हिंदी संस्करण

अध्याय 35

अगली सुबह एलिज़ाबेथ उन्हीं विचारों के साथ जागी, जिनमें पिछली रात आँख लगने तक उलझी रही थी। जो कुछ हुआ था, उसके सदमे से वह अभी उबर नहीं पाई थी। कुछ और सोचना मुमकिन ही नहीं लग रहा था। किसी काम में मन नहीं लगा, इसलिए नाश्ते के थोड़ी देर बाद ही वह हवा खाने टहलने निकल पड़ी। सीधे अपने मनपसंद रास्ते की तरफ़ जा रही थी कि याद आया — मिस्टर डार्सी कभी-कभी उधर ही आते हैं। वह रुक गई। पार्क में जाने के बजाय उस संकरी राह पर मुड़ गई, जो बड़ी सड़क से और दूर ले जाती थी। एक तरफ़ अब भी पार्क की बाड़ चलती रही। जल्दी ही वह पार्क में जाने वाले एक फाटक के पास से गुज़री।

उस राह पर दो-तीन बार आते-जाते हुए, सुहावने सुबह के मौसम ने उसे फाटक के पास रोक लिया। वह पार्क के भीतर झाँकने लगी। केंट में बिताए पाँच हफ़्तों में देहात का नज़ारा बहुत बदल चुका था। जल्दी कोंपलें फूटने वाले पेड़ रोज़ और हरे होते जा रहे थे। फिर से चलने ही वाली थी कि पार्क के किनारे की छोटी झाड़ी में उसे एक सज्जन झलकते दिखे। वे इसी तरफ़ आ रहे थे। कहीं मिस्टर डार्सी न हों, इस डर से वह फ़ौरन पीछे हटने लगी। पर वे इतने पास आ चुके थे कि एलिज़ाबेथ को पहचान गए। वे तेज़ी से आगे बढ़े और उसका नाम पुकारा। एलिज़ाबेथ मुड़ चुकी थी, फिर भी उसे साफ़ पता चल गया कि पुकारने वाली आवाज़ मिस्टर डार्सी की है। वह फिर फाटक की तरफ़ बढ़ी। वे भी उसी पल फाटक तक पहुँच गए। उन्होंने एक चिट्ठी आगे बढ़ाई, और वह बिना सोचे-समझे उसे थाम बैठी। डार्सी ने ऐसी ठंडी शांति से कहा, जो लगभग घमंड जैसी लगती थी। 'आपसे मिलने की उम्मीद में मैं कुछ देर से इस झाड़ी में टहल रहा था। क्या आप कृपा करके यह चिट्ठी पढ़ेंगी?' फिर उन्होंने हल्के-से सिर झुकाया। वे दोबारा झाड़ी की तरफ़ मुड़े और जल्दी ही ओझल हो गए।

ख़ुशी की कोई उम्मीद नहीं थी, पर जिज्ञासा बेहद तेज़ थी। एलिज़ाबेथ ने जब चिट्ठी खोली, तो हैरानी और बढ़ गई। लिफ़ाफ़े के भीतर दो पन्ने थे, दोनों तरफ़ घनी लिखावट से पूरे भरे हुए। लिफ़ाफ़े पर भी लिखावट भरी थी। वह राह पर चलती हुई ही पढ़ने लगी। चिट्ठी सुबह आठ बजे रोज़िंग्स में लिखी गई थी। उसमें यह लिखा था:

'महोदया, इस डर से मत घबराइए कि इस चिट्ठी में मैं कल रात आपकी इतनी नापसंद भावना दोहराऊँगा, या फिर से प्रस्ताव रखूँगा। दोनों की भलाई के लिए जिस उम्मीद को जितनी जल्दी भुला दिया जाए उतना अच्छा, उसे लंबा खींचकर न तो मैं आपको तकलीफ़ देना चाहता हूँ, न ख़ुद को छोटा करना चाहता हूँ। यह चिट्ठी लिखना और आपसे पढ़वाना मेरी अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए ज़रूरी था। वरना यह लिखने और पढ़ने की मशक़्क़त, दोनों से बचना ही ठीक होता। इसलिए आपका ध्यान माँगने की इस गुस्ताख़ी को माफ़ कर दीजिए। आपकी भावना नाख़ुश होकर भी इसे पढ़ेगी, पर आपकी निष्पक्षता से यही उम्मीद रखता हूँ। कल रात आपने मुझ पर दो ग़लतियों का इल्ज़ाम लगाया, जो न स्वभाव में एक-सी हैं, न वज़न में। पहली — कि मैंने दोनों के दिल की परवाह किए बिना मिस्टर बिंगली को आपकी बहन से दूर कर दिया। दूसरी — कि मैंने कई हक़, इज़्ज़त और इंसानियत के तक़ाज़े ताक पर रखकर मिस्टर विकहम की आज की सुख-सुविधा छीन ली और आगे की उम्मीदें कुचल दीं। वे मेरे बचपन के दोस्त थे, और मेरे पिता खुलकर उन्हें चाहते थे। हमारे घराने की मदद के सिवा उनके पास सहारा था ही नहीं, और वे इसी मदद को अपना हक़ समझते हुए बड़े हुए थे। ऐसे इंसान को मैं जान-बूझकर, बिना किसी वजह के ठुकरा देता — तो यह सोचिए कैसा लगता। यह उस बात से कहीं ज़्यादा गिरी हुई हरकत होती, जिसमें दो जवानों की मुहब्बत, जो बस कुछ हफ़्तों में पनपी थी, तोड़ी गई। पर दोनों मामलों पर कल रात जो तीखा इल्ज़ाम लगा, उम्मीद है अब से मेरे बर्ताव और उसकी वजह पढ़ने के बाद फिर नहीं लगेगा। ख़ुद को दी जाने वाली सफ़ाई देते हुए अगर आपका दिल दुखाने की बात भी कहनी पड़े, तो बस इतना कह सकता हूँ — अफ़सोस है। यह कहना ज़रूरी है, और इससे ज़्यादा माफ़ी माँगना बेमानी होगा। हर्टफ़र्डशायर पहुँचे थोड़े ही दिन हुए थे कि मुझे भी बाक़ी सबकी तरह पता चल गया — बिंगली उस इलाक़े की किसी और लड़की से कहीं ज़्यादा आपकी बहन को चाहते थे। पर उनके दिल में सचमुच गहरी मुहब्बत है, यह डर मुझे पहली बार नेदरफ़ील्ड के नाच वाली रात हुआ। इससे पहले भी उन्हें कई बार प्यार में पड़ते देखा था। उसी नाच में जब मुझे आपके साथ नाचने का सौभाग्य मिला, तभी संयोग से सर विलियम लुकास से पहली बार सुना कि बिंगली की आपकी बहन में दिलचस्पी के चलते दोनों की शादी की उम्मीद हर तरफ़ फैल चुकी है। उन्होंने बस तारीख़ तय न होने की बात कही, बाक़ी सब पक्का बताया। तभी से मैं दोस्त के बर्ताव पर बारीकी से नज़र रखने लगा। मिस बेनेट के लिए उनका लगाव, मैंने पहले कभी न देखे किसी भी मामले से गहरा पाया। आपकी बहन को भी परखा। उनका चेहरा और अंदाज़ हमेशा की तरह सीधा-सच्चा, ख़ुशमिज़ाज और भला लगने वाला था। पर ख़ास मुहब्बत का कोई निशान नहीं दिखा। उस शाम भर देखने के बाद मुझे यक़ीन हो गया — वह उनकी दिलचस्पी ख़ुशी से क़बूल तो करती हैं, पर उसी शिद्दत से उसे बढ़ावा नहीं देतीं। अगर इसमें आप ग़लत नहीं, तो साफ़ है कि मैं ही ग़लत देख रहा था। आप बहन को मुझसे कहीं बेहतर जानती हैं, इसलिए शायद ऐसा ही हो। अगर मेरी ग़लत राय की वजह से बहन को तकलीफ़ हुई, तो आपका ग़ुस्सा भी बजा है। फिर भी बिना झिझक कहूँगा — आपकी बहन के चेहरे और अंदाज़ की वह शांति सबसे तेज़ नज़र वाले को भी यह यक़ीन दिला सकती थी कि उनका सहज-मृदु स्वभाव भले हो, दिल आसानी से नहीं डोलता। सच है, मैं यही मानना चाहता था कि उनके दिल में कुछ नहीं। पर हिम्मत करके कहूँ — मेरी राय अमूमन मेरी चाह या डर से नहीं बदलती। ऐसा चाहा इसलिए बेपरवाही मान ली, ऐसी बात नहीं। चाहा तो अक्ल से, पर माना निष्पक्ष यक़ीन से। उस शादी का विरोध करने की वजहें सिर्फ़ वे नहीं थीं, जिन्हें कल रात मैंने माना कि मेरे अपने मामले में भी सबसे तेज़ जज़्बात के सिवा कोई नहीं रोक सका। ख़ानदान का रुतबा कम होना मेरे दोस्त के लिए उतनी बड़ी मुसीबत नहीं थी, जितनी मेरे लिए। पर कुछ और वजहें भी थीं, जिनसे मुझे झिझक होती थी। दोनों मामलों में ये वजहें एक-सी थीं, पर आँखों के सामने न होने से मैं इन्हें भुलाने की कोशिश करता रहा। यह बात संक्षेप में ही सही, कहनी होगी। आपके ननिहाल का सामाजिक रुतबा भी एतराज़ लायक़ था, पर आपकी माँ और तीनों छोटी बहनों का, और कभी-कभी आपके पिता का भी, इतनी बार, लगभग हमेशा दिखने वाला पूरा बेतक़ल्लुफ़पन इसके आगे कुछ भी नहीं था। माफ़ कीजिए। आपका दिल दुखाना मुझे भी तकलीफ़ देता है। पर क़रीबी रिश्तेदारों की कमी को लेकर यह कहना नागवार गुज़रे, तो इतने से चैन लीजिए कि आप और आपकी बड़ी बहन, दोनों की यह तारीफ़ हर तरफ़ फैली है कि आप दोनों ने ऐसा कोई बर्ताव कभी नहीं किया। यह तारीफ़ आप दोनों की समझदारी और स्वभाव, दोनों को बराबर रोशन करती है। एक बात और कहूँगा। उस शाम जो हुआ, उससे हर किसी के बारे में मेरी राय पक्की हो गई। साथ ही, जिस रिश्ते को मैं बेहद बदक़िस्मत मानता था, उससे दोस्त को बचाने की इच्छा भी पहले से मज़बूत हो गई। आपको याद ही होगा, वे जल्दी लौटने की सोच के साथ अगले दिन नेदरफ़ील्ड छोड़कर लंदन गए। अब मैंने जो किया, वह बताता हूँ। उनकी बहनें भी मेरी ही तरह बेचैन थीं। हमें जल्दी ही पता चल गया कि हम दोनों की सोच एक-सी है। भाई को अलग करने में एक पल भी न गँवाने की बात पर भी हम राज़ी हुए। इसलिए हम फ़ौरन लंदन में उनसे मिलने को तैयार हो गए। हमने ऐसा ही किया। मैंने ख़ुशी-ख़ुशी दोस्त को यह समझाने का ज़िम्मा लिया कि ऐसे फ़ैसले से यक़ीनन नुक़सान होगा। मैंने वह नुक़सान समझाया और गंभीरता से इस पर ज़ोर दिया। पर यह सलाह उनका इरादा हिला या टाल तो सकती थी, आख़िर में शादी रोक न पाती — अगर मैंने बेझिझक यह यक़ीन दिलाकर मदद न की होती कि आपकी बहन के दिल में उनके लिए कुछ नहीं। इससे पहले वे यही मानते थे कि बहन, भले उतनी गहराई से नहीं जितना वे ख़ुद, फिर भी सच्ची मुहब्बत से उनका जवाब देती हैं। पर बिंगली स्वभाव से विनम्र हैं, और अपनी राय से कहीं ज़्यादा मेरी राय पर भरोसा करते हैं। इसलिए उन्हें यह यक़ीन दिलाना कि वे ख़ुद को धोखा दे रहे थे, मुश्किल नहीं था। यह यक़ीन दिलाने के बाद हर्टफ़र्डशायर न लौटने के लिए मनाने में तो लगभग पल भर ही लगा। इतना करने पर मैं ख़ुद को दोषी नहीं मान सकता। इस पूरे मामले में जिस बात को सोचकर मुझे चैन नहीं मिलता, वह बस एक है — आपकी बहन का लंदन में होना उनसे छिपाने के लिए मैं चाल तक चलने की हद तक ख़ुद को गिरा बैठा। यह मुझे भी पता था, मिस बिंगली को भी। पर उनके भाई को आज तक इसका पता नहीं। दोनों की मुलाक़ात होती तो शायद कुछ बुरा न होता। पर उनका प्यार इतना ख़त्म नहीं लगा था कि बिना किसी ख़तरे के बहन से मिल सकें। ऐसा छिपाना और बनावट शायद मुझे शोभा न दे। पर बात अब हो चुकी है, और मैंने भलाई समझकर ही यह किया। इस बारे में अब और कुछ कहना या कोई और सफ़ाई देना बाक़ी नहीं। अगर आपकी बहन का दिल दुखा, तो यह अनजाने में हुआ। जिन वजहों ने मुझे यह क़दम उठाने पर मजबूर किया, वे आपको काफ़ी न लगें — हो सकता है। पर मैंने अब तक उन वजहों को कोसना नहीं सीखा। अब बड़ा इल्ज़ाम — कि मैंने मिस्टर विकहम को नुक़सान पहुँचाया — इसे सुलझाने का बस एक ही तरीक़ा है, उनके और हमारे घराने के पूरे रिश्ते को खोलकर बताना। उन्होंने ठीक-ठीक किस बात के लिए मुझ पर इल्ज़ाम लगाया, यह मुझे नहीं पता। पर अब जो कहानी बताऊँगा, उसकी सच्चाई की गवाही देने के लिए एक से ज़्यादा ऐसे लोग बुला सकता हूँ, जिनकी ईमानदारी पर कोई शक नहीं। मिस्टर विकहम उस बेहद इज़्ज़तदार आदमी के बेटे हैं, जिसने बरसों तक पेम्बरली की पूरी ज़मीन-जायदाद संभाली। पिता ने अपना काम पूरी लगन से किया, इसलिए मेरे पिता स्वभाव से ही उनकी मदद करना चाहते थे। उन्होंने उनके बेटे और अपने गॉडसन जॉर्ज विकहम पर भी दिल खोलकर मेहरबानी की। स्कूल भेजने का इंतज़ाम किया, और बाद में कैम्ब्रिज की फ़ीस भी भरी। विकहम के पिता अपनी पत्नी की फ़िज़ूलख़र्ची के चलते हमेशा तंगहाल रहे। बेटे को शरीफ़ों जैसी तालीम देने की हैसियत उनकी नहीं थी, इसलिए यह बहुत बड़ी मदद थी। मेरे पिता हमेशा उस जवान के साथ रहना पसंद करते थे, जिसका बर्ताव बड़ा दिलकश लगता था, और वे उसे बड़ा भला इंसान मानते थे। वे चाहते थे कि वह पादरी बने, और उसी राह पर जीने का सहारा भी बना देना चाहते थे। मैं बहुत पहले से उसे बिल्कुल अलग नज़र से देखने लगा था। विकहम अपने सबसे क़रीबी दोस्त से भी अपना बुरा स्वभाव और बेउसूल चाल-चलन बड़ी सावधानी से छिपाता था। पर तक़रीबन हमउम्र होने की वजह से, जो लापरवाही के पल पिता मिस्टर डार्सी की नज़र से बच जाते, वे उस जवान की नज़र से नहीं बच सके, जिसे ऐसे मौक़े देखने का मौक़ा मिला। इस बात में भी मैं आपको फिर तकलीफ़ दूँगा। कितनी तकलीफ़ होगी, यह बस आप ही बता सकती हैं। पर मिस्टर विकहम ने आपके मन में जो भी भाव जगाए हों, उनके स्वभाव का अंदाज़ा होने भर से मैं उनकी असली सूरत सामने लाना नहीं रोक सकता। बल्कि यह तो एक वजह और बन जाती है। मेरे नेक पिता क़रीब पाँच बरस पहले गुज़र गए। विकहम के लिए उनका लगाव आख़िर तक वैसा ही रहा। वसीयत में उन्होंने ख़ास तौर से मुझसे कहा कि विकहम जो पेशा चुने, उसमें सबसे अच्छी तरक़्क़ी दिलाने में मदद करूँ। अगर वह पादरी बने, तो हमारे घराने के अधिकार वाला जो अच्छी आमदनी वाला गिरजाघर सबसे पहले ख़ाली हो, वह उसे दे दिया जाए। एक हज़ार पाउंड की अलग विरासत भी छोड़ी। विकहम के पिता भी मेरे पिता के बाद ज़्यादा दिन नहीं जिए। यह हुए अभी छह महीने भी नहीं बीते थे कि मिस्टर विकहम की चिट्ठी आई। लिखा था कि उसने आख़िरकार पादरी न बनने का फ़ैसला किया है, इसलिए जो गिरजाघर उसके किसी काम का नहीं, उसे छोड़ने के बदले जो पैसा जल्दी मिल सके, वह चाहे तो नाइंसाफ़ी न समझी जाए। कुछ हद तक क़ानून पढ़ने का इरादा भी है, यह भी जोड़ा। एक हज़ार पाउंड के सूद से इतनी पढ़ाई के साथ गुज़ारा करना नामुमकिन-सा है, यह बात मैं भी समझूँगा, ऐसा उसने कहा। मुझे उसकी बात सच लगी, यह कहने से ज़्यादा — मैं यह मानना चाहता था। पर बात जो भी हो, मैंने उसका प्रस्ताव पूरी तरह मान लेने का सोच लिया था। क्योंकि मुझे पता था, मिस्टर विकहम को पादरी नहीं बनना चाहिए। इसलिए जल्दी ही सुलह हो गई। आगे कभी गिरजाघर का हक़दार बनने की सूरत में भी उसने चर्च से जुड़ी हर मदद का हक़ छोड़ दिया। इसके बदले उसे तीन हज़ार पाउंड मिले। अब दोनों के बीच का नाता पूरी तरह टूट चुका लगता था। मैं उसे इतना बुरा मानने लगा था कि न पेम्बरली बुलाता, न लंदन में उससे मेल-जोल रखना चाहता। जहाँ तक जानता हूँ, वह ज़्यादातर लंदन में ही रहा। पर क़ानून की पढ़ाई महज़ बहाना थी। किसी बंधन से आज़ाद होकर उसने सुस्ती और ऐयाशी में समय बिताया। तक़रीबन तीन बरस तक उसकी कोई ख़ास ख़बर नहीं मिली। फिर जो गिरजाघर उसे देना तय हुआ था, उसके मौजूदा पादरी की मौत हुई, तो विकहम ने चिट्ठी लिखकर फिर उसी जगह पर नियुक्ति माँगी। उसने दावा किया कि हालात बहुत बुरे हैं, और यह बात मानने में मुश्किल नहीं थी। कहा कि क़ानून पढ़ने से कोई फ़ायदा नहीं हुआ, यह उसे समझ आ गया है। अब बस मैं उसे उस गिरजाघर में नियुक्त कर दूँ, तो वह ज़रूर पादरी बनेगा, यह उसने ठान लिया है। यह भी कहा कि उसे अच्छी तरह पता है, मुझे किसी और का ख़याल नहीं रखना। और मेरे आदरणीय पिता की मंशा को मैं भूल नहीं सकता, इसलिए वह जगह उसे मिलेगी, इसमें उसे रत्ती भर शक नहीं। मैंने उसकी यह माँग न मानी, बल्कि उसकी बार-बार की माँगें ठुकरा दीं — इसके लिए आपके लिए मुझे कोसना मुश्किल होगा। उसका ग़ुस्सा उसकी तंगहाली जितना ही बड़ा था। मुझे सीधे कोसने जितनी ही शिद्दत से उसने और लोगों के सामने भी मेरी बुराई की होगी, इसमें कोई शक नहीं। इसके बाद जान-पहचान का निशान तक मिट गया। वह कैसे गुज़ारा करता रहा, मुझे नहीं पता। पर पिछली गर्मियों में वह फिर, इस बार बेहद तकलीफ़देह तरीक़े से मेरे सामने आया। अब मुझे वह बात कहनी होगी, जिसे मैं ख़ुद भी भुला देना चाहता हूँ। ऐसा कोई फ़र्ज़ न होता, तो यह बात दुनिया के किसी और इंसान को न बताता। इतना कह चुका हूँ, तो मुझे शक नहीं कि आप यह राज़ रखेंगी। मेरी बहन मुझसे दस बरस से ज़्यादा छोटी है। माँ की तरफ़ के चचेरे भाई कर्नल फ़िट्ज़विलियम और मैं, दोनों उसके संरक्षक बनाए गए। क़रीब एक बरस पहले, स्कूल ख़त्म कर चुकी बहन के लिए लंदन में एक घर बसाया गया। पिछली गर्मियों में वह उस घर की देखभाल करने वाली महिला के साथ रैम्सगेट गई। मिस्टर विकहम भी वहीं पहुँचे — यह साफ़ है कि यह शुरू से रचा हुआ खेल था। पता चला कि जिस श्रीमती यंग का स्वभाव हमने बड़ी बदक़िस्मती से ग़लत आँका था, वे पहले से ही उन्हें जानती थीं। श्रीमती यंग की नज़रअंदाज़ी और मदद के सहारे, विकहम जॉर्जियाना का दिल जीतने में कामयाब रहा। भोली जॉर्जियाना को बचपन में उसने जो मेहरबानी दिखाई थी, वह अब तक याद थी। आख़िरकार उसने मान लिया कि वह प्यार में पड़ चुकी है, और साथ भाग जाने के लिए भी राज़ी हो गई। उस वक़्त बहन बस पंद्रह बरस की थी। इस उम्र में यह नादानी माफ़ी लायक़ मानी जा सकती है। और उसकी यह नादानी बताने के बाद ख़ुशी से यह भी कहूँगा — यह बात मुझे बहन ने ख़ुद बताई। दोनों के भाग जाने की तय तारीख़ से एक-दो दिन पहले, मैं अचानक उनसे जा मिला। जॉर्जियाना उस भाई को, जिसे वह लगभग पिता जैसा मानती थी, दुख और शर्म देने का ख़याल बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने सब कुछ बता दिया। मैंने क्या महसूस किया और क्या किया, यह आप अंदाज़ा लगा सकती हैं। मैंने बहन की इज़्ज़त और दिल का ख़याल रखते हुए इस बात को उजागर नहीं किया। पर मिस्टर विकहम को चिट्ठी भेजी, और वह जल्दी वहाँ से चला गया। श्रीमती यंग को भी लाज़िमी तौर पर बहन की देखभाल की ज़िम्मेदारी से हटा दिया गया। मिस्टर विकहम का मुख्य मक़सद बेशक बहन की तीस हज़ार पाउंड की जायदाद थी। पर मुझसे बदला लेने की इच्छा भी इसकी एक बड़ी वजह रही होगी, यह सोचे बिना नहीं रह सकता। उसका बदला सचमुच पूरा हो जाता। महोदया, हम दोनों से जुड़ी हर बात यहाँ पूरी ईमानदारी से लिख दी है। अगर आप इस पूरी बात को झूठ मानकर सिरे से न नकारें, तो उम्मीद है अब से आप यह इल्ज़ाम हटा लेंगी कि मैंने मिस्टर विकहम के साथ बेरहमी की। उसने किस तरीक़े से और कौन-सा झूठ बोलकर आपको धोखा दिया, यह मुझे नहीं पता। पर जो आप दोनों के बीच की बात बिल्कुल नहीं जानती थीं, उन्हें उसने धोखा दिया — यह शायद हैरानी की बात न हो। आप सच जान ही नहीं सकती थीं, और उस पर शक करने का मन भी आपका यक़ीनन नहीं हुआ होगा। हो सकता है, आपको हैरानी हो कि कल रात यह सब क्यों नहीं बताया। पर उस वक़्त मैं ख़ुद पर इतना क़ाबू नहीं रख पाया कि जान सकूँ, क्या बताना चाहिए और क्या नहीं। यहाँ कही हर बात की सच्चाई की गवाही ख़ासकर कर्नल फ़िट्ज़विलियम पर छोड़ी जा सकती है। वे क़रीबी रिश्तेदार हैं और हमेशा हमसे घुले-मिले रहे। सबसे बढ़कर, वे मेरे पिता की वसीयत के जिन लोगों को यह ज़िम्मा सौंपा गया, उनमें से एक हैं, इसलिए इस मामले की पूरी बारीकियाँ जानना उनके लिए मजबूरी थी। भले आप मुझे नापसंद करके मेरी बात बेक़ीमती मान लें, पर इसी वजह से मेरे चचेरे भाई पर भी भरोसा न करना मुमकिन नहीं होगा। उनसे यह बात जाँचने का मौक़ा आपको मिल सके, इसलिए मैं आज सुबह ही यह चिट्ठी आपके हाथों तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ। आख़िर में, ईश्वर की कृपा आप पर बनी रहे, यही दुआ है। फ़िट्ज़विलियम डार्सी।'