हिंदी संस्करण

अध्याय 59

'प्यारी लिज़ी, आख़िर तुम कहाँ तक टहलकर आ गईं?' कमरे में क़दम रखते ही एलिज़ाबेथ को जेन से यही सुनने को मिला। खाने की मेज़ पर बैठी, तो बाक़ी सबने भी यही पूछा। एलिज़ाबेथ ने बस इतना कहा कि वह इधर-उधर घूमती रही, और ख़ुद उसे भी पता नहीं कि कहाँ-कहाँ। कहते हुए उसका चेहरा लाल हो गया। पर न उस बात से, न किसी और बात से किसी को सच का शक हुआ। वह शाम बिना किसी ख़ास बात के चुपचाप बीत गई। जिनकी मँगनी हो चुकी थी, वे दोनों बातें करते और हँसते रहे। जिन्होंने अब तक अपने मन की बात खोली नहीं थी, वे चुप रहे। डार्सी ऐसे इंसान नहीं थे कि ख़ुशी हँसी बनकर छलक पड़े। एलिज़ाबेथ भी घबराई हुई और उलझी हुई थी। वह सुख महसूस कर रही हो, ऐसा नहीं था — बस इतना जानती थी कि वह सुखी है। अभी की झेंप के अलावा आगे आने वाली मुश्किलें भी सामने थीं। यह बात खुल गई, तो घरवालों के मन में क्या उठेगा — इसका अंदाज़ा उसे था। जेन के सिवा डार्सी को कोई पसंद नहीं करता था। डर यह भी था कि कहीं घरवालों के मन में ऐसी नफ़रत न बैठी हो, जिसे डार्सी की दौलत और ऊँचा दर्जा भी मिटा न सकें।

उस रात एलिज़ाबेथ ने जेन के आगे अपना मन खोल दिया। शक करना मिस बेनेट के स्वभाव से बहुत दूर की बात थी। पर इस बार उससे यक़ीन हो ही नहीं पाया। 'तुम मज़ाक़ कर रही हो, लिज़ी। ऐसा हो ही नहीं सकता! मिस्टर डार्सी से मँगनी? नहीं, नहीं। मुझे धोखा देने की कोशिश मत करो। मैं जानती हूँ कि यह मुमकिन ही नहीं।' 'यह तो बहुत ही बुरी शुरुआत हुई! मुझे भरोसा तो सिर्फ़ तुम्हीं पर था। तुम नहीं मानोगी, तो और कोई भी नहीं मानेगा, यह तय है। पर बात सच है। मैं पूरे मन से कह रही हूँ। वे आज भी मुझसे प्यार करते हैं, और हमारी मँगनी हो चुकी है।' जेन ने शक भरी नज़र से उसे देखा। 'हाय लिज़ी! ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं जानती हूँ कि तुम उनसे कितनी नफ़रत करती थीं।' 'तुम कुछ नहीं जानतीं। वह सब भूल जाना चाहिए। हो सकता है कि मैंने उन्हें हमेशा ऐसे प्यार न किया हो, जैसे अब करती हूँ। पर ऐसी बातों में याददाश्त का तेज़ होना ऐसी ग़लती है, जो माफ़ ही नहीं की जा सकती। मैं भी आख़िरी बार उस बात को याद कर रही हूँ।' मिस बेनेट अब भी हैरान चेहरे से देखती रही। एलिज़ाबेथ ने एक बार फिर, और भी गंभीर होकर भरोसा दिलाया कि यह सच है। 'हे भगवान! क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? फिर भी अब मुझे तुम्हारी बात मान ही लेनी चाहिए।' जेन पुकार उठी। 'प्यारी लिज़ी, सच्चे मन से बधाई। पर यह सवाल पूछने के लिए माफ़ करना। क्या तुम्हें सचमुच यक़ीन है कि तुम उनके साथ सुखी रह सकोगी?' 'मुझे ज़रा भी शक नहीं। हम दुनिया के सबसे सुखी पति-पत्नी बनेंगे — यह तो हम दोनों तय भी कर चुके हैं। पर तुम ख़ुश हो? ऐसा बहनोई पाकर तुम्हें अच्छा लग रहा है?' 'बहुत, बहुत अच्छा लग रहा है। बिंगली को या मुझे इससे बड़ी ख़ुशी कोई दे ही नहीं सकता। पर हमने इस पर सोचा भी था और आपस में बात भी की थी। और फिर यही माना कि यह मुमकिन नहीं। पर तुम सचमुच उन्हें इतना प्यार करती हो? हाय लिज़ी! प्यार किए बिना ब्याह करने के सिवा जो चाहो कर लो। तुम्हें जो महसूस करना चाहिए, वह सचमुच महसूस कर रही हो — इसका पक्का यक़ीन कर लेना ज़रूरी है।' 'हाँ, बिल्कुल! पूरी बात सुन लोगी, तो तुम्हें लगेगा कि जितना मुझे महसूस करना चाहिए, उससे भी ज़्यादा कर रही हूँ।' 'इसका क्या मतलब?' 'यानी मुझे यह क़बूल करना पड़ेगा कि बिंगली से जितना प्यार मैं करती हूँ, मिस्टर डार्सी से उससे भी ज़्यादा करती हूँ। डर लग रहा है कि तुम नाराज़ न हो जाओ।' 'प्यारी छोटी बहन, अब मेहरबानी करके गंभीर होकर बात करो। मैं बहुत ही गंभीरता से बात करना चाहती हूँ। जो कुछ मुझे जानना चाहिए, सब अभी बता दो। बताओगी कि तुमने उन्हें कब से प्यार करना शुरू किया?' 'यह मन इतने धीरे-धीरे बढ़ा कि कब शुरू हुआ, यह मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम। पर लगता है, कहना यही चाहिए कि पेम्बरली की ख़ूबसूरत जागीर पहली बार देखने के दिन से।' जेन ने फिर मिन्नत की कि गंभीर होकर जवाब दो। इसका वही असर हुआ, जो वह चाहती थी। एलिज़ाबेथ ने पूरी संजीदगी से दोहराया कि वह डार्सी से प्यार करती है। सुनकर जेन जल्दी ही संतुष्ट हो गई। इस बात पर भरोसा हो गया, तो मिस बेनेट को और कुछ चाहिए ही नहीं था। 'अब मैं पूरी तरह सुखी हूँ।' जेन ने कहा। 'क्योंकि तुम भी मेरे जितनी ही सुखी रहोगी। मैं उनका हमेशा आदर करती रही हूँ। वे तुमसे प्यार करते हैं — बस इतनी-सी वजह से भी मैं उनका आदर करती रहती। पर अब वे बिंगली के दोस्त हैं और तुम्हारे पति बनने वाले हैं। सो बिंगली और तुम्हारे सिवा मेरे लिए उनसे बढ़कर कोई नहीं होगा। पर लिज़ी, तुमने सचमुच अपना मन छिपाया और मुझसे भेद रखा। पेम्बरली और लैम्बटन में जो कुछ हुआ, उसकी कितनी कम बात तुमने मुझे बताई! उस बारे में मैं जो कुछ जानती हूँ, वह सब तुमसे नहीं, दूसरों से सुना है।' एलिज़ाबेथ ने बता दिया कि उसने भेद क्यों रखा। वह बिंगली का ज़िक्र नहीं छेड़ना चाहती थी। और अपना मन भी तय नहीं था, सो उनके दोस्त का नाम भी टालती रही। पर लिडिया के ब्याह में डार्सी ने जो किया, वह अब उसने और नहीं छिपाया। सब कुछ खोलकर रख दिया। दोनों ने बातों में रात का आधा हिस्सा बिता दिया।

अगली सुबह खिड़की के पास खड़ी श्रीमती बेनेट पुकार उठीं। 'हे भगवान! वह नागवार मिस्टर डार्सी फिर हमारे प्यारे बिंगली के साथ चले आ रहे हैं! रोज़ चले आते हैं और यूँ तंग करते हैं — पता नहीं क्या सोचते हैं। मुझे तो लगा था कि वे शिकार पर या कहीं और चले जाएँगे और हमें परेशान नहीं करेंगे। अब उनका क्या करें? लिज़ी, तू फिर उनके साथ टहलने निकल जा। ताकि वे बिंगली के रास्ते में न आएँ।' इतने काम की तरकीब सुनकर एलिज़ाबेथ लगभग हँस ही पड़ी। फिर भी माँ हमेशा डार्सी को इसी नाम से पुकारती हैं, यह उसे सचमुच बुरा लगा। दोनों भीतर आए ही थे कि बिंगली ने बहुत गहरे मतलब वाली नज़र से एलिज़ाबेथ को देखा। और बड़ी गरमजोशी से हाथ मिलाया। उन्हें अच्छी ख़बर मालूम है, इसमें ज़रा भी शक नहीं रहा। फिर बिंगली ऊँची आवाज़ में बोले। 'श्रीमती बेनेट, यहाँ आस-पास और कोई ऐसी पगडंडी नहीं बची, जहाँ लिज़ी आज फिर रास्ता भटक सकें?' 'मेरा मन है कि मिस्टर डार्सी, लिज़ी और किटी आज सुबह ओकम माउंट तक हो आएँ।' श्रीमती बेनेट ने कहा। 'दूर तक चलने का अच्छा रास्ता है, और मिस्टर डार्सी ने वहाँ का नज़ारा एक बार भी नहीं देखा।' मिस्टर बिंगली ने जवाब दिया। 'बाक़ी दोनों के लिए तो बहुत अच्छा रहेगा, पर किटी के लिए यह रास्ता ज़रूर बहुत दूर पड़ेगा। है न, किटी?' किटी ने मान लिया कि उसका घर पर ही रहना अच्छा है। डार्सी ने कहा कि पहाड़ी से दिखने वाला नज़ारा देखने की उन्हें बहुत उत्सुकता है। एलिज़ाबेथ चुपचाप मान गई। वह तैयार होने ऊपर गई, तो श्रीमती बेनेट पीछे-पीछे आईं और बोलीं। 'लिज़ी, उस नागवार आदमी के साथ तुझे अकेले रहना पड़ेगा — बड़ी बुरी बात है। पर तू ज़्यादा मन पर मत ले। यह सब जेन के लिए ही तो है। बीच-बीच में एक-दो बात कह देने के सिवा उनसे बोलने की ज़रूरत भी नहीं, सो ज़्यादा मेहनत मत कर।' टहलते हुए दोनों ने तय किया कि उसी शाम मिस्टर बेनेट से इजाज़त माँग ली जाए। एलिज़ाबेथ ने कहा कि माँ की इजाज़त वह ख़ुद माँगेगी। माँ इसे किस तरह लेंगी, यह कहा नहीं जा सकता था। डार्सी की सारी दौलत और सारा रुतबा भी माँ के मन में उनके लिए बैठी नफ़रत को हरा पाएँगे या नहीं — कभी-कभी इस पर भी शक होता था। पर माँ इस ब्याह का ज़ोरदार विरोध करें या ज़ोरदार ख़ुशी जताएँ, बात एक ही थी। दोनों में से जो भी हो, यह तय था कि माँ समझदारी से पेश नहीं आ पाएँगी। पहली बार फूटने वाला ख़ुशी का शोर हो या पहली बार दिखने वाला तीखा विरोध — मिस्टर डार्सी को वह सुनने देना मुमकिन ही नहीं था।

उस शाम मिस्टर बेनेट को पुस्तकालय में गए ज़्यादा देर नहीं हुई थी कि मिस्टर डार्सी भी उठे और उनके पीछे जाते दिखे। यह देखकर एलिज़ाबेथ का मन बुरी तरह हिल गया। डर यह नहीं था कि पिताजी मना कर देंगे। पर पिताजी दुखी होंगे, और उसकी वजह वह ख़ुद होगी। सबसे प्यारी बेटी ने जिसे चुना, उसी की वजह से पिताजी को तकलीफ़ हो, और बेटी को विदा करने में उन्हें डर और पछतावा मिले — यह सोचना ही भयानक था। मिस्टर डार्सी के लौट आने तक वह बेहद दुखी मन से बैठी रही। उन्हें देखा, तो चेहरे पर मुस्कान दिखी और मन कुछ हलका हुआ। कुछ मिनट बाद वे उस मेज़ के पास आए, जहाँ वह किटी के साथ बैठी थी। एलिज़ाबेथ की सिलाई निहारने का बहाना करते हुए उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। 'आप अपने पिताजी के पास हो आइए। वे पुस्तकालय में इंतज़ार कर रहे हैं।' एलिज़ाबेथ फ़ौरन चली गई। पिताजी गंभीर और चिंता भरे चेहरे से कमरे में टहल रहे थे। 'लिज़ी।' वे बोले। 'यह क्या कर रही हो? होश खोकर इस आदमी को क़बूल कर लिया? तुम तो हमेशा उनसे नफ़रत करती रही हो न?' उस पल एलिज़ाबेथ के मन में यही चाह उठी कि पहले पाले हुए उसके ख़याल कुछ और समझदारी भरे होते और उसकी बातें कुछ और सँभली हुई होतीं। तब यह सब इतनी झेंप के साथ कहना और क़बूल करना न पड़ता। पर अब कहना ही था। कुछ घबराते हुए भी एलिज़ाबेथ ने भरोसा दिलाया कि वह मिस्टर डार्सी से प्यार करती है। 'यानी तुमने ठान ही लिया है कि उनसे ब्याह करोगी। दौलतमंद तो वे हैं ही। जेन से ज़्यादा अच्छे कपड़े और बढ़िया गाड़ियाँ तुम्हें मिल जाएँगी। पर क्या ये चीज़ें तुम्हें सुखी कर देंगी?' 'आपको लगता है कि मेरे मन में कुछ है ही नहीं — इसके सिवा,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'आपके पास मना करने की और कोई वजह है?' 'बिल्कुल नहीं। हम सब जानते हैं कि वे घमंडी और नागवार इंसान हैं। पर तुम्हें सचमुच वे पसंद हैं, तो यह कोई बात ही नहीं।' 'पसंद हैं, सचमुच पसंद हैं।' आँखों में आँसू भरकर एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'मैं उनसे प्यार करती हूँ। उनमें बेजा घमंड है ही नहीं। वे बेहद नरम दिल के इंसान हैं। वे असल में कैसे हैं, यह आप जानते ही नहीं। सो मेहरबानी करके ऐसी बातों से मुझे दुख मत दीजिए।' 'लिज़ी।' पिताजी बोले। 'मैंने उन्हें इजाज़त दे दी है। सच कहूँ, वे उसी क़िस्म के आदमी हैं कि कृपा करके कुछ माँग लें, तो मना करने की हिम्मत मुझमें नहीं। तुमने ठान ही लिया है कि उनसे ब्याह करोगी, तो अब तुम्हें भी इजाज़त देता हूँ। पर कहना यही चाहता हूँ कि एक बार और सोच लो। मैं तुम्हारा स्वभाव जानता हूँ, लिज़ी। मैं जानता हूँ कि तुम अपने पति का सच्चे मन से आदर न करो, उन्हें अपने से ऊँचा मानकर न देखो, तो न तुम सुखी रह सकोगी, न तुम्हें इज़्ज़त मिलेगी। तुम्हारा मिज़ाज चंचल है और दिमाग़ तेज़ — बेमेल ब्याह में तुम सबसे बड़े ख़तरे में पड़ोगी। बदनामी और बदहाली से बच पाना लगभग नामुमकिन होगा। बेटी, अपने जीवन-साथी का आदर तुम कर ही न पाओ — यह देखने का ग़म मुझे मत देना। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम इस वक़्त क्या कर रही हो।' एलिज़ाबेथ का मन और भर आया। उसने गंभीर और संजीदा होकर जवाब दिया। बार-बार भरोसा दिलाया कि उसने सचमुच मिस्टर डार्सी को ही चुना है। यह भी बताया कि उनके बारे में उसकी सोच किस तरह धीरे-धीरे बदलती गई। कहा कि उनका प्यार एक दिन में पैदा नहीं हुआ। वह प्यार कई महीनों की डाँवाडोल घड़ियाँ झेलने के बाद का है, और इस बात का उसे पूरा यक़ीन है। फिर उसने जोश के साथ उनकी एक-एक अच्छाई गिनाई। आख़िर में पिताजी का शक नरम पड़ गया और उन्होंने यह ब्याह मान लिया। बेटी की बात ख़त्म हुई, तो पिताजी बोले। 'ठीक है, बेटी। अब मुझे और कुछ नहीं कहना। ऐसा है, तो वे तुम्हें पाने के हक़दार हैं। अपनी लिज़ी को मैं इससे कम किसी आदमी के हाथ में नहीं दे पाता।' असर और गहरा करने के लिए एलिज़ाबेथ ने यह भी बता दिया कि मिस्टर डार्सी ने लिडिया के लिए ख़ुद अपनी ओर से क्या किया। पिताजी हैरान होकर सुनते रहे। 'आज की शाम तो हैरानी पर हैरानी लिए आ रही है! यानी सब कुछ डार्सी ने ही किया। ब्याह करवाया, पैसे दिए, उस आदमी का क़र्ज़ चुकाया, और फ़ौज में ओहदा भी दिलवा दिया! और अच्छा हुआ। इससे मेरी बड़ी दौड़-धूप और बड़ी कंजूसी बच जाएगी। यह काम तुम्हारे मामा ने किया होता, तो मुझे उनका पैसा लौटाना ही पड़ता, और मैं ज़रूर लौटाता। पर इस तरह ज़ोरों से प्यार में पड़े नौजवान हर काम अपनी ही मरज़ी से करते हैं। कल मैं उनसे कहूँगा कि पैसा लौटा देता हूँ। तब वे तुम्हारे लिए अपने प्यार का हवाला देकर चीख़ेंगे-चिल्लाएँगे, और बात वहीं ख़त्म हो जाएगी।' फिर उन्हें कुछ दिन पहले की वह बात याद आई, जब मिस्टर कॉलिन्स की चिट्ठी पढ़ते हुए बेटी झेंप गई थी। कुछ देर वे बेटी को छेड़कर हँसते रहे। आख़िर कहा कि अब वह जा सकती है। एलिज़ाबेथ कमरे से निकल रही थी, तभी वे बोले। 'मैरी या किटी के पास कोई नौजवान आए, तो उसे भीतर भेज देना। मैं बिल्कुल ख़ाली बैठा हूँ।'

एलिज़ाबेथ के मन से अब एक बहुत भारी बोझ उतर गया। अपने कमरे में आधा घंटा चुपचाप सोचने के बाद वह ख़ासी शांति से बाक़ी लोगों के बीच जा बैठी। सब कुछ इतना ताज़ा था कि खिलखिलाना मुमकिन नहीं था। फिर भी शाम चैन से बीती। अब डरने लायक़ कोई बड़ी बात बची नहीं थी। सहजता और अपनेपन का सुकून भी वक़्त आने पर मिल ही जाएगा। उस रात माँ अपने कमरे में ऊपर जा रही थीं, तो एलिज़ाबेथ पीछे-पीछे गई और यह बड़ी ख़बर सुना दी। असर हैरान कर देने वाला रहा। पहली बार सुनकर श्रीमती बेनेट हिली तक नहीं। बैठी रहीं और मुँह से एक अक्षर तक नहीं निकाल पाईं। घर के फ़ायदे की बात हो या किसी बेटी के लिए कोई रिश्ता आया हो — ऐसी ख़बरों पर यक़ीन करने में वे कभी देर नहीं लगाती थीं। फिर भी कई मिनट तक, बहुत ही कई मिनट तक उनकी समझ में आया ही नहीं कि सुना क्या है। आख़िर उनका होश लौटने लगा। वे कुर्सी से बेचैनी में उठीं, फिर बैठ गईं, और हैरान होकर वाह-वाह करने लगीं। 'हे भगवान! हे मेरे मालिक! ज़रा सोच तो! अरे बाप रे! मिस्टर डार्सी! किसने सोचा होगा? क्या यह सचमुच सच है? हाय, मेरी सबसे प्यारी लिज़ी! तू कितनी अमीर और कितनी बड़ी हो जाएगी! जेब-ख़र्च, गहने, गाड़ियाँ — तेरे पास कितना कुछ होगा! जेन का रिश्ता तो इसके आगे कुछ भी नहीं। सचमुच कुछ भी नहीं। मैं इतनी ख़ुश हूँ, इतनी सुखी हूँ। इतने मनमोहक आदमी! कितने ख़ूबसूरत और कितने लंबे! हाय, प्यारी लिज़ी! पहले मैं उन्हें इतना नापसंद करती थी — मेहरबानी करके मेरी तरफ़ से उसकी माफ़ी माँग ले। उम्मीद है वे उसे भुला देंगे। मेरी प्यारी, बहुत प्यारी लिज़ी। लंदन में घर भी होगा! सब कुछ कितना शानदार है! तीन बेटियों का ब्याह! साल की आमदनी दस हज़ार पाउंड! हे भगवान! मेरा क्या होगा? मैं तो पागल ही हो जाऊँगी।' इतना सुन लेने के बाद माँ की रज़ामंदी पर शक करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। भावनाओं का यह उफ़ान सिर्फ़ उसी ने सुना — एलिज़ाबेथ को यह अच्छा लगा। वह जल्दी ही वहाँ से चली गई। पर अपने कमरे में आए तीन मिनट भी नहीं हुए थे कि माँ पीछे-पीछे आ गईं। 'मेरी सबसे प्यारी बेटी।' वे पुकार उठीं। 'मुझे और कुछ सूझ ही नहीं रहा। साल की आमदनी दस हज़ार पाउंड, और शायद इससे भी कहीं ज़्यादा! यह तो लगभग किसी लॉर्ड जैसा हुआ! ख़ास इजाज़तनामा भी लेना होगा। ब्याह ज़रूर ख़ास इजाज़तनामे से ही होना चाहिए। पर मेरी सबसे प्यारी बेटी, यह बता दे कि मिस्टर डार्सी को कौन-सा पकवान सबसे ज़्यादा पसंद है। कल वही बनवाऊँगी।' माँ उन सज्जन के सामने पड़ने पर कैसा बरताव करेंगी — यह उसका दुखद संकेत था। एलिज़ाबेथ को डार्सी का सबसे गरम प्यार मिल चुका था, और घरवालों की रज़ामंदी भी। फिर भी उसे लगा कि चाहने को अब भी कुछ बचा है। पर अगला दिन उम्मीद से कहीं ज़्यादा आसानी से बीता। ख़ुशक़िस्मती से श्रीमती बेनेट अपने होने वाले दामाद से बहुत ही दबती थीं। सो कुछ खाने-पीने को कहने या उनकी राय का आदर जताने के सिवा उनसे बात करने की हिम्मत ही नहीं कर पाईं। पिताजी डार्सी को जानने-समझने की कोशिश कर रहे हैं — यह देखकर एलिज़ाबेथ को संतोष हुआ। जल्दी ही मिस्टर बेनेट ने बेटी को भरोसा दिलाया कि डार्सी के बारे में उनकी राय दिन-ब-दिन बेहतर होती जा रही है। 'मैं अपने तीनों दामादों को बहुत ऊँचा मानता हूँ।' वे बोले। 'शायद विकहम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हों। फिर भी लगता है कि तुम्हारे पति को भी मैं जेन के पति जितना ही पसंद करने लगूँगा।'