हिंदी संस्करण

अध्याय 26

श्रीमती गार्डिनर को एलिज़ाबेथ से अकेले में बात करने का जो पहला मौक़ा मिला, उन्होंने वादे के मुताबिक़ प्यार से समझाया। दिल की बात साफ़-साफ़ कहने के बाद उन्होंने जोड़ा। 'लिज़ी, तुम इतनी नादान नहीं कि मना करने भर से किसी के प्यार में पड़ जाओ, इसलिए सच बोलने में मुझे कोई डर नहीं है। गंभीरता से कहती हूँ, ज़रा सँभलकर रहना। न तो अपने आप को ऐसे प्यार में फँसाना जो बिना दौलत के नादानी बन जाए, न उसे इसमें खींचना। उसके बारे में बुरा कुछ नहीं कहना चाहती। बड़ा दिलकश जवान है। अगर उसे वह जायदाद मिल जाती जो उसे मिलनी चाहिए थी, तो मुझे लगता तुम्हारे लिए इससे बेहतर कोई न मिलता। पर अभी के हालात में कल्पनाओं में बहना ठीक नहीं। तुम्हारे पास समझ है, और हम सबको यक़ीन है कि तुम उसका इस्तेमाल करोगी। तुम्हारे पिता को भी तुम्हारे फ़ैसले और सही चाल-चलन पर पूरा भरोसा है। उन्हें निराश मत करना।' 'प्यारी मामी, आप तो बड़ी गंभीर बातें कर रही हैं।' 'हाँ। मैं चाहती हूँ तुम भी इसे गंभीरता से सोचो।' 'तो आपको फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। मैं ख़ुद का भी ख़याल रखूँगी, और मिस्टर विकहम का भी। रोक सकी तो उन्हें मुझसे प्यार में पड़ने ही नहीं दूँगी।' 'एलिज़ाबेथ, अभी तुम गंभीर नहीं हो रहीं।' 'माफ़ करें। फिर कोशिश करती हूँ। अभी मैं मिस्टर विकहम से प्यार नहीं करती। हाँ, बिल्कुल नहीं करती। पर अब तक देखे किसी भी मर्द से कहीं ज़्यादा सुहावने ज़रूर लगते हैं। और अगर वे सचमुच मुझसे प्यार करने लगें... तो न करें, यही बेहतर होगा। मुझे पता है यह नादानी होगी। हे, वह भयानक मिस्टर डार्सी! पिताजी मुझे जिस नज़र से देखते हैं, उससे बढ़कर इज़्ज़त की बात कोई नहीं। वह भरोसा खो दिया तो मुझे बहुत दुख होगा। पर पिताजी को भी मिस्टर विकहम पसंद हैं। तो प्यारी मामी, अगर मैं आप में से किसी को भी दुखी करूँ तो मुझे बहुत तकलीफ़ होगी। पर हम रोज़ देखते हैं कि प्यार करने वालों के बीच फ़ौरन दौलत न हो तो भी जवान लोग सगाई शायद ही छोड़ते हैं। तो अगर मुझे लुभाया गया, तो मैं कैसे वादा कर सकती हूँ कि इतने सारे लोगों से ज़्यादा समझदारी दिखाऊँगी? यह भी कैसे यक़ीन कर सकती हूँ कि विरोध करना ज़्यादा समझदारी होगी? इसलिए मैं बस इतना वादा कर सकती हूँ कि जल्दबाज़ी नहीं करूँगी। यह जल्दी नहीं मान लूँगी कि मैं उनके लिए सबसे अहम हूँ। उनके साथ रहते हुए भी बेकार की उम्मीदें नहीं पालूँगी। बहरहाल, पूरी कोशिश करूँगी।' 'वे यहाँ बहुत बार न आएँ, तो शायद और अच्छा हो। कम-से-कम तुम्हारी माँ को उन्हें बुलाने की याद मत दिलाना।' 'जैसे मैंने कुछ दिन पहले किया था,' एलिज़ाबेथ ने मानो भेद खुल गया हो, ऐसे हँसते हुए कहा। 'सही कह रही हैं। वह काम टालना ही समझदारी होगी। पर यह मत सोचिए कि वे हमेशा इतनी बार आते हैं। इस हफ़्ते इतनी बार बुलाया गया, वह मामा-मामी की वजह से था। आपको तो माँ की सोच पता है — दोस्तों को ख़ुश रखने के लिए हमेशा लोगों को बुलाना चाहिए। फिर भी सच में, अपनी इज़्ज़त की क़सम खाकर, जो सबसे समझदार लगे वैसा ही करने की कोशिश करूँगी। अब आप संतुष्ट हों, यही उम्मीद है।' मामी ने संतुष्ट होने का यक़ीन दिलाया। एलिज़ाबेथ ने उनकी प्यार भरी सलाह का शुक्रिया अदा किया, और दोनों अलग हो गईं। ऐसी सलाह पाकर भी बुरा न मानने का यह एक दुर्लभ मौक़ा था।

गार्डिनर दंपति और जेन के हर्टफ़र्डशायर छोड़ने के कुछ ही समय बाद मिस्टर कॉलिन्स लौट आए। पर वे लुकास परिवार के साथ ही ठहरे, इसलिए श्रीमती बेनेट को ख़ास तकलीफ़ नहीं हुई। शादी का दिन भी तेज़ी से नज़दीक आ गया। आख़िर श्रीमती बेनेट ने भी मान लिया कि यह टाला नहीं जा सकता। तीखे लहज़े में ही सही, उन्होंने कई बार दोहराया भी कि उन्हें दोनों के 'ख़ुश रहने की उम्मीद है'। बृहस्पतिवार शादी का दिन था, और बुधवार को मिस लुकास विदा लेने आईं। जब वे उठकर जाने लगीं, तो एलिज़ाबेथ शार्लट के साथ कमरे से बाहर निकल आई। माँ की मजबूरी में दी गई रूखी दुआ पर उसे शर्म आ रही थी, और ख़ुद उसका दिल भी सचमुच भर आया था। साथ सीढ़ियाँ उतरते हुए शार्लट ने कहा। 'एलिज़ा, मुझे यक़ीन है तू अक्सर चिट्ठी लिखेगी।' 'यह तो ज़रूर करूँगी।' 'एक और गुज़ारिश है। मुझसे मिलने आएगी न?' 'हर्टफ़र्डशायर में हमारी अक्सर मुलाक़ात होती रहे, यही चाहती हूँ।' 'मैं शायद कुछ समय केंट नहीं छोड़ पाऊँगी। तो हंसफ़र्ड आने का वादा कर।' ख़ुशगवार दौरे की उम्मीद तो कम ही थी, पर एलिज़ाबेथ मना नहीं कर सकी। शार्लट ने जोड़ा। 'पिताजी और मरिया मार्च में मेरे पास आएँगे। तू भी साथ आने को हाँ कर दे, तो अच्छा लगेगा। सच कहती हूँ, एलिज़ा। मुझे तू भी उतनी ही अच्छी लगेगी जितने वे दोनों।'

शादी हो गई। दुल्हा-दुल्हन गिरजाघर के दरवाज़े से सीधे केंट के लिए रवाना हुए। हमेशा की तरह इस बात पर सबके पास कहने और सुनने को बहुत कुछ था। एलिज़ाबेथ को जल्दी ही सहेली की चिट्ठी मिली। दोनों पहले जितनी ही नियमितता से और अक्सर चिट्ठियाँ लिखतीं रहीं। पर अब पहले की तरह हर बात दिल खोलकर नहीं कह पाती थीं। एलिज़ाबेथ जब भी शार्लट को चिट्ठी लिखती, उसे यह अहसास नहीं टलता कि गहरी सहेली के बीच का हर सुकून अब ख़त्म हो चुका है। चिट्ठियों में कमी न आने देने की ठान ली थी, पर यह मौजूदा दोस्ती से ज़्यादा पुरानी दोस्ती के लिए था। शार्लट की पहली चिट्ठी बड़ी उम्मीद के साथ मिली। नया घर कैसे बताएगी, लेडी कैथरीन कितनी पसंद आएँगी, अपनी ख़ुशी कितनी हिम्मत से बताएगी — यह जानने की उत्सुकता रोकी नहीं जा सकी। पर चिट्ठी पढ़ने पर पता चला कि शार्लट ने हर बात के बारे में ठीक वही लिखा था जो एलिज़ाबेथ ने सोचा था। लहज़ा ख़ुश था, और वह आरामदायक चीज़ों से घिरी लग रही थी। तारीफ़ के लायक़ न हो ऐसी कोई बात उसने नहीं कही। घर और फ़र्नीचर, आस-पड़ोस और सड़कें — सब कुछ पसंद आया था। लेडी कैथरीन भी बड़ी मेहरबान और दयालु बताई गईं। यह मिस्टर कॉलिन्स के बनाए हंसफ़र्ड और रोज़िंग्स के तसव्वुर से बेतुके हिस्से को समझदारी से हल्का किया गया बयान था। बाक़ी जानने के लिए ख़ुद वहाँ जाने तक इंतज़ार करना होगा, यह एलिज़ाबेथ को समझ आ गया।

जेन ने लंदन सही-सलामत पहुँचने की ख़बर देने के लिए बहन को पहले ही चंद पंक्तियाँ लिख भेजी थीं। अगली चिट्ठी में बिंगली परिवार की बातें पढ़ने को मिलेंगी, यही एलिज़ाबेथ को उम्मीद थी। दूसरी चिट्ठी का इंतज़ार करने की बेताबी को वही जवाब मिला जो बेताबी को अक्सर मिलता है। जेन को लंदन आए एक हफ़्ता हो गया था, फिर भी न कैरोलाइन से मुलाक़ात हुई थी, न कोई ख़बर मिली थी। जेन ने इसकी वजह यह सोचकर समझाई कि लॉन्गबर्न से सहेली को भेजी उसकी आख़िरी चिट्ठी शायद इत्तिफ़ाक़ से खो गई होगी। जेन आगे लिखती रही। 'मामी कल लंदन के उस इलाक़े में जाने वाली हैं, और उसी मौक़े पर मैं ग्रोवनर स्ट्रीट भी हो आऊँगी।' मुलाक़ात पूरी करके मिस बिंगली से मिलने के बाद फिर चिट्ठी आई। 'कैरोलाइन का मूड ठीक नहीं लग रहा था। फिर भी मुझसे मिलकर बहुत ख़ुश हुई, और लंदन आने की ख़बर न देने के लिए मुझे डाँटा भी। तो मेरा सोचना सही निकला, मेरी आख़िरी चिट्ठी उन्हें नहीं मिली। भैया का हाल-चाल तो पूछा ही। ठीक हैं, पर मिस्टर डार्सी के साथ काम में इतने मसरूफ़ हैं कि वे भी उनसे मुश्किल से मिल पाती हैं। पता चला मिस डार्सी रात के खाने पर आने वाली हैं। काश मैं भी उन्हें देख पाती। कैरोलाइन और श्रीमती हर्स्ट को बाहर जाना था, इसलिए ज़्यादा देर नहीं रुकीं। शायद जल्दी ही दोनों यहाँ मुझसे मिलने आएँगी।' एलिज़ाबेथ ने यह चिट्ठी पढ़कर सिर हिलाया। उसे बस यही यक़ीन हुआ कि मिस्टर बिंगली को बहन के लंदन में होने का पता चलना सिर्फ़ इत्तिफ़ाक़ पर टिका है।

चार हफ़्ते बीत गए, पर जेन ने उन्हें नहीं देखा। वह ख़ुद को यक़ीन दिलाने की कोशिश करती रही कि उसे कोई अफ़सोस नहीं। पर मिस बिंगली की बेरुख़ी अब और नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती थी। दो हफ़्ते तक हर सुबह घर पर उनका इंतज़ार करते और हर शाम उनकी तरफ़ से कोई नई सफ़ाई गढ़ते रहने के बाद आख़िर मेहमान आईं। पर बस थोड़ी देर के लिए रुकीं, और बर्ताव उससे भी कहीं ज़्यादा बदला हुआ था। जेन अब ख़ुद को और धोखा नहीं दे सकती थी। यह सब झेलकर उसने बहन को जो चिट्ठी लिखी, उससे जेन का दिल समझा जा सकता है। «प्यारी लिज़ी, मैं मानती हूँ कि मिस बिंगली मुझे चाहती हैं, यह मेरा पूरा ग़लत अंदाज़ा था — पर मुझे यक़ीन है तू इसे सुनकर मुझे नीचा दिखाकर अपनी समझ को सही ठहराने वाली नहीं बनेगी। फिर भी प्यारी बहन, आख़िर में तेरी बात सही निकली, फिर भी उनके बर्ताव को देखते हुए, मुझे यह कहने दे कि मेरा भरोसा भी उतना ही स्वाभाविक था जितना तेरा शक — इसे ज़िद मत समझना। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आता वे मुझसे क्यों नज़दीकी चाहती थीं। पर अगर वैसा ही मौक़ा फिर आए, तो पक्का फिर धोखा खाऊँगी। कैरोलाइन कल ही मेरे यहाँ आने का बदला चुकाने आईं। इतने दिनों में एक चिट्ठी तो दूर, एक लाइन भी नहीं भेजी थी। जब आईं भी, तो साफ़ पता चल रहा था कि उन्हें ज़रा भी ख़ुशी नहीं हो रही। पहले न आने के लिए छोटी-सी रस्मी माफ़ी माँगी, और दोबारा मिलने की कोई बात तक नहीं कही। हर तरह से इतनी बदली हुई थीं कि जाते वक़्त मैंने पक्का इरादा कर लिया कि अब यह नाता आगे नहीं बढ़ाऊँगी। उन्हें दोष दिए बिना नहीं रह सकती, फिर भी तरस आता है। मुझे ही चुनकर इस तरह क़रीब आना उनकी सरासर ग़लती थी। यह मैं भरोसे से कह सकती हूँ कि दोस्ती की पहल हमेशा उन्हीं की तरफ़ से हुई थी। पर तरस इसलिए आता है कि उन्हें ज़रूर लगता होगा कि वे ग़लत कर रही हैं, और मुझे यक़ीन है कि इसकी वजह भैया की फ़िक्र है। ज़्यादा समझाने की ज़रूरत नहीं। हमें पता है ऐसी कोई फ़िक्र करने की ज़रूरत ही नहीं, पर अगर उन्हें ख़ुद फ़िक्र हो, तो मेरे साथ उनका बर्ताव आसानी से समझ आ जाता है। और भैया अपनी बहन को इतने प्यारे हैं कि उनकी तरफ़ से जो भी फ़िक्र महसूस हो, वह स्वाभाविक और मीठी ही होगी। पर अब तक ऐसा डर पालना अजीब ज़रूर लगता है। अगर उन्हें मेरी ज़रा भी परवाह होती, तो हमारी मुलाक़ात बहुत, बहुत पहले हो चुकी होती। कैरोलाइन की अपनी बातों से साफ़ है कि उन्हें पक्का पता है कि मैं लंदन में हूँ। फिर भी कैरोलाइन की बातचीत के ढंग से लगा जैसे वे ख़ुद को यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रही हों कि भैया सचमुच मिस डार्सी को चाहते हैं। मुझे समझ नहीं आता। बहुत सख़्त फ़ैसला सुनाने से डर न लगे, तो कह सकती हूँ कि इस सारे मामले में झूठा दिखावा साफ़ नज़र आता है। पर मैं सारे दुखी ख़याल दूर कर, बस उन बातों के बारे में सोचना चाहती हूँ जो मुझे ख़ुश करती हैं। तेरा प्यार, और मामा-मामी की हमेशा जैसी मेहरबानी। बहुत जल्दी जवाब देना। मिस बिंगली ने कहा कि भैया शायद कभी नेदरफ़ील्ड वापस न आएँ और वह घर छोड़ भी दें, पर उन्होंने यह पक्के तौर पर नहीं कहा। उस बात का ज़िक्र न ही करें तो अच्छा। हंसफ़र्ड के दोस्त ख़ुशी से रह रहे हैं, यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। सर विलियम और मरिया के साथ ज़रूर हो आना। वहाँ तुझे बहुत आराम मिलेगा, यह मुझे यक़ीन है।» «प्यार सहित।» इस चिट्ठी ने एलिज़ाबेथ को कुछ हद तक दुख दिया। पर कम-से-कम इस सोच से हिम्मत मिली कि अब जेन उस बहन के धोखे में और नहीं फँसेगी। भैया से बाँधी उम्मीद अब पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी। उनकी दिलचस्पी फिर जागे, यह चाहत भी उसने छोड़ दी। बिंगली का चरित्र सोचते-सोचते उसकी नज़र में और गिरता गया। उन्हें सज़ा देने के साथ-साथ, शायद जेन के लिए भी भला हो, इसलिए वह दिल से चाहने लगी कि वे सचमुच जल्द ही मिस्टर डार्सी की बहन से शादी कर लें। विकहम की बात मानें तो, वह उस लड़की के हाथ से बिंगली को निकल जाने का काफ़ी पछतावा करा देगी।

इसी दौरान श्रीमती गार्डिनर ने उस सज्जन के बारे में किया वादा एलिज़ाबेथ को याद दिलाते हुए हाल-चाल पूछा। एलिज़ाबेथ जो ख़बर दे सकती थी, वह ख़ुद उससे ज़्यादा मामी को संतुष्ट करने वाली थी। मिस्टर विकहम का दिखाया लगाव ठंडा पड़ गया था, दिलचस्पी भी ख़त्म हो चुकी थी। अब वे किसी और के पीछे थे। एलिज़ाबेथ इतनी चौकस थी कि सब कुछ भाँप गई। फिर भी बिना ज़्यादा दुख के यह सब देख और चिट्ठी में लिख सकी। दिल बस थोड़ा-सा हिला था। हालात इजाज़त देते तो वह ख़ुद विकहम की इकलौती पसंद बनती, यह सोचकर उसका घमंड भी संतुष्ट हो गया। अब विकहम जिस जवान महिला को रिझाने में लगे थे, उनका सबसे साफ़ आकर्षण यही था कि उन्हें अचानक दस हज़ार पाउंड की विरासत मिली थी। पर एलिज़ाबेथ को इस बात में शायद शार्लट के मामले से कम सूझ-बूझ थी। वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहते थे, फिर भी एलिज़ाबेथ ने उन्हें दोष नहीं दिया। बल्कि इससे स्वाभाविक कुछ भी नहीं था। यह सोचकर कि उन्हें उसे छोड़ते वक़्त थोड़ा-बहुत जूझना पड़ा होगा, वह ख़ुशी-ख़ुशी मान सकती थी कि यह दोनों के लिए समझदारी और भलाई की बात थी। वह दिल से उनकी ख़ुशी की दुआ भी कर सकती थी। यह सब कुछ मामी को खुलकर बता दिया। सारी बात समझाने के बाद एलिज़ाबेथ ने आगे कहा। 'प्यारी मामी, अब मुझे पूरा यक़ीन है कि मैंने कभी उन्हें बहुत गहराई से चाहा ही नहीं था। अगर सचमुच वह ख़ालिस, ऊँचा जज़्बा महसूस किया होता, तो अब तक उनका नाम सुनते ही मुझे घिन आती और उनकी हर बदक़िस्मती की दुआ करती। पर मुझे उनके लिए सिर्फ़ अच्छे जज़्बात ही नहीं, मिस किंग के लिए भी पूरी इंसाफ़पसंदी है। मुझे इसका ज़रा भी सबूत नहीं मिलता कि मैं उस लड़की से थोड़ी भी नफ़रत करती हूँ, या उसे थोड़ा भी अच्छी लड़की मानना नहीं चाहती। इससे साफ़ है कि यह प्यार हो ही नहीं सकता। मेरी एहतियात रंग लाई। अगर मैं पागलों की तरह उन्हें चाहती, तो जानने वालों के लिए और भी दिलचस्प तमाशा बन जाती, पर अब जैसी अपनी मामूली-सी हालत का मुझे कोई अफ़सोस नहीं। ध्यान खींचने की क़ीमत कभी-कभी बहुत ज़्यादा होती है। किटी और लिडिया को उनके बदलने का दुख मुझसे कहीं ज़्यादा है। दोनों को अभी दुनियादारी की समझ नहीं। यह अपमानजनक सच अभी उन्होंने नहीं माना कि सुंदर जवान मर्द को भी उतना ही कुछ खाने-पीने का इंतज़ाम चाहिए, जितना मामूली शक्ल वाले जवान मर्द को।'