हिंदी संस्करण

अध्याय 50

मिस्टर बेनेट ने जीवन भर अपनी सारी आमदनी ख़र्च कर दी। उसके बजाय हर साल कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए था। ताकि अपने बाद पत्नी और बच्चों का गुज़र कुछ बेहतर ढंग से चल सके। यह बात उन्हें बहुत बार खली थी। अब तो पहले से कहीं ज़्यादा खल रही थी। उन्होंने वह कर्तव्य निभाया होता, तो अब जो इज़्ज़त और साख पैसे से ख़रीदी जा सकती थी, उसके लिए लिडिया को अपने मामा की एहसानमंद न होना पड़ता। और इंग्लैंड के सबसे निकम्मे नौजवानों में से एक को मनाकर उसका पति बना लेने का संतोष भी उसी को मिलता, जिसका यह काम सचमुच बनता था। जिस काम से किसी का ख़ास भला नहीं होना था, वह पूरा का पूरा पत्नी के भाई के ख़र्च पर आगे बढ़े — यह बात उन्हें गहरे तक खटकी। वे जान लेना चाहते थे कि मिस्टर गार्डिनर ने कितनी मदद की है। और उन्होंने ठान लिया कि जितनी जल्दी हो सके, वह क़र्ज़ चुका देंगे। मिस्टर बेनेट का ब्याह हुआ था, तब उन्हें बचत की कोई ज़रूरत नहीं लगी थी। उन्हें लगता था कि बेटा तो होगा ही। बेटा बालिग़ हो जाता, तो पिता के साथ मिलकर जागीर का बेटों की ओर बँधा होना ख़त्म कर सकता था। तब पत्नी और छोटे बच्चों के गुज़ारे का इंतज़ाम हो जाता। एक के बाद एक पाँच बेटियाँ हो गईं, फिर भी उन्हें भरोसा रहा कि बेटा जल्द ही होगा। लिडिया के जन्म के बाद भी कई साल तक श्रीमती बेनेट को पक्का यक़ीन रहा कि बेटा ज़रूर होगा। आख़िर जब यह आस छोड़ी, तब बचत शुरू करने का वक़्त निकल चुका था। श्रीमती बेनेट किफ़ायत करना जानती ही नहीं थीं। दोनों ने आमदनी से ज़्यादा ख़र्च नहीं किया, तो सिर्फ़ इसलिए कि पति पैसे के मामले में किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहते थे। ब्याह के धन-बंदोबस्त से श्रीमती बेनेट और बच्चों के नाम पाँच हज़ार पाउंड बँधे हुए थे। वह रक़म बच्चों में किस तरह बाँटी जाए, यह तय करना माँ-बाप का काम था। कम से कम लिडिया का हिस्सा तो अब तय करना ही था। सामने रखी शर्तें मान लेने में मिस्टर बेनेट को हिचकने की कोई वजह नहीं थी। पत्नी के भाई की भलाई के लिए उन्होंने बहुत थोड़े शब्दों में शुक्रिया लिखा। लिखा कि अब तक जो कुछ किया गया है, वह सब उन्हें मंज़ूर है, और उनकी ओर से जो वचन दिए गए हैं, वे भी वे निभाएँगे। विकहम को मनाकर बेटी से ब्याह कराया जा सके, तब भी यह बात उन्होंने कभी सोची ही नहीं थी कि मामला उन पर लगभग बिना बोझ डाले निपट जाएगा। दोनों को हर साल सौ पाउंड देने पर भी उनका असली ख़र्च दस पाउंड भी नहीं बढ़ना था। लिडिया का खाना-रहना और जेब-ख़र्च तो लगता ही था। माँ के हाथों उसे लगातार नक़द तोहफ़े भी मिलते रहते थे। सब जोड़ने पर वह सौ पाउंड से बस ज़रा ही कम बैठता था। अपनी ओर से मेहनत भी बहुत कम करनी पड़ेगी — यह दूसरी सुखद हैरानी थी। इस वक़्त वे इस मामले में जितना कम हो सके, उतना ही करना चाहते थे। बेटी को ढूँढ़ने निकल पड़ने वाला पहला ग़ुस्सा ठंडा हुआ, तो वे सहज ही अपने पुराने आलस पर लौट आए। चिट्ठी जल्दी ही भेज दी गई। किसी काम को शुरू करने में वे देर लगाते थे, पर एक बार शुरू कर देते तो निपटाने में तेज़ थे। उन्होंने पत्नी के भाई से यह ब्योरा माँगा कि उन पर कितना क़र्ज़ चढ़ा है। पर लिडिया पर वे इतने ख़फ़ा थे कि उसके लिए एक संदेश तक नहीं भेजा।

अच्छी ख़बर घर भर में फ़ौरन फैल गई। पड़ोस तक भी उतनी ही तेज़ी से पहुँच गई। पड़ोसियों ने यह ख़बर शराफ़त और उदारता का दिखावा करते हुए सुनी। हाँ, मिस लिडिया बेनेट गिरकर सड़क पर आ जाती, या इससे कुछ बेहतर सूरत में किसी दूर के खेतिहर घर में क़ैद होकर दुनिया से कट जाती, तो बात करने को इससे कहीं अच्छा मसाला मिलता। फिर भी उसके ब्याह पर भी कहने को बहुत कुछ था। मेरिटन की जली-कटी सुनाने वाली बूढ़ी औरतें पहले से कहती आई थीं कि वे लिडिया की ख़ुशी की दुआ करती हैं। हालात बदल जाने पर भी उनकी वह नेक दुआ ज़रा भी ठंडी नहीं पड़ी। क्योंकि उन्हें पक्का यक़ीन था कि ऐसे पति के साथ वह दुखी ही रहेगी। श्रीमती बेनेट दो हफ़्ते से नीचे नहीं उतरी थीं। पर इस ख़ुशी के दिन वे फिर मेज़ के सिरहाने आ बैठीं। मन ऐसा उछल रहा था कि दम घुटने लगे। किसी भी शर्म ने उनकी जीत की इस ख़ुशी को हल्का नहीं किया। जेन के सोलह साल की हो जाने के बाद से एक बात वे सबसे ज़्यादा चाहती आई थीं। वह थी, एक बेटी को ब्याह देना। और अब वही पूरी होने को थी। श्रीमती बेनेट की सोच और बातें बस उस महीन मलमल, नई गाड़ी और नौकर-चाकरों पर टिकी रहीं, जो एक शानदार ब्याह के लिए चाहिए। बेटी के लायक़ घर पड़ोस में ढूँढ़ने के लिए वे दौड़-धूप करती रहीं। दोनों की आमदनी कितनी है, यह न उन्हें मालूम था, न उन्होंने सोचा। कई घर उन्होंने यही कहकर ठुकरा दिए कि छोटे हैं और उनमें शान नहीं है। 'गोल्डिंग परिवार घर ख़ाली कर दे, तो हे पार्क ठीक रहेगा। स्टोक का बड़ा घर भी अच्छा है, बस बैठक ज़रा और बड़ी होती। पर ऐशवर्थ बहुत दूर है। बेटी दस मील दूर रहे, यह मुझसे नहीं सहा जाएगा। और पर्विस लॉज की अटारियाँ तो भयानक हैं।' नौकर पास थे, तब तक मिस्टर बेनेट पत्नी को जी भरकर बोलने देते रहे। पर नौकरों के हट जाते ही उन्होंने कहा। 'श्रीमती बेनेट, अपने बेटे और बेटी के लिए इनमें से कोई एक घर, या ये सारे घर दिलाने से पहले एक बात साफ़ कर लें। इस इलाक़े में एक घर ऐसा है, जिसमें वे कभी क़दम नहीं रख पाएँगे। दोनों में से किसी की भी नासमझी को बढ़ावा देने का मेरा मन नहीं, सो लॉन्गबर्न में उन्हें जगह नहीं मिलेगी।' इस बात पर लंबी तकरार चली। पर मिस्टर बेनेट अपनी बात पर अड़े रहे। बहस जल्दी ही दूसरे मुद्दे पर चली गई। श्रीमती बेनेट को यह जानकर हैरानी भी हुई और सदमा भी कि पति बेटी के कपड़ों पर एक गिनी भी ख़र्च करने को तैयार नहीं। उन्होंने साफ़ कह दिया कि इस मौक़े पर लिडिया को वे प्यार का कोई निशान नहीं देंगे। श्रीमती बेनेट की समझ में यह बात आती ही नहीं थी। पति का ग़ुस्सा भला इतना गहरा बैर कैसे बन सकता है! ब्याह ढंग का दिखे, इसके लिए बेटी को जो चीज़ें मिलनी ही चाहिए, वही उससे छीन ली जाएँ — यह उनके मानने की हद से बाहर था। लिडिया ब्याह से पंद्रह दिन पहले भागकर विकहम के साथ रही, इस शर्म से कहीं ज़्यादा उन्हें इस बात की फ़िक्र थी कि नए कपड़ों के बिना बेटी के ब्याह पर कितनी बदनामी छाएगी।

अब एलिज़ाबेथ को दिल से पछतावा हो रहा था कि उस घड़ी की तकलीफ़ में उसने मिस्टर डार्सी को अपनी बहन का डर बता दिया था। ब्याह जल्दी ही हो जाना था, सो इस भाग जाने पर भी ढंग का पर्दा पड़ जाएगा। जो लोग उस वक़्त वहाँ मौजूद नहीं थे, उनसे शुरू की शर्म शायद छिपाई भी जा सके। यह डर उसे नहीं था कि यह बात मिस्टर डार्सी के ज़रिए और फैलेगी। भेद छिपाकर रखने में उनसे बढ़कर पक्का शायद ही कोई हो। पर छोटी बहन की बदचलनी का पता चल जाना जितनी शर्म की बात उनके लिए थी, उतनी और किसी के लिए नहीं। फिर भी उसे यह डर नहीं था कि इससे उसका ही कोई नुक़सान होगा। क्योंकि दोनों के बीच अब ऐसी खाई पड़ चुकी लगती थी, जो पाटी नहीं जा सकती। लिडिया का ब्याह सबसे इज़्ज़तदार शर्तों पर भी हो जाता, तब भी बात वही रहती। जिस आदमी को मिस्टर डार्सी इतनी वाजिब वजह से नीच समझते हैं, उसी का सबसे नज़दीकी रिश्तेदार बन चुके घर से वे नाता जोड़ेंगे — ऐसा सोचा ही नहीं जा सकता था। ऐसा रिश्ता देखकर वे पीछे हट जाएँ, तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं थी। डर्बीशायर में उसे पक्का यक़ीन हो चला था कि वे उसका मन जीतना चाहते हैं। पर इतने बड़े धक्के के बाद भी वह चाह बची रहेगी, ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी। एलिज़ाबेथ का मन छोटा हो गया, और वह उदास पड़ गई। किस बात का, यह ख़ुद उसे भी ठीक-ठीक मालूम नहीं था, फिर भी पछतावा होता रहा। उनका आदर पाने की आस जब मिट गई, तभी उसे उस आदर के खो जाने का मलाल हुआ। उनकी ख़बर मिलने की गुंजाइश जब सबसे कम रह गई, तभी उसका मन उनकी ख़बर सुनने को हुआ। दोबारा मिलने की गुंजाइश जब ख़त्म हो गई, तभी उसे पक्का यक़ीन हुआ कि उनके साथ वह सुखी रह सकती थी। बस चार महीने पहले उसने वह प्रस्ताव घमंड के साथ ठुकरा दिया था। अब वही प्रस्ताव वह ख़ुशी और कृतज्ञता से क़बूल कर लेती। यह बात उन्हें मालूम हो जाए, तो उन्हें कितनी बड़ी जीत का एहसास होगा — एलिज़ाबेथ यह अक्सर सोचती। इसमें उसे कोई शक नहीं था कि वे सबसे उदार आदमियों जितने ही उदार हैं। पर इंसान हैं, इसलिए जीत का एहसास उन्हें होना ही था। अब जाकर उसे समझ आने लगा कि स्वभाव और गुणों के हिसाब से मिस्टर डार्सी ही उसके लिए सबसे सही आदमी थे। उनकी बुद्धि और उनका मिज़ाज उसके अपने जैसा नहीं था। फिर भी वे उसकी हर चाह पूरी कर सकते थे। यह जोड़ी दोनों के लिए ही अच्छी रहती। एलिज़ाबेथ के सहज और चुलबुले ढंग से उनका मन नरम पड़ता और उनका बरताव और सुधर जाता। और उनकी परख, उनकी जानकारी और दुनिया देखे होने से उसे कहीं ज़्यादा फ़ायदा मिलता। पर अब ऐसा सुखी ब्याह लोगों को यह दिखा ही नहीं सकता था कि पति-पत्नी का सुख होता क्या है। उसके ठीक उलट एक जोड़ी जल्द ही इसी परिवार में बनने वाली थी। और वही पहले वाले ब्याह की गुंजाइश बंद कर रही थी। विकहम और लिडिया अपना अलग घर किस तरह ठीक-ठाक चला पाएँगे, यह सोचा ही नहीं जा सकता था। पर यह जोड़ी तो इसीलिए बनी थी कि उनमें नेकी से ज़्यादा ज़ोर जज़्बे का था। दोनों देर तक सुखी रह पाएँगे, इसकी गुंजाइश बहुत कम है — यह आसानी से समझा जा सकता था।

मिस्टर गार्डिनर ने जल्दी ही अपने बहनोई को फिर चिट्ठी लिखी। मिस्टर बेनेट के शुक्रिया का जवाब उन्होंने थोड़े में दिया। लिखा कि परिवार के किसी भी सदस्य का सुख बढ़ाने में वे हाथ बँटाना चाहेंगे, और यह विनती करते हुए चिट्ठी ख़त्म की कि इस बात को दोबारा न छेड़ा जाए। चिट्ठी का मुख्य मक़सद यह ख़बर देना था कि मिस्टर विकहम ने मिलिशिया छोड़ने का फ़ैसला कर लिया है। 'ब्याह तय हो जाने के बाद से मैं यही बहुत चाहता रहा था कि वे ऐसा ही करें। उस रेजिमेंट को छोड़ देना मिस्टर विकहम और भांजी, दोनों के लिए बेहद अच्छा है। मुझे भरोसा है कि आप भी यही मानेंगे। मिस्टर विकहम नियमित सेना में जाने की सोच रहे हैं। फ़ौज में उनके कुछ पुराने दोस्त ऐसे हैं, जिनमें अब भी उनकी मदद करने का बल भी है और मन भी। उत्तर में तैनात किसी जनरल की रेजिमेंट में उन्हें सबसे छोटे ओहदे के अफ़सर की जगह देने का वादा हो चुका है। यह जगह इस राज्य के इस हिस्से से इतनी दूर है, यह भी एक फ़ायदा ही है। उनके वादे सुनने में ठीक ही लगते हैं। ऐसे अजनबियों के बीच, जहाँ दोनों को अपनी-अपनी साख बचानी होगी, मुझे उम्मीद है कि दोनों कुछ ज़्यादा समझदारी से चलेंगे। कर्नल फ़ॉर्स्टर को मैंने चिट्ठी लिखकर बता दिया है कि अब तक तैयारी कहाँ तक पहुँची है। ब्राइटन और उसके आसपास मिस्टर विकहम के जितने लेनदार हैं, उन सबको यह कहकर तसल्ली दिला देने की विनती भी की है कि उनका पैसा जल्द चुका दिया जाएगा। उस पैसे की ज़मानत मैंने ली है। मेरिटन के जिन लेनदारों की सूची उनके बताए मुताबिक़ मैं आगे नत्थी कर दूँगा, उन्हें भी क्या आप ऐसी ही बात कहला देंगे? उन्होंने अपना सारा क़र्ज़ बता दिया है। कम से कम इस एक बात में तो उन्होंने हमें धोखा न दिया हो, यही उम्मीद है। हैगर्स्टन को मैंने हिदायत दे दी है, और हफ़्ते भर में सब निपट जाएगा। उसके बाद दोनों उनकी रेजिमेंट में जा मिलेंगे। यानी अगर इससे पहले उन्हें लॉन्गबर्न न बुला लिया जाए। श्रीमती गार्डिनर से मालूम हुआ कि भांजी दक्षिण छोड़ने से पहले आप सबसे मिलने को बहुत बेताब है। वह ठीक-ठाक है और अच्छी तरह रह रही है। उसने कहा है कि आपको और भाभी को बेटी की ओर से आदर सहित नमस्कार कह दूँ। आपका ही। एडवर्ड गार्डिनर।' विकहम का मिलिशिया छोड़ना कितनी अच्छी बात है, यह मिस्टर बेनेट और उनकी बेटियाँ भी मिस्टर गार्डिनर से कम नहीं समझती थीं। पर श्रीमती बेनेट को यह ख़बर उतनी अच्छी नहीं लगी। लिडिया के साथ रहकर सबसे बड़ा मज़ा और सबसे बड़ा गर्व पाने की आस वे बाँधे बैठी थीं। और अब दोनों उत्तर में जा बसेंगे — यह बड़ी निराशा थी। दोनों को हर्टफ़र्डशायर में ही बसा लेने का ख़याल उन्होंने ज़रा भी नहीं छोड़ा था। ऊपर से लिडिया को वह रेजिमेंट छोड़नी पड़े, जहाँ उसकी इतनी जान-पहचान थी और इतने चहेते थे — इसका उन्हें बहुत अफ़सोस था। 'उसे तो श्रीमती फ़ॉर्स्टर बहुत ही प्यारी हैं। उसे इतनी दूर भेज देना कितनी भयानक बात है! और कई नौजवान भी हैं, जो उसे बहुत भाते हैं। किसी जनरल की रेजिमेंट के अफ़सर उतने ख़ुशमिज़ाज होंगे या नहीं, कौन जाने।' उत्तर के लिए निकलने से पहले घरवालों में फिर से जगह पाने की लिडिया की जो गुज़ारिश थी — अगर उसे गुज़ारिश कहा जा सके — वह पहले तो साफ़ ठुकरा दी गई। पर जेन और एलिज़ाबेथ की राय एक ही थी। दोनों को लगा कि माँ-बाप ब्याह को मान लें, तो यह छोटी बहन के मन के लिए भी अच्छा रहेगा और समाज में उसकी जगह के लिए भी। लिडिया ने बहुत मिन्नत की कि ब्याह होते ही उसे पति के साथ लॉन्गबर्न आने दिया जाए। वह गुज़ारिश ठीक भी थी और नरम भी। आख़िर पिताजी बेटियों की बात से सहमत हो गए, और वैसा ही करने को तैयार हो गए जैसा वे चाहती थीं। माँ को भी यह सोचकर तसल्ली हुई कि ब्याही बेटी को उत्तर में खदेड़ दिए जाने से पहले वे उसे पड़ोसियों को दिखा तो लेंगी। सो मिस्टर बेनेट ने अपनी पत्नी के भाई को फिर चिट्ठी लिखी। दोनों के आने की इजाज़त दे दी। तय हुआ कि ब्याह की रस्म पूरी होते ही दोनों लॉन्गबर्न आ जाएँगे। पर विकहम इस योजना पर राज़ी हो गए, यह बात एलिज़ाबेथ को हैरान कर गई। एलिज़ाबेथ अपने ही मन की सुनती, तो विकहम से मिलना दुनिया में उसकी सबसे आख़िरी चाह होती।