हिंदी संस्करण
अध्याय 49
मिस्टर बेनेट को लौटे दो दिन हो चुके थे। जेन और एलिज़ाबेथ घर के पीछे के झाड़ियों भरे बाग़ में साथ टहल रही थीं। तभी घर की प्रबंधिका को अपनी ओर आते देखा। माँ ने बुलाया होगा, यही समझकर दोनों उससे मिलने आगे बढ़ीं। पर पास पहुँचीं, तो श्रीमती हिल ने कुछ और ही कहा। 'माफ़ कीजिए कि मैं बीच में आ गई। लगा कि शायद लंदन से कोई अच्छी ख़बर आई हो, सो पूछने की हिम्मत कर बैठी।' 'यह क्या कह रही हो, हिल? लंदन से तो हमें कोई ख़बर नहीं मिली।' 'अरे बीबीजी!' श्रीमती हिल ने बड़े अचरज से कहा। 'आपको पता ही नहीं कि मिस्टर गार्डिनर ने मालिक के पास हरकारा भेजा है? उसे आए आधा घंटा हो गया, और मालिक को चिट्ठी भी मिल चुकी है।' दोनों बहनों के पास बोलने तक का वक़्त नहीं था। भीतर पहुँचने की जल्दी में वे दौड़ पड़ीं। ड्योढ़ी पार करके नाश्ते के कमरे में, वहाँ से पुस्तकालय की ओर भागीं। पिताजी कहीं नहीं मिले। माँ के पास तो नहीं हैं, यह देखने को ऊपर जाने ही वाली थीं कि ख़ानसामा सामने पड़ गया। उसने कहा। 'मालिक को खोज रही हैं, तो वे छोटे झुरमुट की ओर टहलते हुए गए हैं।' यह सुनते ही दोनों फिर ड्योढ़ी पार करके लॉन के आर-पार निकल गईं। पिताजी के पीछे भागीं। वे चरागाह के एक किनारे बने छोटे जंगल की ओर इत्मीनान से बढ़ रहे थे। जेन न एलिज़ाबेथ जितनी फुर्तीली थी, न दौड़ने की आदी। सो जल्दी ही पीछे छूट गई। एलिज़ाबेथ हाँफती हुई पिताजी तक जा पहुँची और बेचैनी से बोल पड़ी। 'ओह, पिताजी, क्या ख़बर है? क्या ख़बर है? मामा से कोई चिट्ठी आई है?' 'हाँ। हरकारे के हाथ चिट्ठी मिली है।' 'तो ख़बर क्या है? अच्छी है या बुरी?' 'भला अच्छी की उम्मीद कहाँ से करें?' जेब से चिट्ठी निकालते हुए उन्होंने कहा। 'पर शायद तुम इसे पढ़ना चाहोगी।' एलिज़ाबेथ से रहा नहीं गया और उसने चिट्ठी उनके हाथ से झपट ली। तभी जेन भी आ पहुँची। 'ज़ोर से पढ़ो,' पिताजी ने कहा। 'मुझे भी ठीक से समझ नहीं आया कि इसमें है क्या।'
'ग्रेसचर्च स्ट्रीट, दो अगस्त, सोमवार। प्रिय बहनोई साहब, आख़िरकार मैं आपको भांजी की ख़बर भेजने लायक़ हो गया हूँ। उम्मीद है, कुल मिलाकर यह ख़बर आपको संतोष देगी। शनिवार को आप मुझसे विदा हुए, उसके थोड़ी ही देर बाद ख़ुशक़िस्मती से पता चल गया कि दोनों लंदन में कहाँ हैं। ब्योरा मिलने पर ही बताऊँगा। अभी इतना जान लेना काफ़ी है कि दोनों मिल गए हैं। मैं दोनों से ख़ुद मिल भी आया हूँ…।' 'तो जैसा मैं शुरू से चाहती थी, वैसा ही हुआ!' जेन पुकार उठी। 'दोनों का ब्याह हो गया!' एलिज़ाबेथ आगे पढ़ती गई। 'मैं दोनों से ख़ुद मिल आया हूँ। उनका ब्याह अभी नहीं हुआ है। ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे लगे कि ब्याह का इरादा रहा हो। पर आपकी ओर से जो वचन देने की हिम्मत मैंने की है, उसे निभाने को आप तैयार हों, तो जल्द ही ब्याह हो जाने की उम्मीद है। आपको इतना करना है। आपके और मेरी बहन के गुज़र जाने के बाद बच्चों में बाँटी जाने के लिए जो पाँच हज़ार पाउंड की रक़म बँधी है, उसमें से बेटी का बराबर का हिस्सा ब्याह के धन-बंदोबस्त में पक्का कर दीजिए। इसके ऊपर, अपने जीते-जी हर साल सौ पाउंड देने का वादा कर दीजिए। सारी बातों पर सोचकर, जहाँ तक मैंने अपने को आपकी ओर से बोलने का हक़दार माना, वहाँ तक ये शर्तें मानने में मैंने ज़रा भी हिचक नहीं दिखाई। आपके जवाब के इंतज़ार में वक़्त न गँवाना पड़े, इसलिए यह चिट्ठी हरकारे के हाथ भेज रहा हूँ। इन शर्तों से आप आसानी से समझ जाएँगे कि मिस्टर विकहम की हालत उतनी बुरी नहीं है, जितनी लोग समझते हैं। दुनिया इस बात में ग़लत रही। ख़ुशी की बात है कि उनका सारा क़र्ज़ चुका देने के बाद भी कुछ रक़म बच रहेगी, जो बेटी के अपने धन के ऊपर भांजी के नाम बाँध दी जाएगी। जैसा मैंने सोचा है, आप इस पूरे मामले को अपनी ओर से निपटाने का पूरा अधिकार मुझे दे दें, तो मैं हैगर्स्टन को तुरंत ठीक धन-बंदोबस्त तैयार करने को कह दूँगा। आपको दोबारा लंदन आने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं। इसलिए आप चैन से लॉन्गबर्न में रहिए, और मेरी लगन और सावधानी पर भरोसा रखिए। जितनी जल्दी हो सके, साफ़ जवाब भेज दीजिए। मैंने यही ठीक समझा कि भांजी का ब्याह इसी घर से हो। आशा है, आप भी सहमत होंगे। वह आज हमारे यहाँ आ रही है। और कुछ तय होते ही मैं फिर लिखूँगा। आपका ही। एडवर्ड गार्डिनर।'
'क्या यह हो सकता है?' पढ़ चुकने पर एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'क्या वे सचमुच लिडिया से ब्याह करेंगे?' 'तो विकहम उतने नालायक़ नहीं निकले, जितना हमने समझा था,' बहन ने कहा। 'प्यारे पिताजी, आपको बधाई।' 'क्या आपने चिट्ठी का जवाब दे दिया?' एलिज़ाबेथ ने पूछा। 'नहीं। पर जल्दी ही देना होगा।' एलिज़ाबेथ ने बड़ी मिन्नत की कि अब और वक़्त गँवाए बिना चिट्ठी लिख दी जाए। 'ओह, प्यारे पिताजी,' वह पुकार उठी। 'लौटकर अभी लिख डालिए। ऐसे मामलों में एक-एक पल कितना क़ीमती होता है, यह तो सोचिए।' 'आपको तकलीफ़ लगे, तो मैं आपकी जगह लिख देती हूँ,' जेन ने कहा। 'तकलीफ़ तो सचमुच है,' उन्होंने जवाब दिया। 'पर करनी ही पड़ेगी।' इतना कहकर वे बेटियों के साथ मुड़े और घर की ओर चल पड़े। 'और, एक बात पूछ लूँ?' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'वे शर्तें तो मानी ही जानी चाहिए, है न?' 'माननी! शर्म तो इस बात की है कि उसने इतना कम माँगा।' 'दोनों का ब्याह तो होना ही चाहिए! पर विकहम जैसे आदमी के साथ!' 'हाँ, हाँ। ब्याह तो होना ही है। और कोई चारा भी नहीं। पर दो बातें मैं सचमुच जानना चाहता हूँ। एक यह कि यह काम कराने के लिए तुम्हारे मामा ने कितना पैसा दिया, और दूसरी यह कि मैं वह पैसा चुकाऊँगा कैसे।' 'पैसा! मामा!' जेन पुकार उठी। 'आपका मतलब क्या है, पिताजी?' 'मतलब यह कि होश वाला कोई भी आदमी इतने से लालच पर लिडिया से ब्याह नहीं करेगा — मेरे जीते-जी हर साल सौ पाउंड, और मेरे मरने पर पचास पाउंड।' 'सच कहा,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'यह मुझे पहले सूझा ही नहीं। क़र्ज़ चुकाने के बाद भी पैसा बच जाए! ओह, यह ज़रूर मामा का किया हुआ होगा! कितने उदार और भले इंसान — डर है कि इसी वजह से वे तंगी में न पड़ जाएँ। थोड़े पैसे में यह सब हो ही नहीं सकता।' 'हाँ,' पिताजी ने कहा। 'विकहम दस हज़ार पाउंड से एक पाई भी कम लेकर उसे ले जाएँ, तो बेवक़ूफ़ ही ठहरेंगे। रिश्तेदारी के पहले ही दिन उनके बारे में इतना बुरा सोचने का मन नहीं करता।' 'दस हज़ार पाउंड! हे भगवान! उसका आधा भी कैसे लौटाया जाएगा?' मिस्टर बेनेट ने कोई जवाब नहीं दिया। तीनों अपने-अपने गहरे विचारों में डूबे हुए घर पहुँचने तक चुप रहे। पिताजी चिट्ठी लिखने पुस्तकालय में चले गए, और बेटियाँ नाश्ते के कमरे में।
'दोनों का ब्याह सचमुच हो रहा है!' अकेली रह जाते ही एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'कितनी अजीब बात है! और ऐसी बात पर हमें शुक्र मनाना पड़ रहा है। सुखी होने की उम्मीद चाहे कितनी ही कम हो, विकहम का चरित्र चाहे कितना ही गिरा हुआ हो, फिर भी ब्याह हो रहा है — इसी की ख़ुशी मनानी पड़ेगी! ओह, लिडिया!' 'मैं यह सोचकर तसल्ली कर लूँगी कि लिडिया के लिए सचमुच मन न होता, तो विकहम ब्याह करते ही नहीं,' जेन ने जवाब दिया। 'भले मामा ने उनकी कुछ मुश्किलें सुलझा दी हों, पर दस हज़ार पाउंड या उतनी ही कोई रक़म उन्होंने दी होगी, यह मैं नहीं मान सकती। उनके अपने बच्चे हैं, और आगे और भी हो सकते हैं। वे भला पाँच हज़ार पाउंड भी कैसे दे पाएँगे?' 'विकहम पर कितना क़र्ज़ था, और लिडिया के लिए विकहम की ओर से ब्याह के धन-बंदोबस्त में कितना तय हुआ — बस यही पता चल जाए, तो साफ़ हो जाएगा कि मिस्टर गार्डिनर ने दोनों के लिए क्या किया,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'विकहम के पास तो अपना छह पेंस भी नहीं है। मामा-मामी की भलाई का बदला हम कभी नहीं चुका सकेंगे। लिडिया को घर ले जाकर अपनी देखरेख में रखा और उसकी इज़्ज़त बचाई — अकेला यही ऐसा त्याग है कि बरसों शुक्र मनाकर भी उसका मोल नहीं चुकेगा। सोचो, इस वक़्त वह सचमुच उन्हीं के पास होगी! इतनी भलाई पाकर भी अगर वह अब दुखी नहीं है, तो वह कभी सुखी होने के लायक़ नहीं! मामी के सामने पहली बार पड़ी होगी, तो कैसा रहा होगा वह पल!' 'दोनों तरफ़ जो कुछ हुआ, उसे भुला देने की कोशिश हमें करनी चाहिए,' जेन ने कहा। 'फिर भी मुझे आस है, भरोसा भी, कि वे सुखी रहेंगे। विकहम ब्याह के लिए राज़ी हुए, यही मेरे लिए इस बात का सबूत है कि उन्होंने अपनी सोच सुधार ली है। एक-दूसरे के लिए प्यार दोनों को ठहराव देगा। चुपचाप बस जाएँ और समझदारी से रहें, तो मुझे उम्मीद है कि वक़्त के साथ लोग उनकी पिछली नादानी भूल जाएँगे।' 'उन दोनों ने जो किया,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया, 'वह न तुम कभी भूल सकोगी, न मैं, न कोई और। इस पर बात करना बेकार है।' तभी दोनों बहनों को ध्यान आया कि माँ को तो कुछ भी पता नहीं होगा। सो वे पुस्तकालय में गईं और पिताजी से पूछा कि क्या माँ को बता दें। वे चिट्ठी लिख रहे थे। सिर उठाए बिना ही उन्होंने ठंडे स्वर में जवाब दिया। 'जैसा तुम्हारा मन करे, वैसा करो।' 'मामा की चिट्ठी ले जाकर उन्हें पढ़कर सुना दें?' 'जो चाहो ले जाओ, और जाओ यहाँ से।'
एलिज़ाबेथ ने मेज़ पर से चिट्ठी उठा ली। दोनों साथ ऊपर गईं। श्रीमती बेनेट के कमरे में मैरी और किटी भी थीं। सो एक ही बार बता देने से सबको ख़बर हो जाती। अच्छी ख़बर होने का हल्का-सा इशारा करके चिट्ठी ज़ोर से पढ़ी गई। श्रीमती बेनेट अपने को सँभाल ही नहीं पाईं। जेन ने जैसे ही मिस्टर गार्डिनर की यह उम्मीद पढ़ी कि लिडिया का ब्याह जल्द हो जाएगा, ख़ुशी फूट पड़ी। आगे का हर वाक्य उस ख़ुशी को और बढ़ाता गया। डर और झुँझलाहट में जितनी बेचैन रहती थीं, ख़ुशी में उछलती हुई अब उससे भी ज़्यादा उतावली दिख रही थीं। बस इतना जान लेना काफ़ी था कि बेटी का ब्याह हो रहा है। न उसके सुख की कोई चिंता हुई, न ग़लती याद करके ख़ुद के छोटे पड़ने का एहसास। 'मेरी प्यारी-प्यारी लिडिया!' वे पुकार उठीं। 'कितनी ख़ुशी की बात है! ब्याह हो रहा है! फिर से मिलना होगा! सोलह की उम्र में ब्याह! मेरे भले, मेहरबान भाई! मुझे पता था कि ऐसा ही होगा। पता था कि वे सब सँभाल लेंगे। उसे देखने को जी तरस रहा है! और प्यारे विकहम को भी! पर कपड़े, ब्याह के कपड़े कहाँ से आएँगे! अभी गार्डिनर भाभी को चिट्ठी लिखती हूँ। लिज़ी, मेरी प्यारी बिटिया। नीचे दौड़कर पिताजी से पूछ आ कि वे लिडिया को कितना देंगे। ठहर, ठहर। मैं ख़ुद जाती हूँ। किटी, घंटी बजाकर हिल को बुला। मैं अभी कपड़े पहन लेती हूँ। मेरी प्यारी-प्यारी लिडिया! मिलेंगे तो कितना मज़ा आएगा!' बड़ी बेटी ने माँ का ध्यान इस ओर खींचा कि मिस्टर गार्डिनर के किए काम से पूरे परिवार पर कितना बड़ा एहसान चढ़ चुका है। इस तरह उसने माँ के उछलते मन को कुछ शांत करना चाहा। 'यह जो अच्छा अंत हुआ है,' जेन ने जोड़ा, 'उसका बड़ा हिस्सा मामा की भलाई का ही है, यह हमें मानना चाहिए। मुझे पूरा भरोसा है कि उन्होंने मिस्टर विकहम की पैसे से मदद करने का वादा किया होगा।' 'हाँ,' माँ पुकार उठीं। 'यह तो बिलकुल ठीक ही हुआ। उसके मामा नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा? उनका अपना परिवार न होता, तो उनका सारा पैसा मुझे और मेरे बच्चों को ही मिलता। कुछ तोहफ़ों को छोड़ दें, तो उनसे कुछ पाने की यह पहली ही बार है। ओह! मैं कितनी ख़ुश हूँ। जल्दी ही एक बेटी ब्याही हुई होगी। श्रीमती विकहम! सुनने में कितना अच्छा लगता है! पिछले जून में तो वह सोलह की ही हुई है। प्यारी जेन, मेरा दिल इतना धड़क रहा है कि मुझसे लिखा नहीं जाएगा। मैं बोलती जाऊँगी, तू मेरी जगह लिखती जा। पैसे की बात बाद में पिताजी से तय कर लेंगे। पर चीज़ें तो अभी मँगवानी होंगी।' फिर वे मारकीन, मलमल और महीन लिनन के नाम एक के बाद एक गिनाने लगीं। थोड़ी ही देर में बहुत सारा सामान मँगवाने की चिट्ठी लिखवा भी देतीं। पर जेन ने बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया। कहा कि पिताजी से सलाह करने की फ़ुरसत मिलने तक रुक जाइए। यह भी कहा कि एक दिन की देर से कुछ ख़ास नहीं बिगड़ता। माँ इतनी ख़ुश थीं कि हमेशा की तरह ज़िद नहीं की। उनके मन में दूसरी योजनाएँ भी आ गईं। 'कपड़े पहनते ही मैं मेरिटन जाकर श्रीमती फ़िलिप्स को यह अच्छी-अच्छी ख़बर सुना आऊँगी,' वे बोलीं। 'लौटते हुए लेडी लुकास और श्रीमती लॉन्ग के यहाँ भी हो आऊँगी। किटी, नीचे दौड़कर गाड़ी तैयार करने को कह दे। बाहर की हवा लगेगी तो तबीयत बहुत अच्छी हो जाएगी। लड़कियो, मेरिटन से तुम्हारे लिए कुछ लाना है? ओह! वह हिल आ रही है। प्यारी हिल, तुमने अच्छी ख़बर सुनी? लिडिया का ब्याह हो रहा है। ब्याह के दिन तुम सब मज़े करो, इसके लिए मैं पंच का एक कटोरा भिजवाऊँगी।'
श्रीमती हिल ने तुरंत अपनी ख़ुशी जताई। बाक़ी सबके साथ एलिज़ाबेथ को भी बधाई मिली। फिर इस सारी बेवक़ूफ़ी से ऊबकर वह अपने कमरे में चली गई। तभी वह जी भरकर सोच पाई। बेचारी लिडिया की हालत अच्छे से अच्छे हिसाब से भी बहुत बुरी थी। फिर भी इससे बदतर नहीं हुई, इसका शुक्र मनाना ही था। एलिज़ाबेथ को भी यही लगा। आगे की सोचे, तो बहन के लिए न समझदारी वाले सुख की उम्मीद थी, न दुनियादारी की बरकत की। पर बस दो घंटे पहले जिस बात का डर था, उसे याद करे, तो अब जो नतीजा मिला है, उसमें अच्छाई ही अच्छाई दिखती थी।