हिंदी संस्करण

अध्याय 13

'मेरी प्यारी,' अगले दिन नाश्ते की मेज़ पर मिस्टर बेनेट ने पत्नी से कहा, 'उम्मीद है, आज एक बढ़िया रात के खाने का इंतज़ाम कर दिया होगा। लगता है, हमारे परिवार में एक सदस्य और जुड़ने वाला है।' 'किसकी बात कर रहे हैं, मेरे प्यारे मिस्टर बेनेट? मुझे तो किसी के आने की कोई ख़बर नहीं। हाँ, शार्लट लुकास अगर अचानक आ जाए तो अलग बात है। पर मेरी मेज़ का खाना तो उसके लिए भी काफ़ी अच्छा रहेगा। उसके घर में तो ऐसा खाना कभी-कभार ही मिलता होगा।' 'मैं तो एक सज्जन और अजनबी की बात कर रहा हूँ।' श्रीमती बेनेट की आँखें चमक उठीं। 'सज्जन और अजनबी! ज़रूर मिस्टर बिंगली होंगे। अरे जेन, तुमने तो एक शब्द भी नहीं बताया! कितनी चालाक लड़की हो तुम! मिस्टर बिंगली से मिलकर सचमुच बड़ी ख़ुशी होगी। पर हे भगवान, अब क्या करें! आज तो मछली का एक टुकड़ा भी नहीं मिलेगा। लिडिया, घंटी बजाओ। अभी हिल से बात करनी होगी।' 'मिस्टर बिंगली नहीं,' पति ने कहा। 'ऐसा आदमी, जिसे मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा।' सब चकित रह गए। पत्नी और पाँचों बेटियों ने एक साथ बड़े उत्साह से सवालों की झड़ी लगा दी। मिस्टर बेनेट इस मज़े का पूरा आनंद लेते रहे।

कुछ देर परिवार की उत्सुकता का मज़ा लेने के बाद उन्होंने बताया। 'यह चिट्ठी मुझे क़रीब एक महीना पहले मिली थी। जवाब भी मैंने कोई पंद्रह दिन पहले दे दिया था। मामला कुछ नाज़ुक है, इसलिए जल्दी ही ध्यान देना ज़रूरी लगा। यह चिट्ठी मेरे चचेरे भाई मिस्टर कॉलिन्स की है — वही आदमी, जो मेरे मरते ही जब चाहे तुम सबको इस घर से निकाल सकता है।' 'अरे, मेरे प्यारे मिस्टर बेनेट,' पत्नी चिल्ला उठीं। 'यह बात मुझसे सुनी ही नहीं जाती। उस घिनौने आदमी का ज़िक्र मत ही कीजिए, भगवान के लिए। आपकी जागीर का अपनी सगी बेटियों को छोड़कर सिर्फ़ बेटों की ओर बँधा होना — इससे बुरा और क्या होगा भला। मैं आपकी जगह होती, तो कब की कोई न कोई उपाय निकाल चुकी होती।' जेन और एलिज़ाबेथ ने माँ को समझाने की कोशिश की कि जागीर के बेटों की ओर बँधे होने का यह नियम आख़िर काम कैसे करता है। पहले भी कई बार यह कोशिश हो चुकी थी, पर श्रीमती बेनेट इस बात को किसी तरह समझ ही नहीं पाती थीं। पाँच बेटियों वाले घर से जागीर छीनकर किसी बेपरवाह-से आदमी को सौंप देने वाले इस निर्दयी क़ानून को वे हमेशा जी भरकर कोसती थीं। 'यह बिलकुल ही अन्यायपूर्ण बात है,' मिस्टर बेनेट ने कहा। 'मिस्टर कॉलिन्स को लॉन्गबर्न मिलने से रोकने का कोई रास्ता नहीं। पर उसकी चिट्ठी सुनोगी, तो शायद उसके कहने के ढंग से तुम्हारा मन कुछ नरम पड़ जाए।' 'नहीं, हरगिज़ नहीं पड़ेगा। पहले तो उसका आपको चिट्ठी लिखना ही बड़ा घमंडी और पाखंडी काम है। मुझे ऐसे झूठे दोस्त बिलकुल पसंद नहीं। अपने बाप की तरह आपसे बिगड़ा हुआ ही क्यों नहीं रहा?' 'हाँ, यही तो। लगता है, बेटे होने के नाते उसे यह बात कुछ खटकी ज़रूर है — सुनोगी तो पता चल जाएगा।'

'केंट, वेस्टरहैम के निकट, हंसफ़र्ड, पंद्रह अक्तूबर। प्रिय महोदय, आपके और मेरे स्वर्गीय आदरणीय पिता के बीच का पुराना मनमुटाव मुझे हमेशा बहुत दुख देता रहा है। पिता को खोने का दुर्भाग्य झेलने के बाद से मैं अक्सर यह सोचता रहा हूँ कि आप दोनों के बीच की यह दूरी पाट दूँ। पर डर यह था कि पिता जिस व्यक्ति से हमेशा बिगाड़ बनाए रखना ही चुनते रहे, अगर मैं उनसे अच्छे संबंध बना लूँ, तो शायद यह पिता की स्मृति का अनादर लगे। इसी वजह से कुछ समय मैं हिचकता रहा और आगे नहीं बढ़ सका।' मिस्टर बेनेट बीच में बोल पड़े। 'सुनो तो, श्रीमती बेनेट।' फिर उन्होंने चिट्ठी फिर से पढ़नी शुरू की। 'पर अब मैंने इस बारे में अपना मन पक्का कर लिया है। ईस्टर पर धर्मगुरु का पद पाने के बाद, मुझे सर लुईस डी बर्ग की विधवा, आदरणीय लेडी कैथरीन डी बर्ग की कृपा-दृष्टि पाने का सौभाग्य और सम्मान मिला है। उन्होंने अपनी उदारता और कृपा से मुझे इस पल्ली के सम्मानित पादरी-पद पर बिठाया है। यहाँ मैं सदा उनकी कृपा का आभार मानते हुए और उनका आदर करते हुए बर्ताव करूँगा। साथ ही, चर्च ऑफ़ इंग्लैंड द्वारा तय की गई विधियों और रीतियों को हमेशा निभाने की पूरी लगन से कोशिश करूँगा। इसके अलावा, एक धर्मगुरु होने के नाते, मैं यह भी मानता हूँ कि मेरे प्रभाव में आने वाले हर घर में शांति का आशीर्वाद फैलाना और उसे मज़बूत करना मेरा कर्तव्य है। इसलिए इस बार मेरी ओर से बढ़ाया गया यह मेल-मिलाप का हाथ हर तरह से सराहनीय है। मुझे यह भी विश्वास करने का साहस है कि आप उदारता से यह देखेंगे कि मैं लॉन्गबर्न जागीर का अगला वारिस हूँ, और इसी वजह से मेरे बढ़ाए गए इस जैतून की डाल को आप ठुकराएँगे नहीं। आपकी सुशील बेटियों को नुक़सान पहुँचाने वाला व्यक्ति बनने की बात मुझे बेचैन किए बिना नहीं रहती। इसलिए मैं क्षमा माँगता हूँ, और यह भी कहता हूँ कि हर संभव तरीक़े से बेटियों की भरपाई करने को तैयार हूँ। इस विषय पर मैं बाद में फिर बात करूँगा। अगर आप मुझे अपने घर आने की अनुमति दें, तो मैं अठारह नवंबर, सोमवार को चार बजे तक पहुँचकर आपसे और आपके परिवार से मिलने की ख़ुशी पाना चाहूँगा। शायद मुझे अगले शनिवार तक आपकी मेहमाननवाज़ी का लाभ उठाना पड़े। लेडी कैथरीन डी बर्ग को इससे कोई एतराज़ नहीं कि मैं कभी-कभी रविवार को अनुपस्थित रहूँ, इसलिए कोई असुविधा नहीं होगी। बस उस दिन का काम संभालने के लिए किसी दूसरे पादरी का प्रबंध करना होगा। आपकी पत्नी और बेटियों को मेरा सादर नमस्कार पहुँचे। आपकी भलाई चाहने वाला मित्र बना रहूँगा, विलियम कॉलिन्स।'

'तो चार बजे इस शांतिदूत सज्जन का स्वागत करना होगा,' मिस्टर बेनेट ने चिट्ठी मोड़ते हुए कहा। 'सचमुच बड़ा नेक-दिल और शिष्ट जवान लगता है। कोई शक नहीं, यह क़ीमती जान-पहचान साबित होगा — ख़ासकर तब, जब लेडी कैथरीन डी बर्ग मेहरबानी करके उसे हमारे घर फिर भेजें।' 'फिर भी बेटियों के बारे में उसने जो कहा, उसमें कुछ बात है। अगर उसका मन उन्हें कुछ देकर भरपाई करने का है, तो मैं रोकने वाली नहीं।' 'वे हमें जो हक़ का मानते हैं, उसकी भरपाई किस तरह करना चाहते हैं, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है,' जेन ने कहा। 'पर उनकी नीयत तो सराहनीय है, यह पक्का है।' एलिज़ाबेथ को जो दो बातें सबसे ज़्यादा खटकीं, वे थीं — लेडी कैथरीन डी बर्ग के आगे उसका अजीब-सा झुकना, और ज़रूरत पड़ने पर पल्ली के लोगों को बपतिस्मा देने, ब्याह रचाने और अंतिम संस्कार करने की उसकी वह दयालु मंशा। 'लगता तो अजीब-सा आदमी है,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'समझ ही नहीं आता कि यह कैसा इंसान है। लिखावट में कहीं बड़ा घमंड झलकता है। अगला वारिस बनने की माफ़ी माँगने का आख़िर क्या मतलब हुआ? भले ही उसके हाथ में बदलने की ताक़त होती, फिर भी वह सचमुच बदलना चाहता, ऐसा तो लगता नहीं। पिताजी, क्या यह समझदार आदमी है?' 'नहीं, बेटी। लगता तो नहीं। मुझे तो पूरी उम्मीद है कि मुझे बिलकुल इसका उलटा आदमी मिलने वाला है। चिट्ठी में चापलूसी और घमंड दोनों घुल-मिल गए हैं। आगे का हाल बड़ा वादा-भरा लगता है। जल्दी मिलने का मन हो रहा है।' 'सिर्फ़ भाषा की बात करें, तो,' मैरी बोली, 'चिट्ठी में कोई खोट नहीं दिखता। जैतून की डाल वाला ख़याल कोई बहुत नया तो नहीं, पर मुझे लगता है, बात अच्छी तरह कही गई है।' किटी और लिडिया को न चिट्ठी में, न उसे लिखने वाले में रत्ती-भर दिलचस्पी थी। इस चचेरे भाई के लाल वर्दी पहनकर आने की उम्मीद तो बिलकुल ही नहीं थी। दोनों को लाल के अलावा किसी और रंग की वर्दी पहने आदमी की सोहबत में मज़ा आए, इसे हफ़्तों बीत चुके थे। पर मिस्टर कॉलिन्स की चिट्ठी पढ़कर श्रीमती बेनेट का उनके प्रति बना विरोध काफ़ी नरम पड़ गया था। इसलिए उन्होंने पति और बेटियों को चकित कर देने लायक़ ठंडे मन से उनका स्वागत करने की तैयारी शुरू कर दी।

मिस्टर कॉलिन्स ठीक समय पर आ पहुँचे। पूरे परिवार ने उनका बड़ी शिष्टता से स्वागत किया। मिस्टर बेनेट सचमुच बहुत कम बोले। पर महिलाएँ बड़े मन से बातचीत में जुट गईं। मिस्टर कॉलिन्स को भी न किसी के बात शुरू करने का इंतज़ार था, न ख़ुद चुप रहने का कोई इरादा। वे पचीस साल के लंबे-चौड़े, कुछ भारी-भरकम-से दिखने वाले जवान थे। चेहरे पर गंभीरता और रोब था, चाल-ढाल बेहद औपचारिक। बैठे अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि उन्होंने श्रीमती बेनेट से ऐसी शानदार बेटियाँ होने की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिए। कहा कि बेटियों की सुंदरता के बारे में उन्होंने बहुत कुछ सुन रखा था, पर इस बार अफ़वाहें सच्चाई तक भी नहीं पहुँच पाईं। यह भी जोड़ा कि समय आने पर सब अच्छे घर पाकर ब्याही जाती दिखेंगी। कुछ लोगों को ऐसी चापलूसी बिलकुल पसंद नहीं आई। पर किसी भी तारीफ़ से न झगड़ने वाली श्रीमती बेनेट ने बड़ी फ़ुर्ती से जवाब दिया। 'कितनी मेहरबानी की बात कही आपने। मन से यही चाहती हूँ कि ऐसा ही हो। वरना ये बच्चियाँ तो बड़ी ग़रीब रह जाएँगी। सब कुछ कैसे अजीब ढंग से तय है।' 'शायद आप इस जागीर के बेटों की ओर बँधे होने की बात कर रही हैं।' 'हाँ, बिलकुल यही। मानना होगा कि यह बेचारी बेटियों के लिए तकलीफ़ की बात है। हाँ, मेरा मतलब आपको दोष देना नहीं। ऐसी बातें तो सब दुनिया के भाग्य पर टिकी होती हैं। जागीर एक बार बँध जाए, तो आख़िर वह किसके पास जाएगी, यह कहा ही नहीं जा सकता।' 'मुझे अपनी सुंदर चचेरी बहनों की इस मुश्किल का पूरा एहसास है। इस बारे में कहने को बहुत कुछ है, पर डर है कि कहीं मैं बहुत ज़्यादा साहसी और जल्दबाज़ न लगूँ। बस इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि मैं इन युवतियों की क़द्र करने के इरादे से ही यहाँ आया हूँ। अभी इससे ज़्यादा नहीं कहूँगा, शायद जब हम एक-दूसरे को बेहतर जान लेंगे…।' रात के खाने का बुलावा आया तो उनकी बात बीच में ही रुक गई। बेटियाँ एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठीं। मिस्टर कॉलिन्स को सिर्फ़ उन्हीं की तारीफ़ नहीं करनी थी। उन्होंने ड्योढ़ी और खाने के कमरे को, और उसमें रखे हर सामान को देखा और सराहा। अगर यह शर्मनाक ख़याल न आता कि वे इस सबको मानो अपनी भावी जागीर की तरह देख रहे हैं, तो शायद उनकी एक-एक तारीफ़ से श्रीमती बेनेट का मन भी पिघल जाता। इसके बाद खाने की भी ख़ूब तारीफ़ हुई। उन्होंने जानना चाहा कि यह लाजवाब खाना बनाने का हुनर उनकी किस सुंदर चचेरी बहन का है। इस पर श्रीमती बेनेट ने ज़रा तीखे स्वर में बात ठीक की। कहा कि उनके घर में अच्छा रसोइया रखने की पूरी गुंजाइश है, बेटियों का रसोई से कोई वास्ता नहीं। उन्होंने मन दुखाने की माफ़ी माँगी। श्रीमती बेनेट ने नरम स्वर में कहा कि उन्हें ज़रा भी बुरा नहीं लगा। पर वे लगभग पंद्रह मिनट तक माफ़ी माँगते ही रहे।