हिंदी संस्करण
अध्याय 12
दोनों बहनों ने सोच-विचार के बाद तय किया कि अगली सुबह एलिज़ाबेथ माँ को चिट्ठी लिखेगी। उसी दिन गाड़ी भेज देने को कहना था। पर श्रीमती बेनेट का हिसाब यह था कि बेटियाँ अगले मंगलवार तक नेदरफ़ील्ड ठहरेंगी, और जेन पूरे हफ़्ते तक ठहर चुकी होगी। इसलिए उससे पहले बेटियों का ख़ुशी से स्वागत करने का मन नहीं था। जो जवाब आया, वह घर जाने को बेचैन एलिज़ाबेथ की इच्छा से मेल नहीं खाता था। श्रीमती बेनेट ने कहला भेजा कि मंगलवार से पहले गाड़ी देना उनके बस की बात नहीं। पीछे यह भी जोड़ दिया कि अगर मिस्टर बिंगली और उनकी बहन उन्हें और रुकने को कहें, तो बेटियों के बिना भी श्रीमती बेनेट को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। पर एलिज़ाबेथ ने पक्का मन बना लिया था कि और नहीं रुकेगी। उसे किसी के रोकने की बड़ी उम्मीद भी न थी। उल्टे यह डर था कि ज़रूरत से ज़्यादा ठहरकर बोझ बनने का भाव न दे दें। इसलिए उसने जेन पर ज़ोर दिया कि अभी मिस्टर बिंगली की गाड़ी माँग लें। आख़िर दोनों ने तय किया कि उसी सुबह नेदरफ़ील्ड छोड़ने की अपनी मूल योजना बताकर गाड़ी माँगेंगी। यह ख़बर सुनकर सभी को बहुत अफ़सोस हुआ। कम से कम अगले दिन तक रुक जाने की बात इतनी चली कि जेन का मन पिघल गया। इसलिए रवाना होना अगले दिन पर टल गया। मिस बिंगली को जल्दी ही इस बात का पछतावा हुआ कि उन्होंने रवाना होने में देर करवाई। एक बहन के प्रति उनकी जलन और नापसंदगी दूसरी बहन के प्रति उनके स्नेह से कहीं ज़्यादा थी।
मेज़बान को यह सुनकर सच्चा अफ़सोस हुआ कि दोनों इतनी जल्दी जा रही हैं। उन्होंने बार-बार समझाना चाहा कि मिस बेनेट अभी पूरी तरह अच्छी नहीं हुई है, इसलिए अभी चलना सुरक्षित नहीं। पर जेन जिस बात को सही समझती थी, उस पर अडिग रहती थी। मिस्टर डार्सी के लिए यह ख़ुशख़बरी थी। एलिज़ाबेथ नेदरफ़ील्ड में काफ़ी देर तक रह चुकी थी। उसके प्रति उनका खिंचाव उनके अपने इरादे से आगे निकल चुका था। मिस बिंगली एलिज़ाबेथ से बदतमीज़ी करती रहीं, और ख़ुद डार्सी को आम दिनों से कहीं ज़्यादा तंग करती रहीं। अब से प्रशंसा का ज़रा सा भी भाव बाहर न निकले, इसकी ख़ास सावधानी बरतने का उन्होंने समझदारी से मन बना लिया। ऐसा कोई काम न करने का निश्चय किया जिससे एलिज़ाबेथ को यह आशा जगे कि वह उनके सुख का फ़ैसला कर सकती है। अगर ऐसा विचार पहले से उग आया हो, तो आख़िरी दिन का उनका बर्ताव उस विचार को जमाने या तोड़ने में फ़ैसलाकुन असर डालेगा। यह भी वे जानते थे। उन्होंने अपना निश्चय मज़बूती से निभाया। पूरे शनिवार एलिज़ाबेथ से दस शब्द भी पूरे न बोले। एक बार दोनों आधे घंटे तक अकेले रह गए, तब भी वे बड़ी ईमानदारी से किताब ही देखते रहे। उसकी तरफ़ एक नज़र भी न डाली। रविवार सुबह की प्रार्थना के बाद वह विदाई आई, जिसका लगभग सभी स्वागत कर रहे थे। मिस बिंगली को जब लगा कि अब अंत है, तो वे एलिज़ाबेथ से कहीं ज़्यादा मेहरबान हो गईं। जेन के प्रति दिखने वाला स्नेह भी उसी तरह बढ़ गया। विदा होते समय उन्होंने बार-बार कहा कि लॉन्गबर्न हो या नेदरफ़ील्ड, जेन से मिलना हमेशा सुखद रहता है। फिर उन्होंने उसे बड़े प्यार से गले लगा लिया। एलिज़ाबेथ से हाथ भी मिलाया। एलिज़ाबेथ ने बड़े ही प्रसन्न मन से सबको विदाई दी।
घर लौटी दोनों बहनों को माँ की तरफ़ से ख़ास गर्मजोशी नहीं मिली। श्रीमती बेनेट को यह अजीब लगा कि बेटियाँ लौट आई हैं। उनका ख़याल था कि इतना बड़ा कष्ट देना बहुत ग़लत है, और जेन को फिर ज़रूर ज़ुकाम हो जाएगा। पर पिता ने ख़ुशी बहुत संक्षेप में ही दिखाई। फिर भी मन ही मन बेटियों को देखकर वे ख़ुश थे। दोनों बेटियों के न रहने पर पिता को पता चला था कि परिवार की बैठक में वे कितनी ज़रूरी हैं। जब जेन और एलिज़ाबेथ नहीं रहीं, शाम की सबकी बातचीत बहुत फीकी पड़ गई। समझदारी की बातें लगभग पूरी तरह ख़त्म हो गई थीं। मैरी हमेशा की तरह स्वर-संगति के सिद्धांत और इंसान की फ़ितरत में गहरी डूबी हुई थी। परिवार को नए उतारे हुए कुछ अंशों पर वाह-वाह करनी पड़ती थी। घिसी-पिटी नैतिक बातों पर कुछ नई राय भी सुननी पड़ती थी। किटी और लिडिया के पास एकदम दूसरी तरह की ख़बरें थीं। पिछले बुधवार के बाद रेजिमेंट में बहुत कुछ हुआ था, और बहुत बातें भी चली थीं। हाल में कुछ अफ़सर मौसा के घर खाना खा चुके थे। एक सिपाही को कोड़े भी पड़े थे। कर्नल फ़ॉर्स्टर की शादी होने की बात सचमुच चलने भी लगी थी।