हिंदी संस्करण

अध्याय 3

श्रीमती बेनेट ने पाँचों बेटियों की मदद से चाहे जितना कुरेदा, पति से मिस्टर बिंगली के बारे में मन-भर बात नहीं निकाल पाईं। महिलाओं ने सीधे सवाल किए, चतुर अटकलें लगाईं, घुमा-फिराकर टोह भी ली। हर हुनर आज़माया, पर वे हर बार बच निकले। आख़िर सबको पड़ोसन लेडी लुकास से सुनी बातों से ही संतोष करना पड़ा। लेडी लुकास की राय मिस्टर बिंगली के बारे में बहुत अच्छी थी। सर विलियम तो उन पर मुग्ध थे। वे बहुत जवान थे, बेहद सुंदर, और बेहद मिलनसार। और सबसे बढ़कर, अगले नाच में वे बड़ा दल साथ लाने वाले थे। इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या होती! नाच पसंद होना, प्रेम में पड़ने की ओर पक्का क़दम था। मिस्टर बिंगली का दिल जीतने की उम्मीदें ख़ूब परवान चढ़ीं। 'बस हमारी एक बेटी नेदरफ़ील्ड में सुख से बस जाए, और बाक़ी बच्चियाँ भी वैसे ही अच्छे घर पा जाएँ,' श्रीमती बेनेट ने पति से कहा, 'तो मुझे और कुछ नहीं चाहिए।' कुछ दिन बाद मिस्टर बिंगली, मिस्टर बेनेट की भेंट का जवाब देने आए। कोई दस मिनट वे लाइब्रेरी में रहे। जिन युवा कुमारियों की सुंदरता के चर्चे थे, उन्हें देखने की आस उन्हें भी रही होगी, पर भेंट हुई सिर्फ़ पिता से। महिलाएँ कुछ ज़्यादा भाग्यशाली रहीं। ऊपर की खिड़की से उन्होंने देख लिया कि वे नीला कोट पहने थे और काले घोड़े पर सवार थे। थोड़े दिन बाद रात के भोजन का न्योता भेजा गया। श्रीमती बेनेट ने वे पकवान भी सोच रखे थे, जिनसे उनके घर-संभाल का हुनर चमकता। पर जवाब ऐसा आया कि सब टालना पड़ा। मिस्टर बिंगली को अगले ही दिन लंदन जाना था, सो वे यह आदर-भरा न्योता स्वीकार नहीं कर सकते थे। श्रीमती बेनेट सकपका गईं। हर्टफ़र्डशायर आए अभी दिन ही कितने हुए, लंदन में भला उनका क्या काम? चिंता होने लगी — कहीं यह आदमी नेदरफ़ील्ड में टिकने के बजाय यों ही इधर-उधर उड़ता न फिरे। लेडी लुकास ने कहा, वे शायद नाच के लिए बड़ा दल जुटाने ही लंदन गए हैं। इस बात से चिंता कुछ ठंडी पड़ी। जल्द ही ख़बर उड़ी कि मिस्टर बिंगली बारह महिलाएँ और सात पुरुष साथ लाएँगे। बेनेट बेटियों ने इतनी महिलाओं की गिनती पर मातम मनाया। पर नाच से एक दिन पहले सुना कि लंदन से बारह नहीं, केवल छह महिलाएँ आ रही हैं — पाँच बहनें और एक चचेरी बहन। तब कहीं जाकर चैन पड़ा। और जब वह दल हॉल में दाख़िल हुआ, तो कुल पाँच ही लोग निकले: मिस्टर बिंगली, उनकी दो बहनें, सबसे बड़ी बहन के पति, और एक और नौजवान।

मिस्टर बिंगली सुंदर और सज्जन पुरुष थे। चेहरा भला, अंदाज़ सहज और बिना बनावट का। उनकी बहनें नफ़ासत की छाप लिए सुंदर स्त्रियाँ थीं। बहनोई मिस्टर हर्स्ट बस देखने-भर को सज्जन लगते थे। पर उनके मित्र मिस्टर डार्सी की बात ही और थी। लंबा-छरहरा क़द, सुंदर नैन-नक़्श, और चाल-ढाल में रईसी। जल्द ही हॉल की हर नज़र उन्हीं पर टिक गई। आए पाँच मिनट भी नहीं हुए थे कि चारों ओर ख़बर फैल गई — सालाना आमदनी दस हज़ार पाउंड! पुरुष बोले, क़द-काठी शानदार है। महिलाएँ कह उठीं कि ये तो मिस्टर बिंगली से भी कहीं ज़्यादा सुंदर हैं। आधी शाम तक सब उन्हें सराहती आँखों से देखते रहे। पर फिर उनके ढंग की चुभन ने सारा रंग पलट दिया। खुल गया कि वे घमंडी हैं, जुटे लोगों को अपने से नीचा समझते हैं, और किसी बात से ख़ुश होने का इरादा नहीं रखते। डर्बीशायर की बड़ी जागीर भी उन्हें बचा न सकी। तय हो गया कि उनका चेहरा बेहद रूखा और अप्रिय है, और वे अपने मित्र की बराबरी के लायक़ नहीं। मिस्टर बिंगली ने जल्द ही हॉल के सब ख़ास लोगों से जान-पहचान कर ली। वे ज़िंदादिल थे, बेतकल्लुफ़ भी। एक भी नाच नहीं छोड़ा। अफ़सोस जताया कि नाच इतनी जल्दी ख़त्म हो गया। यहाँ तक कहा कि वे ख़ुद नेदरफ़ील्ड में नाच रखेंगे। ऐसे प्यारे स्वभाव को किसी सिफ़ारिश की ज़रूरत नहीं थी। और उनके मित्र से कितना उलट! मिस्टर डार्सी ने बस एक नाच श्रीमती हर्स्ट के साथ किया, एक मिस बिंगली के साथ। किसी और महिला से परिचय की पेशकश भी ठुकरा दी। बाक़ी वक़्त हॉल में इधर-उधर टहलते रहे। बीच-बीच में अपने दल के किसी आदमी से दो बातें कर लेते। उनके स्वभाव का फ़ैसला हो चुका था। वे दुनिया के सबसे घमंडी, सबसे अप्रिय आदमी थे। सबकी यही कामना थी कि वे फिर कभी यहाँ न आएँ। सबसे तीखा बोलने वालों में श्रीमती बेनेट थीं। उन्हें उनका बर्ताव यों भी खटका था, पर अपनी एक बेटी की उपेक्षा ने उसमें निजी ग़ुस्सा भी घोल दिया।

पुरुष कम पड़ गए थे, सो एलिज़ाबेथ बेनेट को दो नाच बैठे-बैठे बिताने पड़े। उसी बीच कुछ देर मिस्टर डार्सी इतने पास खड़े रहे कि उनकी बातें उस तक पहुँच सकती थीं। नाच से पल-भर को निकले मिस्टर बिंगली अपने मित्र से साथ नाचने की मनुहार करने लगे। दोनों की बातचीत एलिज़ाबेथ के कानों में पड़ी। 'चलो भी, डार्सी,' बिंगली ने कहा। 'तुम्हें नाचना ही होगा। यों अकेले बुद्धू की तरह खड़े रहना मुझसे देखा नहीं जाता। नाच लो, यही कहीं बेहतर है।' 'हरगिज़ नहीं। तुम जानते हो, साथी को अच्छी तरह जाने बिना नाचना मुझे कितना खलता है। ऐसे नाच में तो यह असहनीय ही है। तुम्हारी बहनों के साथी तय हो चुके हैं, और इस कमरे में एक भी औरत ऐसी नहीं, जिसके साथ नाचना मेरे लिए सज़ा न हो।' 'राज-पाट के बदले भी मैं तुम्हारे जैसे नख़रे न करूँ!' बिंगली पुकार उठे। 'सच कहता हूँ, आज की शाम जैसी इतनी सारी प्यारी लड़कियाँ एक साथ मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं देखीं। और देखो तो, कई तो ग़ज़ब की सुंदर हैं।' 'इस कमरे की इकलौती सुंदर लड़की के साथ तो तुम्हीं नाच रहे हो,' मिस्टर डार्सी ने बेनेट घराने की सबसे बड़ी बेटी की ओर देखते हुए कहा। 'ओह! वह तो मेरी देखी सबसे सुंदर लड़की है! पर ठीक तुम्हारे पीछे उसकी एक बहन बैठी है — बहुत प्यारी है, और पक्का बेहद मिलनसार होगी। ठहरो, अपनी साथी से कहता हूँ कि तुम्हारा परिचय करा दे।' 'किसकी बात कर रहे हो?' डार्सी ने मुड़कर पल-भर एलिज़ाबेथ को देखा। आँखें मिलते ही नज़र फेर ली। फिर ठंडे स्वर में बोले, 'ठीक-ठाक ही है, पर इतनी सुंदर नहीं कि मेरा मन डोले। और अभी मेरा मन भी ऐसा नहीं कि जिन युवतियों को दूसरे मर्दों ने नकार दिया है, मैं आगे बढ़कर उनकी लाज रखूँ। तुम अपनी साथी के पास लौटो और उसकी मुस्कानों का मज़ा लो। मेरे पास खड़े रहोगे तो वक़्त ही गँवाओगे।' मिस्टर बिंगली ने यह सलाह मान ली। मिस्टर डार्सी भी वहाँ से चले गए। एलिज़ाबेथ के मन में उनके लिए ज़रा भी कोमल भाव नहीं बचा। फिर भी अपनी सहेलियों को उसने यह क़िस्सा बड़े चाव से सुनाया। वह ज़िंदादिल थी, शरारती भी। हँसने लायक़ हर बात में उसे मज़ा आता था।

वह शाम बेनेट परिवार के लिए कुल मिलाकर सुहानी रही। श्रीमती बेनेट ने देख लिया कि नेदरफ़ील्ड का दल उनकी बड़ी बेटी को बहुत पसंद कर रहा है। मिस्टर बिंगली ने जेन के साथ दो बार नाच किया, और उनकी बहनों ने भी जेन को ख़ास मान दिया। जेन भी माँ जितनी ही ख़ुश थी, बस उसकी ख़ुशी कहीं शांत थी। एलिज़ाबेथ जेन की ख़ुशी महसूस कर सकती थी। मैरी ने सुना कि मिस बिंगली के आगे उसका परिचय इस इलाक़े की सबसे गुणी, सबसे हुनरमंद लड़की के रूप में हो रहा है। किटी और लिडिया की क़िस्मत अच्छी रही — नाच के साथी कभी कम नहीं पड़े। और उन दिनों नाच में दोनों के लिए बस यही बात मायने रखती थी। सब अच्छे मन से अपने गाँव लॉन्गबर्न लौट आए। बेनेट परिवार उस गाँव का सबसे मान्य घराना था। घर पहुँचे तो मिस्टर बेनेट अब तक जाग रहे थे। वे ऐसे आदमी थे कि हाथ में किताब हो तो वक़्त का पता ही न चले। पर इस बार उन्हें उस शाम का हाल जानने की ख़ासी उत्सुकता थी, जिसने ऐसी चमकीली उम्मीदें जगाई थीं। मन-ही-मन वे चाहते थे कि उस अजनबी से बँधी पत्नी की सारी उम्मीदें धरी रह जाएँ। पर जल्द ही समझ गए कि सुनने को कुछ और ही मिलने वाला है।

'अरे सुनिए, मिस्टर बेनेट,' श्रीमती बेनेट ने कमरे में क़दम रखते ही कहा। 'क्या ही सुहानी शाम थी! कैसा शानदार नाच था! काश आप भी वहाँ होते। जेन की जितनी तारीफ़ हुई, उतनी पहले कभी नहीं हुई। हर कोई कह रहा था, जेन कितनी सुंदर है। मिस्टर बिंगली को तो वह इतनी सुंदर लगी कि उन्होंने उसके साथ दो बार नाच किया। ज़रा सोचिए तो — सचमुच दो बार! उस पूरे कमरे में जेन अकेली थी, जिससे उन्होंने दूसरी बार नाच के लिए पूछा। सबसे पहले उन्होंने मिस लुकास से नाचने को कहा था। उन्हें उसके साथ खड़े होते देख मेरा तो कलेजा ही बैठ गया। पर मिस लुकास उन्हें ज़रा भी नहीं भाई। सच पूछिए तो वह भाएगी भी किसे। नाच में क़तार से उतरती जेन पर तो वे जैसे मोहित ही हो गए। सो पूछा कि यह कौन है, परिचय कराया गया, और अगले दो नाच जेन से माँग लिए। तीसरे दो नाच मिस किंग के साथ, चौथे दो मरिया लुकास के साथ, पाँचवें दो फिर जेन के साथ, छठे दो लिज़ी के साथ, और फिर बुलांज़े नाच…' 'उस आदमी को मुझ पर ज़रा भी तरस आया होता,' पति झुँझलाकर बोल पड़े, 'तो वह इतना न नाचता! बस करो, भगवान के लिए, अब और साथियों का नाम नहीं। काश पहले ही नाच में उसका टख़ना मुड़ गया होता!' 'अरे सुनिए,' श्रीमती बेनेट ने बात जारी रखी, 'मुझे तो वे बेहद पसंद आए। कितने सुंदर हैं! और उनकी बहनें भी कैसी मोहक स्त्रियाँ हैं। ऐसी नफ़ीस पोशाकें मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखीं। श्रीमती हर्स्ट की पोशाक पर लगी लेस तो पक्का…' यहाँ श्रीमती बेनेट की बात फिर कट गई। मिस्टर बेनेट अड़ गए थे कि ठाठ-बाट की पोशाकों की कोई बात नहीं सुनेंगे। सो उन्हें दूसरा विषय पकड़ना पड़ा। श्रीमती बेनेट का पारा चढ़ा हुआ था। मिस्टर डार्सी की चौंका देने वाली बदतमीज़ी का हाल उन्होंने कुछ नमक-मिर्च लगाकर सुनाया।

'पर मैं दावे से कहती हूँ,' उन्होंने जोड़ा, 'लिज़ी उस आदमी के मन नहीं भाई, तो इसमें उसका रत्ती-भर नुक़सान नहीं। वह तो दुनिया का सबसे अप्रिय, सबसे घिनौना आदमी है — उसे रिझाने की ज़रूरत ही क्या। ऐसा घमंड, ऐसी अकड़ कि सही न जाए! ख़ुद को न जाने क्या समझकर इधर-से-उधर टहलता फिरा! और यह कहना — नाचने लायक़ सुंदर नहीं! काश आप वहाँ होते और एक ही बोल में उसकी अकड़ उतार देते। मुझे उस आदमी से सख़्त नफ़रत है।'