हिंदी संस्करण
अध्याय 42
अगर एलिज़ाबेथ सिर्फ़ अपने ही परिवार को देखकर सोचती, तो शादी की ख़ुशी या घर की शांति की कोई सुहानी तस्वीर नहीं बना पाती। पिता जवानी और ख़ूबसूरती पर मोहित होकर एक औरत से ब्याहे थे। जवानी और ख़ूबसूरती अक्सर इंसान को ख़ुशमिज़ाज़ दिखा देती है। पर पत्नी की सोच छिछली थी, मन भी तंग। इसलिए शादी की शुरुआत का सच्चा प्यार जल्दी ही मिट गया। आदर, इज़्ज़त और भरोसा भी हमेशा के लिए जाता रहा। घर की ख़ुशी की जो उम्मीद उन्होंने बाँधी थी, वह भी टूट गई। फिर भी मिस्टर बेनेट ऐसे आदमी नहीं थे जो अपनी नादानी से मिली मायूसी भुलाने के लिए, दुखी लोगों की आम शरण में जा बैठें। उन्हें गाँव और किताबें भाती थीं, वहीं से उन्हें बड़ा सुकून मिलता। पत्नी से उन्हें बस इतना ही मिलता कि उसकी नादानी और बेवक़ूफ़ी उनके लिए एक तमाशा बन जाती। पत्नी से मर्द जिस सुख की आस रखता है, यह आम तौर पर वैसा नहीं होता। फिर भी, जब बाक़ी सुख कम पड़ें, तो सच्चा दार्शनिक जो मिले उसी में काम की चीज़ ढूँढ़ लेता है। पर एलिज़ाबेथ ने कभी यह अनदेखा नहीं किया कि पिता पति के फ़र्ज़ ठीक से नहीं निभाते। जब भी यह दिखता, उसका मन दुखता ही था। फिर भी वह पिता की क़ाबिलियत का आदर करती थी, और ख़ुद से उनके स्नेह भरे बरताव के लिए शुक्रगुज़ार भी थी। इसीलिए वह जितना हो सके, वह सब भुलाने की कोशिश करती जिसे नज़रअंदाज़ करना वैसे मुमकिन ही नहीं था। पत्नी को बच्चों की हिक़ारत के आगे खड़ा कर देना, बड़ी निंदा के लायक़ था। पति-पत्नी के फ़र्ज़ और शिष्टाचार को बार-बार तोड़ना भी उतना ही बुरा था। एलिज़ाबेथ यह सोच झटकने की कोशिश करती रही। पर बेमेल शादी से जन्मे बच्चों को जो नुक़सान झेलना पड़ता है, वह उसे इतनी शिद्दत से पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। पिता ने अपनी क़ाबिलियत का इतना ग़लत इस्तेमाल किया, उससे हुए नुक़सान का भी उसे अब पूरा एहसास हुआ। वह क़ाबिलियत सही ढंग से इस्तेमाल होती, तो पत्नी की सोच भले न बदल पाती, पर कम से कम बेटियों की इज़्ज़त लायक़ साख तो बचा सकती थी। विकहम के चले जाने की ख़ुशी मनाने के बाद, एलिज़ाबेथ को उस रेजिमेंट के चले जाने में और कोई तसल्ली की वजह मुश्किल से मिली। बाहर की महफ़िलें पहले से फीकी हो गईं। घर में माँ और बहन थीं। दोनों हर बात को उबाऊ बताकर लगातार रोना रोतीं, और घर में सचमुच की उदासी घोल देतीं। किटी के दिमाग़ को उलझाने वाले लोग अब नहीं थे, तो शायद वक़्त के साथ वह जितनी समझदार बन सकती थी, उतनी बन जाती। पर दूसरी बहन का स्वभाव बड़ी ग़लतियाँ करने वाला था। समुद्री शहर और छावनी, इन दो ख़तरों के बीच उस बच्ची की बेवक़ूफ़ी और बेशर्मी और भी पक्की हो जाने का पूरा अंदेशा था। तो एलिज़ाबेथ को वह बात समझ आई, जो कभी-कभी औरों को भी समझ आती है — बेसब्री से जिस चीज़ का इंतज़ार किया जाए, वह असल में हो जाए तो जो तसल्ली वादा की गई थी, वह पूरी नहीं मिलती। इसलिए असली ख़ुशी शुरू होने का कोई और वक़्त तय करना ज़रूरी था। उम्मीद और आस टिकाने की कोई नई जगह बनानी थी, और आगे की उम्मीद के सुख से फ़िलहाल का मन बहलाना था। साथ ही एक और मायूसी के लिए भी तैयार रहना था। अब झीलों वाले इलाक़े की सैर सबसे सुहानी सोच बन गई थी। माँ और किटी की शिकायतों की वजह से जो तक़लीफ़ें झेलनी ही थीं, उन सबको सहने का सबसे बड़ा सहारा यही थी। इस योजना में जेन भी साथ हो पाती, तो सब कुछ मुकम्मल होता। 'पर,' उसने सोचा, 'अच्छा है कि चाहने को अभी एक बात बाक़ी रह गई। हर योजना मुकम्मल होती, तो निराशा तय ही थी। जेन का साथ न होने की कसक लेकर चलूँ, तो उम्मीद की सारी ख़ुशियाँ पूरी होने की वाजिब उम्मीद रख सकती हूँ। जो योजना सिर्फ़ ख़ुशी का ही वादा करे, वह कभी कामयाब नहीं होती। एक छोटी-सी ख़ास तकलीफ़ को ढाल बनाना ही पड़ता है, तभी बड़ी निराशा से बचा जा सकता है।'
जाते वक़्त लिडिया ने माँ और किटी से वादा किया था कि वह बहुत बार, बहुत तफ़सील से चिट्ठी लिखेगी। पर चिट्ठी हमेशा बड़ी देर बाद आती, और हमेशा बहुत छोटी होती। माँ को लिखी चिट्ठियों में अक्सर बस इतना ही होता — अभी-अभी किराए की लाइब्रेरी से लौटी है, साथ में कुछ अफ़सर भी गए थे। वहाँ ऐसे ख़ूबसूरत गहने देखे कि दिल उछल पड़ा। कोई नई पोशाक या छतरी ख़रीदी है, इसके बारे में और बताना चाहती है, पर श्रीमती फ़ॉर्स्टर बुला रही हैं, छावनी जाना है। इतनी जल्दी है कि अब लिखना बंद करना पड़ेगा। बहन के साथ हुई चिट्ठियों में तो और भी कम पता चलता था। किटी को भेजी चिट्ठियाँ ज़रा लंबी होतीं। पर उनमें लफ़्ज़ों के नीचे लकीरें खींचकर छिपाई गई इतनी बातें होतीं, कि किसी और को दिखाई नहीं जा सकती थीं। लिडिया के जाने के पहले दो-तीन हफ़्तों में ही लॉन्गबर्न में सेहत, अच्छा मूड और रौनक़ फिर लौटने लगी। सब कुछ पहले से ज़्यादा ख़ुशहाल लगने लगा। सर्दियों में लंदन गए घराने वापस आ गए। गर्मियों के पहनावे और गर्मियों की महफ़िलें भी शुरू हो गईं। श्रीमती बेनेट अपने रोज़ के बड़बड़ाने के साथ फिर से सुकून भरी नज़र आने लगीं। जून के बीच तक किटी इतनी संभल गई कि बिना रोए मेरिटन जा सकती थी। यह बड़ी उम्मीद की बात थी। एलिज़ाबेथ को उम्मीद थी कि अगले साल क्रिसमस तक किटी इतनी समझदार हो जाएगी कि दिन में एक बार से ज़्यादा अफ़सरों की बात न करे — बशर्ते सेना विभाग कोई क्रूर और शरारती फ़ैसला लेकर मेरिटन में कोई और रेजिमेंट न बिठा दे।
उत्तर की सैर पर निकलने का दिन तेज़ी से पास आने लगा। बस दो हफ़्ते ही बचे थे कि श्रीमती गार्डिनर की चिट्ठी आई। इस चिट्ठी ने रवानगी को एक झटके में टाल दिया और सैर का दायरा भी छोटा कर दिया। मिस्टर गार्डिनर काम की वजह से जुलाई की तय तारीख़ से दो हफ़्ते देर से ही निकल पाते। ऊपर से उन्हें एक महीने के भीतर लंदन लौटना भी था। ऐसे में जितनी दूर जाकर जितना कुछ देखने की योजना थी, उतने के लिए वक़्त बहुत कम रह गया — कम से कम उतनी फ़ुर्सत और सुकून के साथ देखने के लिए, जितनी चाही गई थी। उन्हें झीलों वाला इलाक़ा छोड़कर, एक छोटे दायरे की सैर पर बदलना पड़ा। नई योजना में वे उत्तर की तरफ़ डर्बीशायर से आगे नहीं जाते। डर्बीशायर में इतना कुछ देखने लायक़ था कि तीन हफ़्तों का ज़्यादातर हिस्सा वहीं भर जाता। श्रीमती गार्डिनर को डर्बीशायर ख़ास तौर पर लुभाता था। जिस क़स्बे में वह पहले कई बरस रह चुकी थीं और इस बार भी कुछ दिन ठहरने वाली थीं, वह मशहूर मैटलॉक और चैट्सवर्थ, डवडेल और पीक के तमाम ख़ूबसूरत नज़ारों जितना ही उनकी उत्सुकता जगाता। एलिज़ाबेथ को बड़ी मायूसी हुई। उसने झीलों वाला इलाक़ा देखने का पक्का मन बना रखा था, और सोचती थी कि अभी भी वक़्त काफ़ी हो सकता था। पर संतोष करना उसका फ़र्ज़ था। ख़ुश रहना भी बेशक उसकी सहज फ़ितरत में था। जल्दी ही सब कुछ फिर ठीक लगने लगा। डर्बीशायर नाम के साथ ढेरों ख़याल जुड़े थे। यह नाम सुनते ही पेम्बरली और उसके मालिक को याद न करना नामुमकिन था। 'पर ज़रूर,' उसने कहा, 'मैं बेख़टके उनके सूबे में जाकर, पत्थर जैसे मज़बूत कुछ खनिज के टुकड़े चुराकर निकल सकती हूँ। उन्हें मेरी ख़बर तक नहीं होगी।'
अब इंतज़ार का वक़्त दोगुना हो गया था। मामा-मामी के आने में चार हफ़्ते बाक़ी थे। पर वह वक़्त भी गुज़र गया। मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर आख़िरकार चार बच्चों को साथ लेकर लॉन्गबर्न आए। छह और आठ साल की दो बेटियाँ, और उनसे छोटे दो बेटे, अपनी फुफेरी बहन जेन की ख़ास देखरेख में वहीं रहने वाले थे। सबकी सबसे चहेती जेन हमेशा समझदार और स्नेही थी। बच्चों को सिखाने, उनके साथ खेलने और प्यार से उनकी देखभाल करने के लिए वह बिल्कुल सही इंसान थी। मिस्टर और श्रीमती गार्डिनर लॉन्गबर्न में सिर्फ़ एक रात रुके। अगली सुबह वे एलिज़ाबेथ के साथ नए नज़ारों और नई ख़ुशियों की तलाश में निकल पड़े। एक ख़ुशी तो तय थी — साथ चलने वाले आपस में ख़ूब जँचते थे। उनके पास तक़लीफ़ सहने लायक़ सेहत और स्वभाव, दोनों थे। हर ख़ुशी को और बड़ा बना देने वाली ख़ुशमिज़ाजी भी उनमें थी। बाहर कोई मायूसी हाथ लगे, तो भी एक-दूसरे को ख़ुशी देने वाली मुहब्बत और सूझ-बूझ भी उनके पास थी।
इस कहानी का मक़सद डर्बीशायर का या वहाँ पहुँचने के रास्ते में पड़ने वाली किसी उल्लेखनीय जगह का बयान करना नहीं है। ऑक्सफ़र्ड, ब्लेनहाइम, वारविक, केनिलवर्थ, बर्मिंघम जैसी जगहें पहले ही ख़ूब जानी-पहचानी हैं। अभी जिस पर ध्यान देना है, वह डर्बीशायर का बस एक छोटा-सा हिस्सा है। उस इलाक़े के सारे बड़े देखने लायक़ स्थान देख लेने के बाद, वे लैम्बटन नाम के एक छोटे क़स्बे की तरफ़ चल पड़े, जहाँ श्रीमती गार्डिनर पहले रह चुकी थीं। हाल ही में पता चला था कि उनके कुछ जान-पहचान वाले अब भी वहीं रहते थे। लैम्बटन से पाँच मील के दायरे में ही पेम्बरली है, यह बात एलिज़ाबेथ को मामी से पता चली। पेम्बरली सीधे रास्ते पर नहीं पड़ता था। फिर भी रास्ते से बस एक-दो मील ही हटकर था। पिछली शाम, सैर के रास्ते पर बात करते हुए श्रीमती गार्डिनर ने कहा था कि वह उस जगह को फिर से देखना चाहती हैं। मिस्टर गार्डिनर ने ख़ुशी-ख़ुशी हामी भरी। और एलिज़ाबेथ से भी पूछा कि क्या वह राज़ी है। 'बेटा, इतना कुछ सुनी हुई जगह देखने का मन नहीं करता तुम्हारा?' मामी ने कहा। 'तुम्हारे जाने-पहचाने भी कई लोग वहाँ से जुड़े हैं। विकहम ने भी अपनी सारी जवानी वहीं बिताई थी।' एलिज़ाबेथ बेचैन हो उठी। उसे लगा कि पेम्बरली जाने की हैसियत उसकी नहीं। फिर भी उसे यह दिखावा करना पड़ा कि उसकी वहाँ देखने की कोई इच्छा नहीं। उसने मान लिया कि अब बड़ी हवेलियाँ देखते-देखते उकता गई है। इतनी सारी हवेलियाँ घूम चुकने के बाद, ख़ूबसूरत क़ालीन या साटन के पर्दों में उसे सचमुच कोई मज़ा नहीं आता। श्रीमती गार्डिनर ने भांजी की नादानी पर डाँट लगाई। 'अगर वह सिर्फ़ शानो-शौकत से सजी कोई हवेली भर होती, तो मुझे भी कोई दिलचस्पी न होती,' उन्होंने कहा। 'पर वहाँ का बाग़-बग़ीचा बहुत ख़ूबसूरत है। इस मुल्क़ के सबसे शानदार जंगलों में से कुछ वहीं हैं।' एलिज़ाबेथ ने और कुछ नहीं कहा। पर मन से यह बात मान नहीं पाई। वहाँ घूमते हुए मिस्टर डार्सी से मिल जाने की आशंका फ़ौरन ज़हन में कौंध गई। कैसी डरावनी बात थी यह! सोचकर ही उसका चेहरा लाल हो गया। ऐसा ख़तरा मोल लेने से बेहतर तो यही होगा कि मामी से साफ़-साफ़ कह दे — यह उसे सूझा। पर ऐसा कहने में भी दिक़्क़त थी। इसलिए उसने चुपके से यह पता लगाने का फ़ैसला किया कि हवेली का परिवार वहाँ से बाहर तो नहीं गया हुआ। बुरा जवाब मिलने पर ही आख़िरी उपाय के तौर पर सच बताने का इरादा रखा।
उस रात कमरे में लौटकर एलिज़ाबेथ ने सेवा में लगी नौकरानी से पूछा कि क्या पेम्बरली सचमुच बहुत बढ़िया जगह है। मालिक का नाम भी पूछा। और कुछ बेचैन मन से यह भी पूछा कि क्या हवेली का परिवार गर्मियाँ बिताने वहाँ उतरा हुआ है। आख़िरी सवाल का जवाब सबसे ख़ुशनुमा — नहीं में मिला। अब जब बेचैनी जाती रही, तो वह ख़ुद भी हवेली देखने की उत्सुकता खुलकर महसूस कर पाई। अगली सुबह जब यह बात फिर छिड़ी और उससे फिर राय पूछी गई, तो उसने कह दिया कि सच में उसे यह योजना बुरी नहीं लगती। उसने ठीक-ठाक बेपरवाह भाव बनाए रखते हुए भी बड़ी सहजता से जवाब दे दिया।
इस तरह उन्होंने पेम्बरली जाने का फ़ैसला कर लिया।