हिंदी संस्करण

अध्याय 4

जब जेन और एलिज़ाबेथ अकेली रह गईं, तो जेन ने — जो अब तक मिस्टर बिंगली की तारीफ़ सँभलकर करती आई थी — बहन के आगे अपना दिल खोल दिया। बताया कि वे उसे कितने अच्छे लगे। 'एक नौजवान में जो-जो होना चाहिए, सब उनमें है', जेन बोली। 'समझ, अच्छा स्वभाव, ज़िंदादिली। ऐसा सुहाना बरताव मैंने कभी नहीं देखा — इतना सहज, और शिष्टता ऐसी कि कहीं कोई कसर नहीं!' 'सुंदर भी तो हैं', एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'नौजवान को, बस चले तो, सुंदर भी होना चाहिए। तो लो, उनका चरित्र पूरा हुआ।' 'उन्होंने मुझे दूसरे नाच के लिए बुलाया, तो मैं निहाल हो गई। ऐसी बड़ाई की मुझे उम्मीद नहीं थी।' 'उम्मीद नहीं थी? तुम्हारे लिए तो मुझे पूरी उम्मीद थी। यही तो हम दोनों में बड़ा फ़र्क़ है। बड़ाई तुम्हें हर बार चौंका देती है, मुझे कभी नहीं। तुम्हें दोबारा नाच के लिए बुलाने से ज़्यादा स्वाभाविक और क्या होता? हॉल की बाक़ी औरतों से तुम पाँच गुना सुंदर हो — यह उन्हें दिखे बिना रह ही नहीं सकता था। इसके लिए उनकी शराफ़त का एहसान मत मानो। ख़ैर, हैं वे सचमुच बहुत अच्छे, इसलिए उन्हें पसंद करने की इजाज़त तुम्हें देती हूँ। तुमने तो इनसे कहीं बड़े मूर्खों को भी पसंद किया है।' 'लिज़ी, हद करती हो!' 'अरे, तुम्हें तो पता है — तुम यों भी लोगों को ज़रूरत से ज़्यादा आसानी से पसंद कर लेती हो। तुम्हें किसी में खोट दिखता ही नहीं। तुम्हारी नज़र में सारी दुनिया भली और प्यारी है। मैंने ज़िंदगी में कभी तुम्हें किसी की बुराई करते नहीं सुना।' 'मैं बस जल्दबाज़ी में किसी को बुरा नहीं कहना चाहती। पर जो सोचती हूँ, हमेशा कह देती हूँ।' 'जानती हूँ। ताज्जुब इसी बात का है। तुम्हारी-सी समझ रखनेवाली, और दूसरों की मूर्खताओं और बेतुकेपन के आगे यों सच्चे दिल से आँखें मूँदे रहना! दिखावे की निष्पक्षता तो आम है — हर जगह मिलती है। पर बिना दिखावे, बिना मतलब की सच्ची निष्पक्षता — हर किसी की अच्छाई चुनकर उसे और अच्छा बना देना, और बुराई का नाम तक न लेना — यह बस तुम्हीं से होता है। तो इन साहब की बहनें भी तुम्हें पसंद आ गईं? उनका बरताव भाई के बराबर नहीं था।' 'पहले-पहल तो सच में नहीं आईं। पर बातचीत करो तो बड़ी सुखद औरतें हैं। मिस बिंगली भाई के साथ रहेंगी और उनका घर सँभालेंगी। मैं बहुत ग़लत न होऊँ तो हमें उनमें एक प्यारी पड़ोसन मिलने वाली है।'

एलिज़ाबेथ चुपचाप सुनती रही, पर उसे यक़ीन नहीं आया। नाच में उन दोनों औरतों का बरताव ऐसा नहीं था कि किसी को भाए। एलिज़ाबेथ की नज़र बहन से पैनी थी और स्वभाव कम नरम। फिर उन दोनों ने उस पर कभी ख़ास ध्यान भी नहीं दिया था। सो न उसकी परख पर कोई परदा था, न उन्हें अच्छा मानने का मन। सच पूछो तो वे बड़ी नफ़ीस महिलाएँ थीं। मन अच्छा हो तो हँसमुख रहतीं, चाहतीं तो लोगों का दिल भी जीत लेतीं। पर घमंडी थीं और आत्ममुग्ध। देखने में अच्छी-ख़ासी थीं। लंदन के लड़कियों के चोटी के निजी विद्यालयों में से एक में पढ़ी थीं, और बीस हज़ार पाउंड की जायदाद रखती थीं। हैसियत से ज़्यादा ख़र्च करने और ऊँचे रुतबेवालों में उठने-बैठने की आदी थीं। सो हर बात में ख़ुद को बड़ा और औरों को छोटा समझें, तो अचरज क्या। वे उत्तरी इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित घराने से थीं। और यह बात उनकी याद में उस दूसरी बात से कहीं गहरी खुदी थी — कि भाई की और ख़ुद उनकी दौलत व्यापार से कमाई हुई थी।

मिस्टर बिंगली को अपने पिता से क़रीब एक लाख पाउंड विरासत में मिले। पिता जागीर ख़रीदना चाहते थे, पर ख़रीद नहीं पाए और चल बसे। मिस्टर बिंगली का भी यही इरादा था। कभी-कभी तो वे काउंटी तक चुन बैठते। पर अब उनके पास अच्छा घर था और जागीरदार जैसे हक़ भी। उनके सहज स्वभाव को जाननेवाले सोचते थे — कहीं ऐसा न हो कि बाक़ी उम्र नेदरफ़ील्ड में ही काट दें, और ख़रीदारी अगली पीढ़ी के ज़िम्मे छोड़ जाएँ। बहनें चाहती थीं कि भाई की अपनी जागीर हो। पर वे अभी किराएदार ही थे, फिर भी मिस बिंगली को उनकी मेज़ की मालकिन बनने में कोई एतराज़ न था। श्रीमती हर्स्ट ने ऐसे आदमी से ब्याह किया था जिसके पास दौलत से ज़्यादा ठाट था — वे भी जब जी चाहे भाई के घर को अपना घर मानने को तैयार रहतीं। मिस्टर बिंगली को बालिग़ हुए दो बरस भी नहीं बीते थे कि किसी ने यों ही नेदरफ़ील्ड हाउस देख आने की सलाह दे दी। वे सचमुच गए, आधा घंटा भीतर-बाहर देखा। जगह और मुख्य कमरे पसंद आए। मकान-मालिक की तारीफ़ों से भी संतोष हुआ, और उन्होंने वहीं-के-वहीं घर किराए पर ले लिया। बिंगली और डार्सी के स्वभाव एकदम अलग थे, पर दोनों की दोस्ती एक-सी पक्की चली आती थी। बिंगली सहज थे, खरे थे, दूसरों की मानकर चलनेवाले। डार्सी के मिज़ाज से इससे उलट स्वभाव हो नहीं सकता था। इसी स्वभाव ने बिंगली को डार्सी का चहेता बना दिया था। हालाँकि डार्सी को अपने मिज़ाज से कभी कोई शिकायत नज़र नहीं आई। बिंगली को डार्सी के लगाव पर अटल भरोसा था, और उनकी परख को वे सबसे ऊँची मानते थे। समझ में डार्सी बढ़कर थे। बिंगली कुछ कम न थे, पर डार्सी तेज़ थे। साथ ही मग़रूर, चुप्पे और नकचढ़े भी। तौर-तरीक़े दुरुस्त थे, पर पास बुलानेवाले नहीं। इस मामले में दोस्त उनसे कहीं आगे थे। बिंगली जहाँ जाते, प्यार पाते। डार्सी जहाँ जाते, किसी-न-किसी का दिल दुखा आते।

मेरिटन के नाच का हाल सुनाने के ढंग में भी दोनों के स्वभाव झलक गए। बिंगली बोले — ज़िंदगी में इनसे सुखद लोग और इनसे सुंदर लड़कियाँ कभी नहीं देखीं। सबने उनसे बड़ी भलमनसाहत और ख़याल से बरताव किया। न कोई रस्मी अकड़ थी, न जकड़न। लगा, ज़रा देर में पूरे हॉल से जान-पहचान हो गई। और मिस बेनेट — उनसे सुंदर फ़रिश्ते की तो कल्पना ही नहीं हो सकती। उधर डार्सी की नज़र में वहाँ लोगों का ऐसा जमघट था जिसमें सुंदरता कम थी और सलीक़ा बिलकुल नहीं। किसी में उन्हें रत्ती-भर दिलचस्पी नहीं जगी। न किसी ने उन पर ध्यान दिया, न किसी ने उन्हें कोई आनंद दिया। मिस बेनेट सुंदर हैं, यह उन्होंने माना। पर बोले — मुस्कुराती बहुत हैं। श्रीमती हर्स्ट और उनकी बहन ने यह बात मान ली। फिर भी दोनों जेन को सराहती थीं, चाहती भी थीं। बोलीं — प्यारी लड़की है, और आगे जान-पहचान बढ़े तो हर्ज नहीं। सो मिस बेनेट प्यारी लड़की मान ली गईं। और बिंगली ने इस तारीफ़ को इजाज़त-सी मानकर तय कर लिया कि अब वे उनके बारे में जी भरकर सोच सकते हैं।