हिंदी संस्करण
अध्याय 10
वह दिन भी पिछले दिन के लगभग जैसा ही बीता। श्रीमती हर्स्ट और मिस बिंगली ने सुबह के कुछ घंटे मरीज़ के पास बिताए। जेन धीरे-धीरे, पर रुक-रुककर नहीं, सुधरती जा रही थी। शाम होते एलिज़ाबेथ भी बैठक की मंडली में आ गई। पर लू की कोई मेज़ नहीं थी। मिस्टर डार्सी चिट्ठी लिख रहे थे। पास बैठी मिस बिंगली उन्हें लिखते देखती रहीं। डार्सी की बहन तक पहुँचाने को बात पर बात जोड़ती गईं, और डार्सी का ध्यान भटकाती रहीं। मिस्टर हर्स्ट और मिस्टर बिंगली पिके खेल रहे थे — ताश का एक खेल। श्रीमती हर्स्ट दोनों को खेलते देखती रहीं। एलिज़ाबेथ ने सिलाई का काम उठा लिया। डार्सी और उनके पास बैठी औरत की बातें सुनना ही काफ़ी दिलचस्प था। मिस बिंगली उनकी लिखावट, पंक्तियों की सफ़ाई और चिट्ठी की लंबाई की तारीफ़ किए जा रही थीं। वे यह तारीफ़ बड़े बेपरवाह ढंग से लेते थे। दोनों की बातचीत दिलचस्प थी। और एलिज़ाबेथ ने उन दोनों के बारे में जो सोचा था, उसी से मेल खाती थी। 'मिस डार्सी को ऐसी चिट्ठी पाकर कितनी ख़ुशी होगी!' उन्होंने जवाब नहीं दिया। 'आप तो ख़ास तेज़ी से लिखते हैं।' 'आपने ग़लत देखा। मैं काफ़ी धीरे लिखता हूँ।' 'साल भर कितनी चिट्ठियाँ लिखनी पड़ती होंगी! कामकाज की भी होंगी। मैं होती तो सचमुच तंग आ जाती!' 'अच्छा है कि ऐसी चिट्ठियाँ लिखना आपका काम नहीं, मेरा है।' 'बहन से ज़रूर कहिएगा कि मैं उन्हें बहुत याद करती हूँ।' 'आपके कहने पर मैं एक बार लिख भी चुका हूँ।' 'कलम भा नहीं रही लगती। मैं छील दूँ? मैं कलम बहुत अच्छी छीलती हूँ।' 'शुक्रिया। पर अपनी कलम मैं हमेशा ख़ुद छीलता हूँ।' 'पंक्तियाँ इतनी एक समान कैसे रख लेते हैं?' वे चुप रहे। 'बहन के हार्प में तरक़्क़ी की ख़बर सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई, यह ज़रूर लिखिए। और यह भी कि मेज़ के लिए बनाए उनके छोटे सुंदर नमूने पर मैं बिलकुल फ़िदा हो गई हूँ। मिस ग्रांटली वाले से कहीं बढ़िया, यह बात भी पहुँचा दीजिएगा।' 'यह वाह-वाह अगली चिट्ठी तक टाल देंगी? इस वक़्त उसे ठीक से लिखने की जगह नहीं बची।' 'ओह, कोई बात नहीं। जनवरी में तो हम मिलेंगे ही। पर मिस्टर डार्सी, क्या आप बहन को हमेशा ऐसी बढ़िया लंबी चिट्ठियाँ लिखते हैं?' 'अक्सर लंबी तो होती हैं। पर हमेशा बढ़िया हैं या नहीं, यह तय करना मेरा काम नहीं।' 'मेरा ख़याल है, जो आदमी बिना मेहनत के लंबी चिट्ठी लिख ले, वह लिखना ज़रूर जानता होगा।'
'यह डार्सी की तारीफ़ नहीं हुई, कैरोलाइन।' भाई चिल्लाए। 'डार्सी बिना मेहनत के लिखने वाले नहीं हैं। चार अक्षर वाले शब्द चुनने में बहुत सोचते हैं। है न, डार्सी?' 'लिखने का मेरा ढंग तुम्हारे ढंग से बिलकुल अलग है।' 'अरे,' मिस बिंगली चिल्लाईं। 'चार्ल्स भाई तो सोचे जा सकने वाले सबसे फूहड़ ख़त लिखते हैं। आधे शब्द छोड़ देते हैं, बाक़ी स्याही से दाग़ देते हैं।' 'मेरे ख़याल इतनी तेज़ी दौड़ते हैं कि लिखने का वक़्त नहीं मिलता। इसलिए मेरी चिट्ठियाँ कभी-कभी पाने वाले तक कोई ख़याल पहुँचा ही नहीं पातीं।' 'मिस्टर बिंगली की यह नम्रता देखकर डाँटने का मन ही नहीं रहता', एलिज़ाबेथ ने कहा। 'नम्र दिखने जितना किसी चीज़ से धोखा नहीं होता', डार्सी बोले। 'अक्सर यह औरों की राय की परवाह न करने वाली लापरवाही भर होती है। कभी यह घुमाकर शेख़ी करने का तरीक़ा भी होता है।' 'तो अभी मैंने जो छोटी-सी नम्रता दिखाई, वह इन दोनों में कौन-सी थी?' 'घुमाकर की शेख़ी। तुम्हें चिट्ठी बेढंग लिखने पर सचमुच नाज़ है। तुम इसे वह क़सूर मानते हो जो तेज़ सोच से और अमल की बेपरवाही से निकलता है। यह ख़ूबी ऊँची न मानी जाए, तो भी तुम्हें कम से कम बड़ी दिलचस्प लगती है। कोई काम जल्दी निपटा लेने की ताक़त रखने वाले को वह ताक़त हमेशा बड़ी लगती है। पर नतीजा कितना कच्चा रह जाता है, यह बात अक्सर सोची ही नहीं जाती। आज सुबह तुमने श्रीमती बेनेट से कहा था कि नेदरफ़ील्ड छोड़ने का मन होते ही पाँच मिनट बाद तुम ग़ायब हो चुके होते। यह अपनी तारीफ़ थी। पर ज़रूरी काम अधूरा छोड़ देने वाली, न अपने काम की न किसी और के काम की उस जल्दबाज़ी की इतनी तारीफ़ किस लिए?' 'नहीं,' बिंगली चिल्लाए। 'सुबह की बेवकूफ़ी रात तक याद रखना ज़्यादा हो गया। फिर भी कसम से, मैंने जो कहा उसे सच माना था। इस पल भी वही मानता हूँ। कम से कम महिलाओं के आगे अच्छा दिखने को मैंने बेवजह जल्दबाज़ बनने का ढोंग नहीं किया।' 'यह मैं मानता हूँ कि तुम्हारा वैसा ही यक़ीन था। पर तुम सचमुच उतनी जल्दी निकल भी जाते, इसका मुझे ज़रा भी भरोसा नहीं। तुम्हारा चाल-चलन भी किसी और मर्द से कम संयोग पर नहीं टिका, जिन्हें मैं जानता हूँ। घोड़े पर चढ़ते-चढ़ते कोई दोस्त कहे «बिंगली, बेहतर यही होगा कि अगले हफ़्ते तक रुको», तो तुम शायद मान जाओगे। जाओगे नहीं। एक वाक्य और कह दे तो एक महीना भी ठहर सकते हो।' 'इससे साबित सिर्फ़ यही हुआ,' एलिज़ाबेथ चिल्लाई। 'कि मिस्टर बिंगली अपना स्वभाव पूरा बता नहीं पाए थे। अब मिस्टर डार्सी ने मिस्टर बिंगली ख़ुद जितना बताते उससे कहीं शानदार ढंग से वह दिखा दिया।' 'मेरे दोस्त की बात को मेरे नरम स्वभाव की तारीफ़ बना देने से मुझे बहुत ख़ुशी हुई', बिंगली बोले। 'पर डर यह है कि आपने इस सज्जन की मंशा से एकदम उलटी तरफ़ मोड़ दिया। ऐसे मौक़े पर अगर मैं दोस्त की विनती साफ़ मना कर देता और जितनी जल्दी हो घोड़ा दौड़ाकर निकल जाता, तो डार्सी मुझे ज़रूर ज़्यादा मानते।' 'तो क्या मिस्टर डार्सी का ख़याल है कि पहले मन बनाया काम अगर हड़बड़ी भरा हो, तो उसी योजना पर अड़े रहने से वह ग़लती मिट जाती है?'
'सच कहूँ, इस बात को मैं ठीक से समझा नहीं सकता। डार्सी को ख़ुद कहना चाहिए।' 'आप लोग मुझसे वह बात समझाने को कहते हैं जिसे आप मेरी राय कहते हैं। मैंने ऐसी कोई राय मानी ही नहीं। पर चलिए, आपने जैसा हाल रखा वैसा मान लेते हैं। मिस बेनेट, याद रहे कि वह दोस्त बिंगली से सिर्फ़ अपनी इच्छा कह रहा था। घर लौट जाओ, योजना टाल दो। ऐसा करना चाहिए, इसका एक भी कारण उसने नहीं दिया।' 'दोस्त की समझाइश पर तुरंत, आसानी से मन बदल लेना मिस्टर डार्सी की नज़र में कोई ख़ूबी नहीं लगती।' 'समझे बिना झुक जाना किसी की समझ की तारीफ़ नहीं।' 'मुझे लगता है मिस्टर डार्सी दोस्ती और स्नेह के असर पर सोचते ही नहीं। विनती करने वाले से लगाव भर से भी इंसान अक्सर तर्क से मन बदलने की प्रतीक्षा किए बिना ख़ुशी-ख़ुशी हाँ कर देता है। मैं सिर्फ़ अभी सोचे गए मिस्टर बिंगली वाले हाल की बात नहीं कर रही। ऐसा सचमुच हो जाए, तब तक रुककर तब दिखाई देने वाली हरकत समझदारी भरी है या नहीं, यह कहा जा सकता है। पर दोस्तों में जो बात अक्सर होती है उसे देखिए। एक आदमी दूसरे दोस्त से कोई मामूली-सी ठान बदलने को कहे, और वह बातों से मन न बदलने तक रुके बिना मान जाए — तो क्या आप उसे बुरा समझेंगे?' 'इस बात को और बढ़ाने से पहले क्या यह थोड़ा और साफ़ न कर लिया जाए कि वह विनती कितनी बड़ी है, और दोनों की दोस्ती कितनी गहरी है?' 'बिल्कुल।' बिंगली चिल्लाए। 'हर छोटी बात सुन लें। दोनों की लंबाई और बदन का फ़र्क़ भी छोड़िए मत। मिस बेनेट, आपको लगता है उससे ज़्यादा इस कहानी पर असर पड़ेगा। कसम से, डार्सी मुझसे इतने लंबे और रौबदार न होते तो मैं उन्हें आज जितना मानता हूँ उसका आधा भी न मानता। कुछ वक़्त और जगह पर डार्सी जितना डरावना और कोई चीज़ नहीं जिसे मैं जानता हूँ। ख़ास कर अपने घर में, रविवार की शाम, जब करने को कुछ न हो।' मिस्टर डार्सी मुस्कराए। पर एलिज़ाबेथ ने ताड़ लिया कि वे थोड़े नाख़ुश से हैं, और वह हँसी रोक गई। मिस बिंगली डार्सी के अपमान पर बहुत बिगड़ गईं और ऐसी बेहूदा बात कहने पर भाई को डाँटा। 'तुम्हारी चाल समझ गया, बिंगली', दोस्त बोले। 'तुम्हें बहस पसंद नहीं, इसलिए यह बात ख़त्म करनी है।' 'शायद ऐसा ही हो। बहस झगड़े से बहुत मिलती है। तुम और मिस बेनेट मेरे कमरे से निकल जाने तक यह बात टाल दो तो बड़ा उपकार होगा। उसके बाद मेरे पीछे जो कहना हो कह लेना।' 'यह विनती,' एलिज़ाबेथ बोली। 'ऐसी है जिसमें मुझे झुकना ही नहीं पड़ता। और मिस्टर डार्सी के लिए भी बेहतर यही होगा कि चिट्ठी पूरी कर लें।' मिस्टर डार्सी ने उसकी सलाह मान ली और चिट्ठी पूरी कर दी।
काम पूरा होते ही उन्होंने मिस बिंगली और एलिज़ाबेथ से संगीत सुनाने को कहा। मिस बिंगली झट पियानो के पास गईं। पहले एलिज़ाबेथ से विनम्रता से बजाने को कहा। पर एलिज़ाबेथ ने उतनी ही विनम्रता से, और ज़्यादा सच्चे मन से, मना कर दिया, तो वे ख़ुद बैठ गईं। श्रीमती हर्स्ट बहन के साथ गाती रहीं। दोनों के बजाने के दौरान एलिज़ाबेथ ने पियानो पर रखी संगीत-पुस्तकें पलटकर देखीं। फिर वह यह देखे बिना रह न सकी कि मिस्टर डार्सी उसे कितनी बार देख रहे हैं। इतने बड़े आदमी का उसके प्रति खिंचाव हो सकता है, यह सोचना मुश्किल था। यह मानना और अजीब था कि नफ़रत के मारे देख रहे हैं। आख़िर एलिज़ाबेथ को यही मानना पड़ा कि डार्सी जिन पैमानों को सही समझते हैं उन पर इस कमरे में और किसी से ज़्यादा उसी में क़सूर और शिकायत की बातें हैं, इसीलिए उनकी नज़र उस पर जाती है। यह अंदाज़ा भी उसे सताता नहीं था। वह उन्हें लगभग पसंद नहीं करती थी, इसलिए उनके अच्छे समझने की उसे परवाह न थी। कुछ इतालवी गाने बजाने के बाद मिस बिंगली ने रंग एक हल्की स्कॉटलैंड की धुन पर बदल दिया। थोड़ी देर बाद मिस्टर डार्सी एलिज़ाबेथ के पास आए और बोले। 'मिस बेनेट, ऐसे वक़्त क्या आपको रील नाचने की तीव्र इच्छा नहीं होती?' वह मुस्कराई भर, जवाब न दिया। उसके चुप रहने पर डार्सी थोड़े हैरान हुए और सवाल दोहराया। 'ओह,' वह बोली। 'पहले भी सुन लिया था। बस तुरंत जवाब तय न कर पाई थी। अगर मैं «हाँ» कह दूँ, तो आपको मेरी रुचि को तुच्छ समझने का मज़ा मिल जाता। पर मैं ऐसे इरादे तोड़ देने में, और पहले से तैयार तिरस्कार का मज़ा छीन लेने में, हमेशा खुश रहती हूँ। इसलिए मैंने यही तय किया कि रील मुझे बिलकुल नहीं नाचनी। अब हिम्मत हो तो मेरा तिरस्कार कीजिए।' 'सचमुच हिम्मत नहीं होती।' एलिज़ाबेथ सोचती थी कि उन्हें थोड़ा नाख़ुश कर सकेगी, पर उनके विनम्र जवाब से हैरान रह गई। पर उसके स्वभाव में मिठास और शरारत मिली हुई थी, जिससे किसी का बुरा मानना मुश्किल था। डार्सी किसी और औरत की ओर उससे ज़्यादा खिंच नहीं थे। उसके रिश्तेदारों का दर्जा बस थोड़ा और ऊँचा होता, तो वे सचमुच समझते कि वे कुछ ख़तरे में पड़ गए होते।
मिस बिंगली ने इतना देख या ताड़ लिया था कि जलन हो सके। प्यारी सहेली जेन के अच्छे होने की उनकी बड़ी फ़िक्र में एलिज़ाबेथ को विदा करने की इच्छा भी शामिल थी। वे दोनों की शादी को पहले से पक्की बात की तरह कहतीं, और उस शादी से डार्सी को जो सुख मिलेगा उसकी योजनाएँ बाँधतीं। साथ ही मेहमान से उन्हें चिढ़ाने की कोशिश करतीं। 'जब यह इतनी अच्छी बात पूरी हो जाए,' अगले दिन झाड़ियों वाली सैरगाह पर साथ चलते हुए मिस बिंगली बोलीं। 'तो सास को चुप रहने के फ़ायदे पर दो शब्द कह दीजिएगा। हो सके तो छोटी बेटियों का अफ़सरों के पीछे भागना भी छुड़वा दीजिएगा। और अगर इतनी हिम्मत की बात कहूँ, तो आपकी लेडी की शेख़ी और गुस्ताख़ी के क़रीब वाली छोटी आदतों को भी दबाइएगा।' 'मेरे घर के सुख के लिए और कोई सलाह है?' 'ओह, ज़रूर। मिस्टर और श्रीमती फ़िलिप्स के चित्र पेम्बरली की चित्रशाला में ज़रूर टांगिएगा। मिस्टर डार्सी के परचाचा न्यायाधीश साहब के चित्र के बग़ल में रखिएगा। काम अलग है, पर दोनों एक ही क़ानून के क्षेत्र में हैं। आपकी एलिज़ाबेथ का चित्र नहीं बनवाना चाहिए। कौन सा चितेरा उन सुंदर आँखों को ठीक उतार पाएगा?' 'उस नज़र को उतारना सचमुच आसान न होगा। पर रंग और आकार, और ख़ास कर वह बड़ी खूबसूरत पलकें, ज्यों की त्यों आ सकती हैं।'
तभी दूसरी सैरगाह से आती श्रीमती हर्स्ट और एलिज़ाबेथ उन दोनों से जा मिलीं। 'पता नहीं था आप लोग सैर पर निकलने वाले हैं', मिस बिंगली बोलीं। अपनी बात सुन ली गई होगी, इस ख़याल से वे घबराई हुई थीं। 'आप लोगों ने हमारे साथ बड़ी बेइज्ज़ती की', श्रीमती हर्स्ट ने जवाब दिया। 'बाहर आने की बात किए बिना खिसक गए।' फिर उन्होंने मिस्टर डार्सी की खाली बाँह पकड़ ली, और एलिज़ाबेथ अकेली चलने को रह गई। रास्ते पर तीन ही लोग साथ-साथ चल सकते थे। डार्सी दोनों औरतों की गुस्ताख़ी ताड़ गए और तुरंत बोले। 'यह रास्ता हमारी मंडली के साथ चलने के लिए चौड़ा नहीं। बड़ी सड़क पर निकल चलें तो बेहतर।' पर उनके साथ और रहना जिसका ज़रा भी मन न था, एलिज़ाबेथ हँसकर बोली। 'नहीं, नहीं। आप यहीं रहिए। आप तीनों इतने आकर्षक लगते हैं कि और भी शानदार दिखते हैं। चौथा आदमी आ जुड़े तो तस्वीर जैसा नज़ारा बिगड़ जाएगा। अलविदा।' वह खिली-खिली दौड़ गई। इधर-उधर घूमती रही, और एक-दो दिन में घर लौट सकने की उम्मीद से खुश थी। जेन पहले ही काफ़ी सुधर चुकी थी, और उस शाम दो-एक घंटे कमरे से निकलकर बैठने वाली थी।