हिंदी संस्करण
अध्याय 7
मिस्टर बेनेट की संपत्ति लगभग पूरी तरह एक जागीर थी, जिससे साल के दो हज़ार पाउंड आते थे। बेटियों के लिए यह दुर्भाग्य की बात थी। बेटा न हो तो वह जागीर एक दूर के रिश्तेदार को चली जाती — यही तय था। श्रीमती बेनेट की अपनी संपत्ति उनके रहन-सहन के लिए काफ़ी थी। पर पति की ओर की कमी पूरी करने के लिए वह कुछ भी नहीं थी। उनके पिता मेरिटन में वकील थे। वे बेटी के लिए चार हज़ार पाउंड छोड़ गए थे। श्रीमती बेनेट की एक बहन थी, जिनका विवाह मिस्टर फ़िलिप्स से हुआ था। मिस्टर फ़िलिप्स पहले अपने ससुर के मुहर्रिर थे, फिर उन्होंने वही वकालत संभाल ली। श्रीमती बेनेट का एक भाई भी था, जो लंदन में बस गया था और वहाँ ठीक-ठाक इज़्ज़त का कारोबार करता था। लॉन्गबर्न गाँव से मेरिटन बस एक मील था। जवान लड़कियों के लिए इससे अच्छी दूरी हो ही नहीं सकती थी। वे हफ़्ते में तीन-चार बार वहाँ जाती थीं। मौसी से मिलने जाना होता था, और ठीक सामने वाली टोपियों की दुकान पर भी। घर की दोनों सबसे छोटी बेटियाँ, किटी और लिडिया, सबसे ज़्यादा जाती थीं। उनके दिमाग़ बहनों से भी ज़्यादा ख़ाली थे। कोई बेहतर काम न हो तो सुबह अच्छी बिताने और शाम को बतियाने का सामान जुटाने के लिए मेरिटन तक पैदल जाना ज़रूरी हो जाता था। सारे इलाक़े में चाहे कोई ख़बर न हो, दोनों मौसी से कुछ न कुछ निकाल ही लाती थीं। इस समय तो पास ही एक मिलिशिया रेजिमेंट भी आ पहुँची थी। ख़बरें भी भरपूर थीं और मज़ा भी। रेजिमेंट पूरी सर्दी रुकने वाली थी, और मुख्यालय मेरिटन में था। अब श्रीमती फ़िलिप्स के यहाँ हर फेरे पर सबसे दिलचस्प ख़बरें मिलतीं। अफ़सरों के नाम और उनके ख़ानदानों के बारे में हर दिन कुछ नया जुड़ जाता। वे कहाँ ठहरे हैं, यह भी जल्दी ही पता चल गया। आख़िर दोनों ख़ुद अफ़सरों से भी जान-पहचान करने लगीं। यह मिस्टर फ़िलिप्स की बदौलत हुआ, जो हर अफ़सर से मिलने गए थे। भांजियों के आगे ख़ुशी का ऐसा सोता खुल गया, जिसे वे पहले जानती ही नहीं थीं। दोनों अफ़सरों के सिवा किसी बात पर बोल ही नहीं पातीं। मिस्टर बिंगली की बड़ी दौलत का नाम भर सुनकर उनकी माँ खिल उठती थीं। पर दोनों की नज़र में वह दौलत एक अदना अफ़सर की लाल वर्दी के आगे कुछ नहीं थी।
एक सुबह मिस्टर बेनेट अपनी दोनों बेटियों को इसी विषय पर बहते हुए सुनते रहे, फिर बड़े ठंडे स्वर में बोले। 'तुम दोनों जिस तरह बोलती हो, उससे मैं यही समझ पाया हूँ कि तुम इस मुल्क़ की सबसे बेवक़ूफ़ लड़कियों में हो। कुछ समय से मुझे शक था, अब यक़ीन हो गया।' किटी झेंप गई और कुछ जवाब न दे सकी। पर लिडिया ने ज़रा भी परवाह नहीं की। वह कैप्टन कार्टर की ख़ूबसूरती की बात करती रही। कैप्टन अगली सुबह लंदन जा रहे थे, इसलिए वह चाहती थी कि आज ही उनकी एक झलक मिल जाए। 'आप मुझे हैरान करते हैं', श्रीमती बेनेट बोलीं। 'अपने ही बच्चों को बेवक़ूफ़ कहने में आपको इतनी जल्दी क्यों रहती है? मैं अगर किसी के बच्चों को नीचा दिखाना भी चाहूँ, तो अपने बच्चों को तो नहीं।' 'मेरे बच्चे बेवक़ूफ़ हैं, तो मैं यही चाहूँगा कि मुझे हमेशा इसका पता रहे।' 'हाँ। पर इत्तिफ़ाक़ से ये सब तो बहुत समझदार हैं।' 'जहाँ तक मैं जानता हूँ, हम दोनों की राय बस इसी एक बात पर अलग है। मैं तो चाहता था कि हर बात में हमारी राय मिले। पर अपनी दो छोटी बेटियों के असाधारण रूप से मूर्ख होने के बारे में मुझे तुमसे अलग ही रहना पड़ेगा।' 'मेरे प्यारे मिस्टर बेनेट, ऐसी छोटी लड़कियों से माँ-बाप जैसी समझ की उम्मीद मत कीजिए। हमारी उम्र पर पहुँचेंगी, तो यक़ीन मानिए, ये भी अफ़सरों के बारे में उतना ही कम सोचेंगी जितना हम सोचते हैं। मुझे वह वक़्त याद है जब लाल वर्दी मुझे भी बहुत भाती थी। सच कहूँ तो मन ही मन आज भी भाती है। साल के पाँच-छह हज़ार वाला कोई सजीला जवान कर्नल मेरी किसी बेटी को चाहे, तो मैं मना नहीं करूँगी। उस रात सर विलियम लुकास के यहाँ मुझे कर्नल फ़ॉर्स्टर वर्दी में बहुत फबते लगे।' 'माँ', लिडिया चिल्लाई। 'मौसी कहती हैं कि कर्नल फ़ॉर्स्टर और कैप्टन कार्टर अब मिस वॉटसन के यहाँ उतना नहीं जाते जितना शुरू में जाते थे। आजकल वे उन दोनों को अक्सर क्लार्क की लाइब्रेरी में खड़े देखती हैं।'
श्रीमती बेनेट जवाब देने ही वाली थीं कि नौकर मिस बेनेट के नाम की एक चिट्ठी लेकर अंदर आया। वह जवाब का इंतज़ार कर रहा था। चिट्ठी नेदरफ़ील्ड से आई थी। श्रीमती बेनेट की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। बेटी पढ़ती रही और वे बेचैन आवाज़ में पुकारती रहीं। 'हाँ जेन, किसकी है? क्या लिखा है? उन्होंने क्या कहा? जल्दी बता, जेन, हमें भी सुना। जल्दी कर, मेरी जान।' 'मिस बिंगली की है', जेन ने कहा और चिट्ठी ज़ोर से पढ़ी। 'मेरी प्यारी सहेली, अगर तुमने इतनी दया न की कि आज लुइज़ा और मेरे साथ खाना खाने आ जाओ, तो हम दोनों बाक़ी सारी उम्र एक-दूसरे से नफ़रत करती रह जाएँगी। दो औरतें पूरा दिन आमने-सामने बिताएँ और झगड़ा न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह चिट्ठी मिलते ही जितनी जल्दी हो सके आ जाओ। मेरे भाई और बाक़ी सज्जन अफ़सरों के साथ खाना खाएँगे। सदा तुम्हारी, कैरोलाइन बिंगली।' 'अफ़सरों के साथ!' लिडिया चिल्लाई। 'समझ नहीं आता मौसी ने हमें यह बात क्यों नहीं बताई।' 'बाहर खाना', श्रीमती बेनेट बोलीं। 'बड़ी बदक़िस्मती है।'
'क्या मैं बग्घी ले जाऊँ, माँ?' जेन ने पूछा। 'नहीं बेटी। तुम घोड़े पर ही जाओ। लगता है बारिश होगी, तो फिर तुम्हें रात वहीं रुकना पड़ेगा।' 'योजना अच्छी है, माँ', एलिज़ाबेथ ने कहा, 'बशर्ते आपको यक़ीन हो कि वे दीदी को घर छोड़ने की पेशकश नहीं करेंगे।' 'अरे, पर सज्जन लोग तो मेरिटन जाने के लिए मिस्टर बिंगली की गाड़ी लेंगे, और हर्स्ट परिवार की गाड़ी के लिए घोड़े ही नहीं हैं।' 'मुझे तो बग्घी में जाना कहीं ज़्यादा अच्छा लगेगा, माँ।' 'पर बेटी, तुम्हारे पिता घोड़े नहीं दे पाएँगे, यह मुझे पक्का पता है। खेत पर उनकी ज़रूरत रहती है — है न, मिस्टर बेनेट?' 'खेत पर घोड़ों की ज़रूरत इतनी बार पड़ती है कि वे मुझे मिलते ही कम हैं।' 'पर आज अगर वे आपको मिल गए हों', एलिज़ाबेथ ने कहा, 'तो माँ का मक़सद पूरा हो ही जाएगा।' आख़िर श्रीमती बेनेट ने पति से यह क़बूल करवा ही लिया कि घोड़े पहले से किसी और काम में लगे हैं। सो जेन को घोड़े पर ही जाना पड़ा। माँ मौसम बिगड़ने की तरह-तरह की ख़ुशनुमा भविष्यवाणियाँ करती हुई बेटी को दरवाज़े तक छोड़ने गईं। उनकी उम्मीद पूरी हुई। जेन को गए ज़्यादा देर नहीं हुई थी कि ज़ोर की बारिश शुरू हो गई। बहनें उसकी चिंता करती रहीं, पर माँ ख़ुश थीं। बारिश पूरी शाम एक पल को भी नहीं थमी। जेन का लौटना नामुमकिन था।
'मेरी यह सूझ सचमुच कितनी भाग्यशाली निकली!' श्रीमती बेनेट ने कई बार कहा, मानो बारिश करवाने का सेहरा भी उन्हीं के सिर हो। पर अपनी इस तरकीब से मिली सारी ख़ुशी का पता उन्हें अगली सुबह ही चला। नाश्ता ख़त्म ही होने को था कि नेदरफ़ील्ड से एक नौकर एलिज़ाबेथ के लिए यह चिट्ठी लाया। 'मेरी सबसे प्यारी लिज़ी, आज सुबह मेरी तबीयत बहुत ख़राब है। लगता है कल पूरी भीग जाने का असर है। यहाँ की मेहरबान सहेलियाँ मुझे ठीक हुए बिना घर लौटने ही नहीं देंगी। वे यह भी ज़िद कर रही हैं कि मिस्टर जोन्स मुझे देख लें, इसलिए अगर सुनो कि वे मुझे देखने आए थे तो घबराना मत। गले के दर्द और सिर के भारीपन के सिवा मुझे कुछ ख़ास नहीं है। तुम्हारी अपनी दीदी।' 'तो सुनो, प्रिय', एलिज़ाबेथ के चिट्ठी ज़ोर से पढ़ चुकने पर मिस्टर बेनेट बोले। 'तुम्हारी बेटी अगर ख़तरनाक तरीक़े से बीमार पड़ जाए, या चल ही बसे, तो यह जानकर तसल्ली रहेगी कि यह सब मिस्टर बिंगली के पीछे भागते हुए और तुम्हारे ही हुक्म से हुआ।' 'अरे, मुझे ज़रा भी डर नहीं कि वह मर जाएगी। मामूली ज़ुकाम से कोई नहीं मरता। उसकी अच्छी देखभाल होगी। वह वहीं रुकी रहे, तो सब ठीक ही है। बग्घी मिल जाती तो मैं ख़ुद उसे देखने चली जाती।'
एलिज़ाबेथ सचमुच परेशान हो उठी। बग्घी न मिले तो भी बहन के पास जाने का उसने मन बना लिया। घोड़े पर वह चढ़ती नहीं थी, सो पैदल जाने के सिवा चारा न था। उसने अपना इरादा बता दिया। 'तुम इतनी नासमझ कैसे हो सकती हो!' माँ चिल्लाईं। 'इस कीचड़ भरे रास्ते पर पैदल चलोगी! वहाँ पहुँचकर तुम किसी के सामने जाने लायक़ नहीं रहोगी।' 'जेन के सामने जाने लायक़ तो रहूँगी, और मुझे इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।' 'लिज़ी', पिता ने कहा, 'क्या यह मुझे इशारा है कि घोड़े मँगवा दूँ?' 'नहीं, सच में नहीं। मैं पैदल चलने से बचना नहीं चाहती। मक़सद हो तो इतनी दूरी कुछ भी नहीं। बस तीन मील ही तो है। खाने से पहले लौट आऊँगी।' 'तुम्हारी भलाई इतनी फुर्तीली है, यह देखकर अच्छा लगता है', मैरी ने कहा, 'पर भावना की हर उमंग को विवेक की राह पर चलना चाहिए। मेरी राय में मेहनत भी उतनी ही होनी चाहिए जितनी ज़रूरत हो।' 'मेरिटन तक हम भी साथ चलेंगी', किटी और लिडिया ने कहा। एलिज़ाबेथ दोनों के साथ चलने को राज़ी हो गई। तीनों लड़कियाँ साथ निकल पड़ीं। 'जल्दी करें', रास्ते में चलते हुए लिडिया बोली, 'तो शायद कैप्टन कार्टर के जाने से पहले उनकी झलक मिल जाए।' मेरिटन में तीनों अलग हो गईं। दोनों छोटी बहनें एक अफ़सर की पत्नी के डेरे पर चली गईं। एलिज़ाबेथ अकेली आगे बढ़ती रही। तेज़ क़दमों से वह एक के बाद एक खेत पार करती गई। बाड़ की सीढ़ियाँ फलाँगती और गड्ढों को कूदकर लाँघती रही। बेसब्री भरी फुर्ती से वह आगे बढ़ती गई। आख़िर जब घर दिखाई देने लगा, तब तक उसके टख़नों में थकान थी और मोज़े मैले हो चुके थे। चलने की गर्मी से दहका चेहरा लाल चमक रहा था।
उसे नाश्ते वाले कमरे में ले जाया गया। जेन के सिवा सब वहीं इकट्ठे थे। एलिज़ाबेथ को देखकर सब बहुत चकित हुए। इतने ख़राब मौसम में, दिन के इतने सवेरे, अकेले तीन मील चलकर आना — श्रीमती हर्स्ट और मिस बिंगली को इस पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था। एलिज़ाबेथ को पक्का लगा कि दोनों उसे इसके लिए हेय समझती हैं। फिर भी दोनों ने उसका बड़ा शिष्ट स्वागत किया। उनके भाई के व्यवहार में शिष्टता से भी अच्छी कोई चीज़ थी — उल्लास और दयालुता। मिस्टर डार्सी ने बहुत कम कहा, और मिस्टर हर्स्ट ने तो एक शब्द भी नहीं। डार्सी ने उस चमक की सराहना की जो चलने से उसके चेहरे पर आ गई थी। साथ ही उन्हें शक भी था कि इस काम के लिए इतनी दूर अकेले आना ठीक था या नहीं। मिस्टर हर्स्ट को बस अपने नाश्ते की सुध थी। उसने बहन का हाल पूछा, पर अच्छा जवाब नहीं मिला। मिस बेनेट ठीक से सो नहीं पाई थी। वह उठ तो गई थी, पर बुख़ार बहुत तेज़ था और कमरे से बाहर आने लायक़ हालत नहीं थी। एलिज़ाबेथ को तुरंत बहन के पास पहुँचा दिया गया, इससे वह ख़ुश हुई। जेन को डर था कि बेवजह सबको घबराहट या तकलीफ़ न हो। इसलिए वह चिट्ठी में यह लिख ही नहीं पाई थी कि उसे बहन की कितनी चाह है। एलिज़ाबेथ को अंदर आते देख वह बहुत ख़ुश हुई। पर ज़्यादा बात करने की ताक़त उसमें नहीं थी। मिस बिंगली दोनों को अकेला छोड़कर चली गईं, फिर भी जेन उस ख़ास मेहरबानी के लिए शुक्रिया कहने के अलावा कुछ ख़ास नहीं कह पाई। एलिज़ाबेथ चुपचाप बहन की सेवा करती रही। नाश्ते के बाद नेदरफ़ील्ड की दोनों बहनें कमरे में आईं। जेन के लिए उनका इतना गहरा स्नेह और चिंता देखकर एलिज़ाबेथ भी उन्हें पसंद करने लगी। दवा बनाने वाला आया। मरीज़ को देखकर उसने कहा कि उसे तेज़ ज़ुकाम हो गया है और इससे अच्छी तरह उबरना होगा। उसने फिर से बिस्तर पर जाकर आराम करने की सलाह दी। कुछ दवाइयाँ भेजने का वादा भी किया। बुख़ार बढ़ता जा रहा था और सिर बहुत दुख रहा था, सो यह सलाह ख़ुशी-ख़ुशी मान ली गई। एलिज़ाबेथ एक पल को भी बहन का कमरा छोड़कर नहीं गई। बाक़ी महिलाएँ भी ज़्यादा देर बाहर नहीं रहीं। सज्जन लोग बाहर गए हुए थे, इसलिए सच पूछिए तो कहीं और उनका कोई काम था ही नहीं। घड़ी ने तीन बजाए, तो एलिज़ाबेथ को लगा कि अब चलना चाहिए। बहुत मन मारकर उसने यह कहा भी। मिस बिंगली ने अपनी गाड़ी देने की पेशकश की। थोड़ा और आग्रह होता तो एलिज़ाबेथ यह पेशकश मान लेती। पर जेन बहन से बिछड़ने को लेकर इतनी दुखी हुई कि मिस बिंगली को गाड़ी की पेशकश बदलकर कुछ दिन नेदरफ़ील्ड में ठहरने का न्योता देना पड़ा। एलिज़ाबेथ ने बड़ी कृतज्ञता से यह न्योता स्वीकार कर लिया। फिर एक नौकर को लॉन्गबर्न भेजा गया, ताकि परिवार को उसके रुकने की ख़बर दे और बदलने के कपड़े ले आए।