हिंदी संस्करण

अध्याय 52

एलिज़ाबेथ को जवाब बहुत जल्दी मिल गया, और वह बहुत ख़ुश हुई। चिट्ठी हाथ में आते ही वह उस छोटे झुरमुट की ओर लपकी, जहाँ कोई दख़ल न दे। बेंच पर बैठकर उसने ख़ुश होने की तैयारी कर ली। चिट्ठी इतनी लंबी थी कि इनकार का जवाब वह हो ही नहीं सकती थी। ग्रेसचर्च स्ट्रीट, छह सितंबर। प्रिय भांजी, 'तुम्हारी चिट्ठी अभी-अभी मिली है, और आज की पूरी सुबह मैं जवाब लिखने में ही लगाऊँगी। जो कुछ तुम्हें बताना है, वह थोड़े में लिखकर पूरा नहीं होगा। मानना पड़ेगा कि तुम्हारी माँग से मुझे हैरानी हुई। तुमसे ऐसी माँग आएगी, यह मैंने सोचा नहीं था। इसका मतलब यह नहीं कि मैं नाराज़ हूँ। बस इतना कि मुझे लगा था, ऐसा सवाल पूछने की तुम्हें ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। मेरा मतलब समझ न आए, तो मेरी बदतमीज़ी माफ़ कर देना। तुम्हारे मामा भी मेरी ही तरह हैरान हुए। तुम इस मामले में जुड़ी हुई हो, यह भरोसा न होता, तो मिस्टर डार्सी जो करना चाहते थे, मैं उन्हें वैसा करने ही न देती। पर तुम सचमुच बेक़ुसूर हो और तुम्हें कुछ भी मालूम नहीं, तो मुझे साफ़-साफ़ बताना ही होगा। जिस दिन मैं लॉन्गबर्न से घर लौटी, ठीक उसी दिन तुम्हारे मामा के पास एक ऐसा मेहमान आया, जिसकी उम्मीद ही नहीं थी। मिस्टर डार्सी आए, और मामा के साथ कई घंटे अकेले में बात करते रहे। मेरे पहुँचने से पहले सब निपट चुका था, सो मेरी जिज्ञासा को तुम्हारी जिज्ञासा जितनी तकलीफ़ नहीं हुई। मिस्टर डार्सी, मिस्टर गार्डिनर को यह बताने आए थे कि उन्होंने तुम्हारी छोटी बहन और मिस्टर विकहम का पता लगा लिया है। उन्होंने बताया कि वे दोनों से मिले भी और बात भी की। विकहम से कई बार मिले, लिडिया से एक बार। मुझे जो मालूम हुआ, उसके मुताबिक़ वे हमसे बस एक दिन बाद डर्बीशायर से निकले थे। दोनों को ढूँढ़ निकालने की ठानकर वे लंदन आए थे। उन्होंने जो वजह बताई, वह यह थी। उन्हें पक्का यक़ीन था कि विकहम का घटिया चरित्र लोगों के सामने ठीक से आया ही नहीं, और इसके ज़िम्मेदार मिस्टर डार्सी ख़ुद हैं। इसी वजह से वे किसी भले चरित्र वाली नौजवान लड़की को विकहम से प्यार करने या उन पर भरोसा करने से नहीं रोक सके। उन्होंने बड़ी उदारता से यह सारा दोष अपने ग़लत घमंड के सिर मढ़ा। उन्होंने माना कि पहले उन्हें लगता था, विकहम की निजी करतूतें दुनिया के सामने रखना उनकी अपनी शान के ख़िलाफ़ है। उनका ख़याल था कि उनका अपना चरित्र बिना सफ़ाई दिए ख़ुद ही सामने आ जाना चाहिए। सो उन्होंने कहा कि अपने किए नुक़सान को सुधारने के लिए आगे आना उनका फ़र्ज़ है। कोई और वजह भी रही हो, तब भी मुझे पक्का यक़ीन है कि उससे उनकी बदनामी नहीं होती। लंदन आने के कई दिन बाद जाकर उन्होंने दोनों को ढूँढ़ निकाला। पर उनके पास एक सुराग़ था, जो हमारे पास नहीं था, और वह सुराग़ मालूम होना ही हमारे पीछे आने की एक वजह भी थी। श्रीमती यंग नाम की एक औरत हैं, जो कुछ समय पहले तक मिस डार्सी की गवर्नेस थीं। कोई बात नापसंद आई, तो उन्हें काम से हटा दिया गया, पर वह वजह मिस्टर डार्सी ने नहीं बताई। उसके बाद उन्होंने एडवर्ड स्ट्रीट पर एक बड़ा घर ले लिया और कमरे किराए पर देकर गुज़ारा करने लगीं। मिस्टर डार्सी जानते थे कि श्रीमती यंग और विकहम में बहुत गहरी जान-पहचान है। लंदन पहुँचते ही वे विकहम की ख़बर लेने उनके पास गए। पर जो बात वे चाहते थे, उसे सुनने में दो-तीन दिन लग गए। लगता है, रिश्वत लिए बिना वे अपनी वफ़ादारी तोड़ने को तैयार नहीं थीं। उस औरत को सचमुच मालूम था कि अपने दोस्त को कहाँ पाया जा सकता है। लंदन आते ही विकहम सचमुच उसी के पास गए थे, और श्रीमती यंग उन्हें अपने घर में जगह दे पातीं, तो दोनों वहीं ठहरते। ख़ैर, आख़िरकार हमारे भले दोस्त को मनचाहा पता मिल ही गया। दोनों एक गली में रह रहे थे। वे विकहम से मिले, और उसके बाद अड़ गए कि लिडिया से भी मिलेंगे। उन्होंने बताया कि लिडिया से मिलकर उनका पहला इरादा यही था कि उसे इस शर्मनाक हाल से निकलने के लिए मनाएँ। दोस्त अपनाने को तैयार हो जाएँ, तो वह जल्द लौट आए। उन्होंने यह भी कहा कि जितनी मदद वे कर सकते हैं, करेंगे। पर लिडिया इस बात पर बिलकुल अड़ी रही कि वह जहाँ है, वहीं रहेगी। दोस्त क्या सोचते हैं, इसकी उसे परवाह नहीं थी। मिस्टर डार्सी की मदद भी उसे नहीं चाहिए थी। और विकहम को छोड़ने की बात तो वह सुनने को ही तैयार नहीं थी। उसे यक़ीन था कि ब्याह कभी न कभी होगा ही, सो कब होता है, इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। लिडिया का मन ऐसा था, तो मिस्टर डार्सी ने सोचा कि अब बस ब्याह पक्का कराना और उसे जल्दी कराना ही बाक़ी है। विकहम से पहली ही बात में उन्हें आसानी से समझ आ गया कि विकहम के मन में ब्याह का इरादा ज़रा भी नहीं है। विकहम ने कबूल किया कि इज़्ज़त के कुछ क़र्ज़ बहुत जल्दी चुकाने थे, इसलिए उन्हें रेजिमेंट छोड़नी ही पड़ी। और यह कहने में उन्हें ज़रा हिचक नहीं हुई कि लिडिया के भाग आने से जो कुछ बुरा हुआ, वह सब उसी की नादानी का नतीजा है। वे जल्द ही अफ़सर का अपना ओहदा छोड़ देने की सोच रहे थे, और आगे गुज़ारा कैसे होगा, यह उन्होंने क़रीब-क़रीब सोचा ही नहीं था। कहीं न कहीं तो जाना ही था, पर कहाँ जाएँगे, यह उन्हें मालूम नहीं था। बस इतना मालूम था कि खाने-पीने तक को पैसा नहीं होगा। मिस्टर डार्सी ने पूछा कि वे तुम्हारी छोटी बहन से फ़ौरन ब्याह क्यों नहीं कर लेते। मिस्टर बेनेट बहुत धनी न सही, फिर भी उनके लिए कुछ न कुछ तो कर ही सकते थे। और ब्याह हो जाता, तो हाल भी सुधर जाता। पर विकहम का जवाब बस इतना था कि उन्हें अब भी उम्मीद है — किसी और इलाक़े में किसी और लड़की से ब्याह करके वे और पक्की दौलत पा सकते हैं। फिर भी ऐसी हालत में सामने खड़ी तंगी से निकलने का मौक़ा ठुकराना उनके लिए मुश्किल ही रहा होगा। दोनों कई बार मिले। बात करने को बहुत कुछ था। ज़ाहिर है, विकहम ने उससे कहीं ज़्यादा माँगा, जितना मिल सकता था। पर आख़िर उन्हें वाजिब माँग पर आना ही पड़ा। दोनों के बीच सब तय हो गया, तो मिस्टर डार्सी ने अगली ख़बर तुम्हारे मामा को दी। मेरे घर लौटने से एक दिन पहले शाम को वे पहली बार ग्रेसचर्च स्ट्रीट आए। पर मिस्टर गार्डिनर से मुलाक़ात नहीं हो पाई, और आगे पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि तुम्हारे पिताजी अब भी साथ ही हैं, पर अगली सुबह लंदन से निकलने वाले हैं। उन्हें लगा कि ऐसी बात पर सलाह-मशविरे के लिए तुम्हारे पिताजी उतने ठीक नहीं, जितने मामा। सो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी मुलाक़ात पिताजी के जाने तक टाल दी। उन्होंने अपना नाम नहीं छोड़ा, सो अगले दिन तक हमें बस इतना मालूम था कि कोई सज्जन किसी काम से आए थे। शनिवार को वे फिर आए। तुम्हारे पिताजी जा चुके थे और मामा घर पर थे। जैसा मैंने ऊपर लिखा, दोनों बहुत देर तक बात करते रहे। रविवार को दोनों फिर मिले, और उस दिन मैंने भी उन्हें देखा। सब कुछ सोमवार को जाकर ही तय हुआ। तय होते ही लॉन्गबर्न के लिए हरकारा भेज दिया गया। पर हमारे मेहमान बहुत ज़िद्दी निकले। लिज़ी, सोचती हूँ तो लगता है, यही ज़िद उनका असली ऐब है। अब तक उन पर कई तरह के इल्ज़ाम लगते रहे, पर असली ऐब यही है। जो काम वे ख़ुद न करें, ऐसा एक भी काम उन्होंने होने नहीं दिया। मुझे पक्का यक़ीन है कि तुम्हारे मामा भी सारा मामला बड़ी ख़ुशी से निपटा देते। पर यह बात मैं शुक्रिया पाने के लिए नहीं लिख रही, सो किसी से कहना मत। दोनों देर तक आमने-सामने अड़े रहे। हालाँकि जिन सज्जन और जिन महिला के लिए यह सब हो रहा था, वे दोनों इतनी मेहनत के लायक़ नहीं थे। पर आख़िर तुम्हारे मामा को ही झुकना पड़ा, और भांजी की मदद करने का मौक़ा उन्हें नहीं मिला। उसके बदले उन्हें बस यह नाम सहना पड़ा कि काम उन्होंने किया। यह बात मामा के मन को बहुत खटकी। आज सुबह तुम्हारी चिट्ठी पाकर मामा सचमुच बहुत ख़ुश हुए, ऐसा मैं दिल से मानती हूँ। तुमने सफ़ाई माँगी, तो पराए परों से सजी शोहरत उतारकर वे उसे उसी को लौटा सके, जो सचमुच तारीफ़ का हक़दार है। पर लिज़ी, यह बात तुमसे आगे नहीं जानी चाहिए — ज़्यादा से ज़्यादा जेन तक। उस नई जोड़ी के लिए क्या-क्या किया गया, यह शायद तुम भी काफ़ी हद तक जानती हो। विकहम के क़र्ज़ चुका देने का वादा हुआ। मेरे ख़याल से वह रक़म एक हज़ार पाउंड से काफ़ी ज़्यादा है। लिडिया के अपने हिस्से के ऊपर एक हज़ार पाउंड अलग से उसके नाम बाँध दिए गए, और विकहम का अफ़सरी ओहदा भी ख़रीद दिया गया। यह सब उन्हें ही क्यों करना चाहिए, इसकी वजह वही थी जो ऊपर लिखी। विकहम का चरित्र लोगों के सामने इतना ग़लत आया, और इसी वजह से लोगों ने उन्हें वैसा मान दिया और वैसी तवज्जो दी — इसका दोष मिस्टर डार्सी अपना ही मानते हैं। उन्होंने कहा कि यह उनकी अपनी चुप्पी और उस ध्यान की कमी का नतीजा है, जो उन्हें देना चाहिए था। कुछ हद तक यह सच भी हो सकता है। पर उनकी चुप्पी, या किसी की भी चुप्पी, इस मामले की ज़िम्मेदारी क्यों उठाए — यह मेरी समझ में नहीं आता। फिर भी, प्यारी लिज़ी, इन सब भली-भली बातों से अलग एक बात तुम मान सकती हो — इस मामले में मिस्टर डार्सी की कोई और भी दिलचस्पी है, यह हमने न माना होता, तो तुम्हारे मामा कभी न झुकते। सब तय कर लेने के बाद वे अपने उन दोस्तों के पास लौट गए, जो अब भी पेम्बरली में ठहरे हुए थे। बस यह तय रहा कि ब्याह के वक़्त वे फिर लंदन आएँगे और पैसे से जुड़ा सारा काम पूरा कर देंगे। अब लगता है, मैंने सब कुछ बता दिया। तुम्हारे कहे मुताबिक़ यह सब सुनकर तुम्हें बहुत हैरानी होगी। कम से कम बुरा न लगे, यही उम्मीद है। लिडिया हमारे घर आ गई, और विकहम के लिए भी घर के दरवाज़े हर वक़्त खुले रहे। विकहम बिलकुल वैसे ही थे, जैसा हम उन्हें हर्टफ़र्डशायर में जानते थे। पर लिडिया ने हमारे साथ रहते हुए जैसा बरताव किया, वह मुझे कितना बुरा लगा — यह मैं तुम्हें न बताती। अगर मुझे यह मालूम न होता कि पिछले बुधवार जेन की चिट्ठी देखकर घर लौटने के बाद भी उसने वैसा ही किया। अब कह देने से कोई नई तकलीफ़ तो नहीं होगी। मैंने कई बार उसे बहुत गंभीरता से समझाया। उसने जो किया वह कितना बुरा है, और घरवालों पर उसने कितनी बड़ी मुसीबत ला दी — यह सब मैंने उसे बताया। उसने मेरी बात सुनी हो, तो यह उसकी ख़ुशक़िस्मती। क्योंकि यह तो साफ़ था कि वह ध्यान दे ही नहीं रही थी। कभी-कभी मुझे सचमुच ग़ुस्सा आ जाता था। पर अपनी प्यारी एलिज़ाबेथ और जेन का ख़याल आता, तो मैं उन दोनों की ख़ातिर सब सह लेती। मिस्टर डार्सी वादे के मुताबिक़ ठीक वक़्त पर लौट आए, और जैसा लिडिया ने तुम्हें बताया, वे ब्याह में भी आए। अगले दिन उन्होंने हमारे साथ खाना खाया, और बुधवार या गुरुवार को उन्हें फिर लंदन से निकलना था। प्यारी लिज़ी, इस मौक़े पर मैं वह बात कह दूँ, जो पहले कहने की हिम्मत नहीं हुई — इस पर तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो जाओगी? यही कि वे मुझे कितने अच्छे लगते हैं। हमारे साथ उनका बरताव हर तरह से उतना ही सुहावना था, जितना डर्बीशायर में था। उनकी समझ और उनके विचार, दोनों मुझे भाते हैं। ज़रा और ज़िंदादिली होती, तो कोई कमी ही न रहती। समझदारी से ब्याह करें, तो वह ज़िंदादिली उन्हें उनकी पत्नी सिखा सकती है। मुझे लगा कि वे अपना मन बहुत छिपाते हैं। तुम्हारा नाम तो उन्होंने क़रीब-क़रीब एक बार भी नहीं लिया। पर लगता है, मन छिपाना आजकल का चलन ही है। मैं कुछ ज़्यादा ही बढ़-चढ़कर बोल गई हूँ, तो मुझे माफ़ कर देना। कम से कम मुझे पेम्बरली में न घुसने देने की सज़ा तो मत देना। पूरा पार्क घूम न लूँ, तब तक मैं पूरी तरह सुखी हो ही नहीं सकती। एक जोड़ी सुंदर टट्टुओं वाली नीची चौपहिया गाड़ी हो, तो इससे अच्छा कुछ नहीं। पर अब मुझे लिखना बंद करना होगा। बच्चे आधे घंटे से मुझे ढूँढ़ रहे हैं। सच्चे मन से, श्रीमती गार्डिनर।'

इस चिट्ठी ने एलिज़ाबेथ का मन हिलाकर रख दिया। ख़ुशी ज़्यादा है या तकलीफ़, यह तय करना मुश्किल था। बहन का ब्याह कराने के लिए मिस्टर डार्सी ने क्या-क्या किया होगा — इसे लेकर उसके मन में धुँधले और बिखरे शक पहले से थे। इतनी बड़ी भलाई थी कि उसे सच मान लेना मुश्किल था। ऐसी आस बाँधने की हिम्मत उसे नहीं हुई थी। और फिर उन पर एहसान चढ़ जाने की तकलीफ़ से वह डरती भी थी कि कहीं यह सच न हो। पर हुआ यह कि उस शक से कहीं बड़ी बातें सच निकलीं! वे जान-बूझकर दोनों के पीछे लंदन आए। इस खोज में जितनी मेहनत और जितनी बेइज़्ज़ती थी, सब उन्होंने ख़ुद पर ले ली। जिस औरत से उन्हें घिन और नफ़रत रही होगी, उसी के आगे उन्हें गिड़गिड़ाना पड़ा। जिस आदमी से वे सबसे ज़्यादा बचना चाहते थे, उससे भी मिले। जिसका नाम तक लेना उन्हें सज़ा जैसा लगता था, उसी से कई बार मिले, बहस की और मनाया। आख़िर में पैसा देकर ख़रीदना तक पड़ा। और यह सब उन्होंने ऐसी लड़की के लिए किया, जिसका न वे आदर कर सकते थे, न जिसे ऊँचा मान सकते थे। मन का एक कोना कह रहा था कि यह सब उन्होंने एलिज़ाबेथ के लिए किया है। पर दूसरे ख़यालों ने जल्द ही उस आस को दबा दिया। विकहम से रिश्तेदारी हो जाए, इससे घिन आना तो बिलकुल सहज था। जिस लड़की ने उनका प्रस्ताव पहले ही ठुकरा दिया, उसके लिए बचा प्यार उस घिन पर जीत गया होगा — ऐसा मान लेने के लिए उसका घमंड भी कम पड़ता था। विकहम का साढ़ू बनना! कैसा भी स्वाभिमान हो, ऐसे रिश्ते से बिदकेगा ही। डार्सी ने बहुत कुछ किया था, यह साफ़ था। कितना कुछ किया, यह सोचकर उसे शर्म आती थी। पर उन्होंने जो वजह बताई थी, उस पर भरोसा न करने जैसा कुछ ख़ास नहीं था। उन्हें अपनी ग़लती लगना भी ठीक ही था। उदार मन उनके पास था, और उसे कर दिखाने की ताक़त भी। एलिज़ाबेथ ने यह नहीं माना कि उनकी सबसे बड़ी वजह वह ख़ुद थी। फिर भी इतना वह मान सकती थी कि बचा हुआ प्यार उस काम को निपटाने में ताक़त ज़रूर जोड़ रहा था, जिससे उसके अपने मन का चैन गहरे जुड़ा हुआ था। जिसका बदला कभी चुकाया ही नहीं जा सकता, उसी का एहसान सिर पर है — यह जानना तकलीफ़ पर तकलीफ़ था। लिडिया का लौट आना और उसकी इज़्ज़त का बच जाना, यह सब उन्हीं का दिया हुआ था। उनके लिए जो-जो कड़वे भाव उसने अपने मन में पलने दिए, और उनके सामने जो-जो गुस्ताख़ बातें उसने कहीं — उन सब पर उसे कितना सच्चा पछतावा हुआ! अपने बारे में सोचकर वह छोटी पड़ जाती, पर उनके बारे में सोचकर उसे गर्व होता। दया और इज़्ज़त के सवाल पर उन्होंने ख़ुद को जीत लिया — इस पर उसे गर्व था। मामी ने उनकी जिन बातों की तारीफ़ की थी, उन्हें उसने बार-बार पढ़ा। तारीफ़ पूरी नहीं थी, फिर भी अच्छी लगी। मामी और मामा को इस बात का इतना पक्का भरोसा था कि मिस्टर डार्सी और उसके बीच प्यार और विश्वास है — इससे भी उसे थोड़ी ख़ुशी हुई, जिसमें मलाल घुला हुआ था।

किसी के पास आने की आहट से एलिज़ाबेथ अपनी जगह और अपने ख़यालों से चौंक उठी। वह दूसरी राह पर मुड़ पाती, उससे पहले ही विकहम ने उसे आ लिया। पास आते हुए उन्होंने कहा। 'प्यारी साली साहिबा, मुझे डर है कि मैंने आपकी अकेली सैर में दख़ल दे दिया।' 'दख़ल तो ज़रूर दिया,' एलिज़ाबेथ ने मुस्कुराकर जवाब दिया। 'पर इसका मतलब यह नहीं कि दख़ल बुरा लगा।' 'ऐसा होता, तो मुझे सचमुच अफ़सोस होता। हम हमेशा से अच्छे दोस्त रहे हैं, और अब तो रिश्ता और भी नज़दीक का हो गया है।' 'सच कहा। बाक़ी लोग भी बाहर आ रहे हैं?' 'मालूम नहीं। श्रीमती बेनेट और लिडिया गाड़ी से मेरिटन जाने वाली हैं। पर प्यारी साली साहिबा, मामा-मामी से सुना कि आपने पेम्बरली सचमुच देख लिया।' एलिज़ाबेथ ने कहा कि हाँ, देख लिया। 'उस सुख से मुझे लगभग जलन हो रही है। पर मेरे लिए वह बहुत तकलीफ़देह होता। ऐसा न होता, तो न्यूकैसल जाते हुए मैं भी वहाँ रुक सकता था। घर की बूढ़ी प्रबंधिका से भी मुलाक़ात हुई होगी? बेचारी श्रीमती रेनॉल्ड्स मुझे हमेशा बहुत चाहती रहीं। हाँ, आपसे मेरा नाम उन्होंने ज़रूर नहीं लिया होगा।' 'लिया था।' 'क्या कहा उन्होंने?' 'यही कि आप फ़ौज में चले गए। और यह भी कि उन्हें डर है, बात ठीक… नहीं बैठी। इतनी दूर हों, तो आप जानते ही हैं, बातें अजीब ढंग से बदल जाती हैं।' 'बेशक,' उन्होंने होंठ चबाते हुए जवाब दिया। एलिज़ाबेथ चाहती थी कि अब वे चुप हो जाएँ। पर थोड़ी ही देर में विकहम बोल पड़े।

'पिछले महीने लंदन में डार्सी को देखकर मैं हैरान रह गया। कई बार हम एक-दूसरे के पास से गुज़रे। वहाँ उनका क्या काम था, यह जानने का मन है।' 'शायद मिस डी बर्ग से ब्याह की तैयारी कर रहे हों,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'इस मौसम में उन्हें लंदन ले जाने वाली बात कोई ख़ास ही रही होगी।' 'इसमें शक ही नहीं। लैम्बटन में थीं, तब आप उनसे मिलीं? मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर की बात से तो यही लगा।' 'हाँ। उन्होंने अपनी बहन से हमारा परिचय कराया।' 'वे आपको पसंद आईं?' 'बहुत ज़्यादा।' 'सुना है, पिछले दो साल में वे बहुत ही निखर गई हैं। मैंने आख़िरी बार देखा था, तब उनका भविष्य कुछ ख़ास उजला नहीं लगता था। आपको पसंद आईं, यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई। भली इंसान बनकर निकलें, यही चाहता हूँ।' 'ज़रूर बनेंगी। सबसे मुश्किल उम्र तो निकल ही चुकी।' 'किम्प्टन गाँव से होकर गुज़रीं?' 'ऐसा हुआ या नहीं, याद नहीं।' 'मैंने आपको बताया था, जो पादरी-पद मुझे मिलना चाहिए था, वह वहीं का है। कितनी बढ़िया जगह है! पादरी-घर भी बहुत अच्छा! हर तरह से वह मेरे लिए एकदम सही रहता।' 'उपदेश लिखने का काम भी आपको भाता?' 'बहुत भाता। उसे मैं अपने फ़र्ज़ का हिस्सा मानता, और इतनी मेहनत जल्द ही कुछ भी न रह जाती। शिकायत नहीं करनी चाहिए, पर सच कहूँ तो वह मेरे लिए कितनी अच्छी बात होती! उस तरह के जीवन का सन्नाटा और एकांत सुख के बारे में मेरे हर ख़याल से मेल खाता! पर क़िस्मत को यह मंज़ूर नहीं था। आप केंट में थीं, तब डार्सी को इस बात का ज़िक्र करते सुना?' 'जिन्हें मैं उनसे कम भरोसे का नहीं मानती, ऐसे किसी से मैंने यह सुना ज़रूर है। यही कि वह पादरी-पद शर्त के साथ ही सौंपा गया था। अब के आश्रयदाता की मरज़ी पर।' 'तो आपने यह सुना है! हाँ, कुछ हद तक ऐसा था ज़रूर। मैंने शुरू से ही आपसे यही कहा था, यह आपको याद होगा।' 'यह भी सुना कि एक वक़्त ऐसा भी था, जब उपदेश लिखने का काम आपको आज जितना नहीं भाता था। तब आपने साफ़ कह दिया था कि पादरी आप कभी नहीं बनेंगे, और इसी पर मामला तय हुआ।' 'तो यह तक आपने सुन लिया! बात बिलकुल बेबुनियाद नहीं है। इस मामले पर पहली बार बात हुई थी, तब मैंने क्या कहा था, वह आपको याद होगा।' अब वे लगभग घर के दरवाज़े तक पहुँच चुके थे। एलिज़ाबेथ उनसे पीछा छुड़ाने के लिए तेज़ चल रही थी। छोटी बहन का ख़याल करके वह उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती थी। सो उसने बस ख़ुशमिज़ाजी से मुस्कुराते हुए इतना ही जवाब दिया। 'चलिए, मिस्टर विकहम। अब तो हम भाई-बहन जैसे ही हैं। बीती बातों पर झगड़ा न करें। आगे हमारी राय हमेशा एक ही रहे, यही चाहती हूँ।' उसने हाथ बढ़ा दिया। विकहम की समझ में ही नहीं आया कि चेहरे पर कैसा भाव लाएँ। फिर भी बड़े प्यार और शिष्ट अंदाज़ से उन्होंने उस हाथ को चूम लिया। दोनों घर के भीतर चले गए।