हिंदी संस्करण

अध्याय 46

लैम्बटन पहली बार पहुँची, तो एलिज़ाबेथ को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि जेन की कोई चिट्ठी वहाँ नहीं आई है। उसके बाद भी हर सुबह वही निराशा हाथ लगती रही। पर तीसरे दिन जेन ने एक साथ दो चिट्ठियाँ भेज दीं। एलिज़ाबेथ की शिकायत तभी जाकर ख़त्म हुई। जेन ने भी अपना फ़र्ज़ निभा दिया। दोनों में से एक पर निशान लगा था कि वह ग़लती से कहीं और पहुँचा दी गई थी। जेन पता लिखने में हद से ज़्यादा लापरवाह थी, सो एलिज़ाबेथ को इस पर हैरानी नहीं हुई। चिट्ठियाँ आईं, तब सब लोग टहलने निकलने की तैयारी में ही थे। मामा-मामी उसे चैन से चिट्ठी पढ़ने देने के लिए दोनों पहले ही निकल गए। एलिज़ाबेथ ने पहले वही चिट्ठी खोली, जो ग़लत जगह पहुँच गई थी। वह पाँच दिन पहले लिखी गई थी। शुरू के हिस्से में वहाँ हुई छोटी-मोटी महफ़िलों और न्योतों का, और गाँव-देहात में सुनने को मिलने वाली ख़बरों का ज़िक्र था। पर एक दिन बाद जोड़ा गया आगे का हिस्सा अलग ही था। लिखावट भी साफ़ तौर पर काँपती हुई थी। उसमें कहीं ज़्यादा बड़ी ख़बर थी। लिखा यह था। 'ऊपर की बातें लिख चुकने के बाद, मेरी प्यारी लिज़ी, एक बेहद अनचाही और गंभीर बात हो गई है। पर डर है कि यह सुनकर तुम घबरा जाओगी। पहले यही जान लो कि हम सब ठीक-ठाक हैं। जो कहने जा रही हूँ, वह बेचारी लिडिया के बारे में है। कल रात बारह बजे, जब हम सब सोने ही जा रहे थे, कर्नल फ़ॉर्स्टर ने एक हरकारा भेजा। ख़बर यह थी कि लिडिया उनके नीचे के एक अफ़सर के साथ स्कॉटलैंड भाग गई है। सच कहूँ तो विकहम के साथ! सोचो, हम पर क्या बीती होगी। पर लगता है, किटी के लिए यह इतनी अनोखी बात नहीं थी। मुझे बहुत, बहुत दुख है। दोनों ने कितनी जल्दबाज़ी में ब्याह का फ़ैसला कर लिया! फिर भी मैं सबसे अच्छे नतीजे की ही उम्मीद करना चाहती हूँ। यही चाहती हूँ कि उनके स्वभाव के बारे में हमने जो सुना था, वह ग़लत ही रहा हो। नासमझ और बेपरवाह होना तो आसानी से माना जा सकता है। पर यह क़दम, और इसी बात पर हमें ख़ुश हो लेना चाहिए, यही बताता है कि उनका दिल बुरा नहीं है। कम-से-कम उन्होंने पैसे की चाह के बिना लिडिया को चुना है। उन्हें पता तो होगा ही कि पिताजी उसे कुछ नहीं दे सकते। बेचारी माँ बिल्कुल टूट गई हैं। पिताजी उनसे कुछ बेहतर सह पा रहे हैं। कितनी बड़ी बात है कि विकहम के बारे में जो बुरी बातें हमने सुनी थीं, उनमें से एक भी हमने माँ-बाप को नहीं बताई। हमें भी वे बातें भुला देनी चाहिए। अंदाज़ा है कि दोनों शनिवार की रात बारह बजे के आसपास निकले। पर उनके ग़ायब होने का पता इतवार सुबह आठ बजे ही चला। हरकारा फ़ौरन भेज दिया गया। मेरी प्यारी लिज़ी, वे दोनों हमारे घर से दस मील के भीतर से गुज़रे होंगे। लगता है, कर्नल फ़ॉर्स्टर भी जल्दी ही यहाँ आ पहुँचेंगे। लिडिया कर्नल की पत्नी के नाम एक छोटी चिट्ठी छोड़ गई थी, जिसमें अपनी योजना बता दी थी। अब मुझे लिखना बंद करना होगा। बेचारी माँ को ज़्यादा देर अकेला नहीं छोड़ सकती। डर है कि तुम मेरी लिखावट पढ़ ही न पाओ। मैंने क्या लिख दिया है, यह मुझे ख़ुद भी ठीक से मालूम नहीं।'

सोचने तक का वक़्त नहीं था। ख़ुद क्या महसूस कर रही है, यह भी ठीक से जाने बिना एलिज़ाबेथ ने चिट्ठी ख़त्म करते ही दूसरी वाली लपक ली। बेहद बेचैन हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। और आगे की बातें पढ़ीं। यह चिट्ठी पहली चिट्ठी का आख़िरी हिस्सा लिखे जाने के एक दिन बाद लिखी गई थी। 'मेरी प्यारी बहन, अब तक तो तुम्हें मेरी वह जल्दबाज़ी में लिखी चिट्ठी मिल ही गई होगी। उम्मीद है, यह वाली कुछ आसानी से पढ़ी जाएगी। वक़्त की कोई तंगी नहीं है। पर सिर इतना उलझा हुआ है कि सिलसिलेवार लिख पाने का भरोसा मैं नहीं दे सकती। मेरी प्यारी लिज़ी, मुझे तो यह भी ठीक से नहीं सूझ रहा कि क्या लिखूँ। फिर भी ख़बर बुरी है, इसलिए इसे टाल भी नहीं सकती। मिस्टर विकहम और बेचारी लिडिया ने ब्याह का फ़ैसला चाहे कितनी ही जल्दबाज़ी में किया हो, अब तो हमें यही तड़प रखनी चाहिए कि उन दोनों का ब्याह सचमुच हो गया, इसकी पक्की ख़बर मिल जाए। डरने की बहुत सारी वजहें हैं कि वे स्कॉटलैंड गए ही नहीं। कर्नल फ़ॉर्स्टर परसों ब्राइटन से निकले और एक हरकारा भेजा। उसके कुछ ही घंटे बाद, यानी कल, वे ख़ुद यहाँ आ पहुँचे। लिडिया ने श्रीमती फ़ॉर्स्टर के नाम जो छोटी चिट्ठी छोड़ी थी, उसमें लिखा था कि दोनों ग्रेटना ग्रीन जा रहे हैं। पर डेनी ने ऐसी बात कह दी। उनका कहना था कि उन्हें लगता है, विकहम का न वहाँ जाने का इरादा था, न लिडिया से ब्याह करने का। यह बात कर्नल फ़ॉर्स्टर तक पहुँच गई। वे फ़ौरन बेचैन हो उठे और दोनों का पीछा करने के लिए ब्राइटन से निकल पड़े। क्लैपहम तक तो वे आसानी से पीछे-पीछे पहुँच गए। पर उसके आगे उनका सुराग़ खो गया। वजह यह कि दोनों वहाँ पहुँचते ही किराए की गाड़ी में बैठ गए, और एप्सम से जिस सफ़री गाड़ी में आए थे, उसे लौटा दिया। इसके बाद बस इतना ही पक्का पता है कि उन्हें लंदन के रास्ते पर आगे बढ़ते देखा गया। मेरी समझ में नहीं आता कि क्या सोचूँ। कर्नल फ़ॉर्स्टर लंदन के उस इलाक़े में जितनी पूछताछ हो सकती थी, वह सब करके हर्टफ़र्डशायर आए। रास्ते के हर चुंगी-नाके पर और बार्नेट तथा हैटफ़ील्ड की सरायों में उन्होंने फिर पूछा, पर कुछ हाथ नहीं लगा। लोगों ने कहा, ऐसे लोग वहाँ से गुज़रे ही नहीं। कर्नल बड़ी मेहरबानी से हमारी फ़िक्र करते हुए लॉन्गबर्न तक आए। और भले आदमी की तरह अपनी चिंता हमारे सामने खोलकर रख दी। कर्नल और श्रीमती फ़ॉर्स्टर के लिए मेरा दिल सचमुच दुखता है। पर दोनों में से किसी को दोष तो नहीं दिया जा सकता। मेरी प्यारी लिज़ी, हम इस वक़्त बहुत तकलीफ़ में हैं। पिताजी और माँ सबसे बुरा ही मान बैठे हैं। पर मैं विकहम को इतना बुरा नहीं मान पाती। पहली योजना के मुताबिक़ जाने से बेहतर लंदन में चुपचाप ब्याह कर लेना हो, ऐसी बहुत-सी वजहें हो सकती हैं। और मान भी लें कि विकहम लिडिया जैसी कम उम्र लड़की के ख़िलाफ़ ऐसी साज़िश कर सकते हैं, हालाँकि ऐसा होने की गुंजाइश कम ही है, तो क्या यह सोचा जा सकता है कि लिडिया ने अपनी सारी समझ खो दी? ऐसा नहीं हो सकता! पर दुख इस बात का है कि कर्नल फ़ॉर्स्टर उन दोनों के ब्याह पर यक़ीन करने को तैयार नहीं। मैंने अपनी उम्मीद कही, तो उन्होंने ना में सिर हिलाकर कहा कि विकहम भरोसे लायक़ आदमी नहीं लगते। बेचारी माँ सचमुच बीमार पड़ गई हैं और कमरे से बाहर नहीं निकलतीं। वे हिम्मत बाँध पातीं तो और अच्छा होता, पर यह उम्मीद करना मुश्किल है। पिताजी को भी मैंने ज़िंदगी में कभी इतना टूटा हुआ नहीं देखा। बेचारी किटी को इस बात की डाँट पड़ रही है कि उसने दोनों का रिश्ता छिपाए रखा। पर बात राज़ रखने की कही गई थी, तो यह समझ में न आने वाली बात भी नहीं। मेरी प्यारी लिज़ी, यह दुखभरा नज़ारा तुम्हें थोड़ा भी नहीं झेलना पड़ा, इसकी मुझे सच में ख़ुशी है। पर अब जब पहला धक्का बीत चुका है, तो क्या मैं कह दूँ कि मुझे तुम्हारे लौट आने की बड़ी तड़प है? फिर भी तुम्हें असुविधा हो, तो इतनी स्वार्थी नहीं बनूँगी कि ज़बरदस्ती बुलाऊँ। अलविदा! अभी-अभी जो न करने को कहा, वही करने के लिए दोबारा क़लम उठा ली है। पर हालात ऐसे हैं कि तुम सबसे जितनी जल्दी हो सके यहाँ आ जाने की गिड़गिड़ाकर विनती किए बिना मैं रह नहीं सकती। प्यारे मामा-मामी को मैं इतनी अच्छी तरह जानती हूँ कि यह माँगते डर नहीं लगता। हाँ, मामा से एक और गुज़ारिश है। पिताजी लिडिया को ढूँढ़ने के लिए कर्नल फ़ॉर्स्टर के साथ अभी लंदन जा रहे हैं। वे क्या करने की सोच रहे हैं, यह मुझे सचमुच नहीं मालूम। इतना बड़ा धक्का लगा है कि कोई भी उपाय वे सबसे अच्छे और सुरक्षित ढंग से नहीं कर पाएँगे। कर्नल फ़ॉर्स्टर को भी कल शाम तक ब्राइटन लौटना ही है। ऐसी आफ़त की घड़ी में मामा की सलाह और मदद दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा क़ीमती होगी। मामा मेरे मन की बात फ़ौरन समझ जाएँगे, इसलिए मैं उनके भले दिल के भरोसे हूँ।'

'ओह! मामा कहाँ हैं? कहाँ हैं वे?' चिट्ठी ख़त्म करते ही एलिज़ाबेथ चिल्ला उठी। एक पल भी क़ीमती वक़्त गँवाना उसे मंज़ूर नहीं था। दोनों के पीछे जाने के लिए वह कुर्सी से उछल पड़ी। पर वह दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि नौकर ने उसे बाहर से खोल दिया। मिस्टर डार्सी अंदर आए। उसका फीका पड़ा चेहरा और बदहवास हालत देखकर वे ठिठक गए। डार्सी सँभलकर कुछ कह पाते, उससे पहले ही एलिज़ाबेथ ने जल्दी में कहा, क्योंकि लिडिया की हालत ने उसके मन से बाक़ी हर ख़याल हटा दिया था। 'माफ़ कीजिए, मुझे जाना ही होगा। एक ऐसा काम आ पड़ा है जो टल नहीं सकता, मुझे इसी वक़्त मिस्टर गार्डिनर को ढूँढ़ना है। एक पल भी बरबाद नहीं कर सकती।' 'हे भगवान! हुआ क्या है?' शिष्टता से पहले भावना निकल आई और वे बोल पड़े। फिर ख़ुद को सँभालकर उन्होंने कहा। 'एक पल भी नहीं रोकूँगा। पर मुझे या किसी नौकर को भेज दीजिए, हम गार्डिनर दंपती को ढूँढ़ लाएँगे। आपकी हालत अभी ठीक नहीं है। आप ख़ुद नहीं जा सकतीं।' एलिज़ाबेथ झिझकी। पर उसके घुटने काँप रहे थे। यह भी समझ आ गया कि ख़ुद पीछे जाकर वह कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाएगी। सो उसने नौकर को वापस बुलाया। साँस इतनी फूली हुई थी कि आवाज़ मुश्किल से समझ में आती, और उसी आवाज़ में उसने कहा कि मालिक और मालकिन को तुरंत बुला लाए। नौकर कमरे से निकला, तो एलिज़ाबेथ ख़ुद को सँभाल न पाकर बैठ गई। उसका चेहरा इतना दुखी लग रहा था। डार्सी न तो उसे छोड़कर जा सके, न ही नरम और तरस भरी आवाज़ में यह पूछे बिना रह सके। 'कोई नौकरानी बुला दूँ? इस वक़्त ज़रा भी आराम मिले, ऐसा कुछ लेना चाहेंगी? शराब का एक गिलास ले आऊँ? आपकी हालत बहुत ख़राब है।' 'नहीं, शुक्रिया।' मन को सँभालने की कोशिश करते हुए एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बस लॉन्गबर्न से अभी-अभी मिली एक भयानक ख़बर से दुखी हूँ।' यह कहते ही वह रो पड़ी। कई मिनट तक उसके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। बेहाल मन से इंतज़ार करते डार्सी बस कुछ फ़िक्र भरे शब्द अस्पष्ट-से बोल पाए। तरस खाते हुए चुपचाप देखते रहने के सिवा वे कुछ नहीं कर सके। आख़िर एलिज़ाबेथ फिर बोली। 'जेन की एक चिट्ठी अभी-अभी मिली है, और उसमें बेहद भयानक ख़बर है। यह बात अब किसी से छिपाई नहीं जा सकती। मेरी सबसे छोटी बहन अपने घरवालों और सारे अपनों को छोड़कर भाग गई है। उसने ख़ुद को मिस्टर विकहम के हवाले कर दिया। दोनों ब्राइटन से साथ निकल गए। आप उन्हें इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि आगे क्या हुआ होगा, इसमें आपको कोई शक नहीं रहेगा। मेरी बहन के पास न पैसा है, न कोई असरदार रिश्तेदार, न ऐसा कुछ जो उन्हें लुभा सके। वह हमेशा के लिए बरबाद हो गई।'

डार्सी हैरानी से जड़ हो गए। 'सोचती हूँ तो लगता है,' उसने और भी तड़प भरी आवाज़ में जोड़ा, 'मैं इसे रोक सकती थी! मैं, जो जानती थी कि वे कैसे इंसान हैं। जो सच मुझे मालूम हुआ था, उसका थोड़ा-सा हिस्सा भी, बस थोड़ा-सा ही, मैंने अपने घरवालों को बता दिया होता! उनका असली स्वभाव सबको पता होता, तो यह हो ही नहीं सकता था। पर अब सब, सब कुछ बहुत देर हो चुकी है।' 'मुझे सचमुच बहुत दुख है,' डार्सी बोल उठे। 'यह दुखद भी है और चौंकाने वाला भी। पर क्या यह पक्का है? पूरी तरह पक्का है?' 'हाँ, बिल्कुल! वे दोनों इतवार की रात ब्राइटन से साथ निकल गए। लंदन के पास तक उनका पीछा किया गया, पर उसके आगे कुछ पता नहीं चला। इतना पक्का है कि वे स्कॉटलैंड नहीं गए।' 'उन्हें वापस लाने के लिए क्या किया गया? कौन-कौन से उपाय आज़माए गए?' 'पिताजी लंदन चले गए हैं। जेन ने मामा को चिट्ठी लिखकर तुरंत मदद माँगी है, और हम शायद आधे घंटे में निकल पड़ेंगे। पर किया कुछ जा सकता हो, ऐसा है नहीं। मैं ख़ूब जानती हूँ कि कुछ भी नहीं किया जा सकता। ऐसे आदमी का मन कोई कैसे बदलेगा? उन दोनों को ढूँढ़ा भी कैसे जाएगा? ज़रा भी उम्मीद नहीं है। सब कुछ भयानक है!' डार्सी ने चुपचाप ना में सिर हिलाया। लगा, वे उसकी बात से सहमत हैं। 'जब मुझे उनका असली स्वभाव पता चला, आह, तब अगर मैं जान पाती कि मुझे क्या करना चाहिए था, क्या करने की हिम्मत मैं कर सकती थी! पर मैं नहीं जानती थी। मुझे डर था कि कहीं बात हद से आगे न बढ़ जाए। कितनी दुखद, कितनी दुखद भूल थी!' डार्सी ने कोई जवाब नहीं दिया। लगा, उसकी बात उन्हें सुनाई तक नहीं दे रही। भवें सिकोड़े, उदास चेहरा लिए वे कमरे में इधर-उधर टहलते रहे। देखकर लगता था कि वे किसी गहरी सोच में डूबे हैं। एलिज़ाबेथ ने जल्दी ही यह ताड़ लिया। और उसका मतलब भी उसे फ़ौरन समझ आ गया। डार्सी पर उसका जो असर था, वह मिटता जा रहा था। इस बात ने उसके परिवार के ऐब इतने साफ़ दिखा दिए थे, और सबसे गहरी बदनामी पक्की कर दी थी। इसके आगे सब कुछ मिट जाना ही था। न इसमें हैरानी की बात थी, न दोष देने की। पर उन्होंने अपने मन पर क़ाबू पा लिया है, यह मान लेने से उसके दिल को ज़रा भी तसल्ली नहीं मिली। उसकी तकलीफ़ भी कम नहीं हुई। उलटे उसे अपने ही मन का ठीक-ठीक पता चल गया। जब सारा प्यार बेकार ही जाना था, ठीक उसी वक़्त जितनी सच्चाई से उसने महसूस किया कि वह उन्हें प्यार कर सकती थी, उतनी सच्चाई से पहले कभी नहीं किया था। अपने बारे में ऐसे ख़याल बीच-बीच में आते तो रहे, पर वे उसे पूरी तरह बाँध नहीं सके। लिडिया की, और उसके कारण सब पर आई ज़िल्लत और मुसीबत की सोच ने जल्दी ही उसकी अपनी हर फ़िक्र को निगल लिया। एलिज़ाबेथ ने रूमाल से अपना चेहरा ढँक लिया। थोड़ी ही देर में वह बाक़ी सब कुछ भूल गई। कई मिनट तक चुप्पी छाई रही। फिर अपने साथी की आवाज़ सुनकर ही उसे अपनी हालत का दोबारा एहसास हुआ — उस आवाज़ में तरस भी था और संयम भी। 'आप कब से चाह रही होंगी कि मैं चला जाऊँ, और इतनी देर रुके रहने के लिए मेरे पास सफ़ाई में सिर्फ़ सच्ची, पर बेकार फ़िक्र ही है। काश मैं कुछ ऐसा कह या कर पाता, जिससे इस दुख में ज़रा भी तसल्ली मिलती! पर ऐसी बेकार चाहतों से आपको और नहीं सताऊँगा, कहीं ऐसा न लगे कि मैं जान-बूझकर आपका शुक्रिया माँग रहा हूँ। लगता है, इस दुर्भाग्य के चलते आज मेरी बहन को पेम्बरली में आपसे मिलने की ख़ुशी नहीं मिल पाएगी।' 'हाँ, ज़रूर! हमारी तरफ़ से मिस डार्सी से माफ़ी माँग लीजिएगा। कह दीजिएगा कि एक ज़रूरी काम के चलते हमें फ़ौरन घर लौटना पड़ रहा है। यह दुखद सच जितनी देर छिपा सकें, छिपाए रखिएगा। मुझे मालूम है कि यह ज़्यादा देर नहीं छिप सकेगा।' डार्सी ने ख़ुशी से राज़ रखने का वादा किया। उसकी तकलीफ़ पर एक बार फिर अफ़सोस जताया। और यह चाहा कि इस सबका अंत उससे कहीं ज़्यादा सुखद हो, जितनी अभी उम्मीद की जा सकती है। उसके रिश्तेदारों को नमस्कार कहलवाया। फिर एक गंभीर विदा भरी नज़र डालकर वे चले गए।

वे कमरे से निकले, तो एलिज़ाबेथ को समझ आ गया। डर्बीशायर में हुई कुछ मुलाक़ातों जितनी गर्मजोशी से दोनों का दोबारा मिलना अब बहुत ही मुश्किल था। दोनों की जान-पहचान में उलटी बातें भी बहुत थीं और बदलाव भी बहुत। जिस रिश्ते के ख़त्म होने पर वह कभी ख़ुश होती, उसी को अब जारी रखने की चाह जगा देने वाले अपने मन के इस शरारती बदलाव पर सोचते हुए उसने एक ठंडी साँस भरी। कृतज्ञता और आदर अगर प्यार की अच्छी नींव हैं, तो एलिज़ाबेथ के मन का यह बदलाव न अनहोना है, न ग़लत। पर अगर ऐसा न हो तो? ऐसी जगह से जन्मा प्यार अगर उस प्यार से भी ज़्यादा ज़बरदस्ती का और अनोखा हो, जिसे लोग अक्सर पहली मुलाक़ात में, दो बात होने से भी पहले जन्मा हुआ बताते हैं, तो? उसके बचाव में कहने को बस एक बात है। विकहम की तरफ़ मन खिंचा था, तब उसने दूसरे वाले तरीक़े को कुछ हद तक आज़मा लिया था। नतीजा बुरा निकला। सो शायद उसे कम दिलचस्प दूसरे तरीक़े से प्यार करने का हक़ मिल गया हो। जो भी हो, उन्हें जाते देखकर उसे अफ़सोस हुआ। लिडिया की बदनामी के नतीजे यह पहली मिसाल बनकर सामने आए थे, और इसी को सोचते हुए उसने उस दुखभरी बात में एक और तकलीफ़ जोड़ ली। जेन की दूसरी चिट्ठी पढ़ने के बाद से उसने एक बार भी यह उम्मीद नहीं की थी कि विकहम लिडिया से ब्याह करना चाहते हैं। ऐसी उम्मीद बाँध सकने वाली अकेली इंसान जेन ही है, उसे यही लगता था। सब कुछ यों खुलकर सामने आया, तो सारी भावनाओं में सबसे छोटी हैरानी ही थी। जब तक सिर्फ़ पहली चिट्ठी की बातें मन में थीं, तब तक यह सोचकर उसे बड़ी हैरानी और बड़ा धक्का लगा था कि विकहम ऐसी लड़की से ब्याह कर रहे हैं, जिससे पैसे के लिहाज़ से ब्याह हो ही नहीं सकता। यह भी समझ नहीं आता था कि लिडिया ने उन्हें अपने वश में कैसे कर लिया। पर अब सब कुछ बेहद स्वाभाविक लग रहा था। ऐसे रिश्ते के लिए तो लिडिया में उन्हें खींचने लायक़ आकर्षण भरपूर रहा होगा। लिडिया ने ब्याह का इरादा रखे बिना जान-बूझकर इस भागने में साथ दिया, ऐसा उसने नहीं माना। पर यह मानना भी मुश्किल था कि पवित्रता या समझदारी उस लड़की को आसान शिकार बनने से बचा लेती। रेजिमेंट जब तक हर्टफ़र्डशायर में थी, एलिज़ाबेथ ने कभी नहीं भाँपा कि लिडिया के मन में विकहम के लिए कोई ख़ास जगह है। पर उसे पक्का यक़ीन था कि ज़रा-सा भी बढ़ावा मिलता, तो लिडिया अपना मन दे बैठती। कौन कितना ध्यान देता है, इसी के हिसाब से कभी एक अफ़सर चहेता होता, कभी दूसरा। उसका लगाव लगातार डोलता रहता। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका मन कहीं टिका ही न हो। ऐसी लड़की को यों बेपरवाह छोड़ देने और ग़लत ढंग से सिर चढ़ाकर पालने का नतीजा — आह, अब उसे यह कितनी गहराई से चुभा!

एलिज़ाबेथ का मन पागलों की तरह घर जाने को कर रहा था। पिताजी घर पर नहीं थे। माँ कुछ भी कर पाने लायक़ नहीं थीं, फिर भी उनकी देखभाल हर वक़्त करनी पड़ती थी। उलझन में पड़े परिवार के बीच जो सारी फ़िक्र अब अकेले जेन के हिस्से आने वाली थी, उसे वह बाँटना चाहती थी। ख़ुद सुनना और ख़ुद देखना चाहती थी। उसे पक्का यक़ीन था कि लिडिया के लिए कुछ ख़ास किया नहीं जा सकता। फिर भी मामा का आगे आना उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरी लग रहा था। वे कमरे में आएँ, इसका इंतज़ार करते हुए उसकी बेचैनी बेहद तकलीफ़देह रही। गार्डिनर दंपती नौकर की बात भर सुनकर घबरा गए थे, उन्हें लगा कि भांजी अचानक बीमार पड़ गई है, और वे हड़बड़ी में लौट आए। एलिज़ाबेथ ने पहले उनकी वह चिंता तुरंत दूर की। फिर बताया कि उसने इतनी जल्दबाज़ी में क्यों बुलाया। उसने दोनों चिट्ठियाँ ज़ोर से पढ़ीं, और आख़िरी चिट्ठी में जोड़ी गई बात काँपती आवाज़ में ज़ोर देकर पढ़ी। गार्डिनर दंपती ने लिडिया को कभी ख़ास चाहा नहीं था। फिर भी दोनों गहरे सदमे में आए बिना न रह सके। यह अकेली लिडिया की बात नहीं थी, सबकी बात थी। पहले हैरानी और डर से भरे कुछ शब्द निकल पड़े, फिर मिस्टर गार्डिनर ने ख़ुशी-ख़ुशी वादा किया कि वे हर वह मदद करेंगे जो उनसे बन पड़े। एलिज़ाबेथ को यही उम्मीद थी, फिर भी उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। तीनों एक ही मन से जुट गए। सफ़र से जुड़ी सारी बातें जल्दी ही तय हो गईं। तय हुआ कि जितनी जल्दी हो सके निकल पड़ेंगे। 'पर पेम्बरली का क्या करें?' श्रीमती गार्डिनर बोल उठीं। 'जॉन कह रहा था कि जब तुमने हमें बुलवाया, तब मिस्टर डार्सी यहीं थे। क्या यह सच है?' 'हाँ। और मैंने उनसे कह दिया कि हम वादा नहीं निभा पाएँगे। वह बात तय हो चुकी है।' 'क्या तय हो चुकी है?' तैयारी के लिए अपने कमरे की ओर भागते हुए मामी ने पूछा। 'क्या तुम दोनों इतने क़रीब थे कि सच बता सको? आह, काश मुझे पता चल पाता कि हुआ क्या है!' पर यह चाह बेकार गई। ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही हुआ कि आगे के एक घंटे की भागदौड़ और गड़बड़ी में इसने पल भर का मन बहला दिया। एलिज़ाबेथ के पास ख़ाली बैठने की फ़ुरसत होती, तो वह बस यही दोहराती रहती कि उसके जैसा दुखी इंसान कोई काम कर ही नहीं सकता। पर मामी की तरह उसे भी अपने हिस्से के काम निपटाने थे। उनमें एक काम यह भी था कि लैम्बटन के सारे जान-पहचान वालों को चिट्ठी लिखकर इस अचानक जाने का कोई बहाना बता दे। फिर भी एक घंटे में सारी तैयारी पूरी हो गई। उतनी देर में मिस्टर गार्डिनर ने सराय का हिसाब चुका दिया। अब बस निकलना ही बाक़ी था। सुबह से हर तरह का दुख झेल चुकी एलिज़ाबेथ अपनी सोच से कहीं कम समय में गाड़ी में बैठी हुई थी। और लॉन्गबर्न के रास्ते पर निकल पड़ी।