हिंदी संस्करण

अध्याय 18

एलिज़ाबेथ नेदरफ़ील्ड के बैठक-कक्ष में पहुँची। वहाँ जमा लाल वर्दियों के बीच उसने मिस्टर विकहम को ढूँढ़ा, पर वे कहीं नहीं दिखे। अब तक उसने कभी नहीं सोचा था कि वे शायद न आएँ। थोड़ा सोचती तो उसे चिंता होने की वजह भी मिल जाती। फिर भी मिलने का उसका भरोसा नहीं डगमगाया। एलिज़ाबेथ ने रोज़ से भी ज़्यादा मन लगाकर तैयारी की थी। जो दिल अब तक उसके हाथ नहीं आया था, उसे पूरी तरह जीत लेने की उमंग में वह बहुत उत्साहित थी। उसे लगता था कि यह शाम के एक पहर में पाई जा सकने वाली ख़ुशी से ज़्यादा कुछ नहीं है। तभी अचानक एक भयानक शक ने उसे घेर लिया। कहीं बिंगली परिवार ने अफ़सरों को बुलाते समय मिस्टर डार्सी को ख़ुश करने के लिए जान-बूझकर विकहम को छोड़ तो नहीं दिया? ठीक ऐसा तो नहीं था। पर इतना पक्का था कि विकहम नहीं आए। लिडिया ने बार-बार जिनसे पूछा, उनके उन मित्र मिस्टर डेनी ने बताया। विकहम पिछले दिन किसी काम से लंदन गए थे, अभी तक लौटे नहीं थे। फिर उन्होंने एक अनजानी-सी मुस्कान के साथ जोड़ा: 'यहाँ मौजूद किसी सज्जन से बचना न होता, तो वे ठीक अभी ऐसे काम से न जाते।' लिडिया ने आख़िरी बात नहीं सुनी। पर एलिज़ाबेथ से यह छूटी नहीं। उसका पहला अंदाज़ा सही निकला हो, तो भी फ़र्क़ नहीं पड़ता था। बात यही थी कि विकहम के न आने का ज़िम्मा डार्सी पर था। आँखों के सामने की इस निराशा से डार्सी के प्रति उसकी नाराज़गी और तीखी हो गई। ठीक बाद में पास आकर उन्होंने बड़ी शिष्टता से हाल पूछा, तो एलिज़ाबेथ ने बस शिष्टाचार निभाने भर का जवाब दिया। डार्सी के प्रति ध्यान, उदारता या धैर्य दिखाना मानो विकहम को नुक़सान पहुँचाना था। उसने उनसे कोई बात न करने का मन बना लिया और मुड़ गई। मिस्टर बिंगली से बात करते समय भी उसकी नाराज़गी पूरी तरह गई नहीं। मिस्टर बिंगली का डार्सी को हर हाल में बचाना भी उसे बुरा लगा। फिर भी एलिज़ाबेथ ऐसी नहीं थी जो नाराज़गी में लंबे समय तक फँसी रहे। उस शाम जिन बातों की उम्मीद थी, सब उलट गईं। पर निराशा ज़्यादा देर नहीं टिकी। एक हफ़्ते से न मिली शार्लट लुकास से सारा दुख कहकर, वह जल्दी ही अपने चचेरे भाई की हास्यास्पद हरकतों पर बात करने लगी। फिर उसने शार्लट को इशारे से मिस्टर कॉलिन्स को ध्यान से देखने को कहा। पर पहले दो नाच फिर से कष्टदायक साबित हुए। यह अपमान का नाच था। अटपटे और गंभीर मिस्टर कॉलिन्स का नाच में मन नहीं था, वे बस माफ़ी माँगते रहे। वे अक्सर क़दम ग़लत रखते और उन्हें पता भी नहीं चलता। नापसंद जोड़ीदार के साथ दो नाच करते हुए जितनी शर्म और तकलीफ़ हो सकती थी, वह सब उन्होंने एलिज़ाबेथ को दी। उनसे छुटकारा मिलने का पल स्वर्गीय था। इसके बाद उसने एक अफ़सर के साथ नाच किया। विकहम की बातें करके और सबके उन्हें पसंद करने की बात सुनकर उसे कुछ चैन मिला। नाच ख़त्म होने पर वह शार्लट लुकास के पास लौटकर बात करने लगी। तभी मिस्टर डार्सी ने अचानक बात छेड़ दी। उन्होंने नाच माँगा, तो इतनी हैरान हुई कि एलिज़ाबेथ को पता ही नहीं चला और उसने हामी भर दी। वे तुरंत चले गए। एलिज़ाबेथ ख़ुद पर खीझी कि चतुराई से बच नहीं पाई। शार्लट ने उसे समझाने की कोशिश की। 'साथ नाचोगी तो शायद वे तुम्हें बहुत पसंद आने लगें।' 'ऐसा कभी न हो, यही चाहती हूँ! यह सबसे बड़ी बदक़िस्मती होगी। जिस आदमी को नापसंद करने की ठान ली है, उसे पसंद करने लगूँ! ऐसी आफ़त नहीं चाहती।'

नाच फिर शुरू हुआ। डार्सी अपनी तय जोड़ीदार को लेने आगे बढ़े, तो शार्लट ने एलिज़ाबेथ के कान में सलाह दी। बात यह थी कि मूर्खों जैसा व्यवहार न करे। विकहम की ओर खिंचाव के चलते उससे कई गुना ऊँचे दर्जे के आदमी की नाराज़गी मोल न ले। एलिज़ाबेथ ने कोई जवाब नहीं दिया और पंक्ति में अपनी जगह ले ली। मिस्टर डार्सी के सामने खड़े होकर उसे यह ख़याल आते ही हैरानी हुई कि वह कितनी बड़ी जगह पर खड़ी है। आसपास के चेहरों पर भी वही हैरानी उसने पढ़ी। दोनों देर तक एक शब्द भी नहीं बोले। एलिज़ाबेथ ने सोचा, यह चुप्पी शायद दोनों नाच भर चलती रहे। पहले तो उसने ख़ुद इसे न तोड़ने की ठान ली। पर फिर उसे लगा कि जोड़ीदार को ज़बरदस्ती बुलवाना उनके लिए बड़ी सज़ा होगी। इसलिए उसने नाच के बारे में हल्की-सी बात कह दी। डार्सी ने जवाब दिया और फिर चुप हो गए। कुछ मिनट बाद एलिज़ाबेथ ने फिर बात छेड़ी। 'अब मिस्टर डार्सी की बारी है कुछ कहने की। मैंने नाच की बात कर ली, अब आपको कमरे के आकार या नाचने वालों की गिनती के बारे में कुछ कहना चाहिए।' वे मुस्कराए। बोले, वह जो भी सुनना चाहे, वे वही कह देंगे। 'बहुत अच्छा। अभी के लिए यही जवाब काफ़ी है। थोड़ी देर बाद मैं शायद कह दूँ कि सार्वजनिक नाच से निजी नाच कहीं ज़्यादा सुखद है। पर अभी आप चुप रह सकते हैं।' 'नाचते समय क्या आप हमेशा ऐसे तय नियमों के हिसाब से बात करते हैं?' 'कभी-कभी हाँ। कुछ तो बोलना ही पड़ता है। आधा घंटा साथ रहकर पूरी चुप्पी अजीब लगेगी न। पर कुछ लोगों के लिए बातचीत ऐसी बुननी चाहिए कि जितना कम बोलना पड़े, उतना अच्छा।' 'अभी आप अपने मन के मुताबिक़ बोल रहे हैं? या यह सोचकर कि मुझे ख़ुश कर रहे हैं?' 'दोनों ही।' एलिज़ाबेथ ने शरारत से कहा। 'हम दोनों का सोचने का ढंग हमेशा से बहुत मिलता-जुलता देखा है। दोनों को ही लोगों से घुलना-मिलना पसंद नहीं, बोलते भी कम हैं। पूरे कमरे को चकित कर देने वाली बात, जो आगे तक कहावत बनकर चले, कहने का भरोसा न हो तो मुँह ही नहीं खोलते।' 'यह तो आपके अपने स्वभाव के वर्णन से मेल नहीं खाता लगता।' उन्होंने कहा। 'मेरे स्वभाव से यह कितना मिलता है, यह कहने का साहस मुझमें नहीं। पर आप तो इसे बिलकुल सटीक चित्र मानती होंगी।' 'अपनी ही कारीगरी को मुझे ख़ुद नहीं आँकना चाहिए।' वे कुछ नहीं बोले। दोनों नाच की पंक्ति एक बार पार करने तक फिर चुप रहे। फिर डार्सी ने पूछा कि क्या वह और उसकी बहनें अक्सर मेरिटन तक पैदल जाती हैं। एलिज़ाबेथ ने कहा, हाँ। फिर वह ख़ुद को रोक न सकी और जोड़ा: 'कुछ दिन पहले जब वहाँ आपसे मुलाक़ात हुई, तब हमने अभी-अभी एक नए आदमी से जान-पहचान बनाई थी।' असर तुरंत दिखा। डार्सी के चेहरे पर घमंड की और गहरी छाया फैल गई। पर वे एक शब्द भी नहीं बोले। एलिज़ाबेथ ख़ुद को कमज़ोर होने का दोष देते हुए भी आगे कुछ न कह सकी। आख़िर डार्सी ने सख़्त आवाज़ में कहा। 'मिस्टर विकहम को लोगों से जल्दी घुल-मिल जाने वाला मोहक स्वभाव जन्म से मिला है। पर वे उन्हें दोस्त बनाए रखने में भी उतने ही सक्षम हैं या नहीं, यह उतना पक्का नहीं।' 'उन पर आपकी दोस्ती खोने की बदक़िस्मती आई है।' एलिज़ाबेथ ने ज़ोर देकर कहा। 'और वह भी ऐसे ढंग से, जिसकी पीड़ा उम्र भर रहेगी।' डार्सी ने कोई जवाब नहीं दिया। लगता था वे विषय बदलना चाहते हैं। ठीक उसी वक़्त सर विलियम लुकास पंक्तियों के बीच से कमरे के दूसरे छोर जाने के लिए गुज़रते हुए पास आ गए। उन्होंने मिस्टर डार्सी को पहचान कर क़दम रोक दिए। बड़ी शिष्टता से झुककर उन्होंने उनके नाच के हुनर और जोड़ीदार, दोनों की तारीफ़ की।

'प्रिय महोदय, सच में बहुत आनंद आया। ऐसा उम्दा नाच बिरले ही देखने को मिलता है। यह साफ़ है कि आप सबसे ऊँचे तबके के हैं। पर यह भी कहने दीजिए कि सुंदर जोड़ीदार भी आपसे रत्ती भर कम नहीं। ऐसा सुखद नज़ारा आगे भी बार-बार देखने को मिले, यही चाहता हूँ। ख़ासकर, प्रिय मिस एलिज़ा, जब कोई मनचाही बात पूरी हो जाए, तब तो और भी।' उन्होंने जेन और मिस्टर बिंगली की ओर देखा। 'तब बधाइयों की तो बाढ़ आ जाएगी! मिस्टर डार्सी भी यही कहेंगे। पर मुझे रोक-टोक नहीं करनी चाहिए। इस युवती के साथ आपकी मोहक बातचीत में विघ्न डालूँ, तो आपको अच्छा नहीं लगेगा। वे चमकती आँखें भी मुझे डाँट रही हैं।' डार्सी ने आगे की बातें लगभग सुनी ही नहीं। पर सर विलियम ने अपने दोस्त की जो बात इशारे में की, उससे उन्हें बड़ा धक्का लगा लगता था। उन्होंने साथ नाच रहे बिंगली और जेन को बहुत गंभीर भाव से देखा। जल्दी ही सँभलकर उन्होंने अपनी जोड़ीदार की ओर मुड़कर कहा। 'सर विलियम के बीच में आ जाने से मैं भूल गया कि हम क्या बात कर रहे थे।' 'हमने तो कोई बात की ही नहीं थी लगता है। सर विलियम ने कमरे में चाहे जिसे बीच में रोका हो, हम दोनों से कम बात करने वाला जोड़ा शायद ही कहीं मिले। दो-तीन विषय छेड़े, पर सब बेकार गए। अब आगे क्या बात करें, इसका भी अंदाज़ा नहीं।' 'किताबों की बात कैसी रहेगी?' उन्होंने मुस्कराकर कहा। 'किताबें? नहीं, ना! हम एक जैसी किताबें नहीं पढ़ते होंगे, यह तय है। और एक ही किताब पढ़ें भी, तो एहसास बिलकुल अलग होगा।' 'ऐसा सोचती हैं, यह सुनकर अफ़सोस हुआ। पर अगर सच में ऐसा है, तो कम-से-कम बात ख़त्म होने का डर नहीं। अलग-अलग राय की तुलना करते रह सकते हैं।' 'नहीं। नाच के हॉल में किताबों की बात नहीं हो सकती। मेरे मन में हमेशा कुछ और ही भरा रहता है।' 'क्या ऐसी महफ़िलों में आप हमेशा बस सामने की बात पर ही मन लगाती हैं?' उन्होंने शक भरे स्वर में पूछा। 'हाँ, हमेशा।' एलिज़ाबेथ ने ख़ुद भी जाने बिना जवाब दिया कि वह क्या कह रही है। उसका मन तो कब का बात से दूर जा चुका था। जल्द ही उसके मुँह से निकली बात ने यह दिखा दिया। 'मिस्टर डार्सी, मुझे याद है सुना था कि आप आसानी से माफ़ नहीं करते, एक बार दिल में मैल आ जाए तो मिटता नहीं। तो फिर पहली बार मैल पालते समय आप बहुत सावधान रहते होंगे न?' 'जी हाँ।' उन्होंने दृढ़ता से कहा। 'और पूर्वाग्रह से आँखें बिलकुल अंधी नहीं होने देते?' 'यही उम्मीद रखता हूँ।' 'जो अपना फ़ैसला एक बार लेकर कभी नहीं बदलता, उस पर यह ख़ास ज़िम्मेदारी है कि शुरू से ही सही फ़ैसला लिया हो।' 'क्या पूछ सकता हूँ, आप ऐसे सवाल क्यों कर रही हैं?' 'बस आपका स्वभाव समझने की कोशिश कर रही हूँ।' एलिज़ाबेथ ने गंभीर भाव झटकने की कोशिश करते हुए कहा। 'जान रही हूँ आप कैसे इंसान हैं।' 'क्या हासिल हुआ अब तक?' एलिज़ाबेथ ने सिर हिलाया। 'कुछ भी आगे नहीं बढ़ा। आपके बारे में इतनी अलग-अलग बातें सुनी हैं कि बहुत उलझन में हूँ।' 'मेरे बारे में राय बहुत अलग-अलग हो सकती है, यह आसानी से मान सकता हूँ।' उन्होंने गंभीरता से जवाब दिया। 'पर मिस बेनेट, अभी मेरा स्वभाव न ही चित्रित करें तो अच्छा। मुझे डर है कि बना हुआ चित्र हम दोनों में से किसी की भी शोभा न बढ़ाए।' 'पर अभी न बनाऊँ, तो शायद दोबारा मौक़ा ही न मिले।' 'आपकी ख़ुशी रोकने का मेरा कोई इरादा नहीं।' उन्होंने ठंडे स्वर में कहा। एलिज़ाबेथ ने कुछ नहीं कहा। दोनों अगली नाच-पंक्ति चुपचाप पार करके अलग हो गए। दोनों का मन ठीक नहीं था। पर मात्रा एक जैसी नहीं थी। डार्सी के मन में उसके लिए काफ़ी गहरी भावना थी। इसलिए वे जल्दी ही एलिज़ाबेथ को माफ़ कर गए, और सारा ग़ुस्सा किसी और पर उतार दिया।

दोनों के अलग होने के थोड़ी देर बाद ही मिस बिंगली पास आईं। उन्होंने शिष्ट पर तिरस्कार भरे भाव से बात शुरू की। 'हाँ तो, मिस एलिज़ा। सुना है आप जॉर्ज विकहम पर पूरी तरह मोहित हो गई हैं। मेरी बहन ने मुझसे उनके बारे में बार-बार पूछकर बताया। वह जवान बाक़ी सब बातें तो बता गया, पर यह भूल ही गया कि वह स्वर्गीय मिस्टर डार्सी के जागीर-प्रबंधक रहे बूढ़े विकहम का बेटा है। पर एक सहेली के नाते सलाह दूँ, तो उसकी हर बात आँख मूँदकर मत मान लीजिए। मिस्टर डार्सी ने उसके साथ अन्याय किया, यह बात बिलकुल झूठ है। उल्टे मिस्टर डार्सी हमेशा उसके साथ ख़ास तौर पर दयालु रहे हैं। जॉर्ज विकहम की ओर से ही मिस्टर डार्सी के साथ बेहद शर्मनाक बर्ताव हुआ है। पूरी बात नहीं पता, पर इतना पक्का जानती हूँ कि मिस्टर डार्सी की कोई भी ग़लती नहीं। उनसे जॉर्ज विकहम का नाम सुनना भी सहा नहीं जाता। भाई ने अफ़सरों को बुलाते समय सोचा था कि उसे अकेला छोड़ना मुश्किल होगा। पर जब पता चला कि विकहम ख़ुद ही दूर हो गया, तो उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई। शुरू में इस इलाक़े में आना ही बड़ी ढिठाई थी। हैरानी होती है कि उसकी हिम्मत कैसे हुई। मिस एलिज़ा जिसे इतना चाहती हैं, वह गुनहगार निकला, यह जानकर अफ़सोस होता है। पर सच कहूँ तो उसका ख़ानदान देखकर इससे बेहतर की उम्मीद भी नहीं थी।' 'आपकी बात मानें तो उनका गुनाह और ख़ानदान एक ही चीज़ है।' एलिज़ाबेथ ने ग़ुस्से में कहा। 'मिस्टर डार्सी के जागीर-प्रबंधक के बेटे होने के अलावा आपने कोई बड़ा गुनाह गिनाया ही नहीं। और यह बात मुझे ख़ुद उन्होंने ही बताई थी, यह साफ़ कह सकती हूँ।' 'माफ़ी चाहती हूँ।' मिस बिंगली ने मुस्कान में तंज़ भरकर मुड़ते हुए कहा। 'दख़ल के लिए माफ़ करें। यह बात मैंने भलाई की भावना से कही थी।' «कैसी घमंडी औरत है!» एलिज़ाबेथ ने मन ही मन कहा। «इस छोटी-सी चोट से मेरी राय बदल जाएगी, ऐसा सोचा हो तो बड़ी ग़लती की है। यहाँ बस तुम्हारा जान-बूझकर सच से मुँह मोड़ना और मिस्टर डार्सी की बदनीयती ही दिखती है।» फिर वह इस बात की जानकारी बिंगली से लेने का जिम्मा लिए बड़ी बहन के पास गई। जेन ने उसे मीठी संतुष्टि से भरी मुस्कान और ख़ुशी से चमकते चेहरे के साथ अपनाया। उस शाम जेन कितनी तृप्त थी, यह उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था। एलिज़ाबेथ ने फ़ौरन बहन का मन पढ़ लिया। उसी पल विकहम की चिंता और उसके दुश्मनों पर ग़ुस्सा, दोनों पीछे हट गए। जेन के ख़ुशी की सबसे आसान राह पर क़दम रखने की उम्मीद के आगे यह सब फीका पड़ गया था। 'मिस्टर विकहम के बारे में क्या पता चला, सुनना चाहती हूँ।' एलिज़ाबेथ ने बहन से कम नहीं, ऐसे ही खिले चेहरे से कहा। 'पर अगर किसी तीसरे का ख़याल आने की फ़ुर्सत ही नहीं मिली, इतनी ख़ुशी में गुज़री, तो ज़रूर माफ़ कर दूँगी।' 'नहीं।' जेन ने कहा। 'भूली नहीं हूँ। पर तसल्ली देने वाली बात बता नहीं सकती। मिस्टर बिंगली को पूरी बात पता नहीं। मिस्टर डार्सी इतने नाराज़ क्यों हुए, इसकी सबसे बड़ी वजह भी नहीं पता उन्हें। बस इतना भरोसा दिला सकते हैं कि उनका दोस्त सही चाल-चलन वाला, ईमानदार और सम्मान लायक़ इंसान है। और यह भी पूरा मानते हैं कि मिस्टर विकहम को मिस्टर डार्सी से अब तक जितना ध्यान मिला है, उससे कहीं कम मिलना ही ठीक है। अफ़सोस की बात है, पर मिस्टर बिंगली और उनकी बहन के कहे अनुसार मिस्टर विकहम कतई आदर के लायक़ जवान नहीं। इतनी लापरवाही से चले कि मिस्टर डार्सी की मेहरबानी खोना बनता ही था।' 'मिस्टर बिंगली ख़ुद तो मिस्टर विकहम को जानते ही नहीं न।' 'हाँ। कुछ दिन पहले सुबह मेरिटन में पहली बार देखा था।' 'तो फिर यह बात उन्होंने मिस्टर डार्सी से ही सुनी होगी। बड़ी तसल्ली की बात है। पर चर्च की जागीर के बारे में क्या कहते हैं?' 'मिस्टर डार्सी से एक से ज़्यादा बार सुना, पर पूरी बात ठीक से याद नहीं। बस इतना सोचते हैं कि शर्तें पूरी होने पर ही देने की वसीयत में बात लिखी थी।' 'मिस्टर बिंगली की सच्चाई पर मुझे रत्ती भर शक नहीं।' एलिज़ाबेथ ने जोश से कहा। 'पर सिर्फ़ उस भरोसे से मैं संतुष्ट नहीं हो पा रही, यह समझ लेना होगा। मानती हूँ कि मिस्टर बिंगली ने अपने दोस्त का बड़ी ख़ूबी से बचाव किया। पर वे कहानी के कई हिस्से नहीं जानते, और बाक़ी उन्हीं दोस्त से सुना है, तो मैं अब भी दोनों सज्जनों के बारे में पहले जैसा ही सोचती रहूँगी।'

फिर दोनों बहनों ने ऐसी बात की ओर विषय मोड़ लिया, जो ज़्यादा सुखद हो और जिस पर मतभेद भी न हो। एलिज़ाबेथ ने बिंगली के मन को लेकर जेन की पाली हुई ख़ुश और विनम्र उम्मीद बड़े सुख से सुनी। उसने बहन का भरोसा और पक्का करने के लिए पूरी ताक़त लगाई। मिस्टर बिंगली ख़ुद पास आए, तो एलिज़ाबेथ मिस लुकास के पास हट गई। मिस लुकास ने पूछा कि क्या आख़िरी नाच का जोड़ीदार सुखद इंसान था। एलिज़ाबेथ ठीक से जवाब भी नहीं दे पाई थी कि मिस्टर कॉलिन्स पास आ गए। वे मानो अभी-अभी कोई बहुत बड़ी बात जान गए हों, ऐसे बेहद इतरा रहे थे। 'एक अजीब इत्तिफ़ाक़ से,' उन्होंने कहा, 'मुझे पता चला है कि इसी कमरे में मेरे आश्रयदाता की क़रीबी रिश्तेदार मौजूद हैं। मैंने इत्तिफ़ाक़ से सुन लिया कि जो सज्जन यहाँ इस घर की मालकिन बनी युवती को अपनी चचेरी बहन मिस डी बर्ग और उनकी माँ लेडी कैथरीन डी बर्ग का नाम बता रहे थे। ऐसी बातें कितनी अचरज भरी होती हैं! इस महफ़िल में लेडी कैथरीन डी बर्ग के भतीजे से, या शायद भतीजी से, मुलाक़ात होगी, यह किसने सोचा होगा! समय रहते यह पता चल गया और अब मैं परिचय भी दे सकता हूँ, इसके लिए बहुत आभारी हूँ। पहले ऐसा न कर पाने के लिए माफ़ी मिलेगी, ऐसा विश्वास है। दोनों के रिश्ते के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था, यही बात मेरी माफ़ी का सहारा बनेगी।' 'कहीं आप ख़ुद मिस्टर डार्सी के पास जाकर अपना परिचय देने का इरादा तो नहीं रखते?' 'सच में यही इरादा है। पहले परिचय न दे पाने की माफ़ी माँगूँगा। मुझे लगता है, वे लेडी कैथरीन डी बर्ग के भतीजे हैं। यह भी बता सकता हूँ कि आठ दिन पहले तक वे बहुत अच्छी सेहत में थीं।' एलिज़ाबेथ ने पूरी ताक़त लगाकर उन्हें यह विचार छोड़ने के लिए मनाया। उसने साफ़ कहा कि बिना परिचय के बात करना मिस्टर डार्सी अपनी मौसी की तारीफ़ नहीं, ढिठाई मानेंगे। दोनों को एक-दूसरे को जानने की कोई ज़रूरत ही नहीं, यह भी कहा। ज़रूरत हो भी तो ऊँचे दर्जे वाले मिस्टर डार्सी को ही पहल करनी चाहिए, यह भी कहा। मिस्टर कॉलिन्स ने उसकी बात यह भाव लिए सुनी कि वे अपनी मर्ज़ी से ही करेंगे। एलिज़ाबेथ की बात ख़त्म होते ही उन्होंने जवाब दिया। 'प्रिय मिस एलिज़ाबेथ, जिन-जिन बातों को आप समझ सकती हैं, उन सबमें आपकी उत्तम समझ को दुनिया में किसी से कम नहीं आँकता। पर यह कहने की इजाज़त दीजिए कि आम लोगों के बीच बने शिष्टाचार और धर्मगुरुओं पर लागू शिष्टाचार में बड़ा फ़र्क़ होना ही है। साथ ही, आचरण में सही नम्रता बनी रहे तो, धर्मपद इस राज्य के सबसे ऊँचे दर्जे जितनी ही गरिमा रखता है, ऐसा मानता हूँ। इसलिए इस बार मैं अपनी अंतरात्मा के उस आदेश का पालन करूँगा, जिसे कर्तव्य मानता हूँ। आपकी सलाह न मानने के लिए माफ़ी दीजिए। बाक़ी हर बात में हमेशा आपको ही अपना मार्गदर्शक मानूँगा। पर अभी जिस मसले का सामना है, उसमें आप जैसी युवा युवती से ज़्यादा शिक्षा और लगातार अध्ययन पाया मैं यह तय करने के लिए ज़्यादा उपयुक्त हूँ कि सही क्या है।' मिस्टर कॉलिन्स गहरा झुककर एलिज़ाबेथ को छोड़ मिस्टर डार्सी की ओर बड़े क़दमों से चले गए। एलिज़ाबेथ ने बड़े ध्यान से देखा कि डार्सी इस पहल को कैसे लेते हैं। अचानक बात छेड़ते मिस्टर कॉलिन्स को देख डार्सी का हैरान भाव साफ़ था। चचेरे भाई ने गंभीरता से झुककर बात शुरू की। एलिज़ाबेथ को एक शब्द भी सुनाई नहीं दिया। फिर भी लग रहा था मानो सब सुन रही हो। उनके होंठों की हरकत से «माफ़ी», «हंसफ़र्ड», «लेडी कैथरीन डी बर्ग» जैसे शब्द पढ़े जा सकते थे। ऐसे आदमी के सामने ख़ुद को शर्मसार करते चचेरे भाई को देख उसे ग़ुस्सा आया। डार्सी ने अपनी हैरानी बिलकुल छुपाए बिना उन्हें देखा। आख़िर मिस्टर कॉलिन्स को बोलने का मौक़ा मिला, तो डार्सी ने ठंडे और सिर्फ़ शिष्टाचार भरे ढंग से जवाब दिया। पर मिस्टर कॉलिन्स का हौसला कम नहीं हुआ, वे फिर बोलने लगे। दूसरी बात जितनी लंबी खिंचती, डार्सी की तिरस्कार भरी नज़र उतनी ही गहरी होती लग रही थी। बात ख़त्म होने पर उन्होंने बस हल्का-सा सिर झुकाया और दूसरी ओर चले गए। इस पर मिस्टर कॉलिन्स एलिज़ाबेथ के पास लौट आए। 'साफ़ कह सकता हूँ,' उन्होंने कहा, 'इस स्वागत से असंतुष्ट होने की कोई वजह ही नहीं। मिस्टर डार्सी ने मेरी सोच को बड़ी ख़ुशी से लिया, ऐसा लगा। बहुत ही शिष्टता से जवाब दिया, और लेडी कैथरीन डी बर्ग की परख पर इतना भरोसा जताते हुए मेरी तारीफ़ भी की कि वे किसी नालायक़ पर मेहरबानी करेंगी ही नहीं। सचमुच बहुत बढ़िया सोच थी। कुल मिलाकर, वे मुझे बेहद पसंद आए हैं।'

एलिज़ाबेथ का अब अपने काम में मन नहीं लगा। लगभग पूरा ध्यान बहन और मिस्टर बिंगली की ओर मुड़ गया। दोनों को देखकर एक के बाद एक जो सुखद ख़याल आते, वे शायद जेन जितना ही उसे भी ख़ुश कर रहे थे। सच्चे प्रेम से बंधी शादी जो भी ख़ुशी दे सकती है, उस सबके बीच उसने बहन को इसी घर की मालकिन बना देख लिया कल्पना में। ऐसे समय बिंगली की दोनों बहनों को भी पसंद करने की कोशिश की जा सकती थी शायद। यह भी बिलकुल साफ़ था कि माँ भी यही सोच रही हैं। बहुत कुछ सुनने को मिल जाने के डर से वह उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। इसलिए जब रात का खाना खाने बैठी, तो माँ से बस एक सीट दूर बैठना अपनी घोर बदक़िस्मती लगी। इससे भी बढ़कर, माँ उसी एक सीट वाली लेडी लुकास को जेन के जल्द ही मिस्टर बिंगली से ब्याह जाने की अपनी उम्मीद रत्ती भर छुपाए बिना बता रही थीं, यह जानकर उसे बहुत ग़ुस्सा आया। श्रीमती बेनेट के लिए यह मन बहलाने वाला विषय था। वे उस शादी की भलाइयाँ गिनाते-गिनाते थकती ही नहीं थीं। बिंगली इतना मोहक और धनी जवान है, और महज़ तीन मील दूर रहता है, यही सबसे पहले ख़ुश होने वाली बात थी। फिर यह सोचकर बड़ी तसल्ली मिलती कि उनकी दोनों बहनें जेन को कितना पसंद करती हैं। वे भी अपने जितना ही इस रिश्ते को चाहती होंगी, यह तय था। इसके अलावा, जेन का इतना बढ़िया ब्याह होने पर छोटी बेटियों को भी दूसरे धनी आदमियों से मिलने का मौक़ा मिलेगा, यह बहुत उम्मीद भरी बात थी। आख़िर में, अपनी उम्र में अविवाहित बेटियों को बड़ी बहन के हवाले करके मन से ज़्यादा बार सभाओं में न जाना पड़े, यह बात भी उन्हें बहुत भाती थी। ऐसी हालत में ख़ुश होने की बात कहना ही शिष्टाचार है, इसलिए इसे भी ख़ुशी मान लेना पड़ता था। पर घर में टिके रहने से जितनी कम तसल्ली श्रीमती बेनेट को मिलती, उतनी कम शायद ही किसी और को कभी मिली हो। उन्होंने लेडी लुकास को भी जल्दी वैसा ही सौभाग्य मिलने की बार-बार दुआ देकर बात ख़त्म की। फिर भी साफ़ झलक रहा था कि उन्हें यह क़तई मुमकिन नहीं लगता, और इसी बात पर उन्हें गर्व भी था। एलिज़ाबेथ ने माँ की बहती बातों को रोकने की कोशिश की, पर बेकार गई। कम-से-कम अपनी ख़ुशी बताने की फुसफुसाहट ही धीमी कर लें, यह मनाना भी बेकार गया। सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा तो इस बात पर आया कि सामने बैठे मिस्टर डार्सी ने ज़्यादातर बातें सुन ली थीं, यह साफ़ दिख रहा था। माँ ने बस बेकार की बात कहने के लिए बेटी को डाँट दिया। 'मिस्टर डार्सी मेरा क्या लगते हैं कि मैं उनसे डरूँ? उन्हें बुरी लगे ऐसी कोई बात मुँह से न निकालूँ, इतनी ख़ास शिष्टता दिखाने की कोई वजह हमें नहीं है।' 'माँ, प्लीज़, आवाज़ धीमी कीजिए। मिस्टर डार्सी को नाराज़ करके आपको क्या फ़ायदा होगा? इससे उनके दोस्त पर भी कभी अच्छा असर नहीं पड़ेगा।' पर एलिज़ाबेथ चाहे जो कह ले, कुछ काम नहीं आया। माँ बराबर साफ़ आवाज़ में अपनी योजना बताती रहीं। एलिज़ाबेथ शर्म और ग़ुस्से से बार-बार शरमाई। उसे बार-बार मिस्टर डार्सी की ओर नज़र डालनी ही पड़ी। हर बार उसे वही डर सच होता दिखा। वे हमेशा माँ की ओर नहीं देख रहे थे। पर उनके कान लगातार माँ की बातों में लगे हैं, इसका उसे यक़ीन हो गया। उनके चेहरे का भाव ग़ुस्से भरे तिरस्कार से धीरे-धीरे शांत और अटल गंभीरता में बदल गया।

आख़िर श्रीमती बेनेट के पास भी कहने को कुछ नहीं बचा। जिस ख़ुशी में शामिल होने की गुंजाइश भी अपने पास नहीं, उसकी बातें सुनते-सुनते बहुत देर से जम्हाई ले रहीं लेडी लुकास को अब ठंडे हैम और मुर्गे में तसल्ली मिलने लगी। एलिज़ाबेथ में भी जान लौटने लगी। पर सुकून का यह समय ज़्यादा देर नहीं टिका। रात का खाना ख़त्म होते ही गाने की बात चल पड़ी। एलिज़ाबेथ को यह अपमान सहना पड़ा कि लोगों के मुश्किल से गुज़ारिश करने पर भी मैरी सबका मन बहलाने के लिए तैयार होने लगी। एलिज़ाबेथ ने कई बार गहरी नज़रों और बिना बोले गुज़ारिश भेजी कि मैरी ऐसी मेहरबानी न दिखाए। पर सब बेकार गया। मैरी ने इशारा समझने से इनकार कर दिया। हुनर दिखाने का मौक़ा मैरी के लिए किसी जादू से कम नहीं था। उसने जल्दी ही गाना शुरू कर दिया। एलिज़ाबेथ बेहद तड़पते हुए मैरी से नज़र नहीं हटा पाई। उसने बेचैनी से एक-एक बंद गाया जाना देखा। गाना ख़त्म होने पर जो इनाम मिला, वह बहुत मामूली था। मेज़ पर बैठे लोगों ने शुक्रिया कहते हुए यह चाहत जताई कि उसे दोबारा गाने के लिए मनाया जाए, तो मैरी ने आधा मिनट रुककर दूसरा गाना शुरू कर दिया। मैरी की काबिलियत ऐसी महफ़िल के बिलकुल लायक़ नहीं थी। आवाज़ कमज़ोर थी और गाने का ढंग बनावटी लग रहा था। एलिज़ाबेथ तड़प उठी। उसने देखा जेन कैसे यह सब झेल रही है, पर बहन बड़े इत्मीनान से मिस्टर बिंगली से बात कर रही थी। मिस्टर बिंगली की दोनों बहनों ने एक-दूसरे को तंज़ भरे इशारे किए। उसने डार्सी की ओर भी देखा, पर वे अब भी उतने ही गंभीर थे, मानो मन का कुछ पता ही न चले। मैरी कहीं रात भर न गाती रहे, इस डर से उसने पिता की ओर बीच में रोकने की गुज़ारिश भरी नज़र भेजी। मिस्टर बेनेट ने उसका इशारा समझ लिया। मैरी का दूसरा गाना ख़त्म होते ही उन्होंने ज़ोर से कहा। 'बहुत बढ़िया रहा, बिटिया। हमें काफ़ी देर मन बहला दिया। अब बाक़ी लड़कियों को भी अपना हुनर दिखाने का मौक़ा दें।' मैरी ने न सुनने का दिखावा किया, पर थोड़ी शर्मिंदा हो गई। एलिज़ाबेथ को मैरी के लिए भी और पिता की बात के लिए भी बुरा लगा। उसकी अपनी चिंता किसी अच्छे नतीजे तक नहीं पहुँची लगती थी। अब गुज़ारिश बाक़ी लोगों की ओर मुड़ गई। 'अगर मुझे,' मिस्टर कॉलिन्स ने कहा, 'गाने का सौभाग्य मिला होता, तो ख़ुशी-ख़ुशी एक गीत गाकर यहाँ मौजूद सबका मन बहला देता। क्योंकि मानता हूँ कि संगीत बिलकुल हानि-रहित मनोरंजन है और धर्मगुरु के पद से भी पूरी तरह मेल खाता है। पर इसका मतलब यह नहीं कि संगीत पर बहुत ज़्यादा समय दिया जा सकता है, ऐसा कहना नहीं चाहता। देखने लायक़ और भी काम ज़रूर हैं। पल्ली के पादरी के पास बहुत काम होता है। पहले उसे अपने भी हित में और आश्रयदाता की भी नाराज़गी न हो, ऐसा दशमांश तय करना होता है। उपदेश भी ख़ुद लिखने होते हैं। फिर बचे समय में पल्ली का काम और निवास की देखभाल, मरम्मत करानी होती है, तो समय ज़्यादा बचता नहीं। निवास को जितना आराम-दायक बनाया जा सके, उसमें कोताही नहीं होनी चाहिए। और सबके साथ, ख़ासकर जिन्होंने उसे इस पद तक पहुँचाया, उनके साथ ध्यान और नरमी से पेश आना भी छोटी बात नहीं, ऐसा मानता हूँ। इस ज़िम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। जो इंसान उस घराने से जुड़े किसी के प्रति आदर दिखाने का मौक़ा गँवा दे, उसे अच्छा भी नहीं माना जा सकता।' उन्होंने मिस्टर डार्सी की ओर झुककर अपनी बात ख़त्म की। आवाज़ इतनी बुलंद थी कि आधा कमरा सुन सकता था। बहुत लोगों ने घूरकर देखा, बहुत लोग मुस्कराए। पर मिस्टर बेनेट से ज़्यादा किसी को मज़ा नहीं आया। उलटे, उनकी पत्नी ने मिस्टर कॉलिन्स की इतनी समझदारी भरी बात की दिल से तारीफ़ की। उन्होंने लेडी लुकास से आधी फुसफुसाहट में कहा कि वे सचमुच बहुत होशियार और भले जवान हैं। एलिज़ाबेथ को लगा कि परिवार वाले अगर उस शाम मिलकर तय भी करते कि जितना हो सके ख़ुद को शर्मिंदा करना है, तो भी इससे ज़्यादा जोश और कुशलता से अपना हिस्सा नहीं निभा पाते। यह अच्छा हुआ कि उस नज़ारे का कुछ हिस्सा मिस्टर बिंगली की नज़र से बच गया। और मिस्टर बिंगली ऐसे स्वभाव के भी नहीं थे कि देखी हुई मूर्खता से बहुत दुखी हों। यह बिंगली और जेन दोनों के लिए अच्छी बात थी। पर उनकी दोनों बहनों और मिस्टर डार्सी को अपने परिवार पर हँसने का मौक़ा मिल गया, यही काफ़ी डरावना था। चुपचाप दिखते सज्जन के तिरस्कार और घमंड में मुस्कराती महिलाओं में से कौन-सा ज़्यादा सहन करना कठिन था, यह पता नहीं चला। बाक़ी शाम में भी सुख की कोई बात मुश्किल से हुई। एलिज़ाबेथ को हठपूर्वक साथ चिपके रहने वाले मिस्टर कॉलिन्स ने परेशान किया। उन्हें फिर से साथ नाचने की हामी नहीं मिली। पर उन्होंने उसका किसी और के साथ नाचना भी मुश्किल कर दिया। दूसरे जोड़ीदार से नाचने को कहने और कमरे की किसी भी युवती से मिलवाने की पेशकश करने पर भी कुछ काम नहीं आया। उन्हें नाच से ख़ुद कोई मतलब ही नहीं था। बारीक़ी से ध्यान दिखाकर एलिज़ाबेथ पर अच्छा असर छोड़ना ही सबसे बड़ा मक़सद था। इसलिए उन्होंने पूरी शाम उसके साथ ही रहने की क़सम खा ली। ऐसी योजना पर बहस करना मुमकिन नहीं था। सबसे बड़ा सहारा सहेली मिस लुकास से मिला। शार्लट बार-बार दोनों के साथ आ जुड़तीं और भली भावना से मिस्टर कॉलिन्स की बात अपनी ओर मोड़ लेतीं। कम-से-कम मिस्टर डार्सी के ज़्यादा ध्यान देने से नाख़ुश होने की नौबत नहीं आई। वे अक्सर बिना किसी काम के बिलकुल पास खड़े रहते। पर बात करने लायक़ इतने पास कभी नहीं आते। एलिज़ाबेथ ने इसे मिस्टर विकहम की बात छेड़ने का असर माना, और इस नतीजे से ख़ुश हुई।

लॉन्गबर्न वाले मेहमानों में सबसे आख़िर में निकले। श्रीमती बेनेट की चाल के चलते बाक़ी सब जाने के बाद भी पंद्रह मिनट तक गाड़ी का इंतज़ार करना पड़ा। इससे इस घराने के कुछ लोगों को यह जताने का पूरा समय मिल गया कि वे कितनी सच्चाई से इनके जाने की राह देख रहे हैं। श्रीमती हर्स्ट और उनकी बहन ने थकान की शिकायत के अलावा शायद ही मुँह खोला। साफ़ था कि वे घर को सिर्फ़ अपने लिए चाहती थीं और बेसब्र हो रही थीं। श्रीमती बेनेट जब भी कुछ कहतीं, वे टाल देतीं। इससे सब एक थकी-सी चुप्पी में डूब गए। मिस्टर कॉलिन्स की लंबी-चौड़ी बातें, जिनमें वे मिस्टर बिंगली और उनकी बहनों को महफ़िल की शान और मेहमानों के स्वागत-सत्कार की तारीफ़ करते रहे, उस माहौल को शायद ही हल्का कर पाईं। डार्सी कुछ नहीं बोले। मिस्टर बेनेट भी उतने ही चुप रहकर यह नज़ारा देखते रहे। मिस्टर बिंगली और जेन बाक़ी सबसे थोड़ा हटकर साथ खड़े हुए बस आपस में बात करते रहे। एलिज़ाबेथ श्रीमती हर्स्ट या मिस बिंगली से कम नहीं, वैसे ही चुप रही। लिडिया भी बहुत थक चुकी थी। वह बीच-बीच में ज़ोर से जम्हाई लेकर 'हे भगवान, कितनी थकान है!' कहने के अलावा कुछ नहीं बोल पाई। आख़िर उठकर विदा लेने का समय आ गया। श्रीमती बेनेट ने बड़े हार्दिक और शिष्ट स्वर में कहा कि वे जल्द ही सारे परिवार से लॉन्गबर्न में मिलना चाहती हैं। ख़ासकर मिस्टर बिंगली से उन्होंने भरोसा दिलाया कि बिना औपचारिक न्योते के भी कभी भी घर के आम खाने पर आ जाएँ, तो सबको बहुत ख़ुशी होगी। मिस्टर बिंगली आभार और ख़ुशी से भर गए। अगले दिन उन्हें थोड़ी देर के लिए लंदन जाना था। लौटते ही सबसे जल्दी मिलने आने का उन्होंने खुले दिल से वादा किया। श्रीमती बेनेट पूरी तरह संतुष्ट थीं। शादी का धन-प्रबंध, नई गाड़ी और दुल्हन के कपड़े तैयार करने में लगने वाला समय सोचकर भी, तीन-चार महीनों के भीतर बेटी को ज़रूर नेदरफ़ील्ड की मालकिन बना हुआ देखेंगी, इस ख़ुशहाल भरोसे के साथ वे घर से निकलीं। दूसरी बेटी के मिस्टर कॉलिन्स से ब्याह की भी उन्हें उतनी ही पक्की उम्मीद थी। उस बात से भी वे काफ़ी ख़ुश थीं, पर ख़ुशी की मात्रा एक जैसी नहीं थी। एलिज़ाबेथ अपनी सभी संतानों में माँ की सबसे कम चहेती बेटी थी। आदमी भी और रिश्ता भी उस बच्ची के लिए काफ़ी अच्छा था। पर मिस्टर बिंगली और नेदरफ़ील्ड की क़ीमत के आगे दोनों ही फीके पड़ जाते थे।