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अध्याय 29

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मे की गहरे नीले रंग की बग्घी (हनीमून की यात्रा की चमक अब भी उस पर थी) आर्चर को फ़ेरी घाट पर लेने आई और आराम से जर्सी सिटी के पेन्सिलवेनिया टर्मिनल तक ले गई। वह बर्फ़ीली, उदास दोपहर थी; गूँजते हुए विशाल स्टेशन में गैस की बत्तियाँ जल चुकी थीं। वॉशिंगटन एक्सप्रेस की प्रतीक्षा में प्लेटफ़ॉर्म पर टहलते हुए आर्चर को याद आया कि कुछ लोग मानते हैं कि एक दिन हडसन के नीचे बनी सुरंग पेन्सिलवेनिया की गाड़ियों को सीधे न्यूयॉर्क तक ले आएगी। यही वे स्वप्नदर्शी थे जो पाँच दिन में अटलांटिक पार करने वाले जहाज़ों, उड़ने वाली मशीन, बिजली की रोशनी और बिना तार के टेलीफ़ोन की भविष्यवाणी करते थे। 'उनकी कोई भी भविष्यवाणी सच हो जाए,' आर्चर ने सोचा, 'बस वह सुरंग अभी न बने।' इसी बचकानी खुशी में उसने कल्पना की कि मैडम ओलेंस्का गाड़ी से उतर रही हैं। वह उन्हें सैकड़ों बेमानी चेहरों के बीच पहचान लेगा, वे उसकी बाँह का सहारा लेंगी, और वह उन्हें गाड़ी तक ले जाएगा। फिर फिसलन भरी ढलान से घाट तक की धीमी उतराई: फिसलते घोड़े, लदी हुई गाड़ियाँ और चिल्लाते कोचवान। और अंत में फ़ेरी पर वह अचरज भरा ठहराव: दोनों निश्चल गाड़ी में साथ बैठे हैं, और नीचे धरती बही जा रही है, मानो सूरज के दूसरे छोर की ओर लुढ़क रही हो। उसके पास उनसे कहने को अनगिनत बातें थीं, और वे सब उसके होंठों पर चमकती हुई कतार में खड़ी थीं...

गाड़ी की गड़गड़ाहट और चरचराहट पास आती गई; इंजन डगमगाता हुआ स्टेशन में घुसा, जैसे कोई दैत्य अपना शिकार लेकर अपनी माँद में लौट रहा हो। आर्चर भीड़ चीरता हुआ आगे बढ़ा और डिब्बों की ऊँची खिड़कियों में एक-एक कर देखता रहा। फिर अचानक, बिलकुल पास, मैडम ओलेंस्का का पीला, चकित चेहरा दिखा; और उनका चेहरा भूल जाने की लज्जा फिर उस पर छा गई। दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़े, हाथ मिले; आर्चर ने उनकी बाँह थामी और उन्हें आगे ले चला। 'इधर से। गाड़ी तैयार है,' उसने कहा।

इसके बाद सब कुछ ठीक वैसा ही हुआ जैसा उसने सपने में देखा था। उसने उनका सामान लिया और उन्हें बग्घी में बिठाया; बाद में उसे धुँधला-सा याद रहा कि उसने नानी के बारे में तसल्ली दी और बोफ़र के हाल का संक्षेप में ज़िक्र किया। ('बेचारी रेजाइना...' कहते समय उनकी आवाज़ की कोमलता ने उसे भीतर तक छू लिया।) इसी बीच गाड़ी स्टेशन की अफ़रा-तफ़री से निकलकर फिसलन भरी ढलान से घाट की ओर उतरने लगी: डगमगाती कोयला-गाड़ियों, बिदके घोड़ों और एक खाली शव-वाहन के बीच से। ओह, वह शव-वाहन! जब वह पास से गुज़रा तो मैडम ओलेंस्का ने आँखें मूँद लीं और आर्चर का हाथ कस लिया। 'उस शव-वाहन का मतलब यह तो नहीं कि बेचारी नानी...?' 'अरे नहीं, नहीं। वे तो अब बहुत बेहतर हैं। देखिए, वह निकल भी गया!' आर्चर ने ऐसे कहा मानो इससे सब ठीक हो जाएगा। उनका हाथ अब भी उसके हाथ में था; और जब गाड़ी तख़्तों के पुल से फ़ेरी पर चढ़ी, तो वह झुका, उनका भूरा दस्ताना उतारा और हथेली को यों चूमा जैसे कोई पवित्र वस्तु। वे हल्के से मुस्कराईं और हाथ खींच लिया। उसने कहा:

'आपको आज मेरे आने की उम्मीद नहीं थी, है ना?' 'सचमुच नहीं थी।' 'दरअसल मैं आपसे मिलने वॉशिंगटन आने वाला था। सब तय था... थोड़े में हम रास्ते में चूक जाते।' 'ओह...' वे धीरे से बोलीं, मानो बाल-बाल टली किसी नियति से डर गई हों। 'जानती हैं? मुझे आपका चेहरा लगभग याद ही नहीं रहा था।' 'लगभग याद नहीं रहा था?' 'नहीं, मेरा मतलब है... कैसे समझाऊँ? मेरे साथ हमेशा ऐसा ही है। हर बार आपको देखना पहली बार जैसा होता है।' 'हाँ, मैं जानती हूँ। मेरे साथ भी ऐसा ही है!' 'आपके साथ भी? मेरे लिए भी?' उसने ज़ोर देकर पूछा। वे खिड़की से बाहर देखती रहीं और सिर हिला दिया। 'एलेन... एलेन... एलेन!' उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, और आर्चर चुपचाप बैठा काँच के पीछे बर्फ़ीले धुँधलके में उनका चेहरा मिटते देखता रहा। इन चार लंबे महीनों में उन्होंने क्या किया होगा, उसने सोचा। आख़िर वे एक-दूसरे को कितना कम जानते थे! अनमोल पल फिसल रहे थे, और वह सारी कहने की बातें भूल चुका था; बस असहाय-सा सोचता रहा कि दूर और पास होना एक साथ कैसे संभव है — वही पहेली, कि दोनों इतने पास बैठे थे पर एक-दूसरे का चेहरा नहीं देख पा रहे थे।

'कितनी सुंदर गाड़ी है! क्या मे की है?' उन्होंने अचानक खिड़की से नज़र हटाकर पूछा। 'हाँ।' 'तो मे ने ही आपको मुझे लेने भेजा? कितनी भली है वह!' आर्चर पल भर चुप रहा, फिर जैसे फट पड़ा: 'बॉस्टन में हमारी मुलाक़ात के अगले दिन आपके पति का सचिव मुझसे मिलने आया था।' उसने उन्हें लिखे छोटे-से पत्र में मस्यू रिवियेर की उस भेंट का ज़िक्र नहीं किया था। वह उस बात को दबा देना चाहता था; पर मे की गाड़ी के उनके उल्लेख ने उसमें बदले की एक इच्छा जगा दी। वह देखना चाहता था कि रिवियेर का नाम उन पर वही असर करता है या नहीं जो मे का नाम उस पर करता था। जैसे पहले भी कुछ मौकों पर उनकी शांति डिगाने की कोशिश में हुआ था, उन्होंने इस बार भी कोई आश्चर्य नहीं दिखाया। आर्चर ने तुरंत नतीजा निकाला: 'तो वह उन्हें पत्र लिखता है।' 'मस्यू रिवियेर आपसे मिलने आए थे?' 'हाँ। क्या आपको मालूम नहीं था?' 'नहीं,' उन्होंने सहज भाव से कहा। 'और आपको आश्चर्य भी नहीं हुआ?' वे ज़रा झिझकीं। 'मुझे आश्चर्य क्यों हो? बॉस्टन में उन्होंने बताया था कि वे आपको जानते हैं। शायद इंग्लैंड में मिले थे आप दोनों।'

'एलेन, मुझे आपसे एक बात पूछनी है।' 'पूछिए।' 'उनसे मिलने के बाद से पूछना चाहता था, पर पत्र में नहीं लिख सका। जब आपने अपने पति का घर छोड़ा... तो भागने में मदद करने वाले रिवियेर ही थे?' आर्चर का दिल फटने को था। क्या वे इस प्रश्न का उत्तर भी उसी शांति से देंगी? 'हाँ, मैं उनकी बहुत ऋणी हूँ,' उन्होंने बिना ज़रा भी काँपे उत्तर दिया। उनका स्वर इतना स्वाभाविक था, लगभग उदासीन, कि आर्चर के भीतर का तूफ़ान शांत हो गया। एक बार फिर उन्होंने अपनी सीधी-सादी सच्चाई से उसे ठीक उसी क्षण मूर्ख और रूढ़िवादी महसूस करा दिया जब वह समझ रहा था कि वह सारी रूढ़ियाँ लाँघ रहा है। 'मुझे लगता है आप मेरी देखी हुई सबसे ईमानदार स्त्री हैं!' आर्चर ने कहा। 'नहीं। बस मैं ज़रा कम बाल की खाल निकालती हूँ,' उन्होंने मुस्कराते स्वर में कहा। 'जो कहिए: आप चीज़ों को जैसी हैं वैसी देखती हैं।' 'ओह, मुझे देखना ही पड़ा। मुझे गॉर्गन के चेहरे में सीधे देखना पड़ा।' 'पर आप अंधी तो नहीं हुईं! आख़िर आपने जान लिया कि वह गॉर्गन भी बाकी सबकी तरह एक पुराना हौवा भर है।'

'गॉर्गन अंधा नहीं करता। पर वह आँसू सुखा देता है।' इस उत्तर ने आर्चर के होंठों पर आई विनती रोक दी। यह अनुभव की उस गहराई से आया था जहाँ उसकी पहुँच नहीं थी। फ़ेरी की धीमी यात्रा समाप्त हुई; उसका अगला हिस्सा घाट के खंभों से टकराया और झटके से गाड़ी हिली, जिससे दोनों एक-दूसरे से टकरा गए। आर्चर ने काँपते हुए उनके कंधे का दबाव महसूस किया और सहज भाव से अपनी बाँह उनकी कमर के गिर्द डाल दी। 'अगर आप अंधी नहीं हैं तो देख रही होंगी कि यह ऐसे नहीं चल सकता।' 'क्या नहीं चल सकता?' 'यह साथ होकर भी साथ न होना।' 'सच है। आपको आज नहीं आना चाहिए था,' उनकी आवाज़ बदल गई। फिर अचानक वे मुड़ीं, उसकी बाँहों में आ गिरीं और अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। ठीक उसी क्षण गाड़ी चल पड़ी और घाट की गैस-बत्ती की रोशनी खिड़की से भीतर आ पड़ी। वे अलग हट गईं, और दोनों चुप बैठे रहे जबकि गाड़ी घाट की भीड़ चीरती रही।

गली में पहुँचते ही आर्चर जल्दी-जल्दी बोला: 'मुझसे मत डरिए। आपको यों कोने में सिमटने की ज़रूरत नहीं। मैं चोरी का चुंबन नहीं चाहता था। देखिए, मैं आपके कोट की आस्तीन तक छूने की कोशिश नहीं कर रहा। यह मत समझिए कि मैं नहीं समझता कि आप हमारे बीच के इस भाव को एक साधारण छिपे प्रेम-प्रसंग में क्यों नहीं गिरने देना चाहतीं। कल मैं यह नहीं कह सकता था। दूर रहते हुए आपसे मिलने का विचार मेरे हर विचार को एक विशाल लौ में जला डालता है। पर जब आप आती हैं, तो आप उससे कहीं अधिक निकलती हैं जितना मुझे याद था; और मैं आपसे जो चाहता हूँ वह भी बीच-बीच में मिलने वाले एक-दो घंटों से कहीं अधिक है, जिनके बीच बस प्यास के रेगिस्तान पड़े हों। इसीलिए मैं अभी यों चुपचाप आपके पास बैठ सकता हूँ, मन में वह दूसरा चित्र लिए: साथ रहने का चित्र — और यह विश्वास कि वह चित्र सच होगा, मेरे लिए काफ़ी है।' वे कुछ देर चुप रहीं, फिर लगभग फुसफुसाकर बोलीं: 'यह विश्वास कि वह सच होगा, इसका क्या अर्थ है?' 'आप भी जानती हैं कि वह होगा, है ना?' 'आपका और मेरा साथ होना?' उन्होंने एक छोटी, तीखी हँसी हँस दी। 'यह कहने के लिए आपने कितनी अच्छी जगह चुनी!' 'क्योंकि हम मेरी पत्नी की गाड़ी में हैं? तो उतरकर पैदल चलें? थोड़ी बर्फ़ से आपको एतराज़ नहीं होगा।' वे और नरमी से हँसीं। 'नहीं, मैं उतरकर नहीं चलूँगी। अभी मेरा काम है जल्द से जल्द नानी तक पहुँचना। और आप मेरे पास बैठे रहेंगे। हम सपनों को नहीं, सच्चाइयों को देखेंगे।' 'मैं नहीं जानता आप किसे सच्चाई कहती हैं। मेरे लिए एकमात्र सच्चाई यही क्षण है।' उन्होंने एक लंबी चुप्पी से उत्तर दिया; इसी बीच गाड़ी एक अँधेरी गली से निकलकर

रोशन फ़िफ़्थ एवेन्यू में मुड़ गई। 'तो आपका मतलब है कि चूँकि मैं आपकी पत्नी नहीं बन सकती, इसलिए मुझे आपकी रखैल बनकर रहना चाहिए?' उन्होंने पूछा। इस नंगे प्रश्न ने आर्चर को हिला दिया। उसके वर्ग की स्त्रियाँ इस विषय को छूते समय भी उस शब्द से बचती थीं। पर मैडम ओलेंस्का ने उसे यों बोला जैसे वह उनकी शब्दावली का सहज हिस्सा हो। आर्चर ने सिहरकर सोचा कि जिस भयानक जीवन से वे भागी थीं, वहाँ यह शब्द कितना आम रहा होगा। उस प्रश्न ने उसे अचानक यथार्थ में लौटा दिया; वह हकलाया: 'मैं... मैं बस आपके साथ ऐसी जगह जाना चाहता हूँ जहाँ ये वर्गीकरण न हों, ये शब्द न हों। जहाँ हम बस दो प्राणी हों जो एक-दूसरे से पूरा प्रेम करते हैं। जहाँ हम एक-दूसरे के लिए पूरा जीवन हों, और किसी चीज़ का महत्व न हो।' उन्होंने गहरी साँस ली, फिर फिर हँस पड़ीं। 'ओह मेरे प्रिय, वह देश कहाँ है? क्या आप कभी वहाँ गए हैं?' उन्होंने पूछा। आर्चर के उदास मौन पर वे बोलती रहीं: 'मैंने कई लोगों को उसे ढूँढ़ते देखा है। और वे सब गलत स्टेशन पर उतरे: बूलोन में, पीसा में, मोंटे कार्लो में। और वह जगह उस पुरानी दुनिया से ज़रा भी अलग नहीं थी जिसे वे छोड़ आए थे। बस छोटी, मैली और अधिक अस्तव्यस्त थी।' उसने उन्हें पहली बार ऐसे बोलते सुना

और उसे उनका अभी-अभी कहा वाक्य याद आया। 'हाँ, गॉर्गन ने सचमुच आपके आँसू सुखा दिए हैं,' आर्चर ने कहा। 'सच है। उसने मेरी आँखें भी खोल दीं। यह कहना भ्रम है कि वह अंधा करता है। वह तो उलटा करता है: वह पलकों को खुला रखता है, ताकि आप फिर कभी उस सुखद अँधेरे में न लौट सकें। क्या चीन में ऐसी कोई यातना नहीं थी? होनी चाहिए। ओह, वह सचमुच एक दयनीय, तुच्छ देश है!' गाड़ी बयालीसवीं स्ट्रीट पार कर उत्तर की ओर दौड़ रही थी; मे का ताक़तवर घोड़ा किसी केंटकी नस्ल के घोड़े-सा भाग रहा था। आर्चर बर्बाद हो रहे समय और खोखले शब्दों से घुट रहा था। 'तो हमारे लिए आपकी योजना क्या है?' उसने पूछा। 'हमारे लिए? उस अर्थ में कोई हम है ही नहीं! हम एक-दूसरे के पास तभी हैं जब दूर हैं। तभी हम अपने असली रूप में रह सकते हैं। वरना हम बस मे के पति न्यूलैंड आर्चर और न्यूलैंड आर्चर की पत्नी की चचेरी बहन एलेन ओलेंस्का रह जाएँगे — दो लोग जो अपने पर भरोसा करने वालों की पीठ पीछे सुख ढूँढ़ रहे हैं।' 'ओह, मैं तो वह रेखा कब की पार कर चुका हूँ,' आर्चर कराहा। 'नहीं, आपने नहीं की! आपने कभी नहीं की। पर मैंने की है,' उन्होंने एक अजनबी स्वर में कहा, 'और मैं जानती हूँ उस पार का दृश्य कैसा है।'

वह चुप बैठा रहा, एक अकथ पीड़ा से सुन्न। फिर अँधेरे में उसने वह छोटी घंटी टटोली जो कोचवान को रुकने का संकेत देती थी। उसे याद आया कि मे दो बार घंटी बजाती थी। उसने घंटी खींची, और गाड़ी फुटपाथ के किनारे रुक गई। 'हम क्यों रुके? यह तो नानी का घर नहीं है,' मैडम ओलेंस्का ने चौंककर कहा। 'नहीं, मैं यहीं उतर रहा हूँ,' उसने हकलाकर कहा, दरवाज़ा खोला और फुटपाथ पर कूद गया। बत्ती की रोशनी में उसने उनका चकित चेहरा और उसे रोकने को उठा उनका हाथ देखा। उसने दरवाज़ा बंद किया और पल भर खिड़की पर झुका रहा।

'आप ठीक कहती हैं। मुझे आज नहीं आना चाहिए था,' उसने धीमे स्वर में कहा ताकि कोचवान न सुन सके। वे आगे झुकीं, मानो कुछ कहने वाली हों। पर वह पहले ही गाड़ी को चलने का आदेश दे चुका था; गाड़ी चल दी और वह कोने पर खड़ा रह गया। बर्फ़ थम चुकी थी और एक तीखी हवा उसके चेहरे पर चाबुक-सी पड़ी। अचानक आर्चर को अपनी पलकों पर कुछ जमा हुआ महसूस हुआ। उसने समझा कि वह रोया था और हवा ने उसके आँसू जमा दिए थे। उसने हाथ जेबों में डाले और तेज़ क़दमों से फ़िफ़्थ एवेन्यू से होते हुए घर की ओर चल पड़ा।