
उस शाम एलिज़ाबेथ का मन पिछले दिन से भी ज़्यादा पेम्बरली में अटका रहा। शाम लंबी लगी। पर उस हवेली में रहने वाले एक इंसान के लिए अपने मन का फ़ैसला करने को वह लंबी भी काफ़ी नहीं थी। उसी को समझने की कोशिश में वह पूरे दो घंटे जागती रही। इतना तो पक्का था कि अब वे उसे बुरे नहीं लगते। हाँ। नफ़रत तो बहुत पहले मिट चुकी थी। उन्हें नफ़रत कहलाने लायक़ हद तक नापसंद किया था, इस पर शर्मिंदा हुए भी लगभग उतना ही समय बीत चुका था। उनमें अच्छे गुण हैं, इस यक़ीन से जो आदर जगा था, वह पहले मन मारकर माना गया था। पर उस आदर से मन को कोई अड़चन नहीं रही, और इसे भी बहुत दिन हो चुके थे। पिछले दिन उन्हें बेहद मीठे इंसान के रूप में दिखाने वाली और उनकी हद दर्जे की तारीफ़ करने वाली बातों ने उस आदर को और नरम भाव में बदल दिया। पर आदर और सद्भाव से भी बढ़कर एक भाव था, जिससे मन मुँह नहीं मोड़ सकता था। कृतज्ञता। इस बात की कृतज्ञता कि उन्होंने कभी उससे प्यार किया, और अब भी उस प्यार का कुछ बाक़ी है। इस बात की कृतज्ञता कि प्रस्ताव ठुकराते वक़्त दिखाई उसकी तीखी, कड़वी बात को भी और उस इनकार के साथ लगाए बेजा इल्ज़ामों को भी उन्होंने माफ़ कर दिया। जिस इंसान के बारे में उसे पक्का यक़ीन था कि वे उससे सबसे बड़े दुश्मन की तरह कतराएँगे। फिर भी अचानक हुई इस मुलाक़ात में वे रिश्ता बनाए रखने की भरपूर कोशिश करते दिखे। जहाँ बात सिर्फ़ दोनों की थी, वहाँ उन्होंने न बेढंगे ढंग से अपना लगाव जताया, न कोई अनोखा बरताव किया। फिर भी उसके अपनों पर अच्छी छाप छोड़ना चाहा। और अपनी छोटी बहन से उसकी जान-पहचान कराने की ठान ली। इतने घमंडी आदमी में आया यह बदलाव हैरानी ही नहीं, कृतज्ञता भी जगाता था। इसे गहरे प्यार के सिवा और किसी वजह से समझा ही नहीं जा सकता था। ऐसे भाव से निकला बदलाव था, इसलिए उसने जो छाप छोड़ी, उसे बढ़ावा देना बुरा नहीं था। वह क्या है, यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल था, फिर भी उसमें ज़रा भी अप्रिय कुछ नहीं था। वह उनका सम्मान करती थी, उन्हें ऊँचा मानती थी, उनकी कृतज्ञ थी। उनकी ख़ुशी में भी उसे सच्ची दिलचस्पी थी। अब बस इतना ही जानना बाक़ी था। वह ख़ुशी कितनी उस पर टिकी रहे, यह वह ख़ुद चाहती है। और जो ताक़त अब भी उसके पास बची है, ऐसा उसकी कल्पना कहती थी, उसे लगाकर उन्हें दोबारा प्रस्ताव रखने पर ले आना दोनों की ख़ुशी के लिए कितना अच्छा होगा।
उस शाम मामी और भांजी की राय एक हो गई। पेम्बरली पहुँचने के उसी दिन मिस डार्सी का उनसे मिलने आना बहुत बड़ी मेहरबानी थी। इसका बराबर का जवाब तो नहीं दिया जा सकता, पर इस तरफ़ से भी शिष्टता दिखाने की कोशिश ज़रूरी थी। मिस डार्सी हवेली पहुँची ही तब थीं, जब वहाँ देर वाला नाश्ता होने को था। सो तय हुआ कि अगली सुबह पेम्बरली जाना बिल्कुल ठीक रहेगा। और वे जाएँगी। एलिज़ाबेथ ख़ुश थी। पर ख़ुद से पूछती कि क्यों, तो जवाब में कहने को कुछ ख़ास नहीं था। नाश्ता ख़त्म होने के थोड़ी ही देर बाद मिस्टर गार्डिनर दोनों को छोड़कर चले गए। पिछले दिन मछली पकड़ने की योजना फिर से तय हुई थी, और दोपहर तक पेम्बरली में कुछ सज्जनों से मिलने का पक्का वादा भी था।