हिंदी संस्करण
अध्याय 36
जब एलिज़ाबेथ को मिस्टर डार्सी की चिट्ठी मिली, तो उसने यह नहीं सोचा था कि उसमें प्रस्ताव दोहराने वाली बातें होंगी। फिर भी उसने यह अंदाज़ा भी नहीं लगाया था कि उसमें और क्या हो सकता है। वह चिट्ठी कितनी बेचैनी से पढ़ेगी, और कैसी उलझी हुई भावनाओं में डूब जाएगी, यह आसानी से समझा जा सकता है। पढ़ते समय जो भावनाएँ उसके भीतर उठीं, उन्हें शब्दों में बयान करना भी मुमकिन नहीं था। शुरुआत में तो उसे यह जानकर हैरानी हुई कि उन्हें यक़ीन है कि वे कुछ-न-कुछ सफ़ाई दे ही सकते हैं। उसे पूरा भरोसा था कि अगर उन्हें ज़रा भी शर्म आती, तो वे सिर्फ़ ऐसी बातें ही कह पाते, जिन्हें कहने की हिम्मत उन्हें ख़ुद न होती। गहरे पूर्वाग्रह के साथ उसने पढ़ना शुरू किया कि वे नेदरफ़ील्ड में हुई बात की क्या सफ़ाई देते हैं। इतनी जल्दबाज़ी में पढ़ रही थी कि बात को ठीक से समझ पाने की ताक़त भी मुश्किल से बची थी। अगले वाक्य में क्या लिखा है, यह जानने की जल्दी में, सामने वाले वाक्य का मतलब समझने पर ध्यान ही नहीं दे पाई। यह कि उन्हें यक़ीन था कि बहन को कोई लगाव नहीं था — इस बात को उसने फ़ौरन झूठ मान लिया। शादी रोकने की सबसे बड़ी वजह बताने वाले हिस्से में तो उसे इतना ग़ुस्सा आया कि उनके साथ इंसाफ़ करने का मन तक नहीं हुआ। वे अपने किए पर पछता भी रहे हों, तो भी ऐसी कोई बात नहीं थी जो एलिज़ाबेथ को संतोष दे पाती। चिट्ठी में पछतावा नहीं, बस घमंड भरा था। शुरू से आख़िर तक वह अहंकार और गुस्ताख़ी से भरी थी।
पर मिस्टर विकहम से जुड़ी बात शुरू होते ही हालात बदल गए। अगर वह सच होती, तो विकहम को लेकर उसने जो राय बड़े जतन से सँजोई थी, वह पूरी तरह टूट जाती। इतना ही नहीं, वह बात विकहम ने अपने बारे में जो कुछ ख़ुद सुनाया था, उससे हैरान करने की हद तक मिलती थी। थोड़ा और मन बाँधकर पढ़ा, तो दिल और दुखा और भावनाएँ और भी उलझ गईं, जिन्हें समझना मुश्किल था। हैरानी, बेचैनी, यहाँ तक कि डर तक उस पर हावी हो गए। 'यह झूठ ही होगा! ऐसा हो ही नहीं सकता! यह घिनौना झूठ है!' वह कई बार यही चिल्लाई, और यह सब मानने से इनकार करती रही। चिट्ठी आख़िर तक पढ़ ली, पर आख़िरी एक-दो पन्नों में क्या लिखा था, यह लगभग समझ ही नहीं पाई, और जल्दी से उसे तह करके रख दिया। उसने ठान लिया कि यह चिट्ठी वह फिर कभी न देखेगी, न पढ़ेगी।
मन इतना उलझा हुआ था कि विचार कहीं टिक नहीं रहे थे, फिर भी वह चलती रही। पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। तीस सेकंड भी नहीं बीते कि उसने फिर से चिट्ठी खोल ली। जितना हो सका, ख़ुद को सँभालकर, विकहम से जुड़ी हर बात फिर से दर्द सहते हुए पढ़नी शुरू की। ख़ुद को थामे रखकर एक-एक वाक्य का मतलब परखा। विकहम और पेम्बरली घराने के रिश्ते की बात ठीक वैसी ही थी, जैसी विकहम ने ख़ुद बताई थी। स्वर्गवासी मिस्टर डार्सी कितने भले थे, यह उसे पहले नहीं पता था, पर यह बात भी विकहम की बात से मेल खाती थी। यहाँ तक दोनों बातें एक-दूसरे को सही ठहराती थीं। पर वसीयत वाले हिस्से पर आते ही सब कुछ बदल गया। विकहम ने गिरजाघर की नियुक्ति को लेकर जो कहा था, वह अब भी उसे साफ़ याद था। उन्होंने जो लिखा था, वह भी याद आते ही उसे लगा कि दोनों में से किसी एक तरफ़ ज़रूर बड़ा झूठ है। कुछ मिनट तक उसने ख़ुद को यह कहकर तसल्ली दी कि वह जो चाहती है, वही सही है। पर विकहम ने गिरजाघर की नियुक्ति का पूरा हक़ छोड़ा और बदले में तीन हज़ार पाउंड जैसी बड़ी रकम ली — यह बात जब उसने बहुत ध्यान से बार-बार पढ़ी, तो फिर से हिचकिचाहट हुई। चिट्ठी नीचे रखकर, इंसाफ़ की कोशिश करते हुए, उसने हर बात को तौला। किसकी बात सच होगी, यह सोचा, पर कुछ हासिल नहीं हुआ। दोनों ही बस अपनी-अपनी बात पर अड़े थे। उसने फिर पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे एक-एक पंक्ति पढ़ती गई, वैसे-वैसे यह और साफ़ होता गया — जिस बात को वह अब तक यही मानती आई थी कि चाहे कितनी भी सफ़ाई में लपेटकर कहा जाए, मिस्टर डार्सी के किए को बुरा न मानना नामुमकिन है, वही बात अब यह दिखा रही थी कि हो सकता है, असल में शुरू से आख़िर तक उनकी कोई ग़लती ही न हो। डार्सी ने बेझिझक कहा था कि मिस्टर विकहम पैसा फ़िज़ूल उड़ाते हैं और कुल मिलाकर ऐयाशी भरी ज़िंदगी जीते रहे हैं। एलिज़ाबेथ को इस बात से गहरा धक्का लगा। यह बेइंसाफ़ी है, इसका एक भी सबूत वह पेश नहीं कर पा रही थी, इसलिए धक्का और गहरा था। विकहम के बारे में उसने मिलिशिया में शामिल होने से पहले कभी कुछ नहीं सुना था। लंदन में इत्तेफ़ाक़न मिले एक जवान ने पुरानी, थोड़े समय की जान-पहचान फिर से जोड़ने का न्योता दिया था, और उसी न्योते पर वे मिलिशिया में भर्ती हुए थे। हर्टफ़र्डशायर में उनके ख़ुद बताए के अलावा उनकी पिछली ज़िंदगी के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था। भले उसे उनका असली स्वभाव पहचानने का मौक़ा मिला होता, एलिज़ाबेथ ने कभी उसे पहचानना चाहा ही नहीं — क्योंकि सिर्फ़ चेहरे, आवाज़ और चाल-ढाल को देखकर उसने फ़ौरन मान लिया था कि उनमें हर गुण मौजूद है। मिस्टर डार्सी के इल्ज़ाम से उन्हें बचा सके, ऐसी कोई एक भी अच्छी बात याद करने की कोशिश की। कोई असाधारण ईमानदारी या दयालु दिल का निशान तक ढूँढ़ने की कोशिश की। कम-से-कम इतना तो सोचना चाहा कि उनमें इतने ज़्यादा गुण हैं कि मिस्टर डार्सी ने जिसे बरसों की सुस्ती और बुराई कहा, उसे एक बार की चूक मानकर टाला जा सके। पर ऐसी कोई याद बिल्कुल नहीं आई। दिलकश चाल-ढाल और बातचीत वाले विकहम की तस्वीर तो झट से आँखों के सामने आ गई। पर पड़ोस के हर किसी ने उन्हें अच्छा माना था, और अफ़सरों की दावतों में मिलनसारी से जो चाहत मिली थी, उसके अलावा कोई गहरी खूबी याद नहीं आई। इस बात पर देर तक सोचती रही, फिर चिट्ठी दोबारा पढ़नी शुरू की। पर हाय, आगे मिस डार्सी को लेकर विकहम की जो चाल बताई गई, उसकी कुछ हद तक पुष्टि ठीक एक दिन पहले सुबह कर्नल फ़िट्ज़विलियम से हुई बातचीत से भी होती थी। आख़िर में तो यह भी लिखा था कि पूरी बात जाँचनी हो, तो कर्नल फ़िट्ज़विलियम से पूछ लिया जाए। उन्होंने ख़ुद पहले ही कहा था कि वे अपने चचेरे भाई के हर मामले में गहराई से जुड़े रहे हैं, और उनके स्वभाव पर शक करने की कोई वजह भी नहीं थी। एक पल के लिए तो उसने लगभग तय कर लिया कि उनसे जाकर पूछे। पर ऐसी गुज़ारिश करना बहुत अटपटा लगा। और यह भरोसा भी हो गया कि अगर मिस्टर डार्सी को अपने चचेरे भाई से पुष्टि मिलने का यक़ीन न होता, तो वे कभी ऐसा सुझाव देते ही नहीं — इसी सोच के साथ आख़िरकार उसने यह ख़याल पूरी तरह छोड़ दिया।
मिस्टर फ़िलिप्स के घर पहली शाम साथ बिताई थी, तब विकहम से हुई बातचीत एक-एक करके याद आ गई। उन्होंने जो बहुत कुछ कहा था, वह भी अब तक ताज़ा था। अब जाकर उसे यह अहसास हुआ कि किसी अजनबी के सामने ऐसी बातें छेड़ना कितना अनुचित था, और इसी बात से उसे धक्का लगा। पहले उसे यह क्यों नहीं दिखा, इस पर वह ख़ुद हैरान थी। इतनी आगे बढ़कर अपनी बात खोल देना कितनी बेतमीज़ी थी, और उनकी बातों और बर्ताव में कितनी असंगति थी, यह भी अब उसे समझ आया। उन्होंने बड़े दावे से कहा था कि मिस्टर डार्सी से मिलने में उन्हें ज़रा भी डर नहीं है। यह भी कहा था कि मिस्टर डार्सी भले इस इलाक़े से चले जाएँ, वे ख़ुद यहीं रहेंगे। फिर भी ठीक अगले हफ़्ते नेदरफ़ील्ड के नाच से वे बच निकले। यह बात भी याद आई कि जब तक नेदरफ़ील्ड वाले इस इलाक़े से नहीं गए, तब तक उन्होंने वह बात उसके सिवा किसी और को नहीं बताई थी। पर उनके जाते ही वह बात पूरे इलाक़े में चर्चा का विषय बन गई। यह भी याद आया कि उन्होंने क़सम खाई थी कि पिता का सम्मान करते हुए वे बेटे की ग़लती कभी उजागर नहीं करेंगे। पर उसके बाद उन्होंने ज़रा भी हिचक या संकोच के बिना मिस्टर डार्सी की इज़्ज़त को नीचा दिखाया। अब विकहम से जुड़ी हर बात कितनी अलग दिखने लगी! मिस किंग में उनकी दिलचस्पी अब सिर्फ़ पैसे पर टिकी घिनौनी चाल जैसी लगती थी। मिस किंग की जायदाद बहुत बड़ी नहीं थी, यह बात अब यह सबूत नहीं रह गई थी कि वे बहुत कुछ नहीं चाहते — बल्कि यह सिर्फ़ यह दिखाती थी कि जो भी हाथ लगे, उसे झपटने की उनमें कितनी बेताबी है। ख़ुद एलिज़ाबेथ के साथ उनका बर्ताव भी अब किसी अच्छी नीयत से निकला हुआ नहीं लगता था। या तो उन्होंने उसकी जायदाद का ग़लत अंदाज़ा लगाया था, या फिर वह ख़ुद जो लापरवाही से दिखा बैठी थी, उसी पसंद को भड़काकर वे अपना घमंड सींच रहे थे। विकहम का पक्ष लेने का जो थोड़ा मन बचा था, वह भी धीरे-धीरे मिटता गया। मिस्टर डार्सी की बात पर और यक़ीन दिलाने वाली बातें भी माननी पड़ीं। मिस्टर बिंगली ने बहुत पहले, जब जेन ने पूछा था, तब यही कहा था कि उस मामले में डार्सी की कोई ग़लती नहीं। मिस्टर डार्सी का बर्ताव घमंडी और दूर रखने वाला ज़रूर था। पर इतने समय की जान-पहचान में, और हाल में साथ बिताए ज़्यादा वक़्त में उन्हें कुछ नज़दीक से देख चुकी एलिज़ाबेथ को, उनमें कभी उसूलों से हटकर या नाइंसाफ़ी वाला कोई निशान नहीं दिखा था। न ही धर्म से दूरी या बुरी आदत का कोई इशारा मिला था। रिश्तेदार उन्हें इज़्ज़त देते और चाहते थे। यहाँ तक कि विकहम ने भी भाई के रूप में डार्सी की उम्दगी मान ली थी। एलिज़ाबेथ ने भी उन्हें कई बार बहन की बात बड़े प्यार से करते सुना था। तो इसका मतलब, उनमें कोमल भावना बिल्कुल न हो, ऐसा भी नहीं था। अगर वे वैसा ही करते जैसा विकहम ने बताया था, तो सही राह से इतनी बुरी तरह भटकना दुनिया से छिपा रहना मुश्किल होता। और ऐसा कर सकने वाले इंसान की, मिस्टर बिंगली जैसे भले इंसान से दोस्ती हो, यह भी समझ में नहीं आता था।
एलिज़ाबेथ को ख़ुद अपने आप पर बहुत शर्म आई। डार्सी के बारे में सोचे या विकहम के बारे में, वह यह ख़याल टाल नहीं पाई कि वह ख़ुद अंधी बनी रही, एक तरफ़ झुकी रही, पूर्वाग्रह में डूबकर बेतुका बर्ताव करती रही। 'मैं कितनी घटिया तरह से पेश आई!' वह चिल्लाई। 'मैं, जो लोगों को परखने की अपनी नज़र पर घमंड करती थी! मैं, जो अपनी समझ को इतना ऊँचा मानती थी! बहन के उदार और निष्पक्ष दिल को कितनी बार नीचा दिखाया, और बेकार के शक से अपनी घमंड सींची। यह अहसास कितना शर्मनाक है! पर यह शर्म कितनी वाजिब भी है! प्यार में पड़ी होती, तो भी इससे बुरी तरह अंधी नहीं हो सकती थी। पर मुझे मूर्ख बनाने वाली मुहब्बत नहीं, घमंड थी। पहली बार जान-पहचान होते ही एक की मेहरबानी पर ख़ुश हुई, दूसरे की अनदेखी पर दुखी हुई — इसी वजह से दोनों से जुड़ी हर बात में पूर्वाग्रह और अनजानपन को घुसने दिया, और अक्ल को बाहर निकाल दिया। इस पल तक मैं ख़ुद को ही नहीं जानती थी।'
अपने ख़याल से जेन की तरफ़, और जेन से बिंगली की तरफ़ ध्यान गया, तो जल्दी ही याद आया कि इस मामले में मिस्टर डार्सी की सफ़ाई उसे बहुत अधूरी लगी थी। वह हिस्सा उसने फिर पढ़ा। दूसरी बार पढ़ने पर एहसास बिल्कुल अलग था। एक मामले में उनकी बात मानने के सिवा कोई चारा नहीं था, तो दूसरे मामले में वही यक़ीन ठुकराने की कौन-सी वजह थी? उन्होंने साफ़ कहा था कि जेन को बिंगली से लगाव है, यह बात उन्हें बिल्कुल नहीं दिखी। शार्लट जो हमेशा सोचती थी, वह बात भी याद आए बिना नहीं रही। जेन को लेकर उनकी यह बात सही थी, यह भी नकारा नहीं जा सकता था। जेन का दिल गर्म था, पर बाहर से यह लगभग नहीं दिखता था। उनके अंदाज़ और चाल-ढाल में हमेशा एक नरम संतोष रहता, और यह वैसा भाव नहीं था जो अक्सर गहरी भावुकता के साथ दिखता है। परिवार को इतनी शर्मनाक पर वाजिब बातों से कोसने वाला हिस्सा आया, तो एलिज़ाबेथ को बहुत शर्म आई। यह इल्ज़ाम सही है, यह इतना साफ़ था कि नकारा नहीं जा सकता था। उन्होंने नेदरफ़ील्ड के नाच में हुई जिस बात को ख़ास तौर पर रेखांकित किया, उसने उनके शुरुआती हर एतराज़ को और पुख़्ता कर दिया, ऐसा उन्होंने लिखा था। वह बात डार्सी के दिल में जितनी गहरी बैठी थी, एलिज़ाबेथ के दिल में भी उतनी ही गहरी बैठ गई। ख़ुद और अपनी बहन की तारीफ़ में लिखी बात बेअसर नहीं गई। उससे मन को थोड़ी तसल्ली मिली। पर बाक़ी परिवार ने ख़ुद अपने बर्ताव से जो हिक़ारत बुलाई थी, उसका दर्द वह मिटा नहीं पाई। उसे लगा कि जेन की निराशा असल में सबसे क़रीबी परिवार वालों के बर्ताव से ही उपजी थी। और इतनी बेतमीज़ी से दोनों बहनों की साख को कितना बड़ा नुक़सान हो सकता है, यह सोचकर वह ऐसी गहरी निराशा में डूब गई, जैसी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी।
तरह-तरह के ख़याल मन पर छोड़ दिए, हुई हर बात को फिर से परखा और तय करने की कोशिश की कि सच क्या होगा। इतने अचानक और इतने बड़े बदलाव के साथ किसी तरह तालमेल बिठाने की कोशिश करते हुए वह दो घंटे तक रास्तों में भटकती रही। आख़िर थक गई, और यह ख़याल आया कि बहुत देर से घर से बाहर है, तो लौट पड़ी। घर में घुसते हुए उसने चाहा कि हमेशा की तरह ख़ुश-मिज़ाज दिखे। जिन ख़यालों की वजह से वह लोगों से बात नहीं कर पाएगी, उन्हें दबाने का उसने मन बना लिया। एलिज़ाबेथ के न रहते हुए रोज़िंग्स से दोनों सज्जन बारी-बारी मिलने आए थे, यह उसे जल्दी ही पता चला। मिस्टर डार्सी सिर्फ़ विदाई कहने के लिए कुछ मिनट रुके थे। कर्नल फ़िट्ज़विलियम कम-से-कम एक घंटे तक बैठे उसके लौटने का इंतज़ार करते रहे थे। यहाँ तक कि पैदल पीछा करके उसे ढूँढ़ने तक का ख़याल उन्हें आया था। एलिज़ाबेथ को उनसे न मिल पाने का अफ़सोस दिखाने के सिवा कोई चारा न था। असल में उसे बहुत ख़ुशी हुई थी। कर्नल फ़िट्ज़विलियम अब उसकी दिलचस्पी का विषय नहीं रह गए थे। वह सिर्फ़ चिट्ठी के बारे में ही सोच पा रही थी।