हिंदी संस्करण
अध्याय 37
दोनों सज्जन अगली सुबह रोज़िंग्स से रवाना हो गए। मिस्टर कॉलिन्स विदा लेने के लिए फाटक के पास ही खड़े रहे। इसकी बदौलत वे घर यह ख़ुशख़बरी ले आए कि दोनों बहुत तंदुरुस्त लग रहे थे — रोज़िंग्स में अभी-अभी हुई दुखद विदाई के बावजूद, जितना उम्मीद की जा सकती थी, उतने ख़ुश-मिज़ाज भी। इसके बाद वे लेडी कैथरीन और उनकी बेटी को दिलासा देने के लिए फ़ौरन रोज़िंग्स चले गए। लौटते हुए वे लेडी कैथरीन का यह संदेश लाए कि वे बहुत ऊब रही हैं, इसलिए सबको साथ रात का खाना खाने बुला रही हैं। मिस्टर कॉलिन्स बड़े ही संतुष्ट हुए। एलिज़ाबेथ लेडी कैथरीन को देखकर यह सोचे बिना नहीं रह सकी — अगर वह चाहती, तो अब तक उनकी होने वाली भतीजी-बहू के रूप में उनसे मिलवाई जा चुकी होती। यह सोचकर कि तब लेडी कैथरीन कितना ग़ुस्सा करतीं, उसके मुँह पर अपने-आप मुस्कान आ जाती। 'तब वे क्या कहतीं? कैसा बरताव करतीं?' — यही सोचकर एलिज़ाबेथ अकेले में ख़ुश होती रही। पहला विषय यही था कि रोज़िंग्स में जमघट कम हो गया है। 'यक़ीन मानो, मुझे यह बात बहुत बुरी तरह खल रही है,' लेडी कैथरीन बोलीं। 'दोस्तों के जाने का अफ़सोस मुझसे ज़्यादा किसी को नहीं होता। मुझे उन नौजवानों से बड़ा लगाव है, और मुझे पता है, वे भी मुझसे कितना लगाव रखते हैं! जाते समय उन्हें बड़ा अफ़सोस हो रहा था — पर हमेशा ऐसा ही होता है। प्यारे कर्नल आख़िरी पल तक किसी तरह अपनी हिम्मत बनाए रखे रहे, पर डार्सी को सबसे ज़्यादा बुरा लगा, ऐसा लगा। पिछले साल से भी ज़्यादा। रोज़िंग्स के प्रति उनका लगाव दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है, यह साफ़ है।' मिस्टर कॉलिन्स ने यहाँ एक तारीफ़ और एक इशारा जोड़ दिया। माँ-बेटी ने दोनों को मेहरबानी से मुस्कराकर स्वीकार किया।
खाने के बाद लेडी कैथरीन ने कहा कि मिस बेनेट उदास लग रही है, और फ़ौरन ख़ुद ही इसकी वजह भी बता दी — शायद वह इतनी जल्दी घर लौटना नहीं चाहती। 'तो फिर माँ को चिट्ठी लिखकर कुछ दिन और रुकने की इजाज़त माँगनी चाहिए। मुझे यक़ीन है, श्रीमती कॉलिन्स को भी तुम्हारा साथ रहना बहुत भाएगा।' 'इतनी मेहरबानी से बुलाने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया, महोदया,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया। 'पर मैं मान नहीं सकती। अगले शनिवार तक मुझे लंदन पहुँचना है।' 'तो फिर यहाँ तुम बस छह हफ़्ते ही रहोगी। मुझे तो लगा था, तुम दो महीने रुकोगी। तुम्हारे आने से पहले ही मैंने श्रीमती कॉलिन्स से यही कहा था। इतनी जल्दी जाने की कोई ज़रूरत नहीं। श्रीमती बेनेट को दो और हफ़्ते तुम्हारे बिना कोई तकलीफ़ नहीं होगी।' 'पर पिताजी को होगी। पिछले हफ़्ते की चिट्ठी में उन्होंने जल्दी लौटने को कहा था।' 'अरे, अगर माँ को कोई एतराज़ नहीं, तो पिताजी को भी नहीं होगा। बेटियाँ पिताजी के लिए कभी इतनी अहम नहीं होतीं। पूरा एक महीना और रुको, तो मैं तुम दोनों में से एक को लंदन तक पहुँचा भी सकती हूँ। जून की शुरुआत में एक हफ़्ते के लिए लंदन जाने वाली हूँ। डॉसन को बरूश गाड़ी की अगली सीट पर बैठने से कोई एतराज़ नहीं, तो तुम में से एक के बैठने की जगह ज़रूर बन जाएगी। सच कहूँ तो, अगर मौसम ठंडा ही रहा, तो तुम दोनों का डील-डौल इतना बड़ा नहीं कि मुझे दोनों को ले जाने में कोई एतराज़ हो।' 'आप सचमुच बेहद मेहरबान हैं, महोदया। पर हमें अपनी पहले की योजना पर ही चलना होगा, ऐसा लगता है।' लेडी कैथरीन ने मानो हार मान ली। 'श्रीमती कॉलिन्स, एक नौकर साथ भेजना ही होगा। तुम तो जानती हो, मैं हमेशा अपने मन की बात साफ़ कह देती हूँ। दो जवान लड़कियाँ अकेले घोड़े बदलते हुए सफ़र करें, यह ख़याल मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। यह बिल्कुल अनुचित बात है। किसी-न-किसी को साथ भेजना ही होगा। दुनिया में मुझे इस तरह की बात से सबसे ज़्यादा चिढ़ है। जवान औरत को हमेशा अपनी हैसियत के मुताबिक़ ठीक तरह से सुरक्षा और सेवा मिलनी चाहिए। मेरी भतीजी जॉर्जियाना जब पिछली गर्मी रैम्सगेट गई थी, तो मैंने ज़ोर देकर उसके साथ दो पुरुष नौकर भेजे थे। पेम्बरली के मिस्टर डार्सी और लेडी ऐन की बेटी मिस डार्सी अगर किसी और ढंग से बाहर निकलें, तो यह शिष्टाचार के ख़िलाफ़ होगा। मैं ऐसी बातों का बहुत बारीक़ी से ख़याल रखती हूँ। श्रीमती कॉलिन्स, जवान लड़कियों के साथ जॉन को भेजना ही होगा। अच्छा हुआ, यह बात मुझे याद आ गई — दोनों को अकेले भेजने से तुम्हारी ही इज़्ज़त पर आँच आती।' 'मामा हमें लेने के लिए एक नौकर भेजने वाले हैं।' 'आह! मामा! तो उनके पास पुरुष नौकर है? अच्छा हुआ, किसी को तो यह ख़याल आया। घोड़े कहाँ बदलोगी? आह, ज़रूर ब्रॉम्ली में। बेल सराय में मेरा नाम लेना, वहाँ ठीक से आवभगत होगी।'
लेडी कैथरीन को सफ़र के बारे में और भी बहुत कुछ पूछना था। इस बार वे हर सवाल का जवाब ख़ुद नहीं दे रही थीं, इसलिए ध्यान से सुनना ज़रूरी था। एलिज़ाबेथ को यह अच्छा ही लगा — मन इतने दूसरे ख़यालों में डूबा था कि वह भूल भी सकती थी, वह कहाँ खड़ी है। गहरे विचारों को अकेले रहने के वक़्त के लिए बचाकर रखना पड़ता। जब भी अकेली होती, एलिज़ाबेथ मानो सबसे बड़ा सुकून पाकर मन भरकर सोचने लगती। कड़वी यादों से मिलने वाले हर सुख में डूब सकने वाला अकेला टहलना, उसने एक दिन भी नहीं छोड़ा। मिस्टर डार्सी की चिट्ठी अब लगभग याद हो चुकी थी। एलिज़ाबेथ हर वाक्य को बार-बार जाँचती रही। लिखने वाले के प्रति उसकी भावनाएँ कभी-कभी एकदम विपरीत छोरों पर पहुँच जातीं। प्रस्ताव रखने का जो ढंग था, वह याद आते ही अब भी ग़ुस्सा भर आता। पर यह सोचकर कि उसने ख़ुद उन्हें कितनी बेइंसाफ़ी से कोसा और लताड़ा था, ग़ुस्सा अपनी ही तरफ़ मुड़ जाता। उनकी टूटी हुई उम्मीद पर उसे तरस आता। उनके प्यार के लिए वह आभारी थी, और उनके सामान्य स्वभाव का सम्मान भी करती थी। पर उन्हें अच्छी नज़र से देख नहीं पाती थी। प्रस्ताव ठुकराने का उसे एक पल भी अफ़सोस नहीं था। उनसे दोबारा मिलने की कोई इच्छा भी उसके मन में ज़रा भी नहीं जागती। अतीत में उसने ख़ुद जैसा बरताव किया था, वह बेइंतहा खीझ और पछतावे का सोता बना रहता। पर परिवार में मौजूद अभागे दोष उससे कहीं ज़्यादा तक़लीफ़देह थे। उन्हें सुधारने की कोई उम्मीद नहीं थी। पिताजी को बस उन पर हँसने में ही संतोष मिलता — सबसे छोटी बेटियों के उजड्ड और लापरवाह बरताव को रोकने की कोशिश वे कभी नहीं करेंगे। माँ ख़ुद अपने बरताव में शालीनता से कोसों दूर थीं, इसलिए उन्हें यह अहसास तक नहीं होता कि बेटियों का बरताव ग़लत है। एलिज़ाबेथ ने जेन के साथ मिलकर किटी और लिडिया की लापरवाही रोकने की कई बार कोशिश की थी। पर जब माँ ख़ुद उन्हें मनमानी करने के लिए उकसातीं, तो सुधार की कोई गुंजाइश कहाँ बचती? कमज़ोर दिल की, आसानी से चिढ़ जाने वाली और लिडिया के पीछे-पीछे चलने वाली किटी, जब भी बहनें सलाह देतीं, हमेशा उसे अपनी बेइज़्ज़ती मान लेती। मनमानी और लापरवाह लिडिया उनकी बात लगभग सुनती ही नहीं थी। दोनों बहनें अनजान, आलसी और घमंडी थीं। मेरिटन में जब तक एक भी अफ़सर रहेगा, तब तक वे उससे इशारेबाज़ी करती रहेंगी। लॉन्गबर्न से मेरिटन तक पैदल जाया जा सकता है, तब तक वे वहाँ हमेशा आती-जाती रहेंगी। जेन को लेकर चिंता भी लगातार मन पर छाई रहती। मिस्टर डार्सी की सफ़ाई की बदौलत बिंगली फिर से पहले जैसी अच्छी राय के हक़दार बन गए थे, इसीलिए जेन का खोया हुआ मौक़ा और भी दुखदायी लगता। बिंगली का प्यार सच्चा था, यह बात भी साफ़ हो चुकी थी। दोस्त की बात पर बिना सोचे भरोसा करना अगर ग़लती न मानी जाए, तो उनके बरताव में कोई कमी नहीं थी। हर तरह से मनचाहा और अच्छाइयों से भरा, ख़ुशी का वादा करता-सा जो रिश्ता था — जेन ने अपने परिवार की मूर्खता और बदतमीज़ी की वजह से वह मौक़ा गँवाया, यह ख़याल कितना तक़लीफ़देह था! इन्हीं यादों में विकहम का असली रूप उजागर होने की बात भी जुड़ गई। पहले जो ख़ुशमिज़ाजी शायद ही कभी फीकी पड़ती थी, वह भी अब बुरी तरह डगमगा गई। मामूली-सी भी ख़ुश दिखने की कोशिश करना लगभग नामुमकिन हो गया होगा, यह आसानी से समझा जा सकता था।
ठहरने के आख़िरी हफ़्ते में भी रोज़िंग्स के न्यौते शुरुआत जितने ही बार-बार आते रहे। आख़िरी शाम भी वहीं बीती। लेडी कैथरीन ने एक बार फिर सफ़र की हर बारीकी बड़े ध्यान से पूछी, और सामान बाँधने का सबसे अच्छा तरीक़ा भी समझाया। पोशाकें रखने का बस एक ही सही तरीक़ा है, यह उन्होंने इतनी ज़ोर देकर कहा कि मरिया लौटने के बाद यह मान बैठी कि सुबह जो कुछ उसने बाँधा था, वह सब खोलकर संदूक़ शुरू से फिर बाँधना होगा। विदा के वक़्त लेडी कैथरीन ने बड़ी ही मेहरबान अदा से दोनों की सुखद यात्रा की कामना की, और अगले साल भी हंसफ़र्ड आने का न्यौता दिया। मिस डी बर्ग ने हिम्मत जुटाकर दोनों को झुककर अभिवादन किया, और हाथ तक बढ़ाया।