हिंदी संस्करण
अध्याय 51
छोटी बहन के ब्याह का दिन आ गया। जेन और एलिज़ाबेथ का मन शायद ख़ुद लिडिया से भी ज़्यादा दुखा। दोनों को लेने के लिए गाड़ी भेज दी गई। खाने के वक़्त तक दोनों उसी गाड़ी से लौटने वाले थे। बड़ी बहनें उनके आने से डर रही थीं। ख़ासकर जेन। उसे लगता था कि ग़लती उससे हुई होती तो जो कुछ वह महसूस करती, वही लिडिया भी महसूस कर रही होगी। छोटी बहन को क्या-क्या सहना पड़ेगा, यह सोच-सोचकर वह दुखी होती रही। दोनों आ गए। परिवार के लोग नाश्ते के कमरे में उनका स्वागत करने को इकट्ठा थे। गाड़ी दरवाज़े पर रुकी, तो श्रीमती बेनेट के चेहरे पर चौड़ी मुस्कान खिल उठी। उनके पति का चेहरा इतना गंभीर था कि उसे पढ़ा ही नहीं जा सकता था। बेटियाँ चौंकी हुई, फ़िक्रमंद और बेचैन थीं। ड्योढ़ी से लिडिया की आवाज़ सुनाई दी। दरवाज़ा पूरा खुला और वह कमरे में दौड़ आई। माँ आगे बढ़कर उससे लिपट गईं और मगन होकर उसका स्वागत किया। पत्नी के पीछे-पीछे आए विकहम की ओर भी उन्होंने प्यार से मुस्कुराकर हाथ बढ़ाया। दोनों सुखी हैं, इसमें उन्हें ज़रा भी शक नहीं लग रहा था। उन्होंने बड़े उत्साह से दोनों को आशीर्वाद दिया। इसके बाद दोनों मिस्टर बेनेट से मिले। पर उनका स्वागत उतनी गर्मजोशी से नहीं हुआ। उनका चेहरा उल्टे और सख़्त हो गया। होंठ भी वे मुश्किल से खोल पाए। नई जोड़ी का बेफ़िक्र और बेशर्म ढंग उन्हें ग़ुस्सा दिलाने के लिए काफ़ी से भी ज़्यादा था। एलिज़ाबेथ को घिन आ रही थी, और मिस बेनेट तक को धक्का लगा। लिडिया अब भी वही लिडिया थी। न सधी हुई, न शर्म जानने वाली। मनमानी करने वाली, ऊँची आवाज़ वाली, किसी से न डरने वाली। वह बारी-बारी अपनी बहनों की ओर मुड़ी और उनसे बधाई माँगती रही। आख़िर सब बैठ गए, तो उसने बड़े चाव से कमरे में चारों ओर नज़र दौड़ाई। दो-चार चीज़ें ज़रा बदली हुई दिखीं, तो वह हँसकर बोली कि उसे यहाँ से गए बहुत ज़माना हो गया। विकहम को भी लिडिया जितनी ही, यानी ज़रा भी तकलीफ़ नहीं थी। पर उनका ढंग हमेशा की तरह मोहने वाला था। उनका चरित्र और यह ब्याह वैसा होता, जैसा होना चाहिए था, तो अब रिश्तेदार बन जाने की बात पर मुस्कुराते हुए बेझिझक बतियाने का उनका यह अंदाज़ सबको ख़ुश कर देता। एलिज़ाबेथ को पहले यह भरोसा नहीं था कि वे इस हद तक बेशर्म हो सकते हैं। पर अब बैठते-बैठते उसने ठान लिया। आगे से वह बेशर्म आदमी की बेहयाई की कोई हद नहीं मानेगी। एलिज़ाबेथ का चेहरा लाल हो गया, जेन का भी। पर जिन दोनों की वजह से वे शर्मिंदा थीं, उनके गालों का रंग ज़रा भी नहीं बदला।
बातचीत रुकी ही नहीं। दुल्हन और उसकी माँ जितनी तेज़ी से बोलतीं, उतनी कम पड़ती। विकहम एलिज़ाबेथ के पास ही बैठे थे। उन्होंने बड़े ख़ुशमिज़ाज और सहज ढंग से आस-पड़ोस के जान-पहचान वालों का हाल पूछना शुरू कर दिया। उतनी ही सहजता से जवाब देना एलिज़ाबेथ के लिए बहुत मुश्किल था। दोनों के पास तो जैसे दुनिया की सबसे सुखी यादें ही थीं। पीछे की किसी बात को वे तकलीफ़ के साथ याद ही नहीं करते थे। जिन बातों को बड़ी बहनें दुनिया की कोई भी चीज़ पाकर भी ज़ुबान पर न लातीं, वही बातें लिडिया ख़ुद छेड़ बैठी। 'ज़रा सोचो, मुझे गए पूरे तीन महीने हो गए,' लिडिया पुकार उठी। 'मुझे तो लगता है, बस दो ही हफ़्ते हुए हैं। पर इतने में कितना कुछ हो गया, कहा नहीं जा सकता! हे भगवान! जाते वक़्त मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि लौटने से पहले मेरा ब्याह हो जाएगा! हाँ, यह ज़रूर सोचा था कि ब्याह हो जाए तो बड़ा मज़ा आएगा।' पिताजी ने आँखें ऊपर उठाईं। जेन दुखी हो गई, और एलिज़ाबेथ ने भरी हुई नज़र से लिडिया को देखा। पर लिडिया ऐसी थी कि जो बात वह जानना नहीं चाहती, उसे न सुनती थी, न देखती। वह ख़ुशी-ख़ुशी बोलती रही। 'अरे माँ, यहाँ आस-पास के लोगों को पता है कि आज मेरा ब्याह हुआ है? मुझे डर था, कहीं किसी को पता ही न हो। रास्ते में विलियम गोल्डिंग अपनी दो पहियों वाली गाड़ी हाँकते जा रहे थे, और हमने उन्हें पीछे छोड़ दिया। मैंने ठान लिया कि उन्हें तो बताना ही है। सो मैंने उस तरफ़ की खिड़की गिराई और दस्ताने उतार दिए। फिर हाथ खिड़की के किनारे पर यूँ ही टिका दिया कि अँगूठी दिख जाए। और फिर जितना झुक सकती थी, उतना झुककर सिर नवाया और हँस दी।' एलिज़ाबेथ से अब और नहीं सहा गया। वह उठी और कमरे से बाहर भाग गई। जब तक सबके ड्योढ़ी पार करके खाने-बैठक वाले कमरे में जाने की आवाज़ नहीं आई, वह लौटी नहीं। फिर ठीक वक़्त पर जाकर सबसे मिल गई। उसने देखा, लिडिया जान-बूझकर सबकी नज़रों में आते हुए माँ की दाईं ओर वाली जगह पर जा बैठी। और उसने यह भी सुना कि लिडिया बड़ी बहन से क्या कह रही है। 'अरे जेन, अब यह जगह मेरी है। तुम्हें नीचे सरकना होगा, क्योंकि अब ब्याही हुई मैं हूँ।' जो झिझक उसे शुरू में ज़रा भी नहीं हुई, वह वक़्त बीतने पर आ जाएगी — ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी। उसकी बेफ़िक्री और उसका चढ़ा हुआ मन और बढ़ता गया। उसे श्रीमती फ़िलिप्स से, लुकास परिवार से और बाक़ी सब पड़ोसियों से मिलने की जल्दी थी। और हर एक के मुँह से ख़ुद को 'श्रीमती विकहम' कहलाते सुनने की भी। इसी बीच खाना ख़त्म करके वह श्रीमती हिल और दोनों नौकरानियों को अपनी अँगूठी दिखाने चली गई। ब्याह हो जाने का रुतबा जताना था।
सब लोग नाश्ते के कमरे में लौट आए, तो लिडिया बोली। 'हाँ माँ, मेरे पति आपको कैसे लगे? हैं न बड़े मोहने वाले आदमी? मेरी बहनें तो ज़रूर मुझसे जलती होंगी। बस इतना हो कि उन्हें भी मेरी आधी क़िस्मत मिल जाए। सबको ब्राइटन जाना चाहिए। पति पाने की जगह वही है। माँ, हम सब साथ नहीं गए, इसका कितना अफ़सोस है!' 'सच कहती हो। मेरा बस चलता तो हम ज़रूर साथ जाते। पर मेरी प्यारी लिडिया, तुम्हारा इतनी दूर जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा। क्या ऐसा करना ज़रूरी ही है?' 'हे भगवान! हाँ, ज़रूरी है। पर इसमें है ही क्या। मुझे तो सबसे ज़्यादा यही अच्छा लगेगा। आप और पिताजी, और मेरी बहनें भी हमसे मिलने आइएगा। हम पूरी सर्दी न्यूकैसल में रहेंगे। वहाँ नाच तो होंगे ही, और मैं ध्यान रखूँगी कि सब बहनों को अच्छे जोड़ीदार मिल जाएँ।' 'इससे अच्छी बात और क्या होगी!' माँ ने कहा। 'और लौटते वक़्त आप एक-दो बहनों को मेरे पास छोड़ भी सकती हैं। सर्दी बीतने से पहले मैं उनके लिए पति ढूँढ़ दूँगी।' 'मेरे हिस्से की यह मेहरबानी मुझे नहीं चाहिए,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'पति ढूँढ़ने का तुम्हारा तरीक़ा मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं।' मेहमानों को उनके साथ दस दिन से ज़्यादा नहीं रुकना था। लंदन छोड़ने से पहले ही मिस्टर विकहम को अफ़सर का नियुक्ति-पत्र मिल चुका था। दो हफ़्ते बाद उन्हें अपनी रेजिमेंट में जा मिलना था। दोनों का इतना कम रुकना सिर्फ़ श्रीमती बेनेट को खला। वे बेटी को साथ लेकर इधर-उधर मिलने जाती रहीं। घर पर भी बहुत बार लोगों को बुलाया, ताकि यह वक़्त पूरा-पूरा भोग लिया जाए। ऐसी महफ़िलें सबको भा रही थीं। सिर्फ़ घरवालों का आपस में बैठे रहना कोई नहीं चाहता था। और यह चाह बिना सोचने वालों से कहीं ज़्यादा सोचने वालों में थी। लिडिया के लिए विकहम का लगाव ठीक वैसा ही निकला, जैसा एलिज़ाबेथ ने सोचा था। लिडिया के अपने लगाव जितना गहरा वह नहीं था। भाग निकलने की वजह विकहम का नहीं, लिडिया का ही तेज़ प्यार था। अब की देखी हुई बातों के बिना भी यह समझा जा सकता था। हालात पर सोचने भर से इसका पक्का यक़ीन हो जाता था। विकहम को लिडिया से कोई गहरा प्यार था ही नहीं, तो वे उसे साथ लेकर भागे ही क्यों? एलिज़ाबेथ को यह सवाल उठता। पर उसे भरोसा था कि तंगहाली की वजह से भागना उनकी अपनी मजबूरी थी। और ऐसे में साथ चलने वाली कोई मिल रही हो, तो उसे ठुकरा देने वाले नौजवान वे नहीं थे। लिडिया उन्हें बहुत चाहती थी। वे जो भी करें, उसके लिए वे प्यारे विकहम ही रहते। कोई उनके बराबर नहीं था। दुनिया का हर काम वे सबसे अच्छा करते थे। उसे पक्का यक़ीन था कि सितंबर की पहली तारीख़ के शिकार में वे इस इलाक़े के हर आदमी से ज़्यादा चिड़ियाँ मारेंगे।
दोनों के आने के कुछ ही दिन बाद की बात है। एक सुबह लिडिया अपनी दोनों बड़ी बहनों के साथ बैठी थी। तभी उसने एलिज़ाबेथ से कहा। 'लिज़ी, मुझे लगता है, मैंने तुम्हें अपने ब्याह की बात कभी सुनाई ही नहीं। जब मैं माँ और बाक़ी सबको सब कुछ बता रही थी, तब तुम पास नहीं थीं। सब कैसे हुआ, जानने का मन नहीं?' 'नहीं, सच में नहीं,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'मुझे लगता है, उस बारे में जितनी कम बात हो, उतना अच्छा।' 'अरे! तुम भी कितनी अजीब हो! फिर भी सब कैसे हुआ, यह मैं तुम्हें बता ही देती हूँ। विकहम का ठिकाना सेंट क्लेमेंट की पल्ली में था, इसलिए ब्याह वहीं के गिरजे में हुआ। तय यह था कि सब लोग ग्यारह बजे तक पहुँच जाएँ। मामा-मामी और मैं साथ जाने वाले थे, और बाक़ी सबसे गिरजे में ही मिलना था। सोमवार की सुबह आई, तो मेरे तो होश ही उड़े हुए थे! डर लग रहा था कि कुछ हो गया और ब्याह टल गया, तो मैं तो पागल ही हो जाती। मैं कपड़े पहन रही थी, और उतनी देर मामी ऐसे बोलती और उपदेश झाड़ती रहीं, जैसे कोई धर्म-प्रवचन पढ़ रहा हो। पर उनकी दस में से एक बात भी मैंने ढंग से नहीं सुनी। तुम समझ ही सकती हो, मेरे मन में तो बस प्यारे विकहम थे। मुझे यही धुन थी कि वे नीला कोट पहनकर ब्याह करेंगे या नहीं। फिर हमने रोज़ की तरह दस बजे नाश्ता किया। मुझे तो लगा, यह कभी ख़त्म ही नहीं होगा। और हाँ, यह भी जान लो कि जितने दिन मैं उनके साथ रही, मामा और मामी का बरताव भयानक और चिढ़ाने वाला ही रहा। तुम मानोगी? पूरे दो हफ़्ते उस घर में रही और एक बार भी बाहर पैर नहीं रख पाई। न कोई महफ़िल, न कोई कार्यक्रम, कुछ भी नहीं! हाँ, लंदन में लोग कुछ कम ज़रूर थे, फिर भी लिटिल थिएटर तो खुला ही था। ख़ैर, गाड़ी दरवाज़े पर आई ही थी कि मामा को उस भयानक मिस्टर स्टोन के काम से बुला लिया गया। तुम्हें तो पता ही है, वे दोनों एक बार मिल जाएँ तो बात ख़त्म ही नहीं होती। मामा को ही मुझे दूल्हे के हाथ सौंपना था, और वक़्त निकल जाता तो उस दिन ब्याह हो ही नहीं सकता था। मैं इतनी डर गई कि समझ ही नहीं आया, क्या करूँ। पर अच्छा हुआ, वे दस मिनट में लौट आए और हम सब चल पड़े। बाद में मुझे ध्यान आया कि मामा न भी जा पाते, तो ब्याह टालने की ज़रूरत नहीं थी। मिस्टर डार्सी यह काम कर सकते थे।' 'मिस्टर डार्सी!' एलिज़ाबेथ ने बेहद हैरान होकर दोहराया। 'अरे हाँ! उन्हें विकहम के साथ वहाँ आना ही था। पर हे भगवान! मैं तो बिलकुल भूल ही गई! इस बारे में मुझे एक शब्द भी नहीं कहना था। मैंने उनसे कितनी पक्की क़सम खाई थी! अब विकहम क्या कहेंगे? यह बात तो पूरी तरह छिपी रहनी थी!' 'अगर यह छिपी ही रहनी है,' जेन ने कहा, 'तो इस बारे में एक शब्द और मत कहो। मैं आगे कुछ जानने की कोशिश नहीं करूँगी, तुम निश्चिंत रहो।' 'हाँ, बिलकुल,' एलिज़ाबेथ ने कहा, हालाँकि उत्सुकता उसे भीतर ही भीतर जला रही थी। 'हम कुछ भी नहीं पूछेंगे।' 'शुक्रिया,' लिडिया ने कहा। 'तुम लोग पूछोगी तो मैं ज़रूर सब कुछ बता दूँगी, और फिर विकहम बहुत नाराज़ होंगे।' सवाल पूछने का ऐसा न्योता सुनकर एलिज़ाबेथ के पास कमरे से भाग जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा, ताकि वह पूछ ही न सके।
पर ऐसी बात को न जानकर जीते रहना नामुमकिन था। कम से कम जानने की कोशिश न करना भी नामुमकिन था। मिस्टर डार्सी उसकी छोटी बहन के ब्याह में मौजूद थे। वह जगह ऐसी थी, जहाँ उनका काम सबसे कम था और जाने का मन उन्हें सबसे कम होता। और वे ठीक उन्हीं लोगों के बीच थे। इसका मतलब क्या हो सकता है — यह टटोलते हुए ख़याल तेज़ी से और बेतरतीब उसके मन में उमड़ते रहे। पर कोई भी अटकल उसे जँची नहीं। जिस अटकल में उनका काम सबसे ऊँचा और सबसे भला दिखता, वही सबसे कम मुमकिन लगती। यह अनिश्चय उससे सहा नहीं गया। उसने झट से काग़ज़ उठाया और मामी को एक छोटी-सी चिट्ठी लिखी। उसने विनती की कि लिडिया के मुँह से जो बात निकल गई, उसे समझा दिया जाए। बशर्ते इससे उस भेद को कोई चोट न पहुँचे, जो शुरू से छिपाकर रखा जाना था। चिट्ठी में उसने यह भी लिखा। 'आप आसानी से समझ सकती हैं कि मुझे कितनी उत्सुकता हो रही होगी। जिनका हमसे कोई नाता नहीं, और जो हमारे घर के लिए क़रीब-क़रीब पराए हैं, वे उस मौक़े पर आप लोगों के बीच क्यों थे? तुरंत चिट्ठी लिखकर मुझे यह समझा दीजिए। हाँ, लिडिया जिस भेद को ज़रूरी मानती है, उसे छिपाए रखने की कोई बहुत बड़ी वजह हो, तो मैं कुछ न जानकर ही संतोष करने की कोशिश करूँगी।' 'पर ऐसा कर तो नहीं पाऊँगी,' चिट्ठी ख़त्म करते हुए उसने ख़ुद से कहा। 'और प्यारी मामी, आपने ईमानदारी से नहीं बताया, तो जानने के लिए मुझे चालाकी और चालबाज़ी पर उतरना ही पड़ेगा।' जेन को मान-मर्यादा का बहुत बारीक ख़याल था, सो लिडिया के मुँह से निकली बात पर उसने एलिज़ाबेथ से अकेले में कोई चर्चा नहीं की। एलिज़ाबेथ को यह अच्छा ही लगा। जब तक यह साफ़ न हो जाए कि उसकी पूछताछ का कोई संतोषजनक जवाब मिलेगा या नहीं, तब तक कोई राज़दार न हो, यही बेहतर था।