हिंदी संस्करण

अध्याय 6

लॉन्गबर्न की स्त्रियाँ जल्द ही नेदरफ़ील्ड की स्त्रियों से मिलने गईं। नेदरफ़ील्ड की ओर से भी विधिवत जवाबी भेंट हुई। मिस बेनेट के मधुर व्यवहार ने श्रीमती हर्स्ट और मिस बिंगली का मन उत्तरोत्तर जीत लिया। माँ को वे असह्य मानती थीं। छोटी बहनों को तो एक शब्द के लायक़ भी नहीं समझती थीं। पर दोनों बड़ी बहनों से घनिष्ठ होने की इच्छा उन्होंने ज़ाहिर की। जेन ने इस ध्यान को बड़े हर्ष से लिया। एलिज़ाबेथ देखती थी कि वे सबके साथ, यहाँ तक कि उसकी बहन के साथ भी, ऊँचे स्वर से पेश आती हैं। इसलिए वह उन्हें चाह न सकी। फिर भी जेन के प्रति उनकी कृपा का कुछ मोल था। बहुत सम्भव था कि वह भाई की प्रशंसा से ही उपजी हो। जब भी भेंट होती, हर किसी को साफ़ दिखता कि मिस्टर बिंगली जेन पर मुग्ध हैं। और एलिज़ाबेथ को उतना ही साफ़ दिखता कि जेन पहले दिन से पाले हुए झुकाव के आगे धीरे-धीरे झुक रही है, और गहरे प्रेम में उतर रही है। पर दुनिया इसे आसानी से न भाँप पाएगी। इससे एलिज़ाबेथ को चैन था। जेन में गहरा भाव था, पर स्वभाव शांत और रंग-ढंग सदा प्रसन्न। यही उसे दूसरों के मामलों में टाँग अड़ाने वालों के संदेह से बचाता। एलिज़ाबेथ ने यह बात अपनी सहेली मिस लुकास से कही। 'ऐसे मौक़े पर दुनिया से छिपा ले जाना सुखद हो सकता है', शार्लट ने उत्तर दिया, 'पर इतना सँभलकर रहने में एक हानि है। यदि स्त्री अपना अनुराग उसी पुरुष से भी छिपाए, तो उसे बाँध लेने का अवसर खो सकती है। और तब यह मान लेना कि दुनिया भी उतनी ही अनजान थी, बहुत ही फीकी सांत्वना होगी। लगभग हर लगाव में इतनी कृतज्ञता या इतना अहं-तोष घुला होता है कि उसे अपने भरोसे छोड़ देना सुरक्षित नहीं। हम सब खुलकर शुरू कर सकते हैं। हल्का-सा भाना काफ़ी स्वाभाविक है। पर हममें बहुत कम हैं जिनमें बिना प्रोत्साहन के सचमुच प्रेम में पड़ने का हौसला हो। दस में नौ बार स्त्री के लिए यही अच्छा है कि जितना अनुभव करती है, उससे कुछ अधिक दिखाए। बिंगली तुम्हारी बहन को चाहते हैं, इसमें संदेह नहीं। पर यदि वह उन्हें आगे न बढ़ाए, तो बात चाहने से आगे कभी न बढ़े।' 'पर वह उन्हें आगे बढ़ा तो रही है, जितना उसका स्वभाव देता है। यदि मुझे दिखता है कि वह उनकी परवाह करती है, तो उन्हें न दिखे तो वे निरे भोले ठहरेंगे।' 'एलिज़ा, याद रखो कि वे जेन का स्वभाव तुम्हारी तरह नहीं जानते।' 'पर यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को विशेष रूप से चाहे और छिपाने की कोशिश न करे, तो उसे भाँपना ही होगा।' 'शायद भाँप लें, यदि उससे पर्याप्त मिलें। पर बिंगली और जेन काफ़ी बार मिलते तो हैं, फिर भी कभी घंटों साथ नहीं रहते। और मिलते सदा बड़ी मिली-जुली मंडलियों में हैं, इसलिए हर पल आपस में बात नहीं कर सकते। इसलिए जेन को हर उस आधे घंटे का पूरा उपयोग करना चाहिए जिसमें उनका ध्यान उस पर हो। जब वह उनके मन को लेकर निश्चिंत हो जाए, तब जितना चाहे प्रेम में पड़ने का समय पड़ा है।' 'तुम्हारी योजना अच्छी है', एलिज़ाबेथ ने उत्तर दिया, 'जब बात केवल अच्छा विवाह करने की इच्छा तक हो। यदि मैंने ठान लिया होता कि धनी पति, या कोई भी पति, पाना है, तो शायद मैं भी यही करती। पर जेन के भाव ऐसे नहीं हैं। वह हिसाब लगाकर नहीं चलती। अभी तो वह यह भी निश्चित नहीं कर सकती कि उसका भाव कितना गहरा है, या उचित है भी या नहीं। उन्हें जाने उसे मुश्किल से दो सप्ताह हुए हैं। उसने मेरिटन में उनके साथ चार नृत्य किए। एक सुबह उनके घर पर उनसे मिली। और उसके बाद एक ही मंडली में चार बार भोजन किया। किसी का स्वभाव जानने को यह काफ़ी नहीं।' 'तुम्हारे कहने के ढंग से नहीं। यदि वह केवल उनके साथ भोजन ही करती, तो इतना ही जान पाती कि उनकी भूख अच्छी है या नहीं। पर यह याद रखो कि चार शामें भी साथ बीतीं। और चार शामें बहुत कुछ कर सकती हैं।' 'हाँ। इन चार शामों से इतना पता चला कि दोनों को कॉमर्स से ज़्यादा वैंतेअँ पसंद है। पर बाक़ी किसी महत्त्वपूर्ण गुण के बारे में मुझे नहीं लगता कि बहुत कुछ खुला हो।' 'ख़ैर', शार्लट ने कहा, 'मैं दिल से चाहती हूँ कि जेन का भला हो। कल ही वह उनसे ब्याह ले, तो भी मैं मानूँगी कि उसके सुखी होने की सम्भावना उतनी ही है जितनी साल भर उनका स्वभाव परखने के बाद होती। विवाह का सुख पूरी तरह संयोग की बात है। दोनों एक-दूसरे का स्वभाव पहले से कितना भी जानें, और आपस में कितने भी मिलते-जुलते हों, इससे उन्हें रत्ती भर लाभ नहीं। बाद में वे इतने भिन्न हो ही जाते हैं कि अपने हिस्से का दुख भोगें। इसलिए जिसके साथ जीवन बिताना है, उसके दोष जितने कम जानो उतना अच्छा।' 'तुम मुझे हँसा देती हो, शार्लट। पर बात में दम नहीं। तुम भी यह जानती हो, और ख़ुद कभी ऐसा नहीं करोगी।'

अपनी बहन पर मिस्टर बिंगली के ध्यान को परखने में लगी एलिज़ाबेथ को ज़रा भी शक न था कि वह ख़ुद उनके मित्र की आँखों में कुछ रुचि का विषय बनने लगी है। पहले-पहल मिस्टर डार्सी ने मुश्किल से माना था कि वह सुंदर भी है। नाच में उन्होंने उसे बिना किसी सराहना के देखा था। अगली बार देखा भी तो केवल दोष ढूँढ़ने को। पर जैसे ही उन्होंने अपने मन में और मित्रों के सामने यह तय कर लिया कि उस चेहरे में एक भी अच्छा नक़्श नहीं, वैसे ही उन्हें लगने लगा कि उसकी काली आँखों का सुंदर भाव उस चेहरे को असाधारण रूप से बुद्धिमान बना देता है। इस खोज के बाद और खोजें आईं, जो उनके अभिमान पर उतनी ही भारी पड़ीं। उनकी आलोचक दृष्टि ने उसकी देह-यष्टि में पूर्ण संतुलन से हटे हुए एक से अधिक स्थान पकड़े थे। फिर भी उन्हें मानना पड़ा कि उसका डील-डौल हल्का और भला लगता है। उन्होंने घोषित किया था कि उसके ढंग उच्च समाज के ढंग नहीं हैं। फिर भी उसकी सहज शरारती चाल ने उन्हें बाँध लिया। इस सबका एलिज़ाबेथ को कुछ पता न था। उसके लिए वे बस वही आदमी थे जो कहीं भी अपने को भला नहीं बना पाते, और जिन्होंने उसे नाचने लायक़ सुंदर तक नहीं समझा था। डार्सी को उसे और जानने की इच्छा हुई। स्वयं उससे बात करने की ओर पहला क़दम यह था कि वे सुनते रहते कि वह दूसरों से क्या कहती है। यह बात उसकी नज़र में आ गई। यह सर विलियम लुकास के यहाँ हुआ, जहाँ बड़ी मंडली जुटी थी। 'मिस्टर डार्सी का क्या मतलब है', उसने शार्लट से कहा, 'कर्नल फ़ॉर्स्टर से हो रही मेरी बातचीत सुनने का?' 'इसका उत्तर तो केवल मिस्टर डार्सी ही दे सकते हैं।' 'यदि उन्होंने एक बार और ऐसा किया, तो मैं उन्हें साफ़ जता दूँगी कि मैं जानती हूँ वे क्या कर रहे हैं। उनकी दृष्टि बड़ी व्यंग्य भरी है, और यदि मैंने पहले ही ढिठाई न दिखाई तो जल्द ही उनसे डरने लगूँगी।'

थोड़ी देर बाद डार्सी दोनों सहेलियों के पास आए। पर बात करने की इच्छा उनमें दिखी नहीं। मिस लुकास ने अपनी सहेली को ललकारा कि वह ख़ुद यह बात उनके सामने रखे। तुरंत उकसाई गई एलिज़ाबेथ उनकी ओर मुड़ी और बोली: 'मिस्टर डार्सी, आपको नहीं लगा कि अभी-अभी जब मैं कर्नल फ़ॉर्स्टर के पीछे पड़ी थी कि वे मेरिटन में हमारे लिए नाच रखें, तब मैं असाधारण रूप से अच्छा बोल रही थी?' 'आप बड़े जोश से बोल रही थीं। पर यह विषय ही ऐसा है जो हर स्त्री को जोश से भर देता है।' 'आप हम पर बहुत कठोर हैं।' 'अब जल्द ही एलिज़ा की बारी आएगी सताए जाने की', मिस लुकास ने कहा। 'मैं वाद्य का ढक्कन खोल रही हूँ, एलिज़ा, और तुम जानती हो आगे क्या होगा।' 'तुम भी अजीब क़िस्म की सहेली हो! हमेशा चाहती हो कि मैं जिस-तिस के सामने बजाऊँ और गाऊँ! मेरा दिखावा यदि संगीत की ओर मुड़ा होता, तो तुम अनमोल सहेली ठहरतीं। पर जैसी बात है, मैं सचमुच उनके सामने बैठना नहीं चाहती जो सर्वश्रेष्ठ कलाकारों को सुनने के अभ्यस्त होंगे।' मिस लुकास के अड़े रहने पर उसने जोड़ा, 'अच्छा। यदि होना ही है तो हो जाए।' और मिस्टर डार्सी की ओर गम्भीर दृष्टि डालकर बोली, 'एक पुरानी अच्छी कहावत है, जिसे यहाँ सब जानते ही होंगे: « अपनी फूँक दलिया ठंडा करने को बचा रखो। » मैं अपनी फूँक अपने गाने को बल देने के लिए बचा रखूँगी।' उसका बजाना सुनने में भला लगा, पर किसी तरह उत्कृष्ट न था। वह एक-दो गीत गा चुकी थी। कई लोगों ने एक और गीत की मिन्नत की। एलिज़ाबेथ उत्तर देती, उससे पहले ही उसकी छोटी बहन मैरी उत्साह से वाद्य के आगे की जगह ले बैठी। मैरी घर की अकेली कुरूप लड़की थी। वह विद्या और कला के लिए जी-जान से जुटी रहती। इसीलिए अपना कौशल दिखाने को सदा अधीर रहती। मैरी में न प्रतिभा थी न रुचि। दिखावे ने उसे मेहनती बना दिया था। पर उसी ने उसे पंडिताऊ मुद्रा और गर्वीला ढंग भी दे दिया था। ऐसे दोष उससे कहीं ऊँचे कौशल को भी बिगाड़ देते। एलिज़ाबेथ मैरी से आधा भी अच्छा नहीं बजाती थी। फिर भी उसके सहज और बनावट-रहित ढंग के कारण उसे सुनना कहीं अधिक भला लगता था। मैरी ने एक लम्बा संगीत-खंड पूरा किया। फिर छोटी बहनों के कहने पर स्कॉटिश और आयरिश धुनें बजाईं और प्रशंसा तथा धन्यवाद ख़ुशी से बटोरे। दोनों छोटी बहनें कमरे के एक छोर पर लुकास परिवार के कुछ लोगों और दो-तीन अफ़सरों के साथ मगन होकर नाच रही थीं।

मिस्टर डार्सी उनके पास ही खड़े थे। इस ढंग से बीतती शाम पर, जो हर बातचीत को बाहर कर देती थी, वे चुपचाप झुँझला रहे थे। वे अपने ही विचारों में इतने डूबे थे कि यह भी न देखा कि सर विलियम लुकास बग़ल में आ खड़े हुए हैं। पहले सर विलियम ने ही बात छेड़ी। 'मिस्टर डार्सी, नौजवानों के लिए इससे मनोहर मनोरंजन क्या होगा! आख़िर नाच जैसा कुछ नहीं। मैं इसे सुसंस्कृत समाज की सबसे सुंदर परिष्कृतियों में एक मानता हूँ।' 'निस्संदेह, सर। और इसका एक लाभ यह भी है कि संसार के कम सुसंस्कृत समाजों में भी इसका चलन है। हर असभ्य नाच सकता है।' सर विलियम केवल मुस्कुरा दिए। थोड़ी देर बाद बिंगली को मंडली में आते देख उन्होंने कहा, 'आपके मित्र बहुत अच्छा नाचते हैं। और मुझे संदेह नहीं कि आप स्वयं भी इस कला में निपुण होंगे, मिस्टर डार्सी।' 'मेरे ख़याल से आपने मुझे मेरिटन में नाचते देखा है, सर।' 'हाँ, अवश्य देखा, और उस दृश्य से मुझे कम आनंद नहीं मिला। क्या आप सेंट जेम्स दरबार में अक्सर नाचते हैं?' 'कभी नहीं, सर।' 'क्या आप नहीं मानते कि यह उस स्थान के प्रति उचित शिष्टाचार होता?' 'यह ऐसा शिष्टाचार है जो मैं किसी भी स्थान पर नहीं निभाता, यदि बच सकूँ।' 'आपका नगर में भी घर होगा, ऐसा मैं समझता हूँ।' मिस्टर डार्सी ने सिर झुकाकर हामी भर दी।

'एक समय मैंने भी नगर में बस जाने की सोची थी, क्योंकि मुझे उच्च समाज भाता है। पर मुझे पक्का भरोसा न था कि लंदन की हवा लेडी लुकास को रास आएगी।' वे उत्तर की आशा में रुके। पर उनके सामने वाले का उत्तर देने का मन न था। ठीक उसी क्षण एलिज़ाबेथ उनकी ओर आ रही थी, और सर विलियम के मन में कोई बहुत ही शिष्ट काम करने की सूझी। उन्होंने उसे पुकारा। 'प्रिय मिस एलिज़ा, आप नाच क्यों नहीं रहीं? मिस्टर डार्सी, मुझे अनुमति दीजिए कि मैं इस युवती को आपके सामने एक अत्यंत वांछनीय जोड़ीदार के रूप में प्रस्तुत करूँ। मुझे विश्वास है कि इतना सौंदर्य सामने हो तो आप नाचने से इनकार नहीं कर सकते।' और एलिज़ाबेथ का हाथ पकड़कर वे उसे मिस्टर डार्सी को सौंपने ही वाले थे, जो अत्यंत चकित होते हुए भी उसे लेने को तनिक भी अनिच्छुक न थे। पर एलिज़ाबेथ ने तुरंत हाथ खींच लिया और कुछ घबराकर सर विलियम से बोली: 'सच कहती हूँ, सर, मेरा नाचने का ज़रा भी इरादा नहीं। कृपया यह न समझिए कि मैं इस ओर जोड़ीदार माँगने आई थी।' मिस्टर डार्सी ने गम्भीर शिष्टता के साथ प्रार्थना की कि उन्हें उसका हाथ थामने का सम्मान दिया जाए। पर व्यर्थ। एलिज़ाबेथ अपनी बात पर अडिग रही। सर विलियम भी अपने आग्रह से उसके निश्चय को रत्ती भर न डिगा सके। 'आप इतना अच्छा नाचती हैं, मिस एलिज़ा, कि आपको देखने का सुख मुझसे छीन लेना निर्दयता है। और यद्यपि ये सज्जन आम तौर पर इस मनोरंजन को नापसंद करते हैं, मुझे विश्वास है कि आधे घंटे हमें प्रसन्न करने पर इन्हें कोई आपत्ति न होगी।' 'मिस्टर डार्सी तो शिष्टता की मूर्ति हैं', एलिज़ाबेथ ने मुस्कुराते हुए कहा। 'सचमुच हैं। पर यह सोचें कि उन्हें इस ओर किसने प्रेरित किया, प्रिय मिस एलिज़ा, तो उनकी कृपा पर अचरज नहीं। ऐसी जोड़ीदार को भला कौन ठुकराएगा?' एलिज़ाबेथ ने उन्हें एक शरारती दृष्टि दी और मुड़ गई। उसके इनकार से उन सज्जन की नज़र में उसका मोल घटा नहीं था। वे कुछ संतोष के साथ उसी के बारे में सोच रहे थे कि मिस बिंगली ने उनसे बात की।

'मैं ताड़ सकती हूँ कि आप क्या सोच रहे हैं।' 'मुझे नहीं लगता कि आप ताड़ पाएँगी।' 'आप सोच रहे हैं कि ऐसे लोगों के बीच, इसी ढंग से कितनी ही शामें बितानी पड़ें तो कितना असह्य होगा। और सच कहूँ तो मैं भी बिलकुल यही सोचती हूँ। मैं कभी इतनी खीझी नहीं! इन सब लोगों का फीकापन, फिर भी शोर; इनका कुछ न होना, फिर भी अपने को बड़ा समझना! इन पर आपकी पैनी टिप्पणियाँ सुनने को मैं क्या न दे दूँ!' 'मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपका अनुमान पूरी तरह ग़लत है। मेरा मन कहीं अधिक सुखद बात में लगा था। मैं सोच रहा था कि किसी सुंदर स्त्री के मुख पर दो सुंदर आँखें कितना बड़ा आनंद दे सकती हैं।' मिस बिंगली ने तत्काल उनके चेहरे पर आँखें गड़ा दीं। उन्होंने कहा कि बताइए, ऐसे विचार जगाने का श्रेय किस स्त्री को है। मिस्टर डार्सी ने बिना पल भर हिचके उत्तर दिया: 'मिस एलिज़ाबेथ बेनेट।' 'मिस एलिज़ाबेथ बेनेट!', मिस बिंगली ने दोहराया। 'मैं तो चकित हूँ। वे कब से इतनी प्रिय हो गईं? और मैं आपको बधाई कब दूँ?' 'यही तो प्रश्न था जिसकी मुझे आपसे अपेक्षा थी। स्त्री की कल्पना बहुत तेज़ होती है। वह पल भर में प्रशंसा से प्रेम तक, और प्रेम से विवाह तक छलाँग लगा जाती है। मैं जानता था कि आप मुझे बधाई देना चाहेंगी।' 'नहीं, यदि आप इसे इतनी गम्भीरता से लेते हैं तो मैं इस बात को पूरी तरह तय मान लूँगी। आपको सचमुच बड़ी मनोहर सास मिलेगी। और वे तो निस्संदेह पेम्बरली में सदा आप दोनों के साथ ही रहेंगी।' मिस बिंगली जब तक इस ढंग से अपना मन बहलाना चाहती रहीं, डार्सी पूर्ण उदासीनता से सुनते रहे। और उनकी इस शांति ने जब मिस बिंगली को विश्वास दिला दिया कि डरने की कोई बात नहीं, तो वे अपनी चतुराई बरसाती रहीं।