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अध्याय 27

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अगले दिन वॉल स्ट्रीट में ब्यूफ़र्ट की स्थिति के बारे में कुछ बेहतर ख़बरें आईं। कुछ पक्का नहीं, पर उम्मीद जगाने वाली बातें: कहा गया कि संकट की घड़ी में वह ताक़तवर मददगारों तक पहुँच सका और कामयाब भी रहा। उस शाम जब श्रीमती ब्यूफ़र्ट अपनी पुरानी मुस्कान और पन्ने के नए हार के साथ ओपेरा में प्रकट हुईं, तो समाज ने राहत की साँस ली। न्यूयॉर्क कारोबारी बेईमानी के प्रति कठोर था: ईमानदारी का क़ानून तोड़ने वाले को क़ीमत चुकानी ही पड़ेगी — इस अलिखित नियम का कभी उल्लंघन नहीं हुआ था। सब जानते थे कि ब्यूफ़र्ट दंपती भी इस सिद्धांत की बलि से नहीं बचेंगे। पर उन्हें बलि चढ़ाना पीड़ादायक ही नहीं, असुविधाजनक भी था: उनके मिटने से उस छोटे दायरे में बड़ा खालीपन आता। नैतिक बर्बादी से बेपरवाह लोग भी सबसे अच्छे नृत्य-कक्ष के खोने का शोक पहले से मना रहे थे।

आर्चर ने वॉशिंगटन जाने का पक्का मन बना लिया था। वह मे को बताए मुक़दमे की शुरुआत के साथ रवानगी मिलाना चाहता था, पर मंगलवार को श्री लेटरब्लेयर से पता चला कि मुक़दमा कई हफ़्ते टल सकता है। फिर भी उसने अगली शाम निकलने की ठान ली। मे उसके पेशेवर जीवन के बारे में कुछ नहीं जानती थी, उसने कभी दिलचस्पी भी नहीं दिखाई थी; सो टलने की ख़बर उस तक पहुँचने की संभावना कम थी। और पक्षकारों के नाम सुन भी लेती, तो याद नहीं रखती। सबसे बढ़कर, आर्चर ओलेंस्का से मुलाक़ात अब और नहीं टाल सकता था। उससे कहने को बहुत कुछ जमा हो गया था।

बुधवार सुबह आर्चर दफ़्तर पहुँचा तो श्री लेटरब्लेयर ने उतरे चेहरे से उसका स्वागत किया। आख़िरकार ब्यूफ़र्ट संकट से पार नहीं पा सका। पर बचने की अफ़वाह फैलाकर उसने जमाकर्ताओं को आश्वस्त रखा; कल शाम तक बैंक में मोटी रक़में आती रहीं। फिर बेचैन करने वाली अफ़वाहें फिर उठीं, और निकासी की क़तारें लग गईं। आशंका थी कि बैंक के दरवाज़े आज ही बंद हो जाएँगे। ब्यूफ़र्ट की नीच चालबाज़ी पर लानतें बरस रही थीं, और उसका दिवालियापन वॉल स्ट्रीट के इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में गिना जाने वाला था। तबाही की विकरालता से श्री लेटरब्लेयर पीले पड़े, कुछ कर पाने में असमर्थ थे। 'ज़िंदगी में बहुत देखा, पर ऐसा भयानक कुछ नहीं। हम सबको चोट लगेगी। श्रीमती ब्यूफ़र्ट का क्या होगा? क्या हो सकता है? सबसे ज़्यादा फ़िक्र श्रीमती मिंगट की है। इस उम्र में ऐसा धक्का क्या करेगा, कौन जाने। वे हमेशा ब्यूफ़र्ट पर भरोसा करती रहीं, उसे दोस्त माना! ऊपर से डलास ख़ानदान का नाता। बेचारी श्रीमती ब्यूफ़र्ट तुम सबकी रिश्तेदार है। उसका एकमात्र रास्ता पति को छोड़ना होगा, पर यह उससे कहे कौन? उसका धर्म पति के पास रहना है; और शुक्र है, उसने उसके निजी मामलों से हमेशा आँखें मूँदे रखीं।' तभी किसी ने दरवाज़ा खटखटाया,

और श्री लेटरब्लेयर ने तीखेपन से सिर घुमाया। 'क्या है? तंग मत करो।' एक कर्मचारी आर्चर को चिट्ठी थमाकर चला गया। पत्नी की लिखावट पहचानकर आर्चर ने लिफ़ाफ़ा खोला। 'जितनी जल्दी हो सके घर आ सकते हैं? नानी को कल रात हल्का आघात हुआ। अजीब बात है कि बैंक की यह भयानक ख़बर उन्हें सबसे पहले मिल गई। लवेल मामा शिकार पर गए हैं, और पापा इस बदनामी के सदमे से बुख़ार में हैं, कमरे से नहीं निकल पा रहे। माँ को आपकी बहुत ज़रूरत है। जल्द-से-जल्द सीधे नानी के घर आ जाइए।' आर्चर ने चिट्ठी श्री लेटरब्लेयर को थमाई,

और कुछ मिनटों बाद ठसाठस भरी ट्राम में उत्तर की ओर जा रहा था। चौदहवीं स्ट्रीट पर उसने गाड़ी बदलकर पाँचवें एवेन्यू लाइन की ऊँची, डगमगाती बस पकड़ी। कठिन सफ़र के बाद दोपहर ढले बस ने उसे कैथरीन नानी के घर के सामने

उतारा। भूतल के बैठकख़ाने की खिड़की पर, जहाँ नानी आम तौर पर राज करती बैठी रहती थीं, उनकी बेटी श्रीमती वेलैंड बैठी थीं — उस जगह को भरने में जिनका अस्तित्व नाकाफ़ी था। उन्होंने मुरझाए चेहरे से आर्चर का स्वागत किया। मुख्य द्वार पर मे ने उसे संभाला। घर में अचानक आई बीमारी वाले घरों की ख़ास हवा तैर रही थी: कुर्सियों पर बेतरतीब पड़े कोट और फ़र, मेज़ पर डॉक्टर का बैग और ओवरकोट, और उनके पास बेध्यानी में जमा होते ख़तों और कार्डों के ढेर।

मे पीली दिख रही थी, पर मुस्करा रही थी: अभी-अभी दूसरी बार आए डॉ. बेनकॉम ने ज़्यादा उम्मीद भरी राय दी थी, और श्रीमती मिंगट की जीने की दृढ़ इच्छा परिवार पर भी असर दिखा रही थी। मे आर्चर को नानी के बैठकख़ाने में ले गई। शयनकक्ष की ओर खुलने वाला सरकने वाला दरवाज़ा बंद था और उस पर पीले दमास्क के भारी परदे टँगे थे। वहीं श्रीमती वेलैंड ने भय से दबी आवाज़ में इस घटना की पूरी

कथा आर्चर को सुनाई। कल रात आठ बजे, ताश-बाज़ी निपटते ही, एक रहस्यमय वाक़िआ हुआ: घंटी बजी, और इतने घने घूँघट वाली महिला कि नौकर पहचान न सके, बैठकख़ाने में भेंट माँगने लगी।

जानी-पहचानी आवाज़ सुनकर बटलर ने बैठकख़ाने का दरवाज़ा पूरा खोलते हुए घोषणा की: 'श्रीमती जूलियस ब्यूफ़र्ट' — और दरवाज़ा फिर बंद हो गया। दोनों महिलाएँ लगभग घंटा-भर साथ रहीं। जब श्रीमती मिंगट की घंटी बजी, तब श्रीमती ब्यूफ़र्ट किसी की नज़र में आए बिना जा चुकी थीं, और नानी — सफ़ेद, विशाल और भयावह — अकेली अपनी बड़ी कुर्सी में बैठी थीं; उन्होंने बटलर को इशारा किया कि उन्हें कमरे में ले चलो। तब वे साफ़ तौर पर आहत थीं, फिर भी

देह और मन पर उनका पूरा नियंत्रण था। मुलैटो नौकरानी ने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, रोज़ की तरह चाय की प्याली दी, कमरे की हर चीज़ सहेजकर बाहर चली गई। पर रात के तीन बजे घंटी फिर बजी; और इस अनहोनी पुकार पर दौड़े आए दोनों नौकरों ने (कैथरीन नानी आम तौर पर बच्चे-सी गहरी नींद सोती थीं) देखा कि मालकिन तकियों के सहारे बैठी हैं, विशाल बाँह के सिरे की नन्ही हथेली बेजान लटकी है,

और चेहरे पर टेढ़ी मुस्कान जमी है। सौभाग्य से आघात हल्का था: वे बोल सकती थीं, अपनी बात समझा सकती थीं; पहली जाँच के बाद जल्द ही चेहरे की मांसपेशियाँ भी क़ाबू में आने लगीं। पर धक्का बड़ा था; और उतना ही बड़ा ग़ुस्सा, जब टूटे-फूटे वाक्यों से खुला कि रेजिना आई थी — कैसी ढिठाई! — यह माँगने कि पति का साथ दिया जाए, उन्हें 'छोड़ा' न जाए; असल में पूरा परिवार उस भयंकर बदनामी को ढँकने-अपनाने को राज़ी हो।

'मैंने उससे कहा: मैनसन मिंगट के घर में इज़्ज़त हमेशा इज़्ज़त रही है और ईमानदारी हमेशा ईमानदारी। और जब तक मुझे इस घर से पाँव आगे करके नहीं निकाला जाता, यह उसूल नहीं बदलेगा।' नानी ने अधरंग से लड़खड़ाती आवाज़ में बेटी के कान में फुसफुसाते हुए कहा। 'तो वह बोली: 'पर मौसी, मेरा नाम रेजिना डलास है।' मैंने जवाब दिया: 'जब वह तुझे जवाहरात से लाद रहा था, तब तेरा नाम ब्यूफ़र्ट था;

अब जब उसने तुझे शर्म से लाद दिया है, तब भी ब्यूफ़र्ट ही रहना होगा।'' श्रीमती वेलैंड आँसुओं और दहशत भरी हाँफ के साथ यह सुना रही थीं। अप्रिय सच से आँखें मिलाने की मजबूरी ने उन्हें दुख जितना ही बौखलाया था। 'बस तुम्हारे ससुर से यह छिपा पाऊँ तो ग़नीमत। वे हमेशा कहते हैं: 'ऑगस्टा, दया करके मेरे आख़िरी भ्रम मत तोड़ो।' पर यह भयानक ख़बर मैं छिपाऊँ कैसे?' उन्होंने हताश स्वर में कहा। 'फिर भी माँ, पापा ने उन्हें अपनी आँखों से तो नहीं देखा,' बेटी ने सुझाया। श्रीमती वेलैंड ने आह भरी: 'हाँ, शुक्र है वे बिस्तर में महफ़ूज़ हैं। और डॉ. बेनकॉम ने वादा किया है कि माँ के सुधरने तक, और रेजिना को कहीं भेज दिए जाने तक, उन्हें बिस्तर में ही रखेंगे।'

आर्चर खिड़की के पास बैठा सूनी सड़क को खोई नज़रों से देखता रहा। उसे बुलाया गया था तो साफ़ था कि सदमे में डूबी महिलाओं को मानसिक सहारा देने के लिए, न कि इसलिए कि वह कोई ठोस मदद कर सकता था। श्री लवेल मिंगट को तार भेजा जा चुका था, न्यूयॉर्क के रिश्तेदारों के पास संदेशवाहक रवाना थे। इस बीच बस यही किया जा सकता था कि ब्यूफ़र्ट की बदनामी और उसकी पत्नी के अनुचित क़दम के नतीजों पर दबी आवाज़ में चर्चा हो।

दूसरे कमरे में रुक़्क़े लिख रहीं श्रीमती लवेल मिंगट लौटकर बातचीत में शामिल हुईं। दोनों बुज़ुर्ग महिलाएँ बीते ज़माने के ऐसे मामलों पर एकमत थीं: तब कारोबार में बदनाम हुए आदमी की पत्नी के मन में एक ही बात होती थी — पति के साथ ओझल हो जाना। 'नानी स्पाइसर का मामला भी था। मे, तुम्हारी परनानी।' श्रीमती वेलैंड ने झटपट जोड़ा: 'बेशक तुम्हारे परनाना की दिक़्क़त निजी पैसों की थी — ताश में हारा धन, या किसी की ग़लत ज़मानत — ठीक-ठीक नहीं मालूम, क्योंकि माँ उस बारे में कभी बात नहीं करती थीं। इसीलिए माँ देहात में पलीं: उनकी माँ को उस बदनामी के कारण — जो भी थी — न्यूयॉर्क छोड़ना पड़ा। वे हडसन के ऊपरी इलाक़े में अकेली रहीं, गर्मी हो या सर्दी, माँ के सोलह बरस की होने तक। नानी स्पाइसर को परिवार से मदद माँगने का ख़याल तक नहीं आया; रेजिना की तरह ख़ानदान से 'लाज रखने' की गुहार लगाना तो सोच से बाहर था। और निजी बदनामी उस घोटाले के आगे कुछ नहीं, जो सैकड़ों बेगुनाहों को बर्बाद कर दे।' 'हाँ, रेजिना को औरों से मुँह बचाने की गुहार लगाने से बेहतर होता कि अपना मुँह छिपा लेती,' श्रीमती लवेल मिंगट ने हामी भरी। 'और सुना है कि शुक्रवार को ओपेरा में पहना पन्नों का हार बॉल एंड ब्लैक ने उसी दोपहर आज़माने को भेजा था। देखें, वे उसे वापस पा भी सकेंगे या नहीं।'

आर्चर इस निर्मम भर्त्सना-गान को अविचल भाव से सुनता रहा। सज्जन के लिए धन में बेदाग़ ईमानदारी सर्वोच्च नियम है — यह विश्वास उसमें इतना गहरा था कि कोई भावुकता उसे ढीला नहीं कर सकती थी। लेम्यूएल स्ट्रुथर्स जैसा जोखिमबाज़ चाहे संदिग्ध सौदों के बूते अपनी जूता-पॉलिश से करोड़ों खड़े कर ले; पर पुराने वित्तीय न्यूयॉर्क में निष्कलंक ईमानदारी ही कुलीनता का धर्म थी। श्रीमती ब्यूफ़र्ट की नियति भी उसे बहुत नहीं पसीजती थी। बेशक वह उन क्रुद्ध रिश्तेदारों से ज़्यादा उस पर तरस खाता था; पर उसकी नज़र में पति-पत्नी का बंधन समृद्धि में भले टूट जाए, विपत्ति में अटूट रहना चाहिए। जैसा श्री लेटरब्लेयर ने कहा था, पति मुसीबत में हो तो पत्नी की जगह उसके पास है। पर समाज की जगह उसके पास नहीं थी; और श्रीमती ब्यूफ़र्ट का इसे स्वाभाविक मान लेना उसे लगभग पति की सह-अपराधी बना देता था। कोई स्त्री परिवार से पति की कारोबारी बदनामी ढँकने को कहे — यह क़तई अस्वीकार्य था। यही एक चीज़ थी जो 'परिवार' नाम की संस्था नहीं

कर सकती थी। नौकरानी ने श्रीमती लवेल मिंगट को बाहर बुलाया; वे तनी भौंहों से लौटीं। 'नानी कहती हैं, एलेन ओलेंस्का को तार भेजो। चिट्ठियाँ तो मैंने लिखी थीं, पर अब काफ़ी नहीं। अभी तार भेजकर कहना है कि एलेन अकेली आए।'

यह घोषणा चुप्पी में सुनी गई। श्रीमती वेलैंड ने हार मानकर आह भरी, और मे उठकर फ़र्श पर बिखरे अख़बार समेटने चली गई। 'करना तो पड़ेगा ही,' श्रीमती लवेल मिंगट ने ऐसे कहा मानो कोई विरोध कर दे तो अच्छा। तब मे कमरे के बीच लौटकर बोली: 'बिलकुल करना चाहिए। नानी जो चाहती हैं, वह पूरा होना ही चाहिए। मौसी, तार मैं लिख दूँ? अभी भेजें तो एलेन शायद कल सुबह की गाड़ी पकड़ ले।' मे ने 'एलेन' नाम के अक्षर ऐसे साफ़-साफ़ बोले जैसे चाँदी की दो घंटियाँ बजाई हों। 'पर अभी तो भेजा नहीं जा सकता। जैस्पर और लड़का — दोनों संदेश पहुँचाने बाहर गए हैं।' मे मुस्कराकर पति की ओर मुड़ी। 'न्यूलैंड तो यहीं हैं, हर काम को तैयार। न्यूलैंड, यह तार आप भेज आएँगे? दोपहर के खाने से पहले ठीक समय मिल जाएगा।'

आर्चर तैयार हूँ कहकर उठ खड़ा हुआ; मे नानी की गुलाब-काठ की मेज़ ('बोनर दू जूर') पर बैठ अपनी बड़ी, कच्ची लिखावट में तार लिखने लगी। लिखकर सलीक़े से सुखाया और आर्चर को थमाया।

'अफ़सोस, आप और एलेन रास्ते में चूक जाएँगे।' मे ने जोड़ा, फिर माँ-मौसी की ओर मुड़ी: 'न्यूलैंड को सुप्रीम कोर्ट के पेटेंट मुक़दमे के लिए वॉशिंगटन जाना है। लवेल मामा कल रात लौट आएँगे, नानी भी सँभल गई हैं; न्यूलैंड से दफ़्तर की अहम प्रतिबद्धता छुड़वाना ठीक न होगा, है न?' मे ज़रा रुकी, जैसे जवाब की प्रतीक्षा में हो, और श्रीमती वेलैंड ने झट कहा: 'बिलकुल नहीं, बेटा। तुम्हारी नानी तो हरगिज़ नहीं चाहेंगी।'

तार लेकर आर्चर कमरे से निकल रहा था कि सास की आवाज़ कानों में पड़ी — शायद वे श्रीमती लवेल मिंगट से कह रही थीं: 'पर आख़िर वे एलेन ओलेंस्का को तार क्यों भिजवा रही हैं?' और मे की साफ़ आवाज़ ने जवाब दिया: 'शायद उसे एक बार फिर याद दिलाने को कि आख़िरकार उसका धर्म पति के साथ रहना है।' आर्चर के पीछे मुख्य द्वार बंद हुआ, और वह तेज़ क़दमों से तारघर की ओर बढ़ गया।