हिंदी संस्करण
अध्याय 53
मिस्टर विकहम इस बातचीत से बहुत संतुष्ट हुए। सो उन्होंने फिर कभी वह बात छेड़कर न अपना मन दुखाया, न अपनी प्यारी साली एलिज़ाबेथ को नाराज़ किया। एलिज़ाबेथ ख़ुश थी कि उसने इतना तो कह ही दिया, जितने से वे आगे कुछ कह न सकें। लिडिया और मिस्टर विकहम के जाने का दिन जल्द ही आ गया। श्रीमती बेनेट को यह बिछोह मानना ही पड़ा। पूरे परिवार को न्यूकैसल ले जाने की योजना में उनके पति की ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी। लगता था, यह बिछोह कम से कम एक साल चलेगा। 'हाय, मेरी प्यारी लिडिया,' माँ पुकार उठीं। 'अब हम फिर कब मिलेंगे?' 'हे भगवान, मुझे क्या पता। शायद दो-तीन साल तक न भी मिलें।' 'मेरी प्यारी बेटी, बहुत-बहुत बार चिट्ठी लिखना।' 'जितनी बार हो सकेगा, लिखूँगी। पर ब्याही औरत के पास चिट्ठी लिखने का वक़्त कहाँ होता है। बहनें मुझे लिखती रहें। उनके पास तो और कोई काम होगा ही नहीं।' मिस्टर विकहम ने अपनी पत्नी से कहीं ज़्यादा प्यार से विदा ली। वे मुस्कुराए, ख़ूबसूरत दिखे, और सुनने में भली लगने वाली बहुत-सी बातें कहीं। दोनों घर से निकले ही थे कि मिस्टर बेनेट बोले। 'मेरे देखे हुए लोगों में सबसे बढ़िया आदमी हैं ये। शरमाने का ढोंग करके मुस्कुराते हैं, दाँत निकालते हैं, और हम सबसे प्रेम की बातें करते हैं। ये मेरे दामाद हैं, और इस पर मुझे बेहद गर्व है। सर विलियम लुकास भी इससे क़ीमती दामाद पेश नहीं कर सकते।' बेटी को विदा करके श्रीमती बेनेट कई दिन तक बहुत उदास रहीं। वे बोलीं। 'मुझे अक्सर लगता है, दोस्तों से बिछड़ने से बुरा कुछ नहीं होता। उनके बिना कितना अकेलापन लगता है।' 'बेटी ब्याहने का नतीजा यही होता है, माँ,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'बाक़ी चारों बेटियाँ अब भी कुँवारी हैं — इसकी ख़ुशी और ज़्यादा मना लीजिए।' 'मेरा मतलब वह नहीं था। लिडिया मुझसे दूर जा रही है, तो ब्याह की वजह से नहीं। उसके पति की रेजिमेंट का इतनी दूर होना ही वजह है। रेजिमेंट पास होती, तो वह इतनी जल्दी न जाती।'
पर इस बात से आई सुस्ती ज़्यादा दिन नहीं टिकी। जल्द ही एक ख़बर आई, जिसने उनके मन को फिर आस और बेचैनी से भर दिया। ख़बर यह थी कि नेदरफ़ील्ड की प्रबंधिका को मालिक के आने की तैयारी का हुक्म मिल चुका है। मिस्टर बिंगली एक-दो दिन में आने वाले थे और कुछ हफ़्ते शिकार करने वाले थे। श्रीमती बेनेट से बैठा ही नहीं जा रहा था। वे जेन को देखतीं और मुस्कुरा देतीं, फिर सिर नवातीं और चहल-पहल मचा देतीं। 'हाँ, हाँ। सुना है, मिस्टर बिंगली आ रहे हैं,' श्रीमती बेनेट ने श्रीमती फ़िलिप्स से कहा। यह ख़बर सबसे पहले वही लाई थीं। 'अच्छी बात है। पर मुझे इससे कोई मतलब नहीं। हमारा उनसे कोई नाता नहीं, और उन्हें फिर देखने का मेरा ज़रा भी मन नहीं। फिर भी उनका नेदरफ़ील्ड आने का मन हो, तो शौक़ से आएँ। क्या पता क्या हो जाए? पर हमें इससे कुछ लेना-देना नहीं। हमने तो बहुत पहले तय कर लिया था कि इस बारे में एक शब्द नहीं कहेंगे। हाँ, यह पक्का है कि वे आ ही रहे हैं?' श्रीमती फ़िलिप्स ने जवाब दिया। 'बिलकुल पक्का। कल रात श्रीमती निकल्स मेरिटन आई थीं। उस औरत को गुज़रते देखा, तो सच जानने के लिए मैं जान-बूझकर ख़ुद बाहर निकल गई। उस औरत ने साफ़ कहा कि बात सच है। वे गुरुवार तक तो ज़रूर आ जाएँगे, शायद बुधवार को ही। उन्होंने बताया कि वे उसी वक़्त बुधवार का गोश्त मँगाने क़साई के यहाँ जा रही थीं। और तीन जोड़ी बत्तख़ें भी हैं, जो अभी काटने लायक़ मोटी हो चुकी हैं।' मिस बेनेट ने मिस्टर बिंगली के आने की बात सुनी, तो अपने चेहरे का रंग बदलने से रोक न सकी। कई महीने हो गए थे, उसने एलिज़ाबेथ के सामने उनका नाम तक नहीं लिया था। पर दोनों अकेली रह गईं, तो वह तुरंत बोल पड़ी। 'लिज़ी, आज मौसी ने यह उड़ती ख़बर सुनाई, तब तुम मुझे देख रही थीं — मैंने देख लिया। मैं परेशान लग रही थी, यह भी मुझे पता है। पर यह मत समझना कि वजह कोई बेवक़ूफ़ी वाली थी। बस यह ख़याल आ गया कि सब मुझे ही देखेंगे, और मैं एक पल को घबरा गई। भरोसा रखो, इस ख़बर से मुझे न ख़ुशी है, न तकलीफ़। एक बात अच्छी है — वे अकेले आ रहे हैं, तो सामना कम ही पड़ेगा। मुझे अपनी फ़िक्र नहीं है। डर बस यह है कि लोग क्या कहेंगे।' एलिज़ाबेथ को समझ नहीं आया कि इस बात को कैसे ले। डर्बीशायर में मिस्टर डार्सी को न देखा होता, तो शायद वह मान लेती कि जो मक़सद बताया गया है, उसके सिवा उनके यहाँ आने के पीछे और कोई इरादा नहीं। पर एलिज़ाबेथ को अब भी लगता था कि मिस्टर बिंगली का मन जेन पर है। मिस्टर बिंगली अपने दोस्त की इजाज़त लेकर आ रहे हैं, या इजाज़त के बिना आ जाने की हिम्मत कर बैठे हैं — इन दोनों में ज़्यादा मुमकिन कौन-सी बात है, इस पर उसका मन डोलता रहा। कभी-कभी वह यह सोचती। 'फिर भी बेचारे आदमी के साथ यह ज़्यादती ही है। जो घर उन्होंने क़ायदे से किराए पर लिया है, वहाँ आने भर से इतनी सारी अटकलें खड़ी हो जाएँ! उनका मामला मैं उन्हीं पर छोड़ती हूँ।' जेन ने अपनी भावनाओं के बारे में जो कहा, उस पर उसका सच्चा विश्वास था। पर एलिज़ाबेथ ने आसानी से भाँप लिया कि बात चाहे जो हो, बिंगली के आने का इंतज़ार उसकी बहन के मन पर असर डाल रहा है। जेन का मन पहले कभी इतना डोलता नहीं दिखा था।
क़रीब एक साल पहले माता-पिता ने जिस बात पर इतनी गरमागरमी से चर्चा की थी, वह फिर छिड़ गई। 'सुनिए, मिस्टर बिंगली आते ही आप उनसे मिलने ज़रूर जाएँगे,' श्रीमती बेनेट ने कहा। 'नहीं, नहीं जाऊँगा। पिछले साल तुमने ज़बरदस्ती मुझे उनसे मिलने भेजा था। और वादा किया था कि मैं मिल आऊँ, तो वे हमारी किसी एक बेटी से ब्याह कर लेंगे। पर हुआ कुछ भी नहीं। अब दोबारा ऐसा बेकार का चक्कर नहीं काटूँगा।' पत्नी ने समझाया कि मिस्टर बिंगली नेदरफ़ील्ड लौटें, तो आस-पड़ोस के हर सज्जन का ऐसी शिष्टता निभाना बहुत ज़रूरी है। 'ऐसे शिष्टाचार से मुझे नफ़रत है,' उन्होंने कहा। 'हमारे साथ उठना-बैठना है, तो वे ख़ुद चलकर आ जाएँ। हम कहाँ रहते हैं, यह उन्हें मालूम है। पड़ोसी जाएँ और लौटें, और हर बार मैं अपना वक़्त ख़र्च करके उनके पीछे भागता फिरूँ — यह नहीं होगा।' 'मुझे तो बस इतना पता है कि आप नहीं गए, तो यह बेहद बदतमीज़ी होगी। फिर भी उन्हें खाने पर बुलाने से आप मुझे रोक नहीं सकते। मैं बुलाऊँगी ही। श्रीमती लॉन्ग और गोल्डिंग परिवार को भी जल्द ही बुलाना है। अपने घर के लोग मिलाकर तेरह होते हैं। सो मेज़ पर ठीक उन्हीं एक के बैठने की जगह बचेगी।' यह ठान लेने के बाद श्रीमती बेनेट पति की बदतमीज़ी कुछ बेहतर ढंग से सह सकीं। पर यह ख़याल उन्हें बहुत अपमानजनक लगा कि सारे पड़ोसी उनसे पहले मिस्टर बिंगली से मिल लेंगे। उनके आने का दिन पास आया, तो जेन ने अपनी बहन से कहा। 'अब तो मुझे लगने लगा है कि वे आएँ ही नहीं, यही अच्छा। मिलने पर भी मैं बिलकुल बेपरवाह रह सकती हूँ, सो बात कुछ है ही नहीं। पर लगातार यही चर्चा सुनते रहना मुझसे सहा नहीं जाता। माँ की नीयत अच्छी है। पर उनकी बातों से मुझे कितनी तकलीफ़ होती है, यह उन्हें मालूम नहीं। किसी को मालूम हो ही नहीं सकता। नेदरफ़ील्ड में उनके रहने के दिन ख़त्म हो जाएँ, तो मैं कितनी सुखी हो जाऊँगी!' 'काश मैं तुम्हें दिलासा देने लायक़ कुछ कह पाती,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'पर मेरे बस में कुछ भी नहीं। तुम्हें ख़ुद ही सहना होगा। दुख झेलते इंसान को सब्र का उपदेश देने का जो आम सुख है, वह भी तुम्हारे मामले में मुझे नहीं मिलता — तुम्हारे पास तो हमेशा से हद से ज़्यादा सब्र है।'
मिस्टर बिंगली आ गए। नौकरों की मदद से श्रीमती बेनेट को यह ख़बर सबसे पहले मिली। सो बेचैन और बेसब्र रहने का अपना समय उन्होंने जितना लंबा हो सकता था, उतना लंबा कर लिया। न्योता भेजने में अभी कितने दिन बाक़ी हैं, वे यही गिनती रहीं। उससे पहले उन्हें देख पाने की उम्मीद उन्हें नहीं थी। पर मिस्टर बिंगली को हर्टफ़र्डशायर आए तीसरा ही दिन था। उस सुबह अपने कमरे की खिड़की से उन्होंने देखा कि वे चरागाह में घुसकर घर की ओर घोड़ा दौड़ाते आ रहे हैं। अपनी ख़ुशी बाँटने के लिए उन्होंने बेटियों को हड़बड़ी में पुकारा। जेन डटकर मेज़ पर बैठी रही। एलिज़ाबेथ माँ का मन रखने के लिए खिड़की तक गई। उसने बाहर झाँका, मिस्टर बिंगली के साथ आते मिस्टर डार्सी को देखा, और लौटकर बहन के पास बैठ गई। 'माँ, उनके साथ एक और सज्जन आ रहे हैं,' किटी ने कहा। 'कौन होंगे?' 'कोई जान-पहचान वाले ही होंगे, बेटी। मुझे तो कुछ पता नहीं।' 'अरे!' किटी बोली। 'जो आदमी पहले उनके साथ आते थे, बिलकुल उन्हीं जैसे लगते हैं। नाम क्या था उनका? वही लंबे और घमंडी आदमी।' 'हे भगवान, ये तो मिस्टर डार्सी हैं! सचमुच वही हैं। ख़ैर, मिस्टर बिंगली का कोई भी दोस्त हो, इस घर में उसका हमेशा स्वागत है। पर इतनी बात न होती, तो मुझे कहना ही पड़ता कि उनकी सूरत देखना तक मुझे नहीं भाता।' जेन ने हैरानी और फ़िक्र भरी नज़र से एलिज़ाबेथ को देखा। डर्बीशायर में दोनों की मुलाक़ात के बारे में वह बहुत कम जानती थी। सो उसे इस बात का दुख हुआ कि डार्सी की सफ़ाई वाली चिट्ठी मिलने के बाद उसकी बहन क़रीब-क़रीब पहली ही बार उनके सामने पड़ेगी, और यह उसके लिए कितना असहज होगा। दोनों बहनें बेचैन थीं। दोनों एक-दूसरे की हालत की फ़िक्र कर रही थीं, और ज़ाहिर है, अपनी हालत की भी। माँ कहे जा रही थीं कि मिस्टर डार्सी उन्हें पसंद नहीं, और यह भी कि सिर्फ़ मिस्टर बिंगली के दोस्त होने के नाते वे शिष्टता निभाएँगी। पर दोनों में से किसी बहन ने नहीं सुना। एलिज़ाबेथ की बेचैनी की एक वजह ऐसी थी, जिसका जेन को अंदाज़ा तक नहीं था। श्रीमती गार्डिनर की चिट्ठी दिखाने की हिम्मत उसे अब तक नहीं हुई थी। यह कहने की हिम्मत भी नहीं हुई थी कि डार्सी के लिए उसका अपना मन बदल चुका है। जेन के लिए मिस्टर डार्सी बस वह आदमी थे, जिनका ब्याह का प्रस्ताव ठुकरा दिया गया और जिनकी ख़ूबियाँ ठीक से पहचानी नहीं गईं। पर एलिज़ाबेथ ज़्यादा जानती थी, और उसके लिए वे वह इंसान थे, जिनका सबसे बड़ा एहसान पूरे परिवार पर है। उनके लिए उसके मन में जो भाव था, वह जेन के बिंगली वाले भाव जितना कोमल भले न हो, पर कम से कम उतना ही समझ भरा और उतना ही जायज़ है — ऐसा वह मानती थी। वे नेदरफ़ील्ड आए, लॉन्गबर्न आए, और ख़ुद आगे बढ़कर उससे फिर मिलना चाहते हैं — यह हैरानी उतनी ही बड़ी थी, जितनी डर्बीशायर में उनका बदला हुआ ढंग पहली बार देखने पर हुई थी। थोड़ी देर के लिए उसे यक़ीन हुआ कि उनका प्यार और उनकी चाह अब तक नहीं बदली। उतनी देर में उड़ा हुआ रंग चेहरे पर और गहरा होकर लौट आया। ख़ुशी की मुस्कान उसकी दोनों आँखों में चमक उठी। पर एलिज़ाबेथ जल्दबाज़ी में कोई भरोसा नहीं बाँधना चाहती थी। 'पहले यह तो देख लूँ कि वे कैसा बरताव करते हैं,' उसने ख़ुद से कहा। 'उम्मीद बाँधने में उसके बाद भी देर नहीं होगी।'
एलिज़ाबेथ मन को थामे रखने के लिए जी लगाकर सिलाई करती बैठी रही। नौकर दरवाज़े की ओर बढ़ा, तो बेचैन उत्सुकता ने उसकी नज़र बहन के चेहरे पर टिका दी। उससे पहले तक उसे सिर उठाने की हिम्मत ही नहीं हुई थी। जेन रोज़ से ज़रा पीली थी, पर एलिज़ाबेथ के सोचे से ज़्यादा शांत थी। दोनों सज्जन सामने आए, तो उसका चेहरा लाल हो गया। फिर भी उसने काफ़ी सहजता से उनका स्वागत किया। न शिकवे का कोई भाव, न बेवजह मन जीतने की कोई कोशिश। शिष्टता जितनी कम बात करने की छूट देती थी, एलिज़ाबेथ ने दोनों से उतनी ही कम बात की और फिर बैठ गई। सिलाई में उसने ऐसा मन लगाया, जैसा आमतौर पर कभी नहीं दिखता था। डार्सी की ओर उसने बस एक बार नज़र उठाई। वे रोज़ की तरह गंभीर दिख रहे थे। पेम्बरली में देखे रूप से ज़्यादा, हर्टफ़र्डशायर में हमेशा दिखने वाले रूप के क़रीब लगे। पर हो सकता है, मामा-मामी के सामने वे जैसे हो सकते थे, वैसे उसकी माँ के सामने न हो पाते हों। यह ख़याल तकलीफ़देह ज़रूर था, पर बिलकुल अनहोना नहीं था। बिंगली को भी उसने एक पल देखा। पल भर का ही था, फिर भी उसने भाँप लिया कि वे ख़ुश भी हैं और घबराए हुए भी। श्रीमती बेनेट ने बिंगली का बहुत आदर से स्वागत किया। उनके दोस्त से उन्होंने ठंडे और बस रस्मी शिष्टाचार के साथ नमस्कार किया और बात की। यह फ़र्क़ इतना साफ़ था कि दोनों बेटियाँ शर्म से गड़ गईं। एलिज़ाबेथ को तो ख़ास तौर पर बहुत तकलीफ़ हुई। वह जानती थी कि माँ की सबसे प्यारी बेटी को कभी न मिटने वाली बदनामी से मिस्टर डार्सी ने ही बचाया है, और यह एहसान उन्हीं का है। फिर भी माँ इस तरह बेतुके ढंग से भेदभाव कर रही थीं। डार्सी ने पूछा कि मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर कैसे हैं। एलिज़ाबेथ घबराए बिना जवाब न दे सकी। उसके बाद वे क़रीब-क़रीब कुछ बोले ही नहीं। शायद उनकी चुप्पी की वजह यह रही हो कि वे उसके पास नहीं बैठ पाए। पर डर्बीशायर में ऐसा नहीं था। वहाँ एलिज़ाबेथ से बात न कर पाते, तब भी वे उसके दोस्तों से बात कर लेते थे। और यहाँ कई मिनट बीत गए, पर अब उनकी आवाज़ ही सुनाई नहीं दी। कभी-कभी एलिज़ाबेथ अपनी उत्सुकता रोक न पाती और नज़र उठाकर उनका चेहरा देख लेती। तब वे जितनी बार उसे देखते, उतनी ही बार जेन को भी देखते थे। और बहुत बार तो बस ज़मीन की ओर ही ताकते रहते। पिछली मुलाक़ात के मुक़ाबले अब वे ज़्यादा सोच में थे, और किसी को ख़ुश करने की चाह उनमें कम थी — यह साफ़ दिख रहा था। एलिज़ाबेथ को निराशा हुई, और ऐसी अपनी हालत पर ग़ुस्सा भी आया। 'क्या मैं इससे अलग कुछ उम्मीद कर सकती थी?' उसने ख़ुद से कहा। 'फिर आए ही क्यों?' डार्सी के सिवा किसी और से बात करने का मन एलिज़ाबेथ का था ही नहीं। पर उन्हीं से बात करने की हिम्मत उसमें लगभग नहीं थी। उसने उनकी छोटी बहन का हाल पूछ लिया, इससे आगे कुछ न कर सकी।
'मिस्टर बिंगली, आपको गए बहुत लंबा अरसा हो गया,' श्रीमती बेनेट ने कहा। उन्होंने तुरंत हामी भर दी। 'मुझे तो डर लगने लगा था कि आप अब कभी लौटेंगे ही नहीं। सचमुच ऐसी बात भी उड़ी थी कि माइकलमस पर आप यह घर पूरी तरह छोड़ देने वाले हैं। पर उम्मीद है, वह सच न हो। आपके जाने के बाद आस-पड़ोस में बहुत सारे बड़े बदलाव हुए। मिस लुकास का ब्याह हो गया और वे अपने घर बस गईं। और मेरी एक बेटी का भी ब्याह हो गया। आपने सुना तो होगा ही। सच तो यह है कि आपने अख़बारों में भी पढ़ा होगा। «टाइम्स» और «कूरियर» में छपा था, यह मुझे मालूम है। पर जैसा छपना चाहिए था, वैसा छपा ही नहीं। बस इतना ही था — «हाल ही में मिस्टर जॉर्ज विकहम और मिस लिडिया बेनेट का ब्याह हुआ।» न पिता का नाम, न रहने की जगह, न और कुछ — एक शब्द भी नहीं। और लिखा भी मेरे भाई मिस्टर गार्डिनर ने था। पता नहीं उनसे इतना बेढंगा कैसे लिखा गया। आपने देखा था?' बिंगली ने कहा कि हाँ, देखा था, और बधाई भी दी। एलिज़ाबेथ की नज़र उठाने की हिम्मत नहीं हुई। सो मिस्टर डार्सी के चेहरे पर क्या भाव थे, यह वह जान न सकी। माँ कहती रहीं। 'बेटी का अच्छे घर ब्याह हो जाए, यह ख़ुशी की बात तो है ही। पर मिस्टर बिंगली, बेटी का यूँ मुझसे छिन जाना बहुत भारी पड़ता है। दोनों उत्तर में न्यूकैसल चले गए, जो बहुत ही दूर बताया जाता है। वहाँ कितने दिन रहेंगे, यह मुझे नहीं मालूम। विकहम की रेजिमेंट वहीं है। आपने सुना ही होगा कि वे शायर रेजिमेंट छोड़कर नियमित सेना में चले गए। भगवान का शुक्र है कि उनके कुछ दोस्त तो हैं। जितने होने चाहिए थे, उतने शायद नहीं हैं।' एलिज़ाबेथ समझ गई कि यह बात मिस्टर डार्सी पर ही तानी गई है। शर्म और तकलीफ़ इतनी हुई कि उससे बैठा तक नहीं जा रहा था। पर जिस बात ने पहले उससे एक शब्द नहीं निकलवाया था, उसी ने अब उसे बोलने का बल दे दिया। एलिज़ाबेथ ने बिंगली से पूछा कि इस बार वे इस इलाक़े में कितने दिन रुकने की सोच रहे हैं। उन्होंने कहा, कुछ हफ़्ते। 'मिस्टर बिंगली, नेदरफ़ील्ड की सारी चिड़ियाँ आप मार चुकें,' माँ ने कहा, 'तो यहाँ चले आइए और मिस्टर बेनेट की जागीर में जितना मन हो, उतना शिकार कीजिए। मेरे पति आपकी यह बात मानकर बहुत ख़ुश होंगे। और सबसे अच्छे झुंड वे पूरे के पूरे आपके लिए छोड़ देंगे।' इतनी बेमतलब और दख़ल देने वाली मेहरबानी से एलिज़ाबेथ की तकलीफ़ और बढ़ गई। एक साल पहले जिस सुंदर भविष्य ने उन्हें उछाल दिया था, वह अब फिर सामने आ रहा हो, तो सब कुछ उसी चिढ़ाने वाले अंत की ओर दौड़ेगा — उसे इसका पक्का यक़ीन हो गया। उस पल उसे लगा कि कई साल का सुख भी जेन को और उसे इन तकलीफ़देह और उलझन भरे पलों का बदला नहीं दे सकता। उसने ख़ुद से कहा। 'मेरे मन की सबसे बड़ी चाह यही है कि इन दोनों में से किसी के साथ मैं फिर कभी एक जगह न बैठूँ। इनके साथ मिलने वाला कोई भी सुख इस बदहाली का बदला नहीं दे सकता! दोनों में से कोई फिर कभी न मिले!' पर जिस बदहाली का बदला कई साल के सुख से भी न मिलने की बात थी, वह जल्द ही बहुत घट गई। उसने देख लिया कि उसकी बहन की सुंदरता पुराने चाहने वाले के मन में फिर कितनी तारीफ़ जगा रही है। भीतर आते वक़्त बिंगली ने जेन से बहुत कम बात की थी। पर हर पाँच मिनट के बाद वे और ज़्यादा ध्यान देते लग रहे थे। उन्होंने पाया कि जेन पिछले साल जितनी ही सुंदर है, और उतनी ही मीठी और सादगी भरी भी। बस पहले जितनी बातूनी नहीं रही। जेन की चाह यही थी कि उसमें कोई बदलाव किसी को न दिखे। और उसे सचमुच लगता था कि वह पहले जितना ही बोल रही है। पर मन इतना भरा हुआ था कि वह कब चुप हो जाती है, यह उसे हमेशा पता ही नहीं चलता था। दोनों सज्जन जाने के लिए उठे, तो श्रीमती बेनेट को अपनी सोची हुई शिष्टता याद आ गई। उन्होंने कुछ दिन बाद लॉन्गबर्न में खाने का न्योता दिया, और दोनों ने उसे मान लिया। उन्होंने जोड़ा। 'मिस्टर बिंगली, आप पर मेरी एक मुलाक़ात बाक़ी है। पिछली सर्दियों में आप लंदन जा रहे थे, तब वादा किया था कि लौटते ही हमारे साथ घरेलू ढंग से खाना खाएँगे। देखिए, मैं भूली नहीं हूँ। और सच कहूँ तो आप वादा निभाने लौटे ही नहीं, इसका मुझे बहुत बड़ा मलाल रहा।' इस बात पर बिंगली के चेहरे पर ज़रा बुद्धू-सा भाव आ गया। उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि काम-काज की वजह से वे आ नहीं सके, और इसका उन्हें अफ़सोस है। फिर दोनों चले गए। श्रीमती बेनेट का बहुत मन था कि दोनों उसी शाम रुककर खाना खा लें। पर वे हमेशा बढ़िया खाना रखती थीं, फिर भी उन्हें लगा कि जिस आदमी पर उनकी इतनी बेताब नज़र है, उसके लिए दो दौर से कम का खाना काफ़ी नहीं होगा। साल के दस हज़ार पाउंड कमाने वाले की भूख और उसका स्वाभिमान, दोनों संतुष्ट करने ज़रूरी थे।