हिंदी संस्करण
अध्याय 20
मिस्टर कॉलिन्स को अपने मन-चाहे प्यार पर चैन से सोचने की फ़ुरसत भी नहीं मिली। श्रीमती बेनेट दोनों की बातचीत ख़त्म होने का इंतज़ार करते हुए दालान में टहल रही थीं। एलिज़ाबेथ को दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलते और तेज़ी से अपने पास से गुज़रकर सीढ़ियों की ओर जाते देखते ही, श्रीमती बेनेट नाश्ते के कमरे में चली गईं। फिर जल्द ही और क़रीबी रिश्तेदार बनने की ख़ुशी भरी उम्मीद पर, उन्होंने मिस्टर कॉलिन्स और ख़ुद को दिल से बधाई दी। मिस्टर कॉलिन्स ने भी उतनी ही ख़ुशी से बधाई ली और लौटाई। फिर उन्होंने दोनों के बीच हुई बातचीत का पूरा ब्योरा सुनाया। उनका मानना था कि चचेरी बहन का बार-बार मना करना बस उसकी शर्मीली विनम्रता और स्वाभाविक शालीनता का सबूत था। इसलिए उन्हें भरोसा था कि नतीजे से पूरी तरह संतुष्ट हुआ जा सकता है। पर यह सुनकर श्रीमती बेनेट को बड़ा झटका लगा। अगर वे यही मान पातीं कि बेटी का मना करना और ठुकराना उसे और उकसाने के लिए ही था, तो उन्हें ख़ुशी होती। पर वे इतनी हिम्मत करके ऐसा मान नहीं सकीं। और यह बात छिपा भी नहीं सकीं। 'पर यक़ीन कीजिए, मिस्टर कॉलिन्स।' श्रीमती बेनेट ने आगे कहा। 'लिज़ी को मैं ख़ुद समझा दूँगी। अभी जाकर मैं ख़ुद उससे यह बात कहूँगी। बड़ी ज़िद्दी और नादान लड़की है, अपने भले की बात भी नहीं समझती। फिर भी मैं उसे ज़रूर समझा दूँगी।' 'बात काटने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, श्रीमती जी।' मिस्टर कॉलिन्स बोल उठे। 'पर अगर वह लड़की सचमुच इतनी ज़िद्दी और नादान है, तो शादी में स्वाभाविक रूप से ख़ुशी की उम्मीद रखने वाले मेरे जैसे आदमी के लिए वह पूरी तरह अच्छी पत्नी बन पाएगी या नहीं, मुझे नहीं पता। इसलिए अगर वह मेरी माँग को बार-बार ठुकराती ही रहे, तो शायद उसे ज़बरदस्ती मुझे स्वीकार करने पर मजबूर न किया जाए, यही बेहतर होगा। क्योंकि स्वभाव की ऐसी कमियों से घिरी हुई कोई भी मेरी ख़ुशी में बहुत मदद नहीं कर पाएगी।' 'आप मेरी बात बिलकुल ग़लत समझ गए।' चौंकी हुई श्रीमती बेनेट बोलीं। 'लिज़ी बस इसी मामले में ज़िद्दी है। बाक़ी हर बात में वह दुनिया की सबसे अच्छे दिल वाली लड़की है। मैं अभी मिस्टर बेनेट के पास जाती हूँ। यक़ीन है, बहुत जल्दी उसके साथ यह बात तय कर लूँगी।'
श्रीमती बेनेट ने उन्हें जवाब देने का मौक़ा भी नहीं दिया। वे सीधे पति के पास दौड़ गईं। पढ़ने के कमरे में घुसते ही चिल्लाईं। 'अरे, मिस्टर बेनेट, अभी इसी वक़्त आपकी ज़रूरत है। पूरा घर सिर पर उठा हुआ है। लिज़ी क़सम खा रही है कि वह मिस्टर कॉलिन्स से शादी नहीं करेगी, आप आइए और उसकी शादी करवाइए। अगर जल्दी न किया, तो मिस्टर कॉलिन्स का मन बदल जाएगा और वे लिज़ी को ठुकरा देंगे।' पत्नी के आते ही मिस्टर बेनेट ने किताब से नज़र उठाई और उनका चेहरा देखा। उनके चेहरे का बेहद शांत और बेपरवाह भाव पत्नी की बात सुनकर भी रत्ती भर नहीं बदला। 'तुम्हारी बात समझने का सुख मुझे नहीं मिल पाएगा लगता है।' पत्नी की बात ख़त्म होते ही उन्होंने कहा। 'किस बारे में बात कर रही हो?' 'मिस्टर कॉलिन्स और लिज़ी की बात है। लिज़ी कह रही है कि वह मिस्टर कॉलिन्स से शादी नहीं करेगी, और मिस्टर कॉलिन्स भी अब कहने लगे हैं कि वे लिज़ी से शादी नहीं करेंगे।' 'ऐसी हालत में मैं क्या करूँ? बात बनती नज़र नहीं आती।' 'आप ख़ुद लिज़ी से बात कीजिए। उससे कह दीजिए कि वह उनसे शादी करे, हुक्म दीजिए।' 'बच्ची को नीचे बुलवा लेते हैं। मेरी राय भी सुन ले।' श्रीमती बेनेट ने घंटी बजाई। मिस एलिज़ाबेथ को पढ़ने के कमरे में बुलाया गया।
'इधर आओ, बिटिया।' बेटी के आते ही पिता ने कहा। 'एक ज़रूरी बात के लिए बुलाया है। सुना है मिस्टर कॉलिन्स ने तुम्हें शादी का प्रस्ताव दिया। सच है क्या?' एलिज़ाबेथ ने हाँ में जवाब दिया। 'बहुत अच्छा। और तुमने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया?' 'जी हाँ, पिताजी।' 'बहुत अच्छा। अब असली बात पर आते हैं। तुम्हारी माँ का हुक्म है कि तुम यह प्रस्ताव मान लो। है न, श्रीमती बेनेट?' 'हाँ। नहीं तो मैं उसकी सूरत फिर कभी नहीं देखूँगी।' 'एलिज़ाबेथ, तुम्हारे सामने एक दुखद चुनाव है। आज से तुम्हें अपने माँ-बाप में से किसी एक की नज़र में पराई हो जाना होगा। अगर तुमने मिस्टर कॉलिन्स से शादी नहीं की, तो तुम्हारी माँ फिर कभी तुम्हारी सूरत नहीं देखेगी। अगर तुमने उनसे शादी की, तो मैं फिर कभी तुम्हारी सूरत नहीं देखूँगा।' ऐसी शुरुआत से यह नतीजा निकलते देख, एलिज़ाबेथ मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। पर श्रीमती बेनेट, जो मान बैठी थीं कि उनके पति भी उनकी ही इच्छा के मुताबिक़ इस मामले को देख रहे हैं, बहुत निराश हुईं। 'ऐसा कहने का मतलब क्या है, मिस्टर बेनेट? आपने मुझसे वादा किया था कि लिज़ी को उनसे शादी करने का हुक्म देंगे।' 'सुनो,' पति ने जवाब दिया। 'मेरी दो छोटी-छोटी दरख़्वास्तें हैं। पहली, अभी इस मामले में मुझे अपनी समझ के मुताबिक़ चलने दो। दूसरी, यह कमरा भी मुझे मेरी मर्ज़ी से इस्तेमाल करने दो। जितनी जल्दी हो सके, अगर मुझे यह पढ़ने का कमरा अकेले मिल जाए, तो मुझे ख़ुशी होगी।'
पति से निराश होकर भी श्रीमती बेनेट ने अभी हार नहीं मानी थी। उन्होंने एलिज़ाबेथ से बार-बार यह बात दोहराई, कभी मनाया तो कभी धमकाया। उन्होंने जेन को अपने पक्ष में करना चाहा, पर जेन ने जितनी नरमी से हो सके, इसमें पड़ने से मना कर दिया। एलिज़ाबेथ कभी गंभीर और दृढ़ रहकर, तो कभी हँसी-मज़ाक़ में उल्लास से माँ के हमलों का जवाब देती रही। उसका ढंग बदलता रहा, पर इरादा कभी नहीं बदला। उधर मिस्टर कॉलिन्स अकेले बैठे अभी-अभी हुई बात को मन ही मन सोच रहे थे। वे ख़ुद को इतना बड़ा समझते थे कि समझ ही नहीं पाए कि चचेरी बहन किस वजह से उन्हें ठुकरा सकती है। उनका घमंड आहत हुआ था, पर इसके सिवा कोई तकलीफ़ नहीं थी। उसके लिए उनका प्रेम पूरी तरह उनकी कल्पना में ही था। इसके अलावा, यह सोचकर कि शायद एलिज़ाबेथ अपनी माँ की डाँट की हक़दार ही है, उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं हुआ। परिवार जब इस उथल-पुथल में डूबा था, तभी शार्लट लुकास दिन भर साथ बिताने आ पहुँची। दालान में लिडिया ने उसका स्वागत किया। लिडिया दौड़कर आई और आधी फुसफुसाहट में चिल्लाई। 'तू आई, कितना अच्छा लगा। यहाँ बड़ा मज़ेदार क़िस्सा हो गया है! पता है आज सुबह क्या हुआ? मिस्टर कॉलिन्स ने लिज़ी को शादी का प्रस्ताव दिया, और लिज़ी ने मना कर दिया।' शार्लट को जवाब देने का मौक़ा भी नहीं मिला कि वही ख़बर सुनाने आई किटी बीच में बोल पड़ी। तीनों जैसे ही अकेली बैठी श्रीमती बेनेट के नाश्ते के कमरे में पहुँचीं, श्रीमती बेनेट ने भी वही क़िस्सा सुनाना शुरू कर दिया। उन्होंने मिस लुकास से गुहार लगाई कि उन पर तरस खाए। और विनती की कि वह अपनी सहेली लिज़ी को परिवार की मर्ज़ी मानने के लिए समझाए। 'ऐसा ज़रूर कर दो, प्यारी मिस लुकास।' उन्होंने दुखी आवाज़ में आगे कहा। 'कोई मेरे साथ नहीं है, कोई मेरी मदद नहीं करता। मेरे साथ इतना बुरा बर्ताव हो रहा है, और किसी को मेरे इन बेचारे नसों की परवाह ही नहीं है।' जेन और एलिज़ाबेथ के आ जाने से शार्लट को जवाब नहीं देना पड़ा। 'हाँ, वह आ रही है।' श्रीमती बेनेट ने बात जारी रखी। 'अपनी मर्ज़ी चले तो ऐसे बेपरवाह और इत्मीनान भरे चेहरे के साथ आ रही है, जैसे हम यॉर्क में बैठे हों। पर सुन ले, मिस लिज़ी। अगर तूने इसी तरह हर प्रस्ताव ठुकराने की ठान ली, तो तुझे कभी पति नहीं मिलेगा। तेरे पिता के गुज़र जाने पर तुझे कौन खिलाएगा, यह भी मुझे सच में नहीं पता। मैं तुझे नहीं खिला सकूँगी, इसलिए पहले ही चेता देती हूँ। आज से ही मेरा तुझसे नाता ख़त्म है। जैसा मैंने पढ़ने के कमरे में भी कहा था, अब कभी तुझसे बात नहीं करूँगी, देख लेना मैं अपनी बात पर कायम रहती हूँ या नहीं। अवज्ञाकारी बच्चों से बात करने में मुझे कोई ख़ुशी नहीं मिलती। सच कहूँ तो वैसे भी किसी से बात करने में मुझे ख़ास मज़ा नहीं आता। मेरे जैसी नसों की बीमार को भला बात करने का मन कैसे होगा। मुझे कितनी तकलीफ़ होती है, यह किसी को नहीं पता! पर हमेशा से यही होता आया है। जो शिकायत नहीं करता, उसे किसी की हमदर्दी नहीं मिलती।'
बेटियाँ जानती थीं कि माँ को तर्क से समझाने या मनाने की कोशिश करने से चिढ़ और बढ़ेगी। इसलिए वे बहती हुई बातें चुपचाप सुनती रहीं। श्रीमती बेनेट बिना किसी रुकावट के लगातार बोलती रहीं। तभी हमेशा से कुछ ज़्यादा रोब भरे अंदाज़ में मिस्टर कॉलिन्स कमरे में आकर सबके साथ बैठ गए। उन्हें देखते ही श्रीमती बेनेट ने बेटियों से कहा। 'अच्छा, तुम सब चुप रहो और मुझे मिस्टर कॉलिन्स से थोड़ी देर बात करने दो। यह ज़रूर होना चाहिए।' एलिज़ाबेथ चुपचाप कमरे से बाहर चली गई। जेन और किटी उसके पीछे गईं। पर लिडिया ने ठान लिया कि सुनने लायक़ एक भी बात नहीं छोड़ेगी, इसलिए वह डटी रही। शार्लट पहले तो मिस्टर कॉलिन्स की शिष्टता की वजह से रुक गई। उन्होंने उससे अपने और पूरे परिवार के हालचाल बड़े ब्योरे से पूछे। फिर वह थोड़ी उत्सुकता की वजह से रुकी रही। शार्लट संतोष के साथ खिड़की के पास जाकर न सुनने का दिखावा करने लगी। श्रीमती बेनेट ने दुखी आवाज़ में अपनी तैयार बात शुरू की। 'हाय, मिस्टर कॉलिन्स!' 'प्रिय श्रीमती जी,' उन्होंने जवाब दिया। 'इस मसले पर अब हमेशा के लिए चुप्पी साध लेते हैं। आपकी बेटी के बर्ताव पर मैं कभी कोई गिला नहीं रखूँगा।' थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ खिन्न स्वर में आगे कहा। 'जिस दुख को टाला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार कर लेना और उसके आगे झुक जाना हम सबका फ़र्ज़ है। मुझ जैसे नौजवान के लिए यह फ़र्ज़ और भी ज़्यादा है, जिसे इतनी जल्दी अच्छी जगह पाने का सौभाग्य मिला। मुझे भरोसा है कि मैं इसे स्वीकार कर चुका हूँ। भले ही सुंदर चचेरी बहन मुझसे शादी करने की कृपा करतीं, फिर भी मुझे शक है कि मैं ज़रूर सुखी होता। शायद इसीलिए यह स्वीकार करना मेरे लिए और आसान हो गया। मैंने अक्सर देखा है कि ठुकराई गई ख़ुशी को तब सबसे आसानी से स्वीकार किया जा सकता है, जब हमारी नज़र में उसकी क़ीमत घटने लगे। प्रिय श्रीमती जी, यह उम्मीद मत कीजिए कि आपकी बेटी की मर्ज़ी पाने की अपनी कोशिश यों वापस लेकर, आपसे और मिस्टर बेनेट से मेरे लिए अपना असर इस्तेमाल करने की गुज़ारिश किए बिना, मैंने आपके परिवार का ज़रा भी अनादर किया है। शायद आप मेरे इस बर्ताव पर एतराज़ करें कि मुझे बेटी की बात से नहीं, बल्कि आपसे इनकार सुनना और मानना चाहिए था — पर बेटी की बात से ही मैंने इनकार मान लिया। पर हर कोई ग़लती कर सकता है। इस पूरे मामले में मेरी नीयत हमेशा अच्छी रही। मेरी चाहत बस इतनी थी कि मुझे एक कोमल जीवनसाथी मिले। साथ ही मैंने आपके पूरे परिवार का भला भी ध्यान में रखा। अगर मेरे बर्ताव में ज़रा भी खोट रहा हो, तो मैं यहीं माफ़ी माँगता हूँ।'