हिंदी संस्करण
अध्याय 45
अब एलिज़ाबेथ को यक़ीन हो चुका था कि मिस बिंगली उससे जलन के कारण ही चिढ़ती हैं, और वह यह सोचे बिना न रह सकी। पेम्बरली में उसका आ पहुँचना मिस बिंगली को कितना नागवार गुज़रा होगा। यह भी जानने का मन था कि इस बार मिस बिंगली कितनी शिष्टता बरतते हुए फिर से मिलना-जुलना निभाएँगी। हवेली पहुँचकर सब लोग ड्योढ़ी पार करते हुए बड़ी बैठक तक पहुँचाए गए। कमरा उत्तर की ओर था, सो गर्मियों में बेहद ठंडा रहता था। ज़मीन तक आती खिड़कियों से हवेली के पीछे की ऊँची, जंगल से ढकी पहाड़ी दिखती थी। बीच के लॉन पर जगह-जगह सुंदर बलूत और स्पेनिश शाहबलूत के पेड़ खड़े थे। बस उन्हें देखते रहना ही मन को ताज़ा कर देता था। उस कमरे में मिस डार्सी, श्रीमती हर्स्ट, मिस बिंगली और वह महिला बैठी थीं, जो लंदन में जॉर्जियाना के साथ रहती थीं। उन्होंने सबका स्वागत किया। जॉर्जियाना बेहद शिष्ट थीं, पर बहुत घबराई हुई लग रही थीं। वजह थी उनका शर्मीलापन और यह डर कि कहीं कोई चूक न हो जाए। पर जो लोग ख़ुद को छोटा समझते हैं, वे उन्हें आसानी से घमंडी और बेरुख़ मान सकते थे। श्रीमती गार्डिनर और उनकी भांजी ने जॉर्जियाना को ठीक-ठीक पहचान लिया। और इसीलिए उनके मन में उनके लिए हमदर्दी जागी। श्रीमती हर्स्ट और मिस बिंगली ने बस हल्का-सा अभिवादन किया। सब बैठ गए, तो ऐसे मौक़ों पर जैसा होता है, कुछ देर एक अटपटी चुप्पी छाई रही। पहले बोलने वाली श्रीमती एनेस्ली थीं — गरिमा से भरी और भली लगने वाली। कोई भी बात छेड़ने की उनकी कोशिश भर से समझ आ जाता था कि बाक़ी दोनों से कहीं ज़्यादा सच्ची तमीज़ उन्हीं में है। बातचीत मुख्य रूप से श्रीमती एनेस्ली और श्रीमती गार्डिनर के बीच ही चलती रही। एलिज़ाबेथ भी बीच-बीच में कुछ जोड़ देती। मिस डार्सी हिम्मत करके बातचीत में शामिल होना चाहती-सी लगीं। जब अपनी बात किसी और के कान तक पहुँचने का डर सबसे कम होता, तब वे कभी-कभी छोटा-सा एक वाक्य कह भी देतीं। एलिज़ाबेथ ने जल्दी ही भाँप लिया। मिस बिंगली उसे बहुत ग़ौर से देख रही थीं। ख़ास तौर पर जब वह मिस डार्सी से बात करती, तो लगता जैसे वे एक शब्द भी छूटने नहीं देना चाहतीं। एलिज़ाबेथ मिस डार्सी से इतनी दूर न बैठी होती कि बात करना असुविधा बने, तो वह नज़र भी उसे बोलने की कोशिश से रोक न पाती। पर ज़्यादा बोलने की मजबूरी से बच जाना उसे बुरा भी नहीं लगा। उसका अपना मन ही ख़यालों में उलझा हुआ था। एलिज़ाबेथ को लग रहा था कि कुछ सज्जन अभी कमरे में आएँगे। उनमें हवेली के मालिक भी हों — यह वह चाहती भी थी और इससे डरती भी थी। कौन-सा भाव बड़ा है, यह वह ख़ुद भी मुश्किल से तय कर पा रही थी। इसी तरह क़रीब पंद्रह मिनट बैठे रहने के दौरान उसने मिस बिंगली की आवाज़ एक बार भी नहीं सुनी। फिर उनके ठंडे सवाल ने उसका ध्यान खींचा — घर में सब कैसे हैं। एलिज़ाबेथ ने उतने ही बेपरवाह और छोटे जवाब दिए, तो मिस बिंगली ने आगे कुछ नहीं कहा।
इसके बाद बदलाव तब आया, जब नौकर ठंडा गोश्त, केक और मौसम के बेहतरीन फल कई तरह के लेकर अंदर आए। पर यह सब सामने तब आया, जब श्रीमती एनेस्ली मिस डार्सी की ओर कई बार ऐसी नज़र और मुस्कान भेज चुकी थीं, मानो कह रही हों कि मेज़बानी अब वही सँभालें। अब सबके पास करने को कुछ था। साथ मिलकर बात भले न बन पाए, साथ मिलकर खाया तो जा ही सकता था। अंगूर, शफ़तालू और आड़ू की सुंदर मीनार-सी सजी तश्तरियों ने जल्दी ही सबको मेज़ के चारों ओर बुला लिया। इसी खाने-पीने के दौरान एलिज़ाबेथ को अच्छा मौक़ा मिला कि वह परख ले, मिस्टर डार्सी के आने पर उसका मन किस ओर झुकता है। उनके आने से वह ज़्यादा डरती है या उसे ज़्यादा चाहती है, यह पता चल जाता। अभी थोड़ी देर पहले तक उसे लगता था कि चाहत ही भारी है। पर जैसे ही वे अंदर आए, उसे यहाँ आने का पछतावा होने लगा। डार्सी कुछ देर मिस्टर गार्डिनर के साथ रहे। मिस्टर गार्डिनर हवेली से निकले दो-तीन सज्जनों के साथ नदी किनारे मछली पकड़ रहे थे। घर की महिलाएँ उसी सुबह जॉर्जियाना से मिलने जाने वाली हैं — यह सुनकर ही डार्सी उनसे विदा हुए। उनके आते ही एलिज़ाबेथ ने एक बहुत समझदारी भरा इरादा बाँधा। तय किया कि वह जितना हो सके सहज और शांत बनी रहेगी। यह इरादा निभाना आसान नहीं था। फिर भी बेहद ज़रूरी था। वे जिस पल कमरे में आए, लगभग हर नज़र उनके बरताव का पीछा करने लगी। क्योंकि साफ़ दिख रहा था कि वहाँ बैठा हर कोई उन दोनों पर शक कर रहा है। डार्सी उन दोनों में से किसी से भी बात करते, तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती। पर मिस बिंगली जितनी पैनी उत्सुकता किसी ने नहीं दिखाई। जलन ने अभी मिस बिंगली को हताश नहीं किया था। मिस्टर डार्सी में उनकी दिलचस्पी भी ज़रा भी ठंडी नहीं पड़ी थी। भाई के आते ही मिस डार्सी ने बातचीत में और ज़्यादा जी लगाया। वे बहुत चाहते थे कि उनकी छोटी बहन और एलिज़ाबेथ क़रीब आएँ। जब भी दोनों बात छेड़ने की कोशिश करतीं, वे जितना हो सके मदद करते। एलिज़ाबेथ ने यह ताड़ लिया। मिस बिंगली ने भी सब देख लिया। ग़ुस्सा न सँभाल पाने से बेसब्र होकर उन्होंने पहला मौक़ा मिलते ही मज़ाक़ उड़ाते-से, पर शिष्ट लहजे में कहा। 'हाँ सच, मिस एलिज़ा, मिलिशिया मेरिटन से चला गया न? आपके घरवालों को तो बहुत सूना लग रहा होगा।' डार्सी के सामने मिस बिंगली विकहम का नाम लेने की हिम्मत नहीं कर सकीं। पर एलिज़ाबेथ ने फ़ौरन भाँप लिया कि मिस बिंगली के मन में सबसे ज़्यादा जगह किसकी है। विकहम से जुड़ी कई यादों ने एक पल के लिए उसे तकलीफ़ दी। पर उसने उस बदनीयत वार को नाकाम करने में पूरी ताक़त लगा दी। थोड़ी ही देर में उसने काफ़ी सहज आवाज़ में सवाल का जवाब दे दिया। कहते-कहते उसकी नज़र अनजाने ही डार्सी पर पड़ी। उनका चेहरा और गहरा लाल था, और वे गंभीरता से उसी को देख रहे थे। उनकी छोटी बहन घबराहट में आँखें तक नहीं उठा पा रही थीं। ठीक उसी पल मिस बिंगली अपनी प्यारी सहेली को कितनी बड़ी तकलीफ़ दे रही हैं, यह उन्हें मालूम होता, तो वे ऐसी बात कभी न कहतीं। पर वे तो बस इतना चाहती थीं कि जिस आदमी को वे एलिज़ाबेथ के मन में बसा हुआ मानती हैं, उसकी याद दिलाकर उसे घबरा दें। वे चाहती थीं कि एलिज़ाबेथ कुछ ज़्यादा ही भावुक दिखे और डार्सी की नज़र में गिर जाए। शायद वे डार्सी को यह भी याद दिलाना चाहती थीं कि उस रेजिमेंट से जुड़कर एलिज़ाबेथ के घर के कुछ लोगों ने जो तमाम बेवक़ूफ़ियाँ और हँसी उड़ाने लायक़ हरकतें की थीं। मिस डार्सी भागकर शादी करने वाली थीं — इस बारे में मिस बिंगली ने एक शब्द भी कभी नहीं सुना था। वह बात राज़ रख सकने वाले लोगों में एलिज़ाबेथ के सिवा किसी को भी मालूम नहीं थी। डार्सी बिंगली के नज़दीकी लोगों से तो उसे ख़ास तौर पर छिपाना चाहते थे। इसकी वजह वह चाहत थी, जो एलिज़ाबेथ बहुत पहले से उनमें मानती आई थी। यानी यह चाहत कि किसी दिन बिंगली और जॉर्जियाना एक ही परिवार के हो जाएँ। डार्सी के मन में ऐसा ख़याल था, यह पक्का था। पर इसका मतलब यह नहीं कि इसी योजना के चलते उन्होंने बिंगली और मिस बेनेट को अलग करना चाहा। इतना ज़रूर हो सकता है कि दोस्त की ख़ुशी की गहरी फ़िक्र में इससे थोड़ा और जोश आ गया हो। पर एलिज़ाबेथ शांत बनी रही, तो डार्सी की हलचल भी जल्दी ही थम गई। ग़ुस्से और निराशा से भरी मिस बिंगली विकहम की बात के और क़रीब जाने की हिम्मत न कर सकीं। जॉर्जियाना भी समय बीतने के साथ सँभल गईं। पर इतना नहीं कि फिर से बोल पातीं। छोटी बहन से नज़र मिलाने में डरने वाले भाई को यह बात लगभग याद ही नहीं आई कि इस मामले में जॉर्जियाना भी जुड़ी हुई हैं। मिस बिंगली ने डार्सी का ध्यान एलिज़ाबेथ से हटाना चाहा। पर लगा, उसी बात ने उन्हें और ख़ुशी-ख़ुशी सिर्फ़ एलिज़ाबेथ के बारे में सोचने पर लगा दिया।
ऊपर के सवाल-जवाब के बाद यह मुलाक़ात ज़्यादा देर नहीं चली। मिस्टर डार्सी मेहमानों को गाड़ी तक छोड़ने गए, और उतनी देर में मिस बिंगली ने एलिज़ाबेथ के रूप, बरताव और पहनावे की बुराई करते हुए अपना जी हल्का कर लिया। जॉर्जियाना ने इसमें साथ नहीं दिया। भाई ने जो अच्छा कहा था, एलिज़ाबेथ के लिए मन में अच्छा भाव जगने को इतना ही काफ़ी था। भाई का आँका हुआ ग़लत हो ही नहीं सकता था। और भाई ने एलिज़ाबेथ का जैसा चित्र खींचा था, उसे सुनने के बाद जॉर्जियाना उसे प्यारी और मीठे स्वभाव वाली मानने के सिवा कुछ सोच ही नहीं सकती थीं। डार्सी बड़ी बैठक में लौटे, तो मिस बिंगली छोटी बहन से कही अपनी बातों में से कुछ उनके सामने दोहराए बिना न रह सकीं। 'मिस्टर डार्सी, आज सुबह एलिज़ा बेनेट कितनी बुरी हालत में लग रही थी!' मिस बिंगली चिल्लाईं। 'जाड़ों के बाद से इतना बदला हुआ इंसान मैंने ज़िंदगी में नहीं देखा। रंग तो बहुत काला और खुरदुरा पड़ गया है! लुइज़ा और मैंने आपस में कहा भी कि दोबारा देखते, तो पहचान ही न पाते।' मिस्टर डार्सी को ऐसी बातें ज़रा भी अच्छी नहीं लगीं। उन्होंने बस ठंडे स्वर में इतना कहा कि गर्मियों में सफ़र करने पर धूप से थोड़ा रंग साँवला पड़ जाना कोई अजब बात नहीं, और इसके सिवा उन्हें कोई बदलाव नहीं दिखा। 'मेरी बात करें तो,' मिस बिंगली ने फिर कहा, 'मुझे मानना पड़ेगा कि मुझे वह कभी सुंदर लगी ही नहीं। चेहरा बहुत दुबला है, रंग में कोई चमक नहीं, और नैन-नक़्श भी ज़रा भी सुंदर नहीं। नाक में न कोई ख़ास बात है, न कोई साफ़ रेखा। दाँत देखे जा सकते हैं, पर हैं मामूली ही। और वे आँखें, जिन्हें कभी-कभी इतना बढ़िया कहा जाता है — मुझे तो उनमें कुछ भी ख़ास नहीं दिखा। उनकी वह पैनी, तीखी नज़र मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। और उसके पूरे अंदाज़ में सलीक़ा तो है नहीं, ऊपर से अपने पर इतराने का भाव है, जो सहा नहीं जाता।' डार्सी का मन एलिज़ाबेथ पर है — इसका पक्का यक़ीन रखने वाली मिस बिंगली के लिए ऐसी बातें अपनी ख़ूबी दिखाने का अच्छा तरीक़ा नहीं थीं। पर ग़ुस्से में भरा इंसान हमेशा समझदार नहीं होता। आख़िर उन्हें डार्सी कुछ नाराज़ होते दिखे, तो मिस बिंगली ने मान लिया कि जितनी कामयाबी वे चाहती थीं, वह पूरी मिल गई। फिर भी डार्सी पक्का इरादा करके चुप ही रहे। उन्हें किसी भी तरह बुलवाकर छोड़ेंगी, यह ठान चुकी मिस बिंगली आगे बोलीं। 'मुझे याद है, हर्टफ़र्डशायर में जब हमने उसे पहली बार जाना, तो सब यह सुनकर कितने हैरान हुए थे कि उसकी गिनती सुंदरियों में होती है। ख़ास तौर पर उस रात, जब वे लोग नेदरफ़ील्ड में खाना खाकर गए थे। मुझे याद है, आपने कहा था — «वह सुंदरी! इससे तो अच्छा है, उसकी माँ को मैं हाज़िरजवाब कह दूँ।» पर बाद में शायद आपकी राय धीरे-धीरे बदल गई। लगता है, एक वक़्त आपको वह ठीक-ठाक सुंदर भी लगने लगी थी।' 'हाँ,' डार्सी ने और न सह पाकर जवाब दिया, 'पर वह सिर्फ़ शुरू की जान-पहचान तक था। उसके बाद के कई महीनों से मैं उन्हें अपनी जान-पहचान की सबसे सुंदर स्त्रियों में से एक मानता आया हूँ।' वे तुरंत वहाँ से चले गए। मिस बिंगली के पास बस यही संतोष बचा कि उन्होंने ज़बरदस्ती ऐसी बात कहलवा ली, जिससे किसी और को नहीं, सिर्फ़ उन्हीं को तकलीफ़ हुई।
लौटते वक़्त रास्ते में श्रीमती गार्डिनर और एलिज़ाबेथ ने मुलाक़ात की हर बात कही। सिर्फ़ वह बात छोड़कर, जो दोनों के मन पर सबसे ज़्यादा थी। जिन लोगों से मिले, उनके हाव-भाव और बरताव का एक-एक ब्योरा दिया, पर जिस एक इंसान ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा था, उसी को छोड़ दिया। उनकी बहन की, उनके दोस्तों की, हवेली की और फलों की — सब बात हुई। बस उन्हीं की नहीं। फिर भी एलिज़ाबेथ बहुत जानना चाहती थी कि श्रीमती गार्डिनर उनके बारे में क्या सोचती हैं। और श्रीमती गार्डिनर को भी बेहद ख़ुशी होती, अगर उनकी भांजी ही वह बात छेड़ देती।