हिंदी संस्करण
अध्याय 30
सर विलियम हंसफ़र्ड में बस एक हफ़्ता ठहरे। पर इतना काफ़ी था यह देखने के लिए कि उनकी बेटी बड़े आराम से बस गई है, और उसे ऐसा पति और पड़ोस मिला है जो शायद ही कहीं और मिले। सर विलियम जब तक रहे, मिस्टर कॉलिन्स हर सुबह उन्हें अपनी दो-पहिया गाड़ी में बिठाकर इलाक़ा घुमाते रहे। पर उनके जाते ही सारा घर फिर पुराने ढर्रे पर लौट आया। एलिज़ाबेथ को यह जानकर तसल्ली हुई कि इस बदलाव से चचेरे भाई को पहले से ज़्यादा बार देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मिस्टर कॉलिन्स अब नाश्ते और खाने के बीच का ज़्यादातर वक़्त बाग़ में काम करते हुए बिताते, या फिर सड़क की ओर खुलने वाले अपने कमरे में बैठकर पढ़ते, लिखते और खिड़की से बाहर देखते रहते। जिस कमरे में महिलाएँ बैठतीं, वह घर के पिछले हिस्से में था। पहले-पहल एलिज़ाबेथ को यह अजीब लगा कि शार्लट खाने-बैठने के साझा कमरे को अपना रोज़ का ठिकाना क्यों नहीं बनातीं — वह कमरा बड़ा भी था और नज़ारा भी अच्छा। पर जल्दी ही उसे समझ आ गया कि सहेली के पास इसकी एक बढ़िया वजह थी। अगर दोनों उतने ही सुहाने कमरे में बैठतीं, तो मिस्टर कॉलिन्स यक़ीनन अपने कमरे में बहुत कम वक़्त बिताते। एलिज़ाबेथ को शार्लट का यह इंतज़ाम देखकर ख़ुशी हुई। बैठक वाले कमरे से उस तंग रास्ते पर क्या गुज़र रहा है, यह बिल्कुल पता नहीं चलता था। कौन-सी गाड़ी कब आई-गई, यह बताना मिस्टर कॉलिन्स का काम था। ख़ासकर मिस डी बर्ग की चार-पहिया गाड़ी कितनी बार निकली, यह वे ज़रूर बताते — भले ही यह लगभग रोज़ की बात हो, पर वे कभी नागा नहीं करते। मिस डी बर्ग अक्सर पादरी-घर के सामने रुक भी जातीं और शार्लट से कुछ मिनट बातें कर लेतीं। पर गाड़ी से उतरने का न्यौता वे शायद ही कभी मानतीं।
मिस्टर कॉलिन्स शायद ही कोई दिन ऐसा छोड़ते जब रोज़िंग्स तक पैदल न जाते। और यह भी कम ही होता कि पत्नी को साथ जाने की ज़रूरत न समझें। एलिज़ाबेथ को काफ़ी समय तक समझ नहीं आया कि वे इतना वक़्त वहाँ क्यों लगाते हैं। फिर उसे ख़याल आया कि शायद लेडी कैथरीन आगे चलकर कोई और गिरजाघर का पद भी दिला दें। कभी-कभी लेडी कैथरीन ख़ुद पादरी-घर आने की कृपा भी करतीं। ऐसे में कमरे के भीतर जो कुछ भी होता, उनकी नज़र से कुछ नहीं बचता। वे सबको ग़ौर से देखतीं, हाथ में जो काम होता उसे जाँचतीं, और फिर दूसरे ढंग से करने को कहतीं। फ़र्नीचर की जमावट में कमी निकालतीं और यह भी भाँप लेतीं कि नौकरानी ने काम में कोताही की है। जब कुछ जलपान पेश किया जाता, तो लगता जैसे वे इसी ताक में हैं कि श्रीमती कॉलिन्स घर के लिए ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा गोश्त का टुकड़ा तो नहीं ख़रीदतीं। एलिज़ाबेथ को जल्दी ही पता चल गया कि इस महान महिला को भले इस इलाक़े की मजिस्ट्रेट न बनाया गया हो, पर अपनी पल्ली में वे किसी से कम मुस्तैद जज नहीं थीं। मिस्टर कॉलिन्स पल्ली की सबसे छोटी-सी बात भी उन्हीं के पास लेकर जाते। जब भी झोंपड़ियों में रहने वाला कोई झगड़ता, शिकायत करता या हद से ज़्यादा ग़रीब हो जाता, लेडी कैथरीन ख़ुद गाँव में निकल पड़तीं। झगड़े सुलझातीं, शिकायतें शांत करतीं। और उन्हें डाँट-डपटकर आपस में मेल से और आराम से रहना सिखा देतीं।
रोज़िंग्स में खाने का यह सुख हफ़्ते में क़रीब दो बार दोहराया जाता। बस फ़र्क़ इतना था कि सर विलियम अब नहीं थे, और शाम को ताश की सिर्फ़ एक ही मेज़ लगती। बाक़ी हर बार वैसा ही होता जैसा पहले दिन हुआ था। और न्यौते कहीं और कम ही मिलते, क्योंकि आस-पड़ोस के लोग अक्सर उस तबके के नहीं थे जिनसे कॉलिन्स दंपती मेल-जोल रख सकें। पर एलिज़ाबेथ के लिए इसमें कुछ बुरा न था। कुल मिलाकर वह अपना वक़्त काफ़ी चैन से बिताती। शार्लट से हँसी-मज़ाक में बातें करने को आधा घंटा भी मिल जाता। मौसम के हिसाब से दिन इतने अच्छे थे कि बाहर भी अक्सर बड़ा सुकून मिलता। जब बाक़ी लोग लेडी कैथरीन से मिलने जाते, तब एलिज़ाबेथ को टहलना अच्छा लगता। वह अक्सर पार्क के एक किनारे पर फैले खुले जंगल में जाती, जहाँ एक बढ़िया और सुहावना रास्ता था। पर लगता था जैसे उसकी क़दर एलिज़ाबेथ के सिवा किसी को नहीं। उस रास्ते पर चलते हुए उसे लगता जैसे वह लेडी कैथरीन की उत्सुक निगाहों की पहुँच से बाहर है।
इसी तरह के सुकूनभरे दिनों में यात्रा के पहले दो हफ़्ते जल्दी ही गुज़र गए। ईस्टर नज़दीक आ रहा था, और उससे ठीक पहले वाले हफ़्ते रोज़िंग्स के घरवालों की तादाद बढ़ने वाली थी। इतने छोटे सामाजिक दायरे में यह ज़रूर एक बड़ी बात थी। एलिज़ाबेथ को आए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था कि उसने सुन लिया — मिस्टर डार्सी कुछ हफ़्तों में रोज़िंग्स आने वाले हैं। वैसे तो उसे इनसे कहीं ज़्यादा देखने की चाह किसी और जान-पहचान वाले से थी, फिर भी उनके आने से रोज़िंग्स की महफ़िल में एक नया तमाशा जुड़ जाता। एलिज़ाबेथ यह देखने की सोच रही थी कि लेडी कैथरीन ने जिस चचेरी बहन को डार्सी की बीवी बनाने की ठान रखी है, उससे वे कैसा बरताव करते हैं। इससे उसे मिस बिंगली के मंसूबे कितने बेकार हैं, यह देखकर मज़ा भी आ सकता था। लेडी कैथरीन डार्सी के आने की ख़बर से बड़ी ख़ुश थीं और उनकी जी भरकर तारीफ़ करती रहीं। यह जानकर तो वे लगभग नाराज़ ही हो गईं कि मिस लुकास और एलिज़ाबेथ डार्सी को पहले भी कई बार देख चुकी हैं।
मिस्टर डार्सी के पहुँचने की ख़बर जल्द ही पादरी-घर तक भी पहुँच गई। क्योंकि मिस्टर कॉलिन्स सबसे पहले यह पक्की तरह जान लेने के लिए पूरी सुबह उस जगह टहलते रहे जहाँ से हंसफ़र्ड सड़क तक जाने वाली रोज़िंग्स की फाटक-चौकी दिखती थी। जब गाड़ी पार्क के भीतर मुड़ी, तो उन्होंने झुककर सलाम किया। और फिर बड़ी ख़बर लेकर हड़बड़ी में घर लौट आए। अगली सुबह मिस्टर कॉलिन्स ख़ातिरदारी के लिए जल्दी-जल्दी रोज़िंग्स गए। उन्हें लेडी कैथरीन के दोनों भतीजों को सलाम करना था। मिस्टर डार्सी अपने साथ अपने चाचा — किसी लॉर्ड — के छोटे बेटे कर्नल फ़िट्ज़विलियम को ले आए थे। सबको बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि मिस्टर कॉलिन्स जब लौटे तो दोनों सज्जन उनके साथ ही थे। शार्लट ने अपने पति के कमरे से दोनों को सड़क पार करते देख लिया। वे फ़ौरन दूसरे कमरे की ओर दौड़ीं ताकि दोनों लड़कियों को उन्हें मिलने वाले इस सम्मान की ख़बर दें, और आगे बोलीं।
'एलिज़ा, इतनी जल्दी यह शिष्टाचार दिखाने का सेहरा तुझे ही जाता है, ऐसा कहना पड़ेगा। मिस्टर डार्सी मुझसे मिलने इतनी सुबह-सुबह तो हरगिज़ नहीं आते।' एलिज़ाबेथ को यह कहने का मौक़ा तक नहीं मिला कि उसे ऐसी तारीफ़ का कोई हक़ नहीं। तभी घंटी बजी और पता चला कि वे आ पहुँचे हैं। थोड़ी ही देर में तीनों सज्जन कमरे में दाख़िल हुए। सबसे आगे कर्नल फ़िट्ज़विलियम थे, उम्र क़रीब तीस बरस। दिखने में बहुत सुंदर तो नहीं थे, पर रूप और बर्ताव, दोनों में असली शराफ़त झलकती थी। मिस्टर डार्सी बिल्कुल वैसे ही लग रहे थे जैसे हर्टफ़र्डशायर में हमेशा दिखते थे। हमेशा की तरह कम बोलते हुए उन्होंने श्रीमती कॉलिन्स से मुलाक़ात की रस्म निभाई। उस सहेली के लिए उनके मन में जो भी जज़्बात रहे हों, ऊपर से उन्होंने बड़े इत्मीनान से एलिज़ाबेथ से भेंट की। एलिज़ाबेथ ने एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा, बस घुटने मोड़कर सलाम कर दिया।
कर्नल फ़िट्ज़विलियम ने एक पढ़े-लिखे रईस-ज़ादे जैसी सहज और बेतकल्लुफ़ अदा से फ़ौरन बातचीत शुरू कर दी। बातें भी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में कीं। पर उनके चचेरे भाई ने श्रीमती कॉलिन्स से घर और बाग़ के बारे में बस दो-चार बातें कहीं, फिर कुछ देर तक किसी से कुछ भी कहे बिना बैठे रहे। आख़िरकार थोड़ी शिष्टता दिखाते हुए एलिज़ाबेथ से उसके घरवालों का हाल पूछा। उसने हमेशा की तरह जवाब दिया। फिर पल भर रुककर जोड़ा। 'मेरी बड़ी बहन पिछले तीन महीने से लंदन में हैं। क्या वहाँ आपकी उनसे कभी इत्तफ़ाक़न मुलाक़ात नहीं हुई?' एलिज़ाबेथ को अच्छी तरह पता था कि उन्होंने जेन को कभी नहीं देखा। पर वह देखना चाहती थी कि बिंगली परिवार और जेन के बीच जो कुछ हुआ, उसकी भनक उन्हें है या नहीं, यह उनके चेहरे से झलकता है या नहीं। डार्सी ने जवाब दिया कि मिस बेनेट से मिलने का सौभाग्य उन्हें कभी नहीं मिला। एलिज़ाबेथ को लगा कि वे कुछ सकपका-से गए हैं। बात वहीं थम गई, आगे नहीं बढ़ी। सज्जन जल्दी ही चले गए।