हिन्दी संस्करण
अध्याय 15
न्यूलैंड आर्चर शुक्रवार शाम चिवर्स परिवार के यहाँ पहुँचा, और शनिवार को उसने हाईबैंक के सप्ताहांत की हर रस्म ईमानदारी से निभाई। सुबह उसने मेज़बान और सबसे जीवट मेहमानों संग बर्फ़-नौका की सैर की; दोपहर में रेजी के साथ फ़ार्म देखा और सजे अस्तबलों में घोड़ों पर लंबा, प्रभावशाली व्याख्यान सुना। चाय के बाद अँगीठी के पास उस युवती से बातें कीं, जिसने उसकी सगाई पर दिल टूटने की बात कही थी — पर अब वह अपनी शादी की उम्मीदें चाव से सुना रही थी। आधी रात के क़रीब उसने एक मेहमान के बिस्तर में सुनहरी मछली रखने और घबराई मौसी के गुसलख़ाने में चोर बना पुतला रखने में हाथ बँटाया; और भोर में बच्चों के कमरे से तहख़ाने तक चली तकिया-लड़ाई में शामिल रहा। पर रविवार को भोजन के बाद उसने छोटी बर्फ़-गाड़ी उधार ली और स्कॉयटरक्लिफ़ चल पड़ा।
स्कॉयटरक्लिफ़ के घर को सब हमेशा इतालवी विला कहते थे। जो कभी इटली नहीं गए, वे मान लेते; कुछ जो गए थे, वे भी। इसे श्री वैन डर लायडेन ने जवानी में बनवाया था — यूरोप की अपनी 'बड़ी यात्रा' से लौटकर, मिस लुइज़ा डागोनेट से विवाह से पहले। यह हल्के हरे और सफ़ेद रंग का, लकड़ी का बड़ा चौकोर भवन था; खिड़कियों के बीच धारीदार स्तंभ और सामने कोरिंथी खंभों वाला बरामदा। जिस ऊँचाई पर वह खड़ा था, वहाँ से रेलिंग और सजावटी कलशों से घिरी छतें, किसी नक़्क़ाशी की तरह, नीचे उतरती थीं — एक छोटी, टेढ़ी-मेढ़ी झील तक, जिसके किनारे पर दुर्लभ झुकी शाखों वाले देवदार लटके थे। दाएँ-बाएँ वे मशहूर लॉन फैले थे जिनमें एक भी खरपतवार नहीं थी — 'नमूना' पेड़ों से सजे, हर पेड़ अलग क़िस्म का — और छोर पर ढलवाँ लोहे के नक़्क़ाशीदार शृंगारों वाला लंबा मैदान। नीचे घाटी में चार कमरों का वह पत्थर का घर था, जिसे पहले पाट्रून ने — डच उपनिवेश काल के बड़े ज़मींदार की उपाधि — 1612 में मिली ज़मीन पर बनवाया था।
एकरंगी बर्फ़ और सर्दियों के धूसर आसमान के आगे इतालवी विला काफ़ी उदास लगता था। गर्मियों में भी वह घर दूरी बनाए रखता; सबसे साहसी फूलों की क्यारी भी उसके सामने तीस फ़ुट से क़रीब नहीं आती थी। आर्चर ने घंटी बजाई तो लंबी झनकार किसी मक़बरे के भीतर गूँजती लगी; और आख़िर जो बटलर आया, उसके चेहरे पर आख़िरी नींद से जगाए आदमी की हैरानी थी। ख़ैर, आर्चर घर का आदमी था, इसलिए बिना ख़बर आने पर भी उसे बताया गया कि काउंटेस ओलेंस्का ठीक पौन घंटे पहले श्रीमती वैन डर लायडेन के साथ शाम की प्रार्थना में गई हैं। 'श्री वैन डर लायडेन घर पर हैं, साहब,' बटलर बोला, 'पर मुझे लगता है वे झपकी पूरी कर रहे हैं, या कल शाम का अख़बार पढ़ रहे हैं। आज सुबह गिरजे से लौटते हुए मैंने उन्हें कहते सुना, साहब, कि दोपहर के भोजन के बाद वे इवनिंग पोस्ट पढ़ेंगे। कहें तो मैं पुस्तकालय के दरवाज़े तक जाकर सुन आऊँ—' पर आर्चर ने धन्यवाद कहा और बोला कि वह महिलाओं से मिलने जाएगा; बटलर ने साफ़ राहत के साथ उसके पीछे शान से दरवाज़ा बंद कर दिया। साईस बर्फ़-गाड़ी अस्तबल ले गया, और आर्चर पार्क पार कर बड़ी सड़क की ओर चला। गाँव बस डेढ़ मील दूर था, पर वह जानता था कि श्रीमती वैन डर लायडेन कभी पैदल नहीं चलतीं; बग्घी से मिलने के लिए सड़क पकड़नी होगी।
पर जल्द ही, सड़क काटती एक पगडंडी पर, उसे लाल लबादे में एक छरहरी आकृति दिखी; आगे-आगे एक बड़ा कुत्ता दौड़ रहा था। वह लपककर पहुँचा, और श्रीमती ओलेंस्का स्वागत की मुस्कान के साथ रुक गईं। 'अरे, आप आ गए!' उन्होंने कहा और मफ़ से हाथ निकाला। लाल लबादा उन्हें जीवंत और चंचल दिखा रहा था — पुरानी एलेन मिंगट जैसी; आर्चर हँस पड़ा, उनका हाथ थामते हुए बोला: 'मैं देखने आया हूँ कि आप किस चीज़ से भाग रही हैं।' उनका चेहरा धुँधला पड़ा, पर बोलीं: 'जल्द ही देख लेंगे।' जवाब ने उसे उलझा दिया। 'क्यों — क्या जिससे भाग रही थीं, उसने आ पकड़ा?' उन्होंने नास्तासिया जैसे हल्के अंदाज़ में कंधे उचकाए और हल्के स्वर में कहा: 'चलते रहें? उपदेश के बाद बहुत ठंड लग रही है। और अब क्या फ़र्क़ पड़ता है — आप जो आ गए हैं मेरी रक्षा करने?' आर्चर की कनपटियों में ख़ून दौड़ गया,
और उसने लबादे का एक कोना थाम लिया। 'एलेन — क्या बात है? आपको बताना होगा।' 'अभी, थोड़ी देर में। पर पहले — दौड़ लगाएँ? मेरे पैर जमे जा रहे हैं!' वे चिल्लाईं; और लबादा समेटकर बर्फ़ पर दौड़ पड़ीं, कुत्ता भौंकता हुआ चारों ओर कूदता रहा। एक पल आर्चर मुग्ध खड़ा उस लाल उल्का को सफ़ेदी पर चमकते देखता रहा; फिर वह भी पीछे दौड़ा,
और दोनों पार्क में खुलने वाले छोटे फाटक पर हँसते, हाँफते मिले। उन्होंने ऊपर देखा और मुस्कराईं: 'मुझे पता था आप आएँगे!' 'यानी आप चाहती थीं कि मैं आऊँ,' आर्चर ने कहा — इन बचकानी बातों से कहीं बड़ी ख़ुशी के साथ। पेड़ों की सफ़ेद चमक हवा में रहस्यमय उजाला भर रही थी, और हर क़दम पर बर्फ़ीली ज़मीन पैरों तले गाती-सी लगती। 'कहाँ से आ रहे हैं?' श्रीमती ओलेंस्का ने पूछा। उसने बताया, फिर जोड़ा: 'आपकी चिट्ठी मिली, इसीलिए आया।' थोड़ी चुप्पी के बाद वे बोलीं, आवाज़ में हल्की ठंडक लिए: 'मे ने आपसे कहा था न, मेरा ख़याल रखने को।' 'मुझे किसी के कहने की ज़रूरत नहीं थी।' 'यानी मैं इतनी बेबस, इतनी असहाय दिखती हूँ? आप सब मुझे कैसी दयनीय चीज़ समझते होंगे! पर यहाँ की औरतों को तो ऐसी कोई ज़रूरत महसूस ही नहीं होती —
जैसे स्वर्ग की पुण्यात्माओं को नहीं होती।' 'कैसी ज़रूरत?' उसने धीमे स्वर में पूछा। 'ओह, मुझसे मत पूछिए! मैं आपकी भाषा नहीं जानती,' उन्होंने चिढ़कर कहा। जवाब चोट-सा लगा; वह पगडंडी पर रुककर उन्हें देखने लगा। 'अगर मैं आपकी भाषा नहीं बोलता, तो आया ही क्यों?' 'ओह, मेरे दोस्त...!' उन्होंने उसकी बाँह पर हल्के से हाथ रखा, और वह गिड़गिड़ाया: 'एलेन — क्या हुआ है, बताती क्यों नहीं?' उन्होंने फिर कंधे उचकाए। 'स्वर्ग में भला कुछ होता है क्या?' कुछ क़दम चुपचाप चले। आख़िर वे बोलीं: 'बताऊँगी। पर कहाँ, कहाँ, कहाँ? उस विशाल, मदरसे जैसे घर में एक पल अकेली नहीं रह सकती: दरवाज़े हमेशा खुले, और हमेशा कोई नौकर चला आता है — चाय लेकर, लकड़ी लेकर, अख़बार लेकर! क्या अमेरिकी घरों में अकेले रहने की कोई जगह नहीं? आप लोग इतने संकोची, फिर भी इतने सार्वजनिक हैं। लगता है मैं फिर मठ में हूँ — या मंच पर, ऐसे भयानक शिष्ट दर्शकों के सामने जो कभी ताली नहीं बजाते।'
'अरे, आपको हम पसंद ही नहीं!' आर्चर पुकार उठा। वे पुराने पाट्रून के घर के सामने से गुज़र रहे थे: चपटी दीवारें, बीच की चिमनी के गिर्द सिमटी छोटी चौकोर खिड़कियाँ। किवाड़ खुले थे, और एक धुली-धुलाई खिड़की से आर्चर को आग की रोशनी दिखी। 'अरे — घर खुला है!' उसने कहा। वे रुक गईं। 'बस आज भर। मैंने घर देखने की इच्छा जताई तो श्री वैन डर लायडेन ने आग जलवा दी और खिड़कियाँ खुलवा दीं — ताकि सुबह गिरजे से लौटते हुए हम रुक सकें।' वे सीढ़ियाँ दौड़कर चढ़ीं और दरवाज़ा खींचा। 'अभी भी खुला है — क्या क़िस्मत! आइए; आराम से बातें करेंगे। श्रीमती वैन डर लायडेन अपनी मौसियों से मिलने राइनबेक गई हैं; घंटे भर हमें कोई नहीं पूछेगा।'
वह उनके पीछे तंग गलियारे में दाख़िल हुआ। उनकी पिछली बात से बुझा उसका मन बेवजह उछलकर फिर खिल उठा। सादा-सा छोटा घर — आग की रोशनी में चमकते पीतल और लकड़ी की दीवार-पट्टियों के साथ — मानो जादू से उन्हीं के स्वागत को सजाया गया था। रसोई की अँगीठी में, पुराने काँटे से टँगी लोहे की हाँडी के नीचे, अब भी लाल अंगारा दहक रहा था। टाइलों वाले चूल्हे के दोनों ओर सरकंडे की कुर्सियाँ आमने-सामने रखी थीं, और ताक़ों पर डेल्फ़्ट की तश्तरियाँ क़तार में सजी थीं। आर्चर ने झुककर अंगारों पर एक लकड़ी डाली। श्रीमती ओलेंस्का ने लबादा उतारा और एक कुर्सी पर बैठ गईं। वह अँगीठी से टिककर उन्हें देखने लगा। 'अब तो हँस रही हैं; पर चिट्ठी लिखते समय आप दुखी थीं,' उसने कहा। 'हाँ।' वे पल भर रुकीं। 'पर आप यहाँ हों तो मैं दुखी महसूस कर ही नहीं सकती।' 'मैं देर तक नहीं रुक सकता,' आर्चर ने कहा; होंठ बस इतना ही कहने और आगे कुछ न कहने की कोशिश में कड़े हो गए। 'जानती हूँ। पर मैं आगे का नहीं सोचती; मैं पल के साथ जीती हूँ।'
'ख़ुश होती हूँ तो बस उसी पल को देखती हूँ।' ये शब्द किसी प्रलोभन की तरह उसके भीतर उतर गए; उनका रास्ता रोकने के लिए वह अँगीठी से हटकर खिड़की पर गया और बर्फ़ पर खड़े जंगल के काले तनों को देखने लगा। पर लगा जैसे वे भी जगह बदलकर आ गई हों: वह अब भी उन्हें अपने और पेड़ों के बीच, आग के पास बैठी, उसी अलसाई मुस्कान के साथ देख रहा था। आर्चर का दिल, उसकी इच्छा के विरुद्ध, बेतहाशा धड़कने लगा। अगर वे उसी से भाग रही थीं — और यह बात कहने के लिए इसी एकांत कमरे में उसके साथ अकेले होने की प्रतीक्षा कर रही थीं? 'एलेन — अगर मैं सच में आपके किसी काम का हूँ, अगर आप सच में चाहती थीं कि मैं आऊँ — तो बताइए, क्या ग़लत है, आप किससे भाग रही हैं?' उसने ज़ोर देकर कहा। उसने मुद्रा बदले बिना, उनकी ओर मुड़े बिना कहा: होना है तो ऐसे ही हो — दोनों के बीच पूरे कमरे की चौड़ाई रहे, और निगाहें बाहर की बर्फ़ पर टिकी रहें।
देर तक वे चुप रहीं। उस पल आर्चर ने कल्पना की — लगभग महसूस किया — कि वे पीछे से आकर अपनी हल्की बाँहें उसके गले में डाल रही हैं; उनकी साँस तक सुनाई देती लगी। उस चमत्कार की प्रतीक्षा में उसकी देह और आत्मा काँप रही थीं। तभी उसे घर की ओर आता एक आदमी दिखा — भारी कोट, खड़ा फ़र का कॉलर। वह जूलियस ब्यूफ़र्ट था। 'आह!' आर्चर चीख़ा और ठहाका मार उठा। श्रीमती ओलेंस्का उछलकर उठीं, सरककर उसके पास आईं और अपना हाथ उसके हाथ में डाल दिया; पर खिड़की से एक नज़र डालते ही उनका चेहरा फक़ पड़ गया और वे पीछे हट गईं। 'तो यह बात थी?' आर्चर ने ताना दिया। 'मुझे पता नहीं था कि वे यहाँ हैं,' वे बुदबुदाईं। उनका हाथ अब भी आर्चर के हाथ में था; पर उसने हाथ छुड़ाया, गलियारे में निकला और घर का दरवाज़ा पूरा खोल दिया। 'नमस्ते, ब्यूफ़र्ट साहब — इधर से!
श्रीमती ओलेंस्का आपका ही इंतज़ार कर रही थीं!' उसने कहा। अगली सुबह, न्यूयॉर्क लौटते हुए, आर्चर ने स्कॉयटरक्लिफ़ के वे आख़िरी पल थका देने वाली सजीवता से फिर जिए। ब्यूफ़र्ट उसे श्रीमती ओलेंस्का के पास पाकर साफ़ झुँझलाया था, पर हमेशा की तरह रोब से काम चला ले गया। जो लोग उसे खटकते, उन्हें सिरे से अनदेखा करने का उसका अपना ढंग था; संवेदनशील लोगों को इससे लगता कि वे अदृश्य हैं, हैं ही नहीं। तीनों पार्क से गुज़रे तो आर्चर को अपनी इस अजीब प्रेत-दशा का बोध रहा; इससे स्वाभिमान दुखता था, पर बिना देखे गए देखने का प्रेत जैसा लाभ भी मिलता था। ब्यूफ़र्ट उसी ठसक से छोटे घर में दाख़िल हुआ था; पर भौंहों के बीच खिंची खड़ी लकीर वह मिटा नहीं पा रहा था। साफ़ था कि श्रीमती ओलेंस्का को उसके आने की ख़बर नहीं थी — भले आर्चर से कही एक बात ने यह संभावना झलकाई थी; बहरहाल, न्यूयॉर्क छोड़ते समय उन्होंने उसे नहीं बताया था कि कहाँ जा रही हैं, और इस बिना बताए चले जाने से वह बुरी तरह चिढ़ा था। उसके आने का घोषित कारण था कि पिछली ही शाम उसे एक 'सुथरा छोटा घर' मिला था — अभी बाज़ार में आया भी नहीं, उनके लिए एकदम सही; जल्दी न लपकीं तो कोई और ले उड़ेगा। और बनावटी ग़ुस्से में, ऊँची आवाज़ में, वह उलाहना देने लगा कि जिस घड़ी उसने घर ढूँढ़ निकाला, उसी घड़ी वे भाग खड़ी हुईं और उसकी सारी मेहनत बेकार कर दी।
'यह नया आविष्कार, टेलीफ़ोन, ज़रा और पक्का होता तो मैं यह सब आपसे शहर से ही कह देता। इस वक़्त क्लब की आग के सामने पैर सेंक रहा होता — बर्फ़ीले रास्तों में आपको ढूँढ़ता न फिरता,' ब्यूफ़र्ट भुनभुनाया; असली खीज को बनावटी शिकायत के नीचे छिपाते हुए। इसी दरार का लाभ उठाकर श्रीमती ओलेंस्का ने बात उस अद्भुत संभावना की ओर मोड़ दी कि किसी दिन लोग एक जगह से दूसरी जगह — बल्कि, अविश्वसनीय सपना, एक शहर से दूसरे शहर तक — बातें कर सकेंगे। इससे तीनों सहज ही एडगर पो और जूल वर्न का नाम ले बैठे, और वे घिसी-पिटी बातें दोहराने लगे जो पढ़े-लिखे लोग नए आविष्कारों की चर्चा में यों ही कह जाते हैं — कहीं जल्दी विश्वास कर बैठने से भोले न दिखें। और टेलीफ़ोन की चर्चा उन्हें सुरक्षित बड़े घर तक लौटा लाई। श्रीमती वैन डर लायडेन अभी नहीं लौटी थीं; आर्चर विदा लेकर अपनी बर्फ़-गाड़ी लेने चला, और ब्यूफ़र्ट काउंटेस के साथ भीतर गया। वैन डर लायडेन दंपती को बिन बुलाए मेहमान भाते नहीं थे; पर ब्यूफ़र्ट को रात के भोजन पर ज़रूर रोक लिया जाएगा और फिर नौ बजे की गाड़ी के लिए स्टेशन भेज दिया जाएगा। बस इतना ही: सफ़र में निकला कोई सज्जन बिना सामान के रात बिताना चाहे — यह उनकी कल्पना से बाहर था; और ब्यूफ़र्ट जैसे कम घनिष्ठ आदमी से ऐसा कहना उन्हें अप्रिय लगता।
ब्यूफ़र्ट यह सब जानता था, और सोच भी चुका होगा; फिर भी इतनी दूर आया — यही बताता है कि उसकी बेचैनी कितनी बड़ी थी। बेशक वह काउंटेस ओलेंस्का के पीछे पड़ा था; और ब्यूफ़र्ट सुंदर स्त्रियों के पीछे एक ही मक़सद से पड़ता था। बे-औलाद घर उसे कब का उबाऊ लग चुका था; और अधिक टिकाऊ दिलासों के अलावा वह अपने ही समाज में इश्क़ के रोमांच खोजता था। यही वह आदमी था जिससे, ख़ुद उनके कथन के अनुसार, श्रीमती ओलेंस्का भाग रही थीं: सवाल यह था कि वे उसकी ज़िद भरी माँगों से तंग आकर भागी थीं, या इसलिए कि उन्हें उससे पार पाने का पूरा भरोसा नहीं था। यह भी हो सकता था कि भागना महज़ दिखावा हो, और न्यूयॉर्क छोड़ना एक चाल। आर्चर सच में ऐसा नहीं मानता था: श्रीमती ओलेंस्का को वह कम ही जानता था, पर उसे लगने लगा था कि वह उनका चेहरा — या कम से कम उनकी आवाज़ — पढ़ सकता है; और दोनों में ब्यूफ़र्ट के अचानक प्रकट होने पर झुँझलाहट, बल्कि घबराहट झलकी थी। पर आख़िर, अगर यही सच था, तो क्या यह उससे बुरा नहीं था कि वे उससे मिलने के लिए ही न्यूयॉर्क से निकली होतीं? अगर ऐसा था, तो वे दिलचस्प रहना बंद कर देती थीं: सबसे भोंडी पाखंडिनों की क़तार में जा खड़ी होती थीं। ब्यूफ़र्ट से इश्क़ लड़ाने वाली औरत सदा के लिए 'श्रेणीबद्ध' हो जाती थी।
नहीं — अगर वे ब्यूफ़र्ट को परखती थीं, शायद उसे तुच्छ भी समझती थीं, फिर भी उन चीज़ों की ओर खिंचती थीं जो उसे बाक़ी मर्दों से अलग करती थीं — दो महाद्वीपों और दो समाजों की उसकी आदत, कलाकारों, अभिनेताओं और दुनिया की नज़र में चढ़े लोगों से घनिष्ठता, स्थानीय पूर्वग्रहों के प्रति उसकी शांत उपेक्षा — तो यह हज़ार गुना बुरा था। ब्यूफ़र्ट भोंडा था, अनपढ़ था, पैसे का घमंडी था; पर उसके जीवन की परिस्थितियों और जन्मजात चतुराई ने उसे बातचीत में उन कई नैतिक और सामाजिक रूप से बेहतर आदमियों से ज़्यादा दिलचस्प बना दिया था, जिनका क्षितिज बैटरी और सेंट्रल पार्क के बीच सिमटा था। किसी बड़े संसार से आया इंसान यह फ़र्क़ कैसे न महसूस करता, और कैसे न खिंचता?
श्रीमती ओलेंस्का ने खीज के एक पल में आर्चर से कहा था कि वे दोनों एक भाषा नहीं बोलते; और युवक जानता था कि एक अर्थ में यह सच था। पर ब्यूफ़र्ट उनकी भाषा का हर मोड़ समझता था और उसे धाराप्रवाह बोलता था: उसकी जीवन-दृष्टि, लहजा, रवैया — सब काउंट ओलेंस्की की चिट्ठी से झलकी चीज़ों की भद्दी नक़ल भर थे। काउंट की पत्नी की नज़र में यह ब्यूफ़र्ट के विरुद्ध जा सकता था; पर आर्चर इतना नासमझ नहीं था कि माने — एलेन ओलेंस्का जैसी युवती अतीत की याद दिलाने वाली हर चीज़ को ज़रूर ठुकरा देगी। वे भले मानती हों कि उन्होंने अतीत से पूरी बग़ावत कर ली है; पर जिन चीज़ों ने उन्हें उस अतीत में मोहा था, वे उनकी इच्छा के विरुद्ध भी उन्हें खींचती रहेंगी। इस तरह, कष्टदायक निष्पक्षता से, युवक ब्यूफ़र्ट और उसकी 'शिकार' — दोनों का मामला परखता रहा; और उसके भीतर एक इच्छा साफ़ होती गई: उन्हें सच का बोध कराने की। कभी-कभी तो लगता, वे माँग ही यही रही हैं — कि कोई उन्हें बोध करा दे।
उस शाम आर्चर ने लंदन से आई किताबों का बक्सा खोला। बक्सा बेसब्री से प्रतीक्षित चीज़ों से भरा था: हर्बर्ट स्पेंसर की नई जिल्द, प्रतिभाशाली अल्फ़ोंस दोदे की और कहानियाँ, और जॉर्ज एलियट का 'मिडलमार्च', जिसकी पत्रिकाओं में चर्चा थी। इस दावत की ख़ातिर उसने रात के खाने के तीन न्योते ठुकराए थे; पर किताब-प्रेमी के आनंद से पन्ने पलटते हुए भी उसे पता नहीं था कि पढ़ क्या रहा है; किताबें एक-एक कर हाथ से छूटती गईं। तभी उनके बीच उसे कविताओं की एक छोटी किताब मिली, जो उसने केवल शीर्षक देखकर मँगाई थी: 'जीवन का घर'। खोलते ही वह ऐसे वातावरण में डूब गया जैसा किसी किताब में कभी नहीं मिला था: इतना गर्म, इतना समृद्ध, इतना कोमल कि सीधी-सादी भावनाएँ भी रहस्यमय सौंदर्य में रँग जाती थीं। रात भर वह उन जादुई पन्नों में एक स्त्री की छवि का पीछा करता रहा, जिसका चेहरा एलेन ओलेंस्का का था; पर सुबह जागकर भूरी पत्थर की इमारतें देखीं, दफ़्तर की मेज़ और ग्रेस चर्च की पारिवारिक बेंच याद आई — और पार्क की वह घड़ी रात के सपने जितनी असंभव हो गई।
'अरे, भैया कितने पीले पड़ गए हो!' जेनी ने नाश्ते पर कॉफ़ी का प्याला थामे कहा, और माँ ने जोड़ा: 'न्यूलैंड, आजकल तुम्हें खाँसते सुनती हूँ; कहीं काम से ख़ुद को मार तो नहीं रहे?' दोनों को पक्का यक़ीन था कि कठोर मालिकों के दबाव में वह पेशे के सबसे थकाऊ काम ढो रहा है — और उसने उनकी यह ग़लतफ़हमी दूर करना कभी ज़रूरी नहीं समझा।
अगले दो-तीन दिन घिसटते बीते। रोज़मर्रा का स्वाद मुँह में राख जैसा था, और कभी-कभी लगता कि भविष्य उसे ज़िंदा दफ़्न कर रहा है। काउंटेस ओलेंस्का या उस सुथरे छोटे घर की कोई ख़बर नहीं आई; क्लब में ब्यूफ़र्ट से सामना हुआ तो व्हिस्ट की मेज़ों के पार बस सिर हिलाकर अभिवादन हुआ। चौथी शाम घर लौटने पर ही उसे इंतज़ार करती चिट सामने मिली: 'कल देर से आइएगा। मुझे आपको समझाना है। एलेन।' बस इतना ही। उस शाम बाहर खाने गए युवक ने मुस्कराकर चिट जेब में रखी: वाक्य का फ़्रांसीसी ढंग उसे भा गया था। खाने के बाद वह नाटक देखने गया; और आधी रात के बाद घर लौटकर उसने चिट फिर निकाली और धीरे-धीरे कई बार पढ़ी। जवाब देने के कई ढंग सूझे, और उत्तेजित रात का बड़ा हिस्सा वह हर विकल्प को तौलता जागता रहा। सुबह हुई तो फ़ैसला हो चुका था: उसने जल्दी-जल्दी कुछ कपड़े बैग में ठूँसे और तय किया कि उसी दोपहर सेंट ऑगस्टीन जाने वाले जहाज़ पर सवार हो जाएगा।