हिन्दी संस्करण
अध्याय 18
'मेडोरा मौसी! आप दोनों कोई साज़िश तो नहीं रच रहीं?' कमरे में आती श्रीमती ओलेंस्का ने पुकारकर कहा। वे नृत्य-समारोह जाने वालों-सी सजी थीं: उन पर सब कुछ हौले-हौले झिलमिलाता था, मानो पोशाक मोमबत्ती की किरणों से बुनी हो; और सिर यों ऊँचा था जैसे कोई सुंदरी प्रतिद्वंद्वियों भरे कक्ष को ललकारती हो। 'हम तो कह रही थीं, बेटी, कि यहाँ तेरे लिए एक प्यारा अचरज रखा है,' मार्कीज़ा मैनसन ने उठकर शरारत से फूलों की ओर इशारा करते हुए कहा। श्रीमती ओलेंस्का ठिठकीं और गुलदस्ते को देखा। रंग नहीं बदला, पर ग़ुस्से की एक सफ़ेद कौंध गर्मियों की बिजली-सी उन पर से गुज़र गई। 'आह!' वे ऐसी तीखी आवाज़ में चीख़ीं जो आर्चर ने उनसे कभी नहीं सुनी थी, 'ऐसा हास्यास्पद गुलदस्ता भला कौन भेजता है? गुलदस्ता क्यों? और आज ही की रात क्यों? मैं किसी नाच में नहीं जा रही; मैं कोई सगाई वाली लड़की भी नहीं। पर कुछ लोग हमेशा बेवक़ूफ़ी ही करते हैं।'
वे फिर दरवाज़े तक गईं, उसे खोला और पुकारा: 'नास्तासिया!' हरदम हाज़िर नौकरानी तुरंत आ गई, और आर्चर ने सुना कि श्रीमती ओलेंस्का इतालवी में धीरे-धीरे, जान-बूझकर साफ़ बोल रही हैं, मानो चाहती हों कि वह समझे: 'इसे कूड़े में फेंक दो!' नास्तासिया के हक्का-बक्का ताकने पर उन्होंने जोड़ा: 'नहीं — बेचारे फूलों का दोष नहीं। लड़के से कहो, तीन घर छोड़कर विंसेट साहब के यहाँ दे आए — वही साँवले सज्जन जो यहाँ खाने पर थे। उनकी पत्नी बीमार हैं; शायद इनसे उन्हें ख़ुशी मिले... लड़का बाहर गया है? तो तू ही चली जा, मेरी जान; ले, मेरा लबादा ओढ़ और दौड़ जा। मैं इसे अभी, इसी वक़्त घर से बाहर चाहती हूँ! और ख़बरदार, यह मत कहना कि मैंने भेजे हैं!' उन्होंने मख़मली लबादा नौकरानी के कंधों पर डाला और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर बैठक में लौटीं। लेस तले उनका सीना उठ रहा था; एक पल आर्चर को लगा कि वे रो पड़ेंगी, पर वे हँस पड़ीं और दोनों को बारी-बारी देखकर अचानक पूछा: 'और आप दोनों? दोस्ती हो गई?'
'यह तो आर्चर साहब बताएँगे, बेटी: तू कपड़े पहन रही थी और वे धीरज से बैठे रहे।' 'हाँ — मैंने आप लोगों को भरपूर समय दिया: मेरे बाल क़ाबू में ही नहीं आ रहे थे,' श्रीमती ओलेंस्का ने ऊँचे जूड़े पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया। 'इससे याद आया: डॉक्टर कार्वर तो चले गए लगते हैं, और मौसी, आप ब्लेंकर के यहाँ लेट हो जाएँगी। आर्चर साहब, मौसी को गाड़ी तक पहुँचा देंगे?' वे मार्कीज़ा के पीछे दालान तक गईं, उन्हें जूतों, शालों और मफ़लरों के बीच जमते देखा, और दहलीज़ से पुकारा: 'याद रहे — गाड़ी दस बजे मुझे लेने लौट आए!' फिर बैठक में लौटीं; भीतर आते आर्चर ने उन्हें अँगीठी के पास आईने में अक्स निहारते पाया। न्यूयॉर्क में रिवाज़ नहीं था कि कोई महिला नौकरानी को 'मेरी जान' कहे और अपना लबादा ओढ़ाकर काम पर भेजे; और आर्चर, भीतर की गहरी हलचल के बीच, उस दुनिया की अजीब सिहरन महसूस कर रहा था जहाँ भावना ओलंपस के देवताओं-सी तेज़ी से कर्म बनती थी। आर्चर पीछे आया तो श्रीमती ओलेंस्का हिली नहीं,
और एक क्षण दोनों की आँखें आईने में मिलीं। फिर वे मुड़ीं, सोफ़े के कोने में जा गिरीं और आह भरकर बोलीं: 'एक सिगरेट भर का समय है।' आर्चर ने डिबिया बढ़ाई, लकड़ी की पतली फाँस जलाई; लौ ने उनका चेहरा रोशन किया तो उन्होंने हँसती आँखों से पूछा: 'ग़ुस्से में मैं कैसी लगती हूँ?' आर्चर पल भर ठिठका; फिर जैसे ठानकर बोला: 'अब समझ में आया कि आपकी मौसी आपके बारे में क्या कहती थीं।' 'मुझे पता था कि उन्होंने मेरी बात की है। क्या कहा उन्होंने?' 'कहा कि आप हर तरह की चीज़ों की आदी रही हैं — शान-शौक़त, मौज-मज़े, रोमांच — जो हम यहाँ आपको कभी नहीं दे सकते।' श्रीमती ओलेंस्का धुएँ के घेरे में फीकी मुस्कान मुस्कराईं। 'मेडोरा लाइलाज रूमानी हैं। इसी ने उनकी बहुत सारी कमियाँ पूरी की हैं।' आर्चर फिर हिचकिचाया, फिर जोखिम उठाया: 'आपकी मौसी की रूमानियत हमेशा सटीक होती है?' 'यानी — क्या वे सच बोलती हैं?' उन्होंने सोचकर कहा। 'बताती हूँ: वे जो भी कहती हैं उसमें थोड़ा सच और थोड़ा झूठ मिला होता है। पर आप पूछ क्यों रहे हैं? उन्होंने क्या कहा?' उसने आग में देखा, फिर उनके दमकते रूप की ओर। यह सोचकर उसका दिल कसा कि इस अँगीठी के सामने यह उन दोनों की आख़िरी शाम है, और अभी गाड़ी उन्हें ले जाने आ जाएगी। 'वे कहती हैं — उनका दावा है कि
काउंट ओलेंस्की ने उनसे कहा है कि वे आपको उसके पास लौटने के लिए मनाएँ।' श्रीमती ओलेंस्का ने कोई जवाब नहीं दिया। वे सिगरेट आधी उठाए, निश्चल बैठी रहीं। चेहरे का भाव नहीं बदला; आर्चर पहले से जानता था कि उन्हें चौंका हुआ देखना कितना कठिन है। 'तो आपको मालूम था?' वह बोल पड़ा। वे इतनी देर चुप रहीं कि सिगरेट की राख गिर पड़ी; उन्होंने उसे फ़र्श पर झाड़ दिया। 'मौसी ने एक चिट्ठी का इशारा किया था। बेचारी मौसी! मेडोरा के इशारे—' 'क्या वे आपके पति के कहने पर यहाँ आई हैं?' 'यह भी कोई नहीं जानता। मुझसे बोलीं कि उन्हें डॉक्टर कार्वर से 'आत्मिक बुलावा' मिला है — वह जो भी बला हो। डर है कि मेडोरा डॉक्टर कार्वर से शादी करना चाहती हैं... बेचारी मेडोरा — उन्हें हमेशा किसी न किसी से शादी करनी होती है! या शायद क्यूबा वाले ही उनसे ऊब गए और विदा कर दिया। मेरा ख़याल है वे उनके साथ पगार पर संगिनी बनकर थीं। सच कहूँ, मैं नहीं जानती वे क्यों आईं।' 'पर आप मानती हैं कि उनके पास सचमुच आपके पति की चिट्ठी है?' श्रीमती ओलेंस्का फिर चुपचाप सोच में डूबीं; अंत में बोलीं: 'आख़िरकार — इसी की तो उम्मीद थी।' आर्चर उठा और अँगीठी से टिक गया।
अचानक एक बेचैनी ने उसे जकड़ लिया; यह सोचकर उसकी ज़बान जम गई कि समय बीत रहा है और किसी भी पल लौटती गाड़ी के पहियों की आवाज़ आ सकती है। 'आपकी मौसी को यक़ीन है कि आप पति के पास लौट जाएँगी।' श्रीमती ओलेंस्का ने झटके से सिर उठाया। चेहरे पर गहरी लाली दौड़ गई, गर्दन और कंधों तक फैल गई। वे कम ही लाल होती थीं, और होतीं तो ऐसा लगता जैसे जलने का दर्द हो। 'लोगों ने मेरे बारे में बहुत-सी बेरहम बातें मानी हैं,' उन्होंने कहा। 'ओह, एलेन — माफ़ कीजिए; मैं मूर्ख हूँ, निर्दयी हूँ।' वे हल्का-सा मुस्कराईं। 'आप बहुत बेचैन हैं; आपकी अपनी उलझनें हैं। जानती हूँ, आपको लगता है कि वेलैंड परिवार आपकी शादी के मामले में नासमझी कर रहा है; और मैं आपसे सहमत हूँ। यूरोप में ये लंबी अमेरिकी सगाइयाँ समझी ही नहीं जातीं; शायद वे लोग हम जितने ठंडे मिज़ाज के नहीं।' उन्होंने 'हम' को हल्के ज़ोर से कहा, जिससे उसमें व्यंग्य की झलक आ गई। आर्चर ने वह व्यंग्य महसूस किया, पर छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। शायद उन्होंने जान-बूझकर बात अपने मामलों से हटा दी थी — उसके शब्दों से इतनी चोट खाने के बाद; और उन्हीं की राह चलना ठीक लगा। पर बीतते समय के एहसास ने उसे बेचैन कर दिया: वह सह नहीं सकता था कि उनके बीच फिर शब्दों की दीवार खड़ी हो जाए।
'हाँ,' उसने अचानक कहा; 'मैं दक्षिण गया था — मे से कहने कि हम ईस्टर के फ़ौरन बाद शादी कर लें। उसके न होने की कोई वजह नहीं।' 'और मे आपको मना नहीं पाई — वह, जो आप पर जान छिड़कती है? मैं तो उसे इतनी समझदार मानती थी कि वह ऐसी बेतुकी रस्मों की ग़ुलाम न हो।' 'वह ज़रूरत से ज़्यादा समझदार है — वह उनकी ग़ुलाम नहीं।' श्रीमती ओलेंस्का ने उसे देखा। 'तब तो... मैं समझी नहीं।' आर्चर लाल पड़ा और जल्दी-जल्दी बोला: 'हमारे बीच एक खुली बातचीत हुई — शायद पहली। उसे मेरी जल्दबाज़ी बुरा शगुन लगती है।' 'हे भगवान — बुरा शगुन?' 'उसके ख़याल में इसका मतलब है कि मुझे भरोसा नहीं कि मैं उसे प्यार करता रहूँगा। यानी वह समझती है कि मैं किसी और से — ज़्यादा प्यार करता हूँ, और उससे बचने के लिए जल्दी शादी करना चाहता हूँ।' श्रीमती ओलेंस्का ने दिलचस्पी से इस बात को उलट-पलटकर देखा। 'पर अगर वह ऐसा सोचती है — तो वह ख़ुद जल्दी क्यों नहीं करती?' 'क्योंकि वह वैसी नहीं है। वह कहीं ज़्यादा उदात्त है: इसीलिए लंबी सगाई पर और भी अड़ी है। मुझे समय देने के लिए—' 'उस दूसरी औरत की ख़ातिर उसे छोड़ देने का समय?' 'अगर मैं चाहूँ तो।' श्रीमती ओलेंस्का अँगीठी की ओर झुकीं और स्थिर आँखों से
आग को ताकने लगीं। सुनसान सड़क पर से उनकी गाड़ी के पास आते घोड़ों की टापें सुनाई दीं। 'बड़ी उदात्त है,' उन्होंने हल्की काँपती आवाज़ में कहा। 'हाँ। पर हास्यास्पद।' 'हास्यास्पद? इसलिए कि आप किसी और से प्रेम नहीं करते?' 'नहीं। इसलिए कि मेरा किसी और से विवाह का इरादा ही नहीं।' 'आह।' फिर लंबी चुप्पी छा गई। अंत में उन्होंने ऊपर देखकर पूछा: 'वह दूसरी औरत — क्या वह आपसे प्रेम करती है?' 'अरे, कोई दूसरी औरत है ही नहीं... मेरा मतलब — जिसे मे सोचती है, उसने कभी... नहीं—' 'तो फिर इतनी जल्दी क्यों मचा रहे हैं?' 'आपकी गाड़ी आ गई,' आर्चर ने कहा। वे आधी उठीं और खोई-खोई आँखों से इधर-उधर देखा।
उनका पंखा और दस्ताने सोफ़े पर बग़ल में रखे थे, और उन्होंने अनमने ढंग से उन्हें उठा लिया। 'हाँ, अब चलना चाहिए।' 'श्रीमती स्ट्रुथर्स के यहाँ?' 'हाँ।' मुस्कराकर जोड़ा: 'जहाँ बुलाया जाए वहाँ जाना ही पड़ता है, वरना बहुत अकेली पड़ जाऊँगी। आप भी साथ क्यों नहीं चलते?' आर्चर को लगा कि चाहे जो हो जाए, उसे उन्हें रोक लेना है, शाम का बचा हिस्सा अपने लिए पक्का कर लेना है। उनके प्रस्ताव को अनसुना कर वह अँगीठी से टिका रहा, आँखें उनके दस्ताने-पंखा थामे हाथ पर गड़ीं, मानो देख रहा हो कि क्या उसमें इन्हें गिरवा देने की ताक़त है। 'मे ने सच भाँप लिया,' उसने कहा। 'दूसरी औरत सचमुच है। पर वह नहीं, जिसे मे समझती है।' एलेन ओलेंस्का ने न जवाब दिया, न हिलीं। थोड़ी देर बाद वह उनके पास बैठा, उनका हाथ लिया और धीरे से खोल दिया — दस्ताने और पंखा दोनों के बीच सोफ़े पर गिर पड़े। वे झटके से उठीं, ख़ुद को छुड़ाकर अँगीठी के दूसरी ओर हट गईं।
'ओह, मुझसे इश्क़ मत जताइए! बहुतों ने जताया है,' उन्होंने त्योरी चढ़ाकर कहा। आर्चर का रंग बदला; वह भी उठ खड़ा हुआ: इससे कड़वा उलाहना वे उसे दे ही नहीं सकती थीं। 'मैंने आपसे कभी इश्क़ नहीं जताया,' उसने कहा, 'और कभी जताऊँगा भी नहीं। पर आप वह स्त्री हैं जिससे मैं विवाह करता — अगर हम दोनों के लिए यह संभव होता।' 'हम दोनों के लिए संभव होता?' उन्होंने सच्चे अचरज से उसे देखा। 'और यह आप कह रहे हैं — जब सब कुछ असंभव आपने ही बनाया?' वह उन्हें ताकता रहा — अँधेरे में टटोलते हुए, जिसे अचानक चौंधियाती रोशनी के एक तीर ने चीर दिया। 'मैंने सब असंभव बनाया—?' 'आपने, आपने, आपने ही!' वे चीख़ीं; होंठ उस बच्चे की तरह काँप रहे थे जो अभी रो पड़ेगा। 'तलाक़ आपने ही तो छुड़वाया — यह दिखाकर कि वह कितना स्वार्थी, कितना बुरा है; कि विवाह की गरिमा बचाने के लिए ख़ुद को कैसे होम करना पड़ता है; कि परिवार को खुले कलंक और चर्चा से बचाना है। और चूँकि मेरा परिवार आपका होने वाला था — मे की ख़ातिर, आपकी ख़ातिर — मैंने वही किया जो आपने कहा, जो आपने साबित करके दिखाया कि मुझे करना चाहिए!' वे अजीब-सी हँसी हँस पड़ीं। 'मैंने कभी छिपाया नहीं कि यह सब मैंने आपके लिए किया!' वे फिर सोफ़े पर ढह गईं; उत्सवी पोशाक की तहों के बीच यों सिमटीं जैसे बहाना-नाच में कोई घायल मुखौटा। आर्चर अँगीठी के पास अडिग खड़ा उन्हें देखता रहा। 'हे भगवान,' वह कराहा, '— जब मैं समझता था—'
'क्या समझते थे?' 'मत पूछिए कि मैं क्या समझता था।' उन्हें ताकते हुए उसने वही जलती लाली गर्दन से चेहरे तक चढ़ते देखी। वे तनकर बैठीं और कठोर गरिमा से उसका सामना किया। 'मैं पूछती हूँ।' 'अच्छा, तो सुनिए: जो चिट्ठी आपने मुझे पढ़वाई थी, उसमें ऐसी बातें थीं—' 'मेरे पति की चिट्ठी?' 'हाँ।' 'उस चिट्ठी में डरने लायक़ कुछ नहीं था। बिल्कुल कुछ नहीं। मुझे डर था तो बस इतना कि परिवार पर — आप पर और मे पर — कलंक और शर्मिंदगी न आए।' 'हे भगवान,' वह फिर कराहा और चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। जो चुप्पी छाई, वह न लौटने वाली सच्चाई के बोझ-सी उन पर आ पड़ी। आर्चर को लगा जैसे वह उसे अपनी ही समाधि के पत्थर की तरह दबा रही हो; जहाँ तक भविष्य दिखता था, कुछ भी यह बोझ उसके सीने से कभी नहीं हटा पाएगा। वह हिला नहीं, चेहरे से हाथ नहीं हटाए; ढँकी आँखें घुप्प अँधेरे को ताकती रहीं। 'कम से कम मैंने आपसे प्रेम किया—' वह बमुश्किल कह पाया। अँगीठी के उस पार, सोफ़े के उस कोने से जहाँ वह उन्हें अब भी सिमटी बैठी समझ रहा था, बच्चे जैसी दबी सिसकी सुनाई दी। वह चौंककर उठा और उनके पास गया। 'एलेन! यह कैसा पागलपन? क्यों रो रही हैं?
कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जो मिट न सके। मैं अब भी आज़ाद हूँ, और आप भी होने वाली हैं।' उसने उन्हें बाँहों में ले लिया; उनका चेहरा भीगे फूल-सा उसके होंठों से लगा, और दोनों के पाले सारे व्यर्थ डर सूरज उगते ही मिटते प्रेतों की तरह उड़ गए। अब उसे अचरज बस इस बात का था कि छू लेने भर से सब इतना सरल हो गया, और वह पाँच मिनट कमरे के उस पार खड़ा उनसे बहस करता रहा था। उन्होंने उसके चुंबन का उत्तर दिया; पर एक पल बाद उसने महसूस किया कि उनकी देह उसकी बाँहों में सख़्त हो रही है। फिर उन्होंने उसे कोमलता से परे किया और उठ खड़ी हुईं। 'आह, मेरे बेचारे न्यूलैंड... शायद यह होकर ही रहना था। पर इससे हालात नहीं बदलते,' उन्होंने कहा; इस बार अँगीठी से टिकी, उसे ऊपर से देखते हुए। 'इसने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी है।' 'नहीं, नहीं — ऐसा होना नहीं चाहिए, हो नहीं सकता। आप मे वेलैंड से बँधे हैं, और मैं विवाहिता हूँ।' वह भी तमतमाए चेहरे और दृढ़ भाव से उठ खड़ा हुआ।
'बकवास! अब यह सब कहने में बहुत देर हो चुकी। हमें ख़ुद से या दूसरों से झूठ बोलने का हक़ नहीं। आपके विवाह की बात नहीं करता; पर क्या आपको लगता है, इसके बाद मैं मे से शादी कर सकता हूँ?' वे चुप रहीं; पतली कोहनियाँ अँगीठी की मुँडेर पर टिकाए। उनकी पार्श्व-छवि आईने में झलक रही थी। जूड़े से एक लट खुलकर गर्दन पर आ गिरी थी; वे थकी-हारी, लगभग बूढ़ी लग रही थीं। 'मुझे नहीं लगता,' उन्होंने आख़िर कहा, 'कि आप यह सवाल मे से पूछ पाएँगे। ग़लत कहा?' आर्चर ने लापरवाह ढिठाई से कंधे उचकाए। 'किसी और राह के लिए बहुत देर हो चुकी।' 'आप यह इसलिए कह रहे हैं कि इस घड़ी यही कहना सबसे आसान है — इसलिए नहीं कि यह सच है। सच तो यह है कि अब उस राह के सिवा हर राह के लिए देर हो चुकी है, जो हम दोनों पहले ही चुन चुके थे।' 'आह — मैं आपको समझ नहीं पाता!' उन्होंने ज़बरदस्ती एक दयनीय मुस्कान खींची, जिसने चेहरे को नरम करने की जगह और सिकोड़ दिया। 'आप इसलिए नहीं समझते कि अब तक अंदाज़ा नहीं लगा पाए कि आपने मुझे कितना बदल दिया है।
ओह, शुरू से ही। इसके बहुत पहले से कि मैं जानती कि आपने क्या-क्या किया है।' 'मैंने क्या-क्या किया?' 'हाँ। पहले-पहल मुझे पता ही नहीं चला कि यहाँ लोग मुझसे कतराते हैं — कि वे मुझे कोई भयानक चीज़ समझते हैं। सुना है, एक भोज में लोगों ने मुझसे मिलने तक से इनकार कर दिया था। यह सब मुझे बाद में पता चला। और यह भी कि आपने अपनी माँ को साथ लेकर वैन डर लायडेन दंपती के यहाँ जाने को राज़ी किया; और ब्यूफ़र्ट के नाच में अपनी सगाई की घोषणा पर अड़े रहे — ताकि मेरे पीछे एक नहीं, दो परिवार खड़े हों।' इस पर वह हँस पड़ा। 'सोचिए तो,' वे बोलीं, 'मैं कितनी नादान, कितनी बेख़बर थी! दादी ने एक दिन अचानक कह न दिया होता तो मुझे इनमें से कुछ पता ही नहीं चलता। मेरे लिए न्यूयॉर्क का मतलब बस शांति और आज़ादी था: घर लौट आना। और अपनों के बीच होने की ख़ुशी इतनी थी कि हर मिलने वाला मुझे भला और स्नेही लगता, मुझसे ख़ुश लगता। पर शुरू से ही,' उन्होंने आगे कहा, 'मुझे लगा कि आप-सा भला कोई नहीं। जो चीज़ें पहले इतनी कठिन और — ग़ैरज़रूरी लगती थीं, उनके कारण समझाने वाला आपके सिवा कोई नहीं था। बहुत अच्छे लोग मुझे क़ायल नहीं कर पाते थे: लगता था उन्हें कभी किसी प्रलोभन ने छुआ ही नहीं। पर आप जानते थे; आप समझते थे; आपने महसूस किया था कि बाहर की दुनिया कैसे अपने सुनहरे हाथ बढ़ाकर खींचती है — और फिर भी आप उसकी माँगों से घृणा करते थे। बेवफ़ाई, निर्दयता और बेपरवाही से ख़रीदे सुख से घृणा करते थे। यही वह चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं जानी थी — और वह मेरे जाने हुए सब कुछ से बेहतर है।'
वे बिना आँसू, बिना आवेग के, धीमी, सधी आवाज़ में बोल रही थीं; और उनका हर शब्द उसके सीने पर पिघले सीसे-सा गिरता था। झुका हुआ, सिर हाथों में थामे, वह क़ालीन को और पोशाक के नीचे से झाँकती साटन की जूती की नोक को ताकता रहा। अचानक वह घुटनों पर झुका और उस जूती को चूम लिया। वे झुकीं, उसके कंधों पर हाथ रखे, और उसे इतनी गहरी आँखों से देखा कि वह उस दृष्टि तले हिल न सका। 'ईश्वर के लिए, जो आपने बनाया है उसे मत बिगाड़िए!' वे पुकार उठीं। 'मैं अब पुराने ढंग से सोचने की ओर नहीं लौट सकती। आपसे प्रेम करना है, तो मुझे आपको छोड़ना होगा।' उसकी दोनों बाँहें तड़पकर उनकी ओर बढ़ीं, पर वे एक क़दम पीछे हट गईं; दोनों आमने-सामने खड़े रहे — बीच में बस वह दूरी, जो उनके शब्दों ने रच दी थी। तभी आर्चर का ग़ुस्सा फट पड़ा: 'तो ब्यूफ़र्ट? मेरी जगह वही लेगा?'
शब्द निकलते ही उसने वैसी ही ग़ुस्से की भड़ास की उम्मीद की — और उसे अपने भीतर की आग के लिए ईंधन की तरह हाथोंहाथ लेता। पर श्रीमती ओलेंस्का बस थोड़ी और पीली पड़ गईं; बाँहें आगे लटकाए, सिर हल्का झुकाए यों खड़ी रहीं मानो किसी गंभीर प्रश्न पर विचार कर रही हों। 'वह अभी श्रीमती स्ट्रुथर्स के यहाँ आपकी राह देख रहा है। जाइए न उसके पास?' आर्चर ने ताना मारा। श्रीमती ओलेंस्का घंटी बजाने मुड़ीं। नौकरानी आई तो बोलीं: 'आज शाम मैं बाहर नहीं जाऊँगी। गाड़ी से कहो, जाकर मार्कीज़ा साहिबा को ले आए।' दरवाज़ा फिर बंद हुआ, तो भी आर्चर कड़वी नज़रों से उन्हें देखता रहा। 'यह क़ुर्बानी किसलिए? आपने ख़ुद कहा कि आप अकेली हैं; तो मुझे हक़ नहीं कि आपको आपके दोस्तों से दूर रखूँ।' वे भीगी पलकों तले हल्का-सा मुस्कराईं। 'अब मैं अकेली नहीं रहूँगी। पहले अकेली थी; डरती थी। पर अब वह सूनापन और अँधेरा जा चुका है। अब जब अपने भीतर लौटती हूँ, तो उस बच्चे जैसा लगता है जो रात में ऐसे कमरे में जाए जहाँ हमेशा एक दिया जलता रहता है।'
उनकी आवाज़ और भाव अब भी उन्हें एक कोमल, अगम्य आभा में लपेटे थे, और आर्चर फिर कराह-सा उठा: 'मैं आपको समझ नहीं पाता!' 'पर मे को तो समझते हैं!' इस पलटवार पर आर्चर लाल पड़ गया, पर नज़रें उन्हीं पर टिकी रहीं। 'मे मुझे छोड़ देने को तैयार है।' 'क्या! उसके आगे घुटने टेककर शादी जल्दी करने की भीख माँगने के तीन दिन बाद?' 'उसने इनकार किया; इससे मुझे हक़ मिल गया—' 'आह, वह शब्द कितना कुरूप है — यह तो आपने ही मुझे सिखाया था,' वे बोलीं। आर्चर हारी हुई हताशा से मुड़ गया: जैसे घंटों खड़ी चट्टान चढ़ने के बाद, चोटी छूते ही हाथ फिसल जाए और वह अँधेरे में जा गिरे। उन्हें एक बार फिर बाँहों में ले पाता, तो उनकी हर दलील बहा ले जाता; पर उनके चेहरे और भंगिमा की वह अबूझ निर्लिप्तता, और उनकी सच्चाई के प्रति श्रद्धा, उसे दूर धकेलती रही। अंत में वह फिर गिड़गिड़ाने लगा: 'अभी हमने ऐसा किया, तो आगे और बुरा होगा — सबके लिए बुरा—' 'नहीं — नहीं — नहीं!' वे लगभग चीख़ पड़ीं, मानो उससे डर रही हों। उसी क्षण घर की घंटी की लंबी झनकार कमरों में फैल गई।
उन्होंने दरवाज़े पर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज़ नहीं सुनी थी; दोनों ठिठके खड़े, चौंकी आँखों से एक-दूसरे को देखते रहे। बाहर नास्तासिया के क़दम गलियारा पार कर गए, बाहरी दरवाज़ा खुला; फिर वह भीतर आई और काउंटेस ओलेंस्का को एक तार थमाया। 'वे मोहतरमा फूल देखकर बहुत ख़ुश हुईं,' नास्तासिया ने एप्रन सँवारते हुए कहा। 'समझीं कि उनके पति ने भेजे हैं; थोड़ा रोईं और बोलीं कि यह पागलपन है।' श्रीमती ओलेंस्का मुस्कराकर पीला लिफ़ाफ़ा ले लिया। उसे खोला, दिये के पास ले गईं; फिर दरवाज़ा बंद होते ही तार आर्चर की ओर बढ़ा दिया। वह सेंट ऑगस्टीन से भेजा गया था, काउंटेस ओलेंस्का के नाम, और उसमें लिखा था: 'दादी का तार काम कर गया। मम्मी-पापा ईस्टर के बाद शादी पर राज़ी। न्यूलैंड को तार भेजूँगी। इतनी ख़ुश हूँ कि कह नहीं सकती; तुमसे कृतज्ञ प्रेम। तुम्हारी आभारी मे।'
आधे घंटे बाद, जब आर्चर ने अपने घर का दरवाज़ा खोला, तो दालान की मेज़ पर, अपनी चिट्ठियों और परचों के ऊपर, वैसा ही एक लिफ़ाफ़ा पाया। संदेश यह भी मे वेलैंड का था: 'माता-पिता राज़ी। शादी ईस्टर के बाद के मंगलवार, दोपहर बारह बजे, ग्रेस चर्च में। आठ सहेलियाँ चाहिए। पादरी जी से बात कर लेना। बेहद ख़ुश। प्यार सहित, मे।' आर्चर ने पीला काग़ज़ यों मसला मानो इबारत मिट जाएगी; फिर जेब से छोटी डायरी निकाली और काँपती उँगलियों से पन्ने पलटे, पर जो ढूँढ़ रहा था वह नहीं मिला। मुड़ा-तुड़ा तार जेब में ठूँसकर वह सीढ़ियाँ चढ़ गया।
सीढ़ियों के ऊपर उस छोटे कमरे से रोशनी छन रही थी जो जेनी का ड्रेसिंग-रूम और निजी ठिकाना था। भाई ने अधीर होकर दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खुला, और बहन अपने चिर-परिचित बैंगनी फलालैन के गाउन में, बालों में काग़ज़ के बल डाले, सामने खड़ी थी। चेहरा पीला और परेशान था। 'न्यूलैंड! उस तार में कोई बुरी ख़बर तो नहीं? मैं यों ही जागती रही, कहीं—' (जेनी की जिज्ञासा से कोई चिट्ठी सुरक्षित नहीं थी।) उसने सवाल अनसुना कर पूछा: 'जेनी — इस साल ईस्टर कब है?' वह उसके इस विधर्मी अज्ञान पर भौचक रह गई। 'ईस्टर? न्यूलैंड! अप्रैल के पहले हफ़्ते में, और कब। क्यों?' 'पहले हफ़्ते में?' उसने फिर डायरी के पन्ने पलटे, दबी ज़बान तेज़ी से हिसाब लगाया। 'पहला हफ़्ता कहा न तूने?' उसने सिर पीछे झटककर लंबा ठहाका लगाया। 'भगवान के लिए, हुआ क्या है?' 'कुछ नहीं हुआ — बस एक महीने बाद मेरी शादी है।' जेनी उसके गले से झूल गई और उसे बैंगनी फलालैन के सीने से भींच लिया। 'ओह न्यूलैंड, कितना बढ़िया! मैं कितनी ख़ुश हूँ! पर तुम हँसे क्यों जा रहे हो? चुप भी करो — माँ जाग जाएँगी।'