हिंदी संस्करण

अध्याय 27

लॉन्गबर्न परिवार के लिए इसके बाद कोई बड़ी बात नहीं हुई। कीचड़ भरे या ठंडे रास्तों से मेरिटन आना-जाना छोड़कर, जनवरी और फ़रवरी बिना किसी ख़ास बदलाव के गुज़र गए। मार्च में एलिज़ाबेथ को हंसफ़र्ड जाना था। पहले-पहल उसने इस बारे में ज़्यादा गंभीरता से नहीं सोचा था। पर जल्द ही उसे पता चला कि शार्लट इस मुलाक़ात का कितना इंतज़ार कर रही है। इसके बाद एलिज़ाबेथ भी इस बारे में हर बार ज़्यादा ख़ुशी और यक़ीन के साथ सोचने लगी। दूर रहने से शार्लट को फिर से देखने की चाह और बढ़ गई थी। मिस्टर कॉलिन्स से जो ऊब होती थी, वह भी थोड़ी कम हो गई थी। इस योजना में एक नई दिलचस्पी भी थी। ऐसी माँ और मन न मिलने वाली बहनों वाला घर पूरी तरह अच्छा नहीं हो सकता था। सिर्फ़ माहौल बदलने भर से भी कुछ दिन के लिए घर छोड़ना बुरा नहीं लगता था। इसके अलावा रास्ते में जेन से भी थोड़ी देर मिल सकती थी। समय क़रीब आते-आते, इस योजना का किसी भी वजह से टलना उसे इतना बुरा लगने लगा कि उसे बेसब्री से इंतज़ार होने लगा। पर सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। आख़िरकार वैसा ही तय हो गया जैसा शार्लट ने शुरू में सोचा था। एलिज़ाबेथ सर विलियम और उनकी छोटी बेटी के साथ जाने वाली थी। इसके साथ लंदन में एक रात बिताने का और भी बढ़िया कार्यक्रम जुड़ गया। इससे बेहतर योजना और कोई हो ही नहीं सकती थी। एक ही बात मन को दुखा रही थी — पिताजी को छोड़कर जाना। पिताजी को उसकी बहुत याद आने वाली थी, यह तय था। जाने का वक़्त क़रीब आते ही, पिताजी को बेटी का जाना बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने ज़रूर चिट्ठी लिखने को कहा, और लगभग यह वादा भी कर डाला कि जवाब देंगे।

मिस्टर विकहम से बड़े प्यार से विदाई हुई। मिस्टर विकहम का बर्ताव तो उससे भी ज़्यादा प्यार भरा था। अब वे किसी और लड़की के पीछे थे, फिर भी एलिज़ाबेथ ही पहली थी जिसने उनका ध्यान खींचा था। वही पहली थी जो उस ध्यान की हक़दार भी थी। जिसने पहले उनकी बात सुनकर सहानुभूति जताई, जिसने उनके भीतर तारीफ़ जगाई, वह भी वही थी। विदा लेते हुए उन्होंने दुआ की कि एलिज़ाबेथ को हर तरह की ख़ुशी मिले। लेडी कैथरीन डी बर्ग कैसी होंगी, यह भी उन्होंने फिर से समझा दिया। मानो उन्हें यक़ीन था कि उस औरत के बारे में दोनों की राय हमेशा एक जैसी रहेगी — बल्कि हर किसी के बारे में भी। उनके इस बर्ताव में फ़िक्र और अपनापन झलक रहा था। इसी वजह से एलिज़ाबेथ को लगा कि वह मिस्टर विकहम के लिए हमेशा सच्चा स्नेह रखेगी। वे शादी करें या कुँवारे रहें, एक भले और ख़ुशमिज़ाज मर्द की मिसाल हमेशा वही रहेंगे — यही मानते हुए दोनों अलग हुए।

अगले दिन जिनके साथ सफ़र शुरू हुआ, वे मिस्टर विकहम की याद कम सुहानी बनाने वाले साथी नहीं थे। सर विलियम लुकास और उनकी बेटी मरिया, दोनों में से किसी ने भी सुनने लायक़ एक बात नहीं कही। मरिया स्वभाव से हँसमुख थीं, पर सिर उतना ही ख़ाली था जितना उनके पिता का। इन दोनों को सुनने का मज़ा गाड़ी की खटपट सुनने से कुछ ख़ास अलग नहीं था। एलिज़ाबेथ को हँसी-मज़ाक पसंद था। पर सर विलियम की हँसी वह बहुत पहले से देखती आई थी। उनका दरबार में पेश होकर नाइट की उपाधि पाने वाला वह हैरतअंगेज़ क़िस्सा अब उनके पास सुनाने को नया कुछ नहीं बचा था। उनकी शिष्ट बातें भी उस क़िस्से जितनी ही घिस चुकी थीं। सफ़र बस चौबीस मील का था। बहुत सवेरे निकलने की वजह से दोपहर तक वे ग्रेसचर्च स्ट्रीट पहुँच गए। जब गाड़ी मिस्टर गार्डिनर के घर के सामने आ रही थी, जेन बैठक की खिड़की से उन्हें आते देख रही थी। जब सब लोग दहलीज़ में दाख़िल हुए, जेन वहीं उनकी अगवानी को खड़ी थी। एलिज़ाबेथ ने बड़ी बहन का चेहरा ग़ौर से देखा। जेन को अब भी सेहतमंद और ख़ूबसूरत देखकर उसे बड़ी ख़ुशी हुई। सीढ़ियों पर छोटे लड़के-लड़कियों का एक झुंड जमा था। अपनी ममेरी बहनों को देखने की बेताबी में बैठक में रुक ही नहीं सके थे। पर एक साल से न मिल पाने की झिझक में, नीचे उतरने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाए। सब कुछ ख़ुशी और अपनेपन से भरा था। पूरा दिन बड़े मज़े में गुज़रा। सुबह ख़रीदारी में बीती, और शाम किसी थिएटर का तमाशा देखते हुए बीती।

उस वक़्त एलिज़ाबेथ ने कोशिश करके अपनी जगह मामी के बग़ल में बना ली। पहली बात जेन को लेकर हुई। बारीकी से पूछने पर पता चला कि जेन हमेशा हिम्मत बनाए रखने की कोशिश करती है, पर कभी-कभी उदास भी हो जाती है। यह सुनकर हैरानी से ज़्यादा दुख हुआ। फिर भी यही सोचना ठीक था कि यह उदासी ज़्यादा दिन नहीं टिकेगी। श्रीमती गार्डिनर ने यह भी बारीकी से बताया कि मिस बिंगली जब ग्रेसचर्च स्ट्रीट आई थीं, तब क्या हुआ था। जेन के साथ हुई कई बातचीत भी दोहराकर सुनाईं। इस बयान से साफ़ पता चलता था कि जेन ने सचमुच इस रिश्ते की उम्मीद छोड़ दी है। इसके बाद श्रीमती गार्डिनर ने मिस्टर विकहम के अपनी भांजी को छोड़ देने की बात पर हल्का ठट्ठा किया। साथ ही यह भी सराहा कि एलिज़ाबेथ ने इसे कितनी अच्छी तरह सह लिया। मामी ने जोड़ा। 'पर प्यारी एलिज़ाबेथ, मिस किंग कैसी लड़की है? हमारे दोस्त को अगर सिर्फ़ पैसे का लालची समझना पड़े, तो अफ़सोस की बात होगी।' 'प्यारी मामी, यह तो बताइए कि शादी में पैसे का लालच और समझदारी में फ़र्क़ कहाँ है? कहाँ तक बात अक़्लमंदी है, और कहाँ से लालच शुरू होता है? पिछले क्रिसमस पर आपको यही फ़िक्र थी कि मिस्टर विकहम अगर मुझसे शादी करें तो यह नादानी होगी। और अब जब वे बस दस हज़ार पाउंड वाली लड़की पाने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप उन्हें लालची समझना चाहती हैं।' 'मिस किंग कैसी लड़की है, बस यह बता दो, तो मुझे पता चल जाएगा कि क्या सोचना चाहिए।' 'लगता तो है, बड़ी भली लड़की हैं। कोई बुरी बात मुझे मालूम नहीं।' 'पर जब तक उनके दादाजी के गुज़रने से मिस किंग को वह जायदाद नहीं मिली थी, तब तक तो मिस्टर विकहम ने उनमें ज़रा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, है न?' 'जी हाँ। दिलचस्पी दिखाने की कोई वजह भी तो नहीं थी। अगर पैसे की कमी की वजह से मेरा प्यार पाना उन्हें जायज़ नहीं लगा, तो जिस लड़की को वह पसंद भी नहीं करते और जो उतनी ही ग़रीब भी है, उससे प्यार जताने की भला उन्हें क्या वजह होती?' 'पर इतना कुछ होने के बाद इतनी जल्दी उस लड़की की तरफ़ मन मोड़ लेना, शराफ़त की बात नहीं लगती।' 'तंगहाली में फँसे आदमी के पास वे सारे नफ़ीस तौर-तरीक़े निभाने का वक़्त नहीं होता, जो और लोग निभा सकते हैं। अगर उस लड़की को कोई एतराज़ नहीं, तो हमें एतराज़ क्यों होना चाहिए?' 'उस लड़की को एतराज़ न होने से उस आदमी का बर्ताव सही नहीं ठहर जाता। इससे बस इतना पता चलता है कि उस लड़की में भी कुछ कमी है — शायद समझ की, शायद जज़्बात की।' 'ठीक है,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'आपकी मरज़ी जो सोचना चाहें, सोच लीजिए। वे लालची हैं, और वह लड़की नादान है।' 'नहीं, लिज़ी। मैं ऐसा सोचना नहीं चाहती। मैंने तो कहा था, डर्बीशायर में इतने बरस रहे किसी जवान को बुरा समझना अफ़सोस की बात होगी।' 'हाय, अगर बस इतनी सी बात है, तो मैं डर्बीशायर में रहने वाले जवानों के बारे में बहुत ख़राब राय रखती हूँ। और हर्टफ़र्डशायर में रहने वाले उनके क़रीबी दोस्त भी कुछ ख़ास बेहतर नहीं हैं। सबसे मन भर गया है। भला हो ईश्वर का! कल ही तो मैं ऐसी जगह जा रही हूँ जहाँ न कोई सुहानापन है, न शराफ़त और न समझ की कोई सिफ़ारिश करने लायक़ बात। आख़िर में जान-पहचान के लायक़ बस मूर्ख मर्द ही निकलते हैं।' 'ज़रा सँभलकर, लिज़ी। इस बात में मायूसी की झलक बहुत गहरी है।'

नाटक ख़त्म होने पर, दोनों के अलग होने से पहले, एलिज़ाबेथ को अचानक एक ख़ुशी भरा न्यौता मिला। मामा-मामी गर्मियों में एक सुहाना सफ़र करने वाले थे, और उन्होंने साथ चलने का न्यौता दिया। 'कितनी दूर तक जाएँगे, यह अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ,' श्रीमती गार्डिनर ने कहा। 'पर शायद हम झील प्रदेश तक चले जाएँ।' एलिज़ाबेथ के लिए इससे बढ़िया योजना और कोई नहीं हो सकती थी। उसने बड़ी ख़ुशी और शुक्रगुज़ारी के साथ न्यौता क़बूल कर लिया। 'प्यारी मामी, सबसे प्यारी मामी,' एलिज़ाबेथ मुग्ध होकर बोल पड़ी। 'कितना मज़ा आएगा, कितनी ख़ुशी मिलेगी! आपने मुझे मानो नई ज़िंदगी और नया जोश दे दिया है। निराशा और उदासी को अलविदा! चट्टानों और पहाड़ों के आगे भला मर्दों की क्या बिसात? कैसा मुग्ध कर देने वाला वक़्त हमारा इंतज़ार कर रहा है! और लौटते वक़्त हम बाक़ी मुसाफ़िरों जैसे नहीं होंगे, जो कुछ भी ठीक से बता नहीं पाते। हमें ठीक-ठीक पता होगा कि हम कहाँ गए, और यह भी याद रहेगा कि क्या देखा। हम अपने दिमाग़ में झीलों, पहाड़ों और नदियों को गड्डमड्ड नहीं करेंगे। किसी नज़ारे का बयान करते हुए यह झगड़ना भी शुरू नहीं करेंगे कि कौन कहाँ खड़ा था। हमारे सफ़र की पहली याद आम मुसाफ़िरों की यादों जितनी बेढब नहीं होगी।'