हिन्दी संस्करण

अध्याय 28

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'ओल... ओल... इसकी वर्तनी क्या है?' वेस्टर्न यूनियन के पीतल के काउंटर पर बैठी रूखी युवती ने पूछा, जिसे आर्चर ने पत्नी का तार थमाया था। 'ओलेंस्का। ओ-लेन-स्का।' आर्चर ने काग़ज़ वापस लेकर मे की जल्दबाज़ी भरी लिखावट के ऊपर वह विदेशी नाम साफ़-साफ़ लिखते हुए धीरे-धीरे दोहराया। 'न्यूयॉर्क के तारघर में ऐसा नाम कम दिखता है, कम-से-कम इस मोहल्ले में,' एक अप्रत्याशित आवाज़ आई। आर्चर ने मुड़कर देखा: लॉरेंस लेफ़र्ट्स कोहनी के पास खड़ा था — मूँछें ऐंठता, तार न देखने का नाटक करता। 'हैलो, न्यूलैंड। पता था तुम यहीं मिलोगे। अभी-अभी सुना कि मिंगट नानी को आघात हुआ है। घर की ओर जा रहा था कि तुम्हें इधर मुड़ते देखा और पीछे चला आया। वहीं से आ रहे हो?' आर्चर ने सिर हिलाया और तार जाली के नीचे सरका दिया। 'हालत ख़राब लगती है,' लेफ़र्ट्स बोलता गया। 'परिवार को तार भेज रहे हो, ज़ाहिर है। काउंटेस ओलेंस्का तक शामिल है, तो मामला संगीन ही होगा।' आर्चर ने होंठ भींच लिए। उस लंबे, सुंदर, अहंकारी चेहरे पर घूँसा जड़ देने की जंगली इच्छा उसके भीतर उमड़ी। 'ऐसा क्यों सोचते हो?' आर्चर ने पूछा। बहस टालने के लिए मशहूर लेफ़र्ट्स ने कटाक्ष-भरे भाव से भौंहें चढ़ाईं — चेतावनी कि काउंटर के पार बैठी युवती देख रही है। सार्वजनिक जगह पर ग़ुस्सा दिखाने से बुरा कोई 'तौर-तरीक़ा' नहीं —

वही भाव यह याद दिला रहा था। आर्चर औपचारिकताओं का पाबंद था, पर इस पल वह उनसे पूरी तरह उदासीन था। हालाँकि लेफ़र्ट्स को मारने की इच्छा क्षण-भर की थी। इस घड़ी, किसी भी बहाने एलेन ओलेंस्का का नाम लेफ़र्ट्स के साथ उछालना सोच से भी बाहर था। उसने तार का शुल्क चुकाया, और दोनों युवक साथ-साथ सड़क पर निकल आए। आर्चर ने संयत होकर कहा: 'मिंगट नानी अब काफ़ी बेहतर हैं। डॉक्टर ने कहा है, चिंता की कोई बात नहीं।' लेफ़र्ट्स ने राहत के उद्गार बरसाए, फिर पूछा

कि क्या उसने ब्यूफ़र्ट के बारे में घूम रही नई ज़हरीली अफ़वाहें सुनी हैं। उसी दोपहर ब्यूफ़र्ट बैंक के दिवालियेपन की ख़बर सारे अख़बारों में छप गई। इस ख़बर ने मिंगट नानी के आघात को ढँक लिया; दोनों का सूक्ष्म संबंध जानने वाले गिने-चुने ही सोच सके कि उनकी बीमारी सिर्फ़ बुढ़ापे का नतीजा नहीं होगी। पूरा न्यूयॉर्क ब्यूफ़र्ट की बदनामी से म्लान हो गया। श्री लेटरब्लेयर के अनुसार, इतना संगीन मामला उनकी स्मृति में नहीं था। पतन अटल होने के बाद भी बैंक पूरा एक दिन पैसा लेता रहा; और ग्राहक ज़्यादातर प्रतिष्ठित घरानों से थे, सो ब्यूफ़र्ट की दोमुँही चाल और भी नीच लगी। श्रीमती ब्यूफ़र्ट ने इस 'दुर्भाग्य' (शब्द उन्हीं का था) को 'दोस्ती की परीक्षा' न कहा होता, तो उन पर तरस उनके पति पर ग़ुस्से को कुछ नरम कर देता। पर आधी रात श्रीमती मैनसन मिंगट के घर जाने का उनका मक़सद खुलने के बाद, माना गया कि उनकी बेशर्मी पति से भी बढ़कर है। ऊपर से उनके पास 'विदेशी होने' का बहाना भी नहीं था; और उनके निंदकों को यह बहाना सुनने का

संतोष भी नसीब न हुआ। हाँ, ब्यूफ़र्ट का विदेशी होना (जिनके शेयर दाँव पर नहीं थे, उनके लिए) कुछ हद तक तसल्ली की बात थी। पर जब दक्षिणी कैरोलाइना वाले डलास ने पूरे मामले को हल्के में लेते हुए बेधड़क कहा कि वह 'फिर खड़ा हो जाएगा', तो यह तर्क भी दम तोड़ गया। अंततः इस घटना को विवाह-बंधन की अटूटता का भयावह उदाहरण मानकर स्वीकारना ही पड़ा। समाज को अब ब्यूफ़र्ट दंपती के बिना जीने का रास्ता ढूँढ़ना था। बस इतना ही। सिवा इस विपदा के अभागे शिकारों के: मेडोरा मैनसन, बेचारी लैनिंग बहनें, और अच्छे घरानों की कुछ और भटकी हुई महिलाएँ — जिन्होंने हेनरी वान डेर लूयडेन की सलाह मानी होती तो यह दिन न देखना पड़ता... 'ब्यूफ़र्ट दंपती के लिए सबसे समझदारी की बात यह होगी,' श्रीमती आर्चर ने निदान और नुस्ख़ा एक साथ लिखने वाले चिकित्सक के अंदाज़ में कहा, 'कि रेजिना के उत्तरी कैरोलाइना वाले छोटे घर में जाकर रहें। ब्यूफ़र्ट हमेशा रेस के अस्तबल रखता आया है; अब चाल-घोड़े पाले तो बेहतर। मेरे ख़याल से उसमें अच्छे घोड़ों के सौदागर के सारे गुण हैं।' सबने हामी भरी, पर

किसी ने यह पूछने की ज़हमत न उठाई कि ब्यूफ़र्ट दंपती असल में क्या करने वाले हैं। अगले दिन श्रीमती मैनसन मिंगट की हालत काफ़ी सुधर गई। आवाज़ लौट आई, और उन्होंने हुक्म दिया कि अब उनके सामने ब्यूफ़र्ट दंपती का ज़िक्र न हो; और डॉ. बेनकॉम के आने पर पूछा कि परिवार उनकी सेहत को लेकर इतना हंगामा क्यों मचा रहा है। 'मेरी उम्र में रात को चिकन सलाद खाओ तो और क्या उम्मीद थी?' डॉक्टर ने झट उनका आहार सुधार दिया, और आघात महज़ बदहज़मी में बदल गया। पर दृढ़ लहजे के बावजूद कैथरीन नानी जीवन के प्रति अपना पुराना रवैया पूरी तरह नहीं लौटा पाईं। बुढ़ापे का बढ़ता एकांत, पड़ोसियों के प्रति जिज्ञासा भले कम न करे, दूसरों के दुख के लिए उनकी पहले से ही अल्प करुणा को और कुंद कर चुका था; और ब्यूफ़र्ट दंपती की तबाही उनके मन से आसानी से मिट गई। पर पहली बार वे अपने लक्षणों में डूब गईं और अब तक उपेक्षित रहे कुछ परिजनों में भावुक दिलचस्पी लेने लगीं। ख़ासकर श्री वेलैंड को उनका ध्यान पाने का सौभाग्य मिला। दामादों में वही सबसे अनदेखा रहा था; पत्नी जब-जब उन्हें दृढ़ चरित्र और असाधारण बुद्धि का धनी बताती — 'चाहते तो कर दिखाते' — नानी उपहास भरी हँसी से उड़ा देतीं। पर अब उनकी रुग्णता दिलचस्पी की चीज़ बन गई। मिंगट नानी ने साम्राज्ञी की तरह फ़रमान जारी किया कि बुख़ार उतरते ही वे आकर आहार का मिलान करें — क्योंकि अब कैथरीन नानी सबसे पहले मानने वालों में थीं कि शरीर के तापमान के मामले में सावधानी कभी ज़्यादा

नहीं होती। ओलेंस्का को भेजे तार के चौबीस घंटे के भीतर ख़बर आई कि वह अगले दिन शाम वॉशिंगटन से पहुँचेगी। उस समय वेलैंड के घर दोपहर का खाना खा रहे आर्चर दंपती के सामने सवाल उठा कि जर्ज़ी सिटी स्टेशन कौन जाएगा; और सीमा-चौकी जैसे घिरे वेलैंड घराने की भौतिक दुश्वारियों ने बहस गरमा दी। श्रीमती वेलैंड नहीं जा सकती थीं: उन्हें उसी दोपहर पति के साथ कैथरीन नानी के यहाँ जाना था। ब्रूम गाड़ी भी नहीं दी जा सकती थी, क्योंकि आघात के बाद पहली बार सास से मिलकर श्री वेलैंड विचलित हो जाएँ, तो उन्हें फ़ौरन घर पहुँचाना पड़ सकता था। वेलैंड के बेटे 'शहर में' होंगे, श्री लवेल मिंगट शिकार से लौटने की जल्दी में थे और मिंगट गाड़ी उन्हें लेने जाएगी; और ढलती सर्दियों की शाम मे को अकेले — भले अपनी ही गाड़ी में — फ़ेरी से जर्ज़ी सिटी भेजना सोचा भी नहीं जा सकता था। पर परिवार से कोई एलेन को स्टेशन पर न मिले, तो यह रूखापन लगेगा — कैथरीन नानी की स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध। परिवार को ऐसे धर्मसंकट में डालना एलेन जैसों का ही काम है, श्रीमती वेलैंड की थकी आवाज़ ने जताया। 'हमेशा यही होता है। एक बात ख़त्म होती है तो दूसरी आ जाती है,' उन्होंने नियति के विरुद्ध अपने दुर्लभ विद्रोहों में से एक में शिकवा किया। 'माँ की हालत डॉ. बेनकॉम के मानने से ज़्यादा ख़राब है — यह सोचने की मेरे पास एक ही वजह है:

मिलना इतना असुविधाजनक होते हुए भी एलेन को फ़ौरन बुलाने की यह रुग्ण ललक।' ये शब्द जल्दबाज़ी में, बिना तौले निकल गए थे, और श्री वेलैंड ने तीखी प्रतिक्रिया दी। 'ऑगस्टा,' उन्होंने पीले पड़ते हुए काँटा रखकर पूछा, 'क्या तुम्हारे पास कोई और वजह है यह मानने की कि बेनकॉम अब पहले जैसे भरोसे के लायक़ नहीं? क्या तुम्हें लगा कि वे मेरी बीमारी या तुम्हारी माँ की बीमारी को पहले से कम लगन से देख रहे हैं?' अब पीला पड़ने की बारी श्रीमती वेलैंड की थी — चूक के अनंत परिणाम आँखों के आगे घूम गए। पर वे हँसी जुटा लाईं, सीप दुबारा परोसी, और पुराना कवच ओढ़ते हुए बोलीं: 'यह आप कैसे सोच सकते हैं, जी? मेरा मतलब बस यह था कि माँ ने जब इतनी दृढ़ता से कहा था कि एलेन का धर्म पति के पास लौटना है, तो अचानक उसे देखने की यह ज़िद अजीब है — जबकि बुलाने को छह और नाती-पोते हैं। पर हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि माँ, अपनी अद्भुत जीवनी-शक्ति के बावजूद, अब बहुत वृद्ध हैं।' श्री वेलैंड का माथा अब भी बादलों से घिरा था; साफ़ था कि उनकी विचलित कल्पना पत्नी के आख़िरी वाक्य से चिपक गई थी। 'हाँ, तुम्हारी माँ बहुत वृद्ध हैं। और हो सकता है बेनकॉम बहुत वृद्ध मरीज़ों में उतने सफल न हों। जैसा तुम कहती हो, हमेशा एक बात ख़त्म होती है तो दूसरी आती है। दस-पंद्रह साल में मुझे नया डॉक्टर ढूँढ़ने का सुखद दायित्व निभाना होगा। ऐसे बदलाव सचमुच ज़रूरी होने से पहले कर लेना ही अच्छा।' और यह स्पार्टा-सा संकल्प लेकर श्री वेलैंड ने मज़बूती से काँटा

थाम लिया। 'पर जो भी सोचूँ,' श्रीमती वेलैंड ने भोजन की मेज़ से उठकर, घर के भीतर बैंगनी साटन और मैलाकाइट से सजे बैठकख़ाने की ओर ले जाते हुए फिर कहा, 'समझ नहीं आता कल शाम एलेन को लाया कैसे जाएगा। और मुझे चैन तभी मिलता है जब चीज़ें कम-से-कम चौबीस घंटे पहले तय हो जाएँ।' आर्चर, गोमेद के पदकों से जड़े अठकोने आबनूसी चौखटे में मढ़ी उस छोटी तस्वीर से — जिसमें दो कार्डिनल रंगरलियाँ मनाते मदिरा पी रहे थे — मुग्ध निगाहें हटाकर मुड़ा। 'मैं ले आऊँ? मे गाड़ी फ़ेरी तक भिजवा दे, तो दफ़्तर से समय पर निकलने में कोई दिक़्क़त नहीं होगी।' उसका दिल उत्तेजना से धड़क रहा था। श्रीमती वेलैंड ने राहत की साँस छोड़ी, और खिड़की के पास खड़ी मे ने मुड़कर उस पर अनुमोदन की रोशनी डाली। 'देखिए न माँ, इस तरह सब कुछ चौबीस घंटे पहले तय हो गया,' मे ने माँ के चिंतित माथे पर झुककर चुंबन

दिया। मे की ब्रूम गाड़ी दरवाज़े पर खड़ी थी; उसे आर्चर को यूनियन स्क्वायर तक छोड़ना था, जहाँ से वह ब्रॉडवे की ट्राम लेकर दफ़्तर जा सकता था। गाड़ी के कोने में बैठते हुए मे ने कहा: 'माँ को और परेशान नहीं करना चाहती थी, इसलिए वहाँ नहीं कहा — पर कल तो आपको वॉशिंगटन जाना है, फिर एलेन को कैसे लाएँगे?' 'अरे, मैं नहीं जा रहा,' आर्चर ने जवाब दिया। 'नहीं जा रहे? क्यों, क्या हुआ?' उसकी आवाज़ घंटी-सी साफ़ थी, पत्नी-सुलभ चिंता से भरी। 'मुक़दमा टल गया। स्थगित हो गया।' 'स्थगित? कैसी अजीब बात! आज सुबह मैंने माँ के पास श्री लेटरब्लेयर की चिट्ठी देखी — लिखा था कि वे कल उस बड़े पेटेंट मुक़दमे के लिए वॉशिंगटन जा रहे हैं, जिसकी पैरवी उन्हें सुप्रीम कोर्ट में करनी है। आपने भी तो पेटेंट मुक़दमा ही कहा था न?' 'हाँ, वही तो। पर पूरा दफ़्तर तो नहीं जा सकता। लेटरब्लेयर साहब ने आज सुबह ख़ुद जाने का फ़ैसला किया।' 'तो मुक़दमा स्थगित नहीं हुआ?' उसकी यह ज़िद उसकी आदत से इतनी अलग थी कि आर्चर का चेहरा तप गया — मानो शिष्टता की मर्यादा के इस अभूतपूर्व उल्लंघन पर वह उसकी जगह ख़ुद लजा रहा हो। 'नहीं, मुक़दमा स्थगित नहीं हुआ।

स्थगित मेरा जाना हुआ है,' उसने जवाब दिया — वॉशिंगटन की घोषणा के साथ दिए अपने सारे फ़ालतू ब्योरों को कोसते हुए; और कहीं पढ़ा वाक्य याद आया: चतुर झूठा ब्योरे गिनाता है, सबसे चतुर कुछ नहीं गिनाता। मे से झूठ बोलना उतना नहीं चुभा जितना यह देखना कि वह झूठ भाँपकर भी अनजान बनी हुई है। 'मैं बाद में जाऊँगा। मेरा न जाना तुम्हारे परिवार के लिए ग़नीमत ही रहा, देखो न,' वह व्यंग्य की ओट में कायरता से छिपते हुए बोला। बोलते-बोलते उसे लगा कि वह उसे देख रही है, और नज़र चुराता न दिखे, इसलिए उसने उसकी आँखों में आँखें डाल दीं। पल-भर दोनों एक-दूसरे को ताकते रहे; और शायद दोनों ने एक-दूसरे के भीतर उससे ज़्यादा झाँक लिया जितना दोनों चाहते थे। 'हाँ, यह तो सचमुच बड़ा सुभीता हो गया,' मे ने खिले स्वर में हामी भरी। 'आप एलेन को ला सकेंगे; देखा न, माँ आपके प्रस्ताव से कितनी कृतज्ञ हुईं।' 'मैं भी ख़ुशी से ही कर रहा हूँ।' गाड़ी रुकी, वह कूदकर उतरा; उसने झुककर अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। 'अच्छा, जाइए।' उसकी आँखें इतनी नीली थीं कि आर्चर बाद में सोचता रह गया — कहीं वे आँसुओं के पार तो नहीं चमक रही थीं।

वह मुड़ा और तेज़ क़दमों से यूनियन स्क्वायर पार करने लगा, भीतर भजन-सा दोहराता: 'जर्ज़ी सिटी से नानी के घर तक पूरे दो घंटे। पूरे दो घंटे... शायद ज़्यादा।'