हिंदी संस्करण
अध्याय 43
गाड़ी चलती रही, और एलिज़ाबेथ बेचैन मन से पेम्बरली के जंगल की पहली झलक का इंतज़ार करती रही। आख़िरकार जब सब लोग फाटक के चौकीदार के घर से होकर अंदर दाख़िल हुए, तो उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। पार्क बहुत बड़ा था, और ज़मीन की बनावट भी कई तरह की। सब सबसे नीची जगहों में से एक से होकर अंदर गए, और कुछ देर तक चौड़े, ख़ूबसूरत जंगल के बीच से गाड़ी चलती रही।
एलिज़ाबेथ के मन में इतने ख़याल भरे थे कि वह बात नहीं कर पा रही थी। फिर भी नज़र आने वाली हर जगह, हर नज़ारा उसकी तारीफ़ से बच नहीं पाया। सब आधे मील तक ढलवाँ रास्ते पर चढ़ते हुए एक काफ़ी ऊँची पहाड़ी की चोटी पर पहुँचे। वहाँ जंगल ख़त्म हो गया। रास्ता तेज़ी से घूमकर घाटी में उतरा, और घाटी के उस पार पेम्बरली हवेली एक ही नज़र में उसकी निगाह खींच ले गई। ज़मीन थोड़ी ऊँची जगह पर बना, बड़ा और ख़ूबसूरत पत्थर का यह भवन बड़े शान से खड़ा था। पीछे जंगलों से ढकी ऊँची पहाड़ी की कतार किसी पर्दे-सी खड़ी थी। सामने एक धारा बहती थी, जो पहले से ही काफ़ी चौड़ी थी और अब और चौड़ी कर दी गई थी, पर कहीं भी इंसानी हाथ का निशान नज़र नहीं आता था। किनारे न तो सीधे काटे गए थे, न झूठी सजावट से सजाए गए थे। एलिज़ाबेथ मुग्ध हो गई। उसने ऐसी जगह पहले कभी नहीं देखी थी, जहाँ प्रकृति ने इतना कुछ दिया हो, या जहाँ कमज़ोर पसंद ने प्रकृति की सुंदरता को इतना कम बिगाड़ा हो। सबने खुले दिल से तारीफ़ की। और उसी पल, उसे लगा — पेम्बरली की मालकिन बनना भी शायद कुछ ख़ास बात होती।
सब पहाड़ी उतरकर पुल पार कर गए, फिर गाड़ी में बैठकर हवेली के दरवाज़े तक पहुँचे। घर को क़रीब से देखते हुए, मालिक से आमने-सामने पड़ जाने का डर फिर से लौट आया। उसे चिंता हुई कि कहीं नौकरानी ग़लत तो नहीं जानती थी। घर देखने की इच्छा जताई गई, तो सबको दालान में ले जाया गया। घर की प्रबंधिका का इंतज़ार करते हुए एलिज़ाबेथ को यह सोचकर हैरान होने की फ़ुर्सत मिली कि वह सचमुच यहाँ आ पहुँची है।
घर की प्रबंधिका आ पहुँची — भली सूरत वाली, उम्र में बड़ी औरत। एलिज़ाबेथ ने जितना सोचा था, वह उससे कहीं ज़्यादा सादी और कहीं ज़्यादा मेहरबान निकली। सब उसके पीछे-पीछे खाने-बैठने के कमरे में गए। बड़ा, सलीक़े से बना कमरा शानदार ढंग से सजा था। एलिज़ाबेथ ने कमरे पर हल्की नज़र डालने के बाद खिड़की के पास जाकर बाहर देखा। थोड़ी देर पहले जिस जंगल-ढकी पहाड़ी से वे उतरे थे, वह दूर से और खड़ी दिखती थी और एक ख़ूबसूरत नज़ारा बनाती थी। ज़मीन का हर हिस्सा बेऐब ढंग से एक-दूसरे में घुला-मिला था। वह नदी, किनारे पर बिखरे पेड़ों और जहाँ तक नज़र जाए वहाँ तक घूमती घाटी को ख़ुशी से निहारती रही। एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने पर नज़ारा बदल जाता, पर हर खिड़की से ख़ूबसूरत ही लगता। कमरे ऊँची छत वाले और शानदार थे। साज-सामान भी मालिक की दौलत के मुताबिक़ था। पर एलिज़ाबेथ को लगा, उसका ज़ौक़ चमक-दमक या बेवजह की तड़क-भड़क में नहीं, बल्कि इसी में झलकता है। रोज़िंग्स के साज-सामान से यहाँ सजावट कम थी, पर असली शालीनता कहीं ज़्यादा। 'मैं इन कमरों की मालकिन बन सकती थी!' उसने सोचा। 'अब तक इन कमरों को अच्छी तरह जान चुकी होती। किसी अजनबी की तरह घूमने के बजाय इन्हें अपना मानकर बरतती, और मामा-मामी को मेहमान की तरह यहाँ बुलाती। पर नहीं।' होश में आकर उसने फिर सोचा। 'यह मुमकिन ही नहीं था। मामा-मामी को खोना पड़ता। उन्हें बुलाने की इजाज़त भी शायद न मिलती।' यह सोचकर उसे राहत मिली। इस ख़याल ने उस पछतावे से बचा लिया, जो उसे लगभग महसूस होने लगा था। एलिज़ाबेथ का मन घर की प्रबंधिका से पूछने को बेचैन था कि क्या मालिक सचमुच घर से बाहर गए हैं। पर उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। आख़िर मामा ने ही यह सवाल पूछ लिया। श्रीमती रेनॉल्ड्स 'हाँ' में जवाब दे रही थीं, तभी एलिज़ाबेथ बेचैनी से मुँह फेर बैठी। घर की प्रबंधिका ने जोड़ा, 'पर कल तक वे कई दोस्तों को साथ लेकर लौट आएँगे।' एलिज़ाबेथ को कितनी राहत मिली, यह बताया नहीं जा सकता, कि उनकी यात्रा किसी वजह से एक दिन भी देर नहीं हुई।
मामी ने एक तस्वीर देखने को बुलाया। पास जाकर देखा तो चिमनी के ऊपर टँगी कई छोटी तस्वीरों में मिस्टर विकहम की भी एक तस्वीर थी। मामी ने मुस्कुराकर पूछा कि क्या यह उसे पसंद है। घर की प्रबंधिका आगे आकर समझाने लगी — यह स्वर्गीय पुराने मालिक के जायदाद-प्रबंधक के बेटे, एक जवान सज्जन की तस्वीर है। पुराने मालिक ने अपने ख़र्च पर उसे पाला-पोसा था। 'अब वह फ़ौज में है,' उसने जोड़ा। 'पर मुझे डर है, वह कुछ ज़्यादा ही बिगड़ गया है।' श्रीमती गार्डिनर मुस्कुराकर भांजी की तरफ़ देखने लगीं, पर एलिज़ाबेथ मुस्कान से जवाब नहीं दे सकी। 'और यह लीजिए,' श्रीमती रेनॉल्ड्स ने दूसरी छोटी तस्वीर की ओर इशारा किया। 'यह अभी के मालिक हैं। बिल्कुल हूबहू बने हैं। दूसरी तस्वीर के साथ ही, क़रीब आठ बरस पहले बनवाई गई थी।' 'आपके मालिक बड़े सुंदर हैं, यह मैंने बहुत सुना है,' श्रीमती गार्डिनर ने तस्वीर देखते हुए कहा। 'सच में बड़ा सुंदर चेहरा है। पर लिज़ी, तस्वीर असली से मिलती है या नहीं, यह तो तुम ही बता सकती हो।' एलिज़ाबेथ ने जब यह ज़ाहिर किया कि वह उनके मालिक को जानती है, तो श्रीमती रेनॉल्ड्स उसे पहले से कुछ ज़्यादा आदर से देखने लगीं। 'तो आप मिस्टर डार्सी को जानती हैं?' एलिज़ाबेथ ने चेहरा लाल करते हुए कहा, 'थोड़ा-सा।' 'क्या आपको नहीं लगता, वे बड़े सुंदर सज्जन हैं?' 'जी हाँ, बहुत सुंदर हैं।' 'मुझे तो इनसे ज़्यादा सुंदर कोई नहीं दिखता। पर ऊपर की तस्वीर-दीर्घा में जाएँगी, तो इससे भी बढ़िया और बड़ी तस्वीर देखेंगी। यह कमरा स्वर्गीय मालिक को सबसे प्यारा था। ये छोटी तस्वीरें भी तब से वैसी ही रखी हैं। उन्हें इनसे बड़ा लगाव था।' यह सुनकर समझ आ गया कि मिस्टर विकहम की तस्वीर वहाँ क्यों टँगी है।
इसके बाद श्रीमती रेनॉल्ड्स ने सबका ध्यान मिस डार्सी की उस तस्वीर की ओर मोड़ा, जो उनके सिर्फ़ आठ साल की उम्र में बनी थी। 'क्या मिस डार्सी भी अपने भाई जितनी ही सुंदर हैं?' मिस्टर गार्डिनर ने पूछा। 'जी हाँ, बिल्कुल। दुनिया की सबसे सुंदर लड़की हैं। और कितनी हुनरमंद भी! पूरे दिन पियानो बजाती और गाती रहती हैं। अगले कमरे में उनके लिए एक नया साज़ अभी-अभी आया है। मालिक की तरफ़ से तोहफ़ा है। कल भाई के साथ ही आएँगी।' मिस्टर गार्डिनर लोगों से सहज और सुखद ढंग से पेश आते थे, सो सवाल और बातों से घर की प्रबंधिका को बोलते रहने के लिए उकसाते रहे। चाहे घमंड की वजह से हो या स्नेह की, यह साफ़ था कि श्रीमती रेनॉल्ड्स को मालिक-भाई-बहन की बात करना बहुत भाता था। 'मालिक साल भर में अक्सर पेम्बरली में रहते हैं?' 'जितना मैं चाहती, उतना तो नहीं, पर साल का क़रीब आधा हिस्सा यहीं बिताते हैं। मिस डार्सी गर्मियों में हमेशा यहाँ आती हैं।' 'सिवाय तब के, जब वे रैम्सगेट जाती हैं,' एलिज़ाबेथ ने सोचा। 'मालिक की शादी हो जाए, तो शायद आप उन्हें ज़्यादा देखेंगी।' 'सच है। पर पता नहीं यह कब होगा। और मुझे तो यह भी नहीं पता कि मालिक के लायक़ कौन इतनी अच्छी होगी।' मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर मुस्कुरा दिए। एलिज़ाबेथ ख़ुद को रोक नहीं पाई और बोली, 'ऐसा सोचने वाला कोई हो, यह उनके लिए बड़े सम्मान की बात है।' 'मैं तो बस सच कह रही हूँ। जो भी उन्हें जानता है, वह यही कहेगा,' श्रीमती रेनॉल्ड्स ने जवाब दिया। एलिज़ाबेथ को यह बात कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर लगी। पर घर की प्रबंधिका की अगली बात सुनकर उसकी हैरानी और बढ़ गई। 'मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में मालिक से एक भी कड़वा लफ़्ज़ नहीं सुना। और मैं उन्हें चार साल की उम्र से जानती हूँ।' यह अब तक सुनी किसी भी तारीफ़ से बड़ी बात थी। उसकी अपनी सोच से भी बिल्कुल उल्टी। डार्सी अच्छे स्वभाव के इंसान नहीं हैं — यही एलिज़ाबेथ की सबसे पक्की धारणा थी। अब वह पूरे ध्यान से और सुनना चाहती थी। मामा ने अगली बात कही, तो उसे राहत मिली। 'ऐसी बात सुनने को मिले, ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। इतना अच्छा मालिक मिलना आपकी क़िस्मत है।' 'जी हाँ, मुझे अच्छी तरह पता है। पूरी दुनिया घूम आइए, इनसे अच्छा इंसान नहीं मिलेगा। मैंने हमेशा देखा है — जो बचपन में अच्छे स्वभाव के होते हैं, बड़े होकर भी वैसे ही रहते हैं। मालिक बचपन में दुनिया के सबसे नरम स्वभाव और सबसे उदार दिल वाले लड़के थे।' एलिज़ाबेथ घर की प्रबंधिका को घूरते-घूरते बची। 'क्या यह औरत सचमुच मिस्टर डार्सी की बात कर रही है?' उसने सोचा। 'उनके पिता भी बड़े भले इंसान थे,' श्रीमती गार्डिनर ने कहा। 'जी हाँ, बिल्कुल सच है। और बेटा भी अपने पिता की तरह ग़रीबों के लिए बेहद मेहरबान हैं।' एलिज़ाबेथ यह सुनकर हैरान भी हुई और शक भी करती रही, फिर भी और सुनने को बेचैन थी। श्रीमती रेनॉल्ड्स किसी और बात से उसका ध्यान नहीं खींच पाईं। तस्वीरों में कौन है यह बताना, कमरों का आकार और साज-सामान की क़ीमत समझाना — कुछ काम नहीं आया। मिस्टर गार्डिनर को लगता था कि घर की प्रबंधिका मालिक की इतनी तारीफ़ें घराने का पक्ष लेने की वजह से करती है, और यह उन्हें दिलचस्प लगा। जल्दी ही वे फिर उसी बात पर आ गए। साथ बड़ी सीढ़ी चढ़ते हुए श्रीमती रेनॉल्ड्स ने मालिक की ढेरों ख़ूबियाँ जोश से गिनाईं। 'दुनिया में अब तक हुए किसी भी ज़मींदार और मालिक से बढ़कर हैं,' उसने कहा। 'आजकल के बिगड़े जवानों की तरह नहीं, जो बस अपना ही सोचते हैं। किरायेदार हो या नौकर, कोई भी उनके बारे में बुरा नहीं कहेगा। कुछ लोग उन्हें घमंडी कहते हैं, पर मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। मेरे ख़याल से बस इसलिए, क्योंकि वे दूसरे जवानों की तरह बिना रुके बकबक नहीं करते।' 'यह सुनकर तो सचमुच बड़े मीठे स्वभाव के लगते हैं!' एलिज़ाबेथ ने सोचा। 'ये जो इतनी अच्छी बातें बता रही हैं,' चलते-चलते मामी ने फुसफुसाकर कहा, 'वे हमारे उस बेचारे दोस्त के साथ हुए बरताव से कुछ मेल नहीं खातीं।' 'शायद हम धोखा खा गए हों।' 'इसकी गुंजाइश ज़्यादा नहीं है। बात का सिरा बिल्कुल भरोसे लायक़ था।' ऊपर की चौड़ी मंज़िल पर पहुँचकर सबको एक बहुत सुंदर बैठक में ले जाया गया, जो नीचे के कमरों से कहीं हल्के और सुरुचिपूर्ण ढंग से हाल ही में सजाई गई थी। बताया गया कि मिस डार्सी को पिछली बार पेम्बरली आने पर यह कमरा बहुत पसंद आया था, इसलिए उन्हें ख़ुश करने के लिए इसे अभी-अभी नया सजाया गया है। 'अच्छे भाई हैं, इसमें कोई शक नहीं,' एलिज़ाबेथ ने एक खिड़की की तरफ़ जाते हुए कहा। श्रीमती रेनॉल्ड्स पहले से ही सोच रही थीं कि मिस डार्सी कमरे में आते ही कितनी ख़ुश होंगी। 'मालिक हमेशा ऐसे ही हैं,' उसने जोड़ा। 'बहन को ख़ुश करने वाली कोई भी बात हो, फ़ौरन कर देते हैं। अपनी बहन के लिए वे कुछ भी करने से पीछे नहीं हटते।'
अब दिखाने को बस तस्वीर-दीर्घा और दो-तीन मुख्य सोने के कमरे बचे थे। दीर्घा में कई शानदार पेंटिंग थीं। पर एलिज़ाबेथ को चित्रकला की कोई समझ नहीं थी। नीचे देखी तस्वीरों से कहीं ज़्यादा दिलचस्पी से उसने मिस डार्सी की क्रेयॉन से बनाई कुछ तस्वीरें देखीं। इनके विषय भी आम तौर पर ज़्यादा दिलचस्प और समझने में आसान थे। दीर्घा में घराने के लोगों की कई तस्वीरें थीं, पर किसी अजनबी की नज़र थामे रखने लायक़ बहुत कम थीं। एलिज़ाबेथ उस इकलौते चेहरे को ढूँढ़ते हुए आगे बढ़ी, जिसे वह पहचान सकती थी। आख़िर वह चेहरा उसे रोक ही गया — मिस्टर डार्सी से हैरतअंगेज़ हद तक मिलती-जुलती एक तस्वीर। उस चेहरे पर वही मुस्कान थी, जो उसे कभी-कभी दिखती थी, जब वे उसकी तरफ़ देखते थे। वह कई मिनट तक तस्वीर के सामने खड़ी होकर गंभीरता से उसे निहारती रही। दीर्घा छोड़ने से पहले भी एक बार फिर उसके पास लौटी। श्रीमती रेनॉल्ड्स ने बताया कि यह तस्वीर उनके पिता के जीवित रहते बनवाई गई थी। उस पल एलिज़ाबेथ के मन में, दोनों के सबसे क़रीबी दिनों में भी कभी न जगी हो, ऐसी नरम भावना तस्वीर के इंसान के लिए जाग उठी। श्रीमती रेनॉल्ड्स की तारीफ़ हल्की बात नहीं थी। समझदार नौकर की तारीफ़ से बढ़कर तारीफ़ और क्या हो सकती है? उसने सोचा — भाई के रूप में, ज़मींदार के रूप में, मालिक के रूप में वे कितने लोगों की ख़ुशी की ज़िम्मेदारी उठाते हैं। कितने लोगों को सुख और कितनों को दुख देने की ताक़त उनके पास है, यह भी सोचा। उनके हाथों से कितनी भलाई और कितनी बुराई निकल सकती है! घर की प्रबंधिका ने जो कुछ कहा, उससे उनका स्वभाव और भी अच्छा दिखने लगा। एलिज़ाबेथ उस तस्वीर के सामने खड़ी थी, जिसमें डार्सी की निगाहें सीधे उस पर टिकी थीं। उसने पहले से कहीं गहरी कृतज्ञता के साथ उनके स्नेह के बारे में सोचा। उस भावना की गर्मी को याद करते हुए, उसे जताने के अनाड़ी तरीक़े के लिए भी वह पहले से कहीं ज़्यादा नरम पड़ गई। आम मेहमानों के लिए खुले घर के सारे हिस्से देख लेने के बाद सब फिर नीचे उतर आए। घर की प्रबंधिका से विदा लेकर, फाटक पर इंतज़ार कर रहे माली के साथ आगे बढ़े।
लॉन पार करके नदी की तरफ़ चलते हुए एलिज़ाबेथ ने घर को फिर से देखने के लिए पीछे मुड़कर देखा। मामा-मामी भी रुक गए। मिस्टर गार्डिनर यह अंदाज़ा लगा रहे थे कि इमारत कब बनी होगी, तभी हवेली के पिछवाड़े से अस्तबल जाने वाले रास्ते पर घर का मालिक अचानक नज़र आया। दोनों गुट बीस गज़ से भी कम दूरी पर थे। वे इतनी अचानक सामने आए कि बचने का कोई रास्ता नहीं था। दोनों की नज़रें फ़ौरन टकराईं, और दोनों के गाल गहरे लाल हो उठे। डार्सी सचमुच चौंक गए। एक पल के लिए वे हैरानी से जैसे जड़ हो गए। पर जल्दी ही ख़ुद को सँभालकर वे सबकी तरफ़ बढ़े। पूरी तरह शांत तो नहीं थे, पर एलिज़ाबेथ से बड़ी शिष्टता से बात करने लगे। एलिज़ाबेथ का जी सहज ही मुड़ जाने को हुआ। पर वे पास आए, तो वह रुक गई और ऐसी घबराहट में उनका अभिवादन स्वीकार किया, जो किसी तरह छुप नहीं सकती थी। उनका अचानक सामने आना और अभी देखी तस्वीर से मिलता चेहरा — इतने भर से भी अगर बाक़ी दोनों न पहचान पाते कि ये मिस्टर डार्सी हैं, तो मालिक को देखकर माली के चेहरे पर आई हैरानी उन्हें बता ही देती। मामा-मामी थोड़ी दूर खड़े होकर देखते रहे कि वे भांजी से क्या बात करते हैं। हैरान और उलझी हुई एलिज़ाबेथ उनके चेहरे की तरफ़ देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाई। घरवालों की ख़ैरियत पूछने वाली उनकी शिष्ट बातों का उसने क्या जवाब दिया, यह उसे ख़ुद पता नहीं चला। पिछली बार बिछड़ने के बाद उनके बरताव में इतना बदलाव देखकर वह इतनी हैरान थी कि वे जो भी शब्द बोलते, उससे उसकी घबराहट और बढ़ जाती। ख़ुद के यहाँ आने की बेजगह हरकत भी बार-बार याद आती रही। इसलिए दोनों साथ बिताए वे कुछ मिनट उसकी ज़िंदगी के सबसे तकलीफ़देह पलों में गिने गए। डार्सी भी कुछ ख़ास सहज नहीं दिख रहे थे। उनकी आवाज़ में हमेशा वाली शांति बिल्कुल नहीं थी। उन्होंने कई बार, बहुत जल्दबाज़ी में दोहराकर पूछा कि वह लॉन्गबर्न से कब निकली और डर्बीशायर में कितने दिन ठहरने वाली है। उनका मन बुरी तरह उलझा हुआ है, यह साफ़ झलक रहा था। आख़िर मानो कहने को कुछ बचा ही न हो। कुछ पल चुपचाप खड़े रहने के बाद वे अचानक होश में आए-से जान पड़े और विदा माँगकर चले गए। इसके बाद मामा-मामी पास आकर उनकी शक्ल-सूरत की तारीफ़ करने लगे। पर एलिज़ाबेथ को एक भी बात सुनाई नहीं दी। अपनी ही भावनाओं में पूरी तरह डूबी वह चुपचाप पीछे-पीछे चलती रही। शर्म और गुस्से से दबी जा रही थी। यहाँ आना दुनिया की सबसे बदक़िस्मत और सबसे बेसमझी वाली हरकत थी! उन्हें यह कितनी अजीब लगी होगी! घमंडी आदमी की नज़र में यह कितनी शर्मनाक दिखी होगी! ऐसा भी लग सकता था जैसे वह जान-बूझकर दोबारा उनकी आँखों के सामने आना चाहती थी! हाय, यहाँ आई ही क्यों? और वे तय दिन से एक दिन पहले ही क्यों आ गए? अगर वे दस मिनट पहले ही निकल गए होते, तो उनकी नज़र से बच जाते। क्योंकि साफ़ था कि वे ठीक उसी वक़्त पहुँचे थे, घोड़े या गाड़ी से अभी-अभी उतरे थे। इस बदमिज़ाजी-भरी मुलाक़ात को सोचकर उसका चेहरा बार-बार लाल हो उठा। पर उनका इतना साफ़ बदला हुआ बरताव आख़िर किस बात का इशारा था? बात करने भर से ही हैरानी थी, ऊपर से इतनी शिष्टता से बोलना और घरवालों की ख़ैरियत तक पूछना! उनके बरताव में इतनी कम शान उसने पहले कभी नहीं देखी थी। इस अचानक मुलाक़ात में जैसी नरमी से वे बोले, वैसी नरमी उसने पहले कभी नहीं सुनी थी। रोज़िंग्स पार्क में आख़िरी बार बात करने और उसके हाथ में वह ख़त थमाने के वक़्त से यह कितना अलग था! क्या सोचे, कैसे समझाए — कुछ समझ नहीं आ रहा था।
अब सब नदी किनारे बने ख़ूबसूरत रास्ते पर चल पड़े। हर क़दम पर सामने आते जंगल की और शानदार ढलानें और और ख़ूबसूरती से फैले हिस्से नज़र आते जाते। पर एलिज़ाबेथ को इनमें से कोई भी बात समझ आने में वक़्त लगा। मामा-मामी बार-बार बात छेड़ते, तो वह मशीन की तरह जवाब देती रही। जिस तरफ़ वे इशारा करते, उस तरफ़ नज़र घुमाती-सी लगती, पर नज़ारे का कोई भी हिस्सा पहचान नहीं पाती थी। उसका मन बस पेम्बरली हवेली की एक ही जगह पर टिका था, जहाँ अभी मिस्टर डार्सी होंगे। उसी वक़्त उनके मन में क्या चल रहा है, यह जानने की उसे तड़प थी। वह उसके बारे में क्या सोचते हैं, इतना सब झेलने के बाद भी अब भी उससे प्यार करते हैं या नहीं — यह जानना चाहती थी। शायद वे सिर्फ़ सहज महसूस करने की वजह से इतनी शिष्टता से पेश आए हों। पर उनकी आवाज़ में सहजता से हटकर भी कुछ और था। उसे यह नहीं पता चला कि उसे देखकर उन्हें दुख ज़्यादा हुआ या ख़ुशी। पर इतना पक्का था कि वे शांत नहीं दिख रहे थे। आख़िर साथ वालों ने जब इशारा किया कि उसका ध्यान कहीं और है, तो एलिज़ाबेथ होश में लौटी। उसे लगा कि अब अपने रोज़ के अंदाज़ में दिखना ज़रूरी है। सब जंगल में घुसे, नदी से कुछ देर के लिए अलग होकर ऊँची जगह की ओर चढ़ते गए। जहाँ पेड़ कम थे, वहाँ से नज़र दूर तक जाती थी। घाटी और उस पार की पहाड़ियों के कई ख़ूबसूरत नज़ारे दिखते। कई पहाड़ियाँ लंबे-चौड़े जंगल से ढकी थीं, और बीच-बीच में धारा का कोई हिस्सा भी झलक जाता। मिस्टर गार्डिनर पूरे पार्क का एक चक्कर लगाना चाहते थे, पर उन्हें चिंता थी कि यह पैदल तय करने लायक़ दूरी है या नहीं। रास्ता दिखाने वाले ने जीत भरी मुस्कान के साथ बताया कि इसका घेरा दस मील है। इससे बात तय हो गई। सब उस रास्ते पर चल पड़े, जिस पर आमतौर पर लोग चलते थे। कुछ देर बाद ढलवाँ जंगल उतरकर नदी के किनारे, सबसे संकरी जगहों में से एक पर पहुँचे। पूरे नज़ारे से मेल खाते एक सादे पुल से पानी पार किया। यह अब तक देखी किसी भी जगह से कम सजा था। घाटी यहाँ आकर एक तंग घाटी में सिमट गई थी। धारा और उसके दोनों ओर उगे जंगली झाड़-झंखाड़ के बीच बस एक संकरे रास्ते भर की जगह बची थी। एलिज़ाबेथ का मन घुमावदार रास्ते पर और आगे जाने का था। पर पुल पार करके यह अंदाज़ा लगते ही कि हवेली से कितनी दूर आ चुके हैं, लंबा चलने की आदी न होने वाली श्रीमती गार्डिनर और आगे नहीं जा सकीं। उनका मन बस जितनी जल्दी हो सके, गाड़ी तक लौट जाने का था। भांजी को उनके साथ मुड़ना ही पड़ा। सब नदी के इस पार से सबसे नज़दीकी रास्ता पकड़कर हवेली की तरफ़ चल पड़े। पर चाल धीमी रही, क्योंकि मिस्टर गार्डिनर — जिन्हें अक्सर मौक़ा नहीं मिलता, पर मछली पकड़ना उन्हें बहुत भाता था — बीच-बीच में पानी में दिखती ट्राउट मछलियाँ देखने और माली से इस बारे में बात करने में इतने रम गए कि आगे बढ़ना भूल गए। इसी धीमी चाल में चलते हुए सबको एक बार फिर हैरानी हुई। ज़्यादा दूर नहीं, मिस्टर डार्सी सामने से आ रहे थे। एलिज़ाबेथ की हैरानी पहली बार जितनी ही गहरी थी। इस तरफ़ का रास्ता नदी के उस पार वाले रास्ते से कम पेड़ों से घिरा था, इसलिए आमने-सामने आने से पहले ही उसने उन्हें देख लिया। कितनी भी हैरान क्यों न हो, एलिज़ाबेथ कम-से-कम पहले से इस मुलाक़ात के लिए कुछ ज़्यादा तैयार थी। उसने ठान लिया कि अगर वे सचमुच उससे मिलने आ रहे हैं, तो वह शांत दिखेगी और शांति से बात करेगी। दरअसल कुछ पलों के लिए उसे लगा कि वे शायद किसी और रास्ते पर मुड़ जाएँगे। रास्ते का मोड़ जब तक उन्हें नज़रों से छुपाए रखता, तभी तक यह ख़याल टिका। मोड़ पार होते ही वे ठीक सामने आ गए। एक ही नज़र में साफ़ था कि अभी की मेहरबान चाल-ढाल में ज़रा भी कमी नहीं आई थी। एलिज़ाबेथ ने भी उनकी शिष्टता से क़दम मिलाने की कोशिश की। मिलते ही उसने इस जगह की सुंदरता की तारीफ़ करनी शुरू की। पर 'मनमोहक', 'दिलकश' — इतना कहने से पहले ही मनहूस यादें उमड़ आईं। उसे लगा, अगर वह पेम्बरली की तारीफ़ करेगी, तो वे इसे शायद बुरा मान लें। उसका रंग बदल गया, और वह आगे कुछ नहीं बोल सकी।
श्रीमती गार्डिनर थोड़ा पीछे खड़ी थीं। एलिज़ाबेथ चुप हुई, तो डार्सी ने पूछा कि क्या वे उन्हें साथ आए लोगों से मिलवाने का सम्मान देंगी। यह ऐसी मेहरबानी थी, जिसकी उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। जिन लोगों को उन्होंने प्रस्ताव रखते वक़्त हिक़ारत से नकार दिया था, उन्हीं से अब जान-पहचान चाहने की बात पर वह मुस्कुराते-मुस्कुराते बची। 'ये कौन हैं, यह पता चले तो कितना चौंक जाएँगे!' उसने सोचा। 'शायद अभी इन्हें बड़े ख़ानदान के लोग समझ रहे हैं।' पर मिलवाना जल्दी ही हो गया। एलिज़ाबेथ ने अपने रिश्ते की बात बता दी। वे यह कैसे झेलते हैं, यह देखने को उसने शरारत से कनखियों से देखा। थोड़ी उम्मीद यह भी थी कि वे इतने शर्मनाक साथियों से जल्द से जल्द भाग खड़े होंगे। रिश्ता सुनकर वे हैरान तो ज़रूर हुए, पर डार्सी ने डटकर इसे स्वीकार किया। जाना तो दूर, वे सबके साथ लौटकर चलने लगे और मिस्टर गार्डिनर से बातें करने लगे। एलिज़ाबेथ ख़ुश हुए बिना नहीं रह सकी, और थोड़ा इतरा भी उठी। इस बात से चैन मिला कि उनके पास भी ऐसे रिश्तेदार हैं, जिनसे शर्माने की ज़रूरत नहीं। दोनों के बीच हुई हर बात वह ध्यान से सुनती रही। मामा की समझ, पसंद और भले तौर-तरीक़े झलकाने वाला हर लफ़्ज़, हर वाक्य उसे गर्व से भर देता। बात जल्दी ही मछली पकड़ने पर आ गई। डार्सी ने मिस्टर गार्डिनर से बड़ी शिष्टता से कहा कि जब तक वे इस इलाक़े में रहें, जब मन करे यहाँ मछली पकड़ सकते हैं। मछली पकड़ने का सामान भी देने की बात कही। आम तौर पर सबसे बढ़िया मछली कहाँ मिलती है, यह भी बता दिया। एलिज़ाबेथ का हाथ थामे चल रहीं श्रीमती गार्डिनर ने हैरानी से नज़र दौड़ाई। एलिज़ाबेथ कुछ नहीं बोली, पर बेहद ख़ुश थी। यह मेहरबानी सिर्फ़ उसी की वजह से की गई होगी, इसमें कोई शक नहीं था। पर हैरानी बहुत बड़ी थी। मन-ही-मन वह बार-बार दोहराती रही। 'ये इतने क्यों बदल गए? आख़िर क्यों? यह मेरी वजह से तो नहीं हो सकता। मेरे लिए इतना नरम बरताव तो नहीं हुआ होगा। हंसफ़र्ड में मेरी लगाई फटकार से इतना बड़ा बदलाव नहीं आ सकता। अब भी मुझसे प्यार करना — यह मुमकिन ही नहीं।'
दोनों महिलाएँ आगे और दोनों सज्जन पीछे-पीछे कुछ देर तक चलते रहे। एक अनोखी जलीय घास को नज़दीक से देखने के लिए नदी किनारे उतरने और फिर जगह लेने के बीच क़तार थोड़ी बदल गई। इसकी शुरुआत तब हुई, जब सुबह से चलकर थकी श्रीमती गार्डिनर को लगा कि सिर्फ़ एलिज़ाबेथ की बाँह का सहारा काफ़ी नहीं, तो उन्होंने पति की बाँह थाम ली। मिस्टर डार्सी मामी की जगह भांजी के पास आ खड़े हुए, और दोनों साथ चलने लगे। कुछ पल की चुप्पी के बाद एलिज़ाबेथ ने पहले बात छेड़ी। वह बताना चाहती थी कि यहाँ आने से पहले उसे पक्का यक़ीन दिलाया गया था कि वे घर पर नहीं हैं। इसलिए उसने कहा कि उनका आना उसने बिल्कुल नहीं सोचा था। 'घर की प्रबंधिका ने,' उसने जोड़ा, 'बताया था कि आप कल से पहले ज़रूर नहीं आएँगे। और बेकवेल से निकलने से पहले भी हमें यही सुनने को मिला था कि आप इस इलाक़े में जल्दी लौटने वाले नहीं हैं।' डार्सी ने माना कि यह सब सच है। ज़मीन-जायदाद के प्रबंधक से कुछ काम निपटाना था, इसलिए बाक़ी साथियों से कुछ घंटे पहले ही आ गए। 'वे लोग कल सुबह जल्दी आ जुड़ेंगे,' उन्होंने आगे कहा। 'उनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो आपको जानने का दावा करेंगे — मिस्टर बिंगली और उनकी दोनों बहनें।' एलिज़ाबेथ ने बस हल्के से सिर झुका दिया। उसका मन फ़ौरन उस पल की तरफ़ लौट गया, जब दोनों के बीच मिस्टर बिंगली का नाम आख़िरी बार आया था। डार्सी के चेहरे के रंग से भी लगा कि उनका मन भी कुछ ख़ास दूर नहीं भटका था। 'साथ में एक और भी हैं,' थोड़ी देर बाद उन्होंने आगे कहा, 'जो आपसे ख़ास तौर पर जान-पहचान बढ़ाना चाहती हैं। क्या लैम्बटन में रहने के दौरान आप मुझे अपनी बहन से आपका परिचय कराने देंगी? या यह मेरी कुछ ज़्यादा ही माँग है?' ऐसी माँग सुनने की हैरानी इतनी बड़ी थी कि एलिज़ाबेथ को याद ही नहीं रहा कि उसने कैसे हामी भरी। मिस डार्सी की उससे जान-पहचान बढ़ाने की जो भी इच्छा हो, वह जल्दी ही समझ गई कि यह भाई की ही बनाई हुई है। इससे ज़्यादा गहराई में जाए बिना भी यह बात संतोष और ख़ुशी देने वाली थी। इससे यह भी साफ़ हो गया कि डार्सी की चाहत की वजह से वे उसे सचमुच बुरा नहीं समझने लगे थे। अब दोनों चुपचाप चलते रहे, हर कोई अपने-अपने ख़यालों में गहरा डूबा। एलिज़ाबेथ सहज तो नहीं थी, पर इतरा उठी और ख़ुश भी थी। अपनी बहन से मिलवाने की चाहत सबसे बड़ी तारीफ़ थी। दोनों जल्दी ही बाक़ी सबसे कहीं आगे निकल गए। जब गाड़ी तक पहुँचे, तो मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर लगभग आठवें हिस्से मील पीछे थे। डार्सी ने घर के अंदर चलने को कहा, पर एलिज़ाबेथ ने कहा कि वह थकी नहीं है। दोनों लॉन पर साथ खड़े रहे। ऐसे मौक़े पर कहने को बहुत कुछ होना चाहिए था, पर चुप्पी बेहद अजीब लगी। एलिज़ाबेथ बात करना चाहती थी, पर लगा जैसे हर विषय पर मनाही है। आख़िर उसे याद आया कि वे यात्रा पर हैं। दोनों जी-जान से मैटलॉक और डवडेल की बातें करने लगे। पर वक़्त भी और मामी भी धीरे-धीरे चल रही थीं। दोनों के अकेले बिताए वक़्त के ख़त्म होने से पहले ही एलिज़ाबेथ का धीरज और सोच लगभग जवाब दे गए। मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर पहुँचे, तो डार्सी ने सबसे बड़े आग्रह से घर के अंदर चलकर कुछ जलपान लेने को कहा। पर सबने मना कर दिया, और दोनों तरफ़ से बड़ी शिष्टता से विदाई हुई। डार्सी ने महिलाओं को गाड़ी में चढ़ने में मदद की। गाड़ी चली, तो एलिज़ाबेथ ने देखा कि वे धीरे-धीरे हवेली की तरफ़ चल पड़े थे।
अब मामा-मामी अपनी देखी बातें सुनाने लगे। दोनों ने ही पक्के तौर पर कहा कि डार्सी उम्मीद से कहीं ज़्यादा भले निकले। 'तौर-तरीक़े बिल्कुल सही, शिष्ट और नम्र लगे,' मामा ने कहा। 'हाँ, थोड़ी शान तो ज़रूर है,' मामी ने जवाब दिया। 'पर वह बस चाल-ढाल में दिखती है, ज़रा भी बुरी नहीं लगती। अब मैं भी घर की प्रबंधिका की तरह कह सकती हूँ — कोई उन्हें घमंडी कहे, तो कहे, पर मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखा।' 'हमसे इतने अच्छे से पेश आएँगे, यह सोचकर मैं पहले कभी इतना हैरान नहीं हुआ। सिर्फ़ शिष्ट नहीं, सचमुच बहुत ख़याल रखने वाले थे। इतना करने की तो कोई ज़रूरत भी नहीं थी। एलिज़ाबेथ से भी उनकी जान-पहचान बहुत कम है।' 'हाँ, लिज़ी,' मामी ने कहा। 'सच कहूँ तो विकहम जितने सुंदर तो नहीं। नहीं, ठीक-ठीक कहूँ तो विकहम जैसे भाव भी नहीं। नैन-नक़्श तो बहुत अच्छे हैं। तो फिर तुमने हमें क्यों कहा था कि वे तुम्हें ज़रा भी पसंद नहीं?' एलिज़ाबेथ ने जितना हो सका, सफ़ाई दी। कहा कि केंट में मिलने पर वे पहले से ज़्यादा अच्छे लगे थे, और आज सुबह जैसी ख़ुशमिज़ाजी उसने उनमें पहले कभी नहीं देखी। 'पर हो सकता है, मेहरबानी दिखाने में थोड़े मनमौजी हों,' मामा ने जवाब दिया। 'बड़े लोग अक्सर ऐसे ही होते हैं। इसलिए मछली पकड़ने वाली बात पर मैं पूरा भरोसा नहीं करूँगा। हो सकता है, अगले दिन मन बदल लें और अपनी ज़मीन से बाहर निकाल दें।' एलिज़ाबेथ को लगा कि दोनों डार्सी के स्वभाव को पूरी तरह ग़लत समझ रहे हैं, पर वह कुछ नहीं बोली। 'आज हमने जो देखा, बस उसे देखकर,' श्रीमती गार्डिनर ने आगे कहा, 'मुझे तो लगता ही नहीं कि वे किसी के साथ भी बेचारे विकहम जैसा क्रूर बरताव कर सकते हैं। बदमिज़ाज तो बिल्कुल नहीं लगे। बल्कि बोलते वक़्त उनके होंठों पर कुछ ऐसा था, जो खींच लेता है। चेहरे पर शान तो है, पर दिल बुरा हो, ऐसा नहीं लगता। हाँ, घर दिखाने वाली उस भली औरत ने तो उनकी हद से ज़्यादा तारीफ़ की! कई बार तो मैं ज़ोर से हँसते-हँसते बची। पर लगता है, वे उदार मालिक ज़रूर हैं। नौकर की नज़र में तो शायद बस यही सारी अच्छाइयों का मतलब होता है।' अब एलिज़ाबेथ को लगा कि विकहम के साथ डार्सी के बरताव का कुछ हद तक बचाव करना ज़रूरी है। सो उसने बड़ी सावधानी से दोनों को बताया कि केंट में उनके रिश्तेदारों से जो सुना, उसके मुताबिक़ डार्सी के बरताव को बिल्कुल अलग नज़र से देखा जा सकता है। उनका स्वभाव हर्टफ़र्डशायर में सोचे जितना ऐबों से भरा नहीं है, और विकहम भी उतने भले नहीं जितना दिखते हैं। इसके सबूत के तौर पर उसने दोनों के बीच हुए पैसे के लेन-देन का पूरा ब्योरा बताया। स्रोत का नाम नहीं लिया, पर बताया कि यह भरोसेमंद जगह से आया है।
श्रीमती गार्डिनर हैरान भी हुईं और परेशान भी। पर अब वे उस जगह के क़रीब पहुँच रही थीं, जहाँ उन्होंने कभी सुख के दिन बिताए थे, इसलिए हर ख़याल यादों के जादू के आगे पीछे हट गया। आस-पास की दिलचस्प जगहें एक-एक करके पति को दिखाने में वे इतनी रम गईं कि और कुछ सोच ही नहीं पाईं। सुबह की सैर से थकी होने के बावजूद, रात का खाना ख़त्म होते ही वे पुराने जान-पहचान वालों से मिलने फिर निकल पड़ीं। सालों से टूटी हुई जान-पहचान को फिर से जोड़ने की ख़ुशी में उनकी शाम बीती। उस दिन जो कुछ हुआ, वह इतना दिलचस्प था कि एलिज़ाबेथ को इन नए साथियों में मन लगाने की फ़ुर्सत ही मुश्किल से मिली। मिस्टर डार्सी ने जो मेहरबानी दिखाई, और सबसे बढ़कर, अपनी बहन से जान-पहचान कराने की जो चाहत जताई — इस पर हैरान होकर बार-बार सोचने के अलावा वह कुछ और कर ही नहीं पाई।