हिंदी संस्करण
अध्याय 41
लौटने के बाद पहला हफ़्ता झटपट बीत गया। दूसरा हफ़्ता शुरू हुआ। यह रेजिमेंट के मेरिटन में रहने का आख़िरी हफ़्ता था। आस-पास की जवान लड़कियाँ तेज़ी से उदास होने लगीं। मायूसी लगभग सबमें फैल गई। बेनेट घर की दो बड़ी बेटियाँ ही ऐसी थीं जो अब भी हमेशा की तरह खा-पी सकती थीं, सो सकती थीं। किटी और लिडिया का दुख हद से बढ़ गया था। परिवार में कोई इतना बेदर्द कैसे हो सकता है, यह उनकी समझ में नहीं आता था। बड़ी बहनों को बेहिस बताकर वे बार-बार कोसतीं। दोनों बहनें कड़वे ग़म में डूबकर अक्सर चिल्लातीं, 'हे भगवान! अब हमारा क्या होगा? हम क्या करें? लिज़ी, तुम हँस कैसे सकती हो?' प्यारी माँ भी दोनों बेटियों का पूरा ग़म बराबर महसूस करतीं। पच्चीस साल पहले ऐसा ही कुछ हुआ था, तब ख़ुद उन्होंने जो पीड़ा झेली थी, वह भी उन्हें याद आ जाती। 'बिल्कुल सच है,' उन्होंने कहा। 'जब कर्नल मिलर की रेजिमेंट गई थी, तो मैं पूरे दो दिन रोई थी। लगा, दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।' 'मेरा दिल तो सच में टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा,' लिडिया ने कहा। 'काश हम ब्राइटन जा पाते!' श्रीमती बेनेट ने कहा। 'हाँ, सच में! काश हम ब्राइटन जा पाते! पर पिताजी बड़े ही सख़्त-दिल हैं।' 'थोड़ा समुद्र का नहाना मुझे हमेशा के लिए तंदुरुस्त कर देगा।' 'फ़िलिप्स मौसी को भी पूरा यक़ीन है कि इससे मुझे बहुत फ़ायदा होगा,' किटी ने जोड़ा। ऐसी शिकायतें लॉन्गबर्न में बिना रुके गूँजती रहतीं। एलिज़ाबेथ इन्हें मज़े की तरह लेने की कोशिश करती। पर शर्म की वजह से कोई मज़ा नहीं आता। उसे फिर महसूस हुआ कि मिस्टर डार्सी की नाराज़गी की वजहें सही थीं। दोस्त की शादी में उनके दख़ल को माफ़ करने का मन उसे इससे पहले कभी इतना नहीं हुआ था।
पर लिडिया का उदास भविष्य जल्दी ही रोशन हो गया। रेजिमेंट के कर्नल की पत्नी, श्रीमती फ़ॉर्स्टर ने उसे साथ ब्राइटन चलने का न्यौता दिया। यह बेहद प्यारी सहेली बहुत जवान थी और अभी हाल ही में शादी हुई थी। दोनों एक जैसी ख़ुशमिज़ाज़ और चंचल थीं, इसीलिए एक-दूसरे की तरफ़ खिंच गईं। तीन महीने की जान-पहचान में से दो महीने से तो वे बहुत गहरी सहेलियाँ बन चुकी थीं। तब लिडिया की ख़ुशी और श्रीमती फ़ॉर्स्टर के लिए उसकी दीवानगी बयान से बाहर थी। श्रीमती बेनेट की ख़ुशी और किटी की तौहीन भी वैसी ही थी। लिडिया को बहन के दिल की ज़रा भी परवाह न थी। बेक़ाबू जोश में घर भर में उड़ती फिरती। सबसे मुबारकबाद माँगती, और पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से हँसती-चिल्लाती। बेचारी किटी इस बीच बैठक में ही रह गई, अपनी क़िस्मत को कोसती रही। चिढ़ी हुई आवाज़ में बेतुकी बातें बकती रही। 'मैं भले ही श्रीमती फ़ॉर्स्टर की ख़ास सहेली न सही, पर समझ नहीं आता कि सिर्फ़ लिडिया को क्यों बुलाया जाए, मुझे क्यों नहीं। मुझे भी लिडिया जितना ही न्यौता पाने का हक़ है — बल्कि उससे भी ज़्यादा, क्योंकि मैं उससे दो साल बड़ी हूँ।'
एलिज़ाबेथ ने किटी को समझदारी से सोचने पर लाने की कोशिश की। जेन ने उसे मन मार लेने पर राज़ी करने की कोशिश की। पर दोनों की कोई कोशिश काम न आई। यह न्यौता माँ और लिडिया के लिए तो ख़ुशी ही ख़ुशी लेकर आया था। एलिज़ाबेथ को लगा, जैसे लिडिया के अक़्लमंद बनने की हर उम्मीद पर फ़ैसला सुना दिया गया हो। यह बात पता चलती, तो लिडिया की नज़र में एलिज़ाबेथ बहुत नापसंद बन जाती। फिर भी वह चुपके से पिता से लिडिया को न भेजने की गुज़ारिश किए बिना न रह सकी। उसने लिडिया की हर बेढंगी हरकत का हवाला दिया। यह भी बताया कि श्रीमती फ़ॉर्स्टर जैसी औरत से दोस्ती से कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं मिलेगा। और यह भी समझाया कि ऐसी संगत के साथ, घर से कहीं ज़्यादा लालचों वाले ब्राइटन में जाकर, वह और ज़्यादा लापरवाह हो सकती है। पिता ने ध्यान से सुना, फिर बोले। 'लिडिया का मन तब तक चैन नहीं पाएगा जब तक वह लोगों के सामने अपनी बेइज़्ज़ती एक बार न करा ले। ऐसा मौक़ा फिर कभी इतने कम ख़र्च और इतनी कम तक़लीफ़ में हमारे परिवार को नहीं मिलेगा।' 'अगर आपको पता होता कि लिडिया की बेपरवाह और लापरवाह अदाएँ लोगों की नज़र में आएँ, तो हम सबका कितना बड़ा नुक़सान हो सकता है — बल्कि पहले ही कितना नुक़सान हो चुका है — तो आप ज़रूर अलग सोचते,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'पहले ही नुक़सान हो चुका!' मिस्टर बेनेट ने दोहराया। 'क्या बात है! क्या तुमने अपने किसी चाहने वाले को डरा-धमकाकर भगा दिया? बेचारी मेरी लिज़ी! पर हिम्मत मत हारो। ऐसा नाज़ुक जवान, जिसे ज़रा-सी हास्यास्पद रिश्तेदारी भी बर्दाश्त न हो, उसके लिए अफ़सोस करने लायक़ कुछ नहीं। चलो, ज़रा दिखाओ तो, लिडिया की बेवक़ूफ़ी की वजह से कौन-कौन से बेचारे जवान तुमसे दूर हो गए।' 'आप सचमुच ग़लत सोच रहे हैं। मैं किसी निजी नुक़सान की वजह से नाराज़ नहीं हो रही। अभी जो कह रही हूँ, वह सबको होने वाले नुक़सान की बात है। लिडिया की तबीयत उजड्ड, मनमानी और बेशर्म है। किसी भी रोक-टोक की परवाह नहीं करती। इसलिए हमारे घर की इज़्ज़त और साख को बट्टा लगे बिना नहीं रह सकता। माफ़ कीजिए, पर मुझे साफ़ बात कहनी ही होगी। प्यारे पिताजी, अगर आपने उसके इस बेहिसाब जोश को रोका नहीं, तो जल्दी ही यह सुधारा नहीं जा सकेगा। उसे सिखाना होगा कि अभी जिन बातों में वह डूबी है, वे उम्र भर का शग़ल नहीं बन सकतीं। वरना उसका स्वभाव हमेशा के लिए ऐसा ही जम जाएगा। सोलह साल की उम्र में ही वह ख़ुद को और पूरे परिवार को हँसी का पात्र बनाने वाली, सबसे बड़ी छिछोरी लड़की बन जाएगी। सबसे घटिया और ओछे ढंग से मर्दों को इशारे करेगी। जवानी और मामूली-सी सूरत के सिवा उसमें कोई कशिश नहीं होगी। नादान और ख़ाली दिमाग़ से सिर्फ़ लोगों का ध्यान चाहेगी, तो हर कोई उसे हिक़ारत से देखेगा। किटी भी उसी ख़तरे में है। लिडिया जहाँ ले जाएगी, वहीं चली जाएगी। घमंडी, नादान, सुस्त — ऊपर से कोई रोक-टोक भी नहीं! ओह, प्यारे पिताजी, दोनों को जानने वाला हर कोई उन्हें कोसेगा और तुच्छ समझेगा — क्या आप सोच सकते हैं कि इस बदनामी में बहनें भी अक्सर नहीं घसीटी जाएँगी?' मिस्टर बेनेट ने भाँप लिया कि बेटी का पूरा दिल इस बात में लगा है। उन्होंने प्यार से उसका हाथ थामा और जवाब दिया। 'फ़िक्र मत करो, बेटा। तुम और जेन जहाँ भी जानी जाओगी, वहाँ आदर और क़दर पाने से बच ही नहीं सकतीं। दो-तीन बड़ी बेवक़ूफ़ बहनें होने से भी तुम कमतर नहीं दिखोगी। लिडिया ब्राइटन न जा सकी, तो लॉन्गबर्न में चैन नहीं रहेगा। तो चलो, जाने दो उसे। कर्नल फ़ॉर्स्टर समझदार आदमी हैं, वह उसे किसी सचमुच के ख़तरे में नहीं पड़ने देंगे। अच्छी बात यह भी है कि वह किसी के लालच का निशाना बनने लायक़ इतनी दौलतमंद भी नहीं। ब्राइटन में मामूली छिछोरी लड़की के तौर पर भी वह यहाँ से कम अहमियत रखेगी। वहाँ के अफ़सर उससे कहीं ज़्यादा ध्यान देने लायक़ औरतें ढूँढ़ लेंगे। तो उम्मीद करते हैं कि वहाँ जाकर उसे पता चल जाए कि वह ख़ुद कितनी मामूली है। ख़ैर, अगर हालात इससे भी कहीं ज़्यादा बिगड़ गए, तो हमें उसे उम्र भर कमरे में बंद रखने का हक़ भी मिल जाएगा।' एलिज़ाबेथ को इस जवाब से संतोष कर लेना पड़ा। पर उसकी राय नहीं बदली। निराश और उदास मन से वह पिता के पास से चली गई। फिर भी चिंता को थामे रखकर तकलीफ़ बढ़ाने वाला स्वभाव उसका नहीं था। उसे यक़ीन था कि उसने अपना फ़र्ज़ निभा दिया। जिस नुक़सान से बचा नहीं जा सकता, उसे लेकर छटपटाना या फ़िक्र से उसे और बड़ा बना देना, यह उसके स्वभाव में नहीं था।
अगर लिडिया और माँ को एलिज़ाबेथ और पिता के बीच हुई बातचीत का पता चलता, तो दोनों मिलकर चाहे जितनी तेज़ ज़बान चलातीं, फिर भी अपना पूरा ग़ुस्सा जता नहीं पातीं। लिडिया के लिए ब्राइटन की सैर में दुनिया भर की मिल सकने वाली सारी ख़ुशी समाई थी। अपनी कल्पना में वह देखती कि उस चहल-पहल भरे समुद्र-तटीय शहर की गलियाँ अफ़सरों से भरी हैं। दर्जनों अफ़सर, जिन्हें वह अभी जानती तक नहीं, उसकी तरफ़ ध्यान देते नज़र आते। छावनी की सारी शान भी उसे दिखती। ख़ूबसूरत तंबू क़तार में सजे होते। जवान और फुर्तीले लोगों से भरे, चमकते सुर्ख़ वर्दियों से जगमगाते। तस्वीर पूरी करने के लिए लिडिया ख़ुद को किसी तंबू के नीचे बैठा हुआ भी देखती — कम से कम छह अफ़सरों से एक साथ प्यार भरी नोक-झोंक करती अपनी ही सूरत। बहन ने उसे इस सपने और हक़ीक़त से अलग करने की कोशिश की थी — यह जानकर लिडिया का दिल कैसा होता? शायद सिर्फ़ माँ ही यह समझ सकतीं, क्योंकि उन्हें भी लगभग वैसा ही महसूस होता। पति के ब्राइटन जाने का कोई इरादा न होने की उदास सच्चाई को सहलाने वाली एक ही बात थी — लिडिया का वहाँ जाना। पर दोनों को हुई बातचीत की भनक तक नहीं लगी। लिडिया के घर छोड़ने के दिन तक ख़ुशी लगभग बिना रुके बनी रही।
अब एलिज़ाबेथ को मिस्टर विकहम से आख़िरी बार मिलना था। लौटने के बाद कई बार उसी महफ़िल में साथ रहने से उसकी मन की उथल-पुथल लगभग शांत हो चुकी थी। पहले जो हल्की-सी चाहत थी, उससे उपजी बेचैनी तो पूरी तरह मिट गई थी। शुरू में जो नरमी उसे भाती थी, अब उसी में वह वही उकताने और थकाने वाला दिखावा और एक-सा ढोंग पहचान पाती थी। ऊपर से, हाल के दिनों में विकहम का उसके प्रति बर्ताव भी नई नाराज़गी की एक वजह बन गया था। विकहम ने जल्दी ही यह जताना शुरू किया कि वह जान-पहचान के शुरुआती दिनों वाली दिलचस्पी फिर से दिखाना चाहता है। पर बीच में जो कुछ हो चुका था, उसे याद करके एलिज़ाबेथ को बस ग़ुस्सा ही आता। इतने सुस्त और छिछले प्रेम-प्रदर्शन के लिए ख़ुद को चुना हुआ पाकर, विकहम के लिए उसकी हर दिलचस्पी पूरी तरह ख़त्म हो गई। विकहम को यक़ीन था कि उसने अपनी दिलचस्पी चाहे जिस वजह और जितने अरसे के लिए हटाई हो, उसे फिर दिखाते ही एलिज़ाबेथ का घमंड संतुष्ट हो जाएगा — और उसकी चाहत भी ज़रूर लौट आएगी। उसे यह भरोसा नागवार लगे बिना नहीं रह सका। फिर भी उसने उसकी हर कोशिश को बराबर नाकाम किया। रेजिमेंट के मेरिटन में रहने के आख़िरी दिन, विकहम बाक़ी अफ़सरों के साथ लॉन्गबर्न में खाना खाने आया। एलिज़ाबेथ का उससे दिल से विदा लेने का कोई इरादा नहीं था। विकहम ने पूछा कि हंसफ़र्ड में उसका समय कैसा बीता। एलिज़ाबेथ ने बताया कि कर्नल फ़िट्ज़विलियम और मिस्टर डार्सी, दोनों ने रोज़िंग्स में तीन हफ़्ते बिताए। फिर पूछा कि क्या वह कर्नल को जानता है। विकहम के चेहरे पर हैरानी, नाराज़गी और बेचैनी झलक आई। पर उसने कुछ पल में ख़ुद को सँभाल लिया। मुस्कान लौटाकर जवाब दिया कि पहले वह उन्हें अक्सर देखता था। उन्हें बड़ा शाइस्ता आदमी बताने के बाद, विकहम ने एलिज़ाबेथ से पूछा कि उसकी उनके बारे में क्या राय है। एलिज़ाबेथ ने फ़िट्ज़विलियम की खुले दिल से तारीफ़ की। थोड़ी देर बाद विकहम ने बेपरवाह अंदाज़ बनाकर जोड़ा, 'आपने बताया था, वह रोज़िंग्स में कितने समय रहे?' 'लगभग तीन हफ़्ते।' 'अक्सर मिलना हुआ आपका?' 'जी हाँ, लगभग रोज़।' 'तौर-तरीक़े अपने चचेरे भाई से बिल्कुल अलग हैं, है न?' 'जी हाँ, बिल्कुल अलग। पर मिस्टर डार्सी को जितना जानो, उतने ही अच्छे लगते हैं।' 'सच में!' विकहम चिल्ला उठा। एलिज़ाबेथ ने उसके चेहरे का भाव नहीं छोड़ा। 'तो फिर पूछ सकता हूँ...' उसने ख़ुद ही बात रोक दी। फिर ज़्यादा हल्के लहज़े में जोड़ा, 'क्या मतलब, तौर-तरीक़े सुधर गए हैं? अपने रोज़ के अंदाज़ में थोड़ी नरमी जोड़ने की मेहरबानी कर दी उन्होंने? क्योंकि,' कुछ नीची और संजीदा आवाज़ में बात आगे बढ़ाई, 'बुनियादी तौर पर कुछ सुधरे होंगे, ऐसी उम्मीद तो मैं करने की हिम्मत नहीं करूँगा।' 'अरे, नहीं!' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'बुनियादी तौर पर तो मुझे लगता है, वे लगभग हमेशा जैसे ही हैं।' जब वह यह कह रही थी, विकहम के चेहरे पर उलझन थी — इस जवाब से ख़ुश हो या इसके मतलब पर शक करे, समझ नहीं आ रहा था। एलिज़ाबेथ के चेहरे पर कुछ ऐसा था कि वह बेचैन निगाहों से उसे ताकने लगा। उसने आगे कहा। 'जब मैंने कहा, जानने पर वे बेहतर लगते हैं, तो मेरा मतलब यह नहीं था कि उनकी सोच या तौर-तरीक़े सचमुच सुधर रहे हैं। मेरा मतलब था, उन्हें जितना बेहतर जानती हूँ, उतना ही उनका असली स्वभाव भी समझ आता है।' अब विकहम की बेचैनी उसके लाल पड़े चेहरे और डगमगाते भाव में साफ़ झलक आई। कुछ मिनट तक वह कुछ नहीं बोला। आख़िर उलझन झटककर फिर से उसकी तरफ़ मुड़ा। सबसे नरम आवाज़ में बोला। 'आप तो जानती ही हैं, मैं मिस्टर डार्सी के बारे में क्या सोचता हूँ, तो आप आसानी से समझ सकती हैं कि वह कम से कम सही दिखने लायक़ इतने समझदार हो गए हैं, यह जानकर मुझे कितनी सच्ची ख़ुशी होगी। ऐसे मौक़ों पर काम आने वाला घमंड ख़ुद उनके किसी काम का न हो, तो भी बहुतों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है — मुझ पर की गई जैसी नीचता किसी और के साथ करने से भी रोक सकता है। मुझे तो बस यह डर है कि आपने जिस सावधानी की बात कही, वह सिर्फ़ अपनी मौसी से मिलने जाने पर ही दिखाई जाती हो। उनकी मेहरबानी और राय से वह बहुत डरते हैं। दोनों साथ हों, तो हमेशा यह डर ही काम करता है, यह मुझे पता है। मिस डी बर्ग से शादी की उनकी चाह भी इसकी बड़ी वजह होगी। मुझे पूरा यक़ीन है, वह उस शादी को बहुत बेताबी से चाहते हैं।' एलिज़ाबेथ इस बात पर मुस्कान रोक नहीं पाई। पर जवाब में बस हल्के से सिर झुकाया। वह समझ गई कि विकहम उसे अपनी पुरानी शिकायत के उसी घिसे-पिटे विषय में फिर घसीटना चाहता है। उसका मन उसकी बात मानने का बिल्कुल नहीं था। उस शाम बाक़ी समय विकहम हमेशा की तरह ख़ुशमिज़ाज़ दिखा। पर एलिज़ाबेथ से दोबारा कुछ ख़ास बर्ताव करने की कोशिश नहीं की। आख़िर दोनों ने शिष्टाचार के साथ विदा ली — शायद दोनों की दिली ख़्वाहिश यही थी कि दोबारा कभी न मिलें।
महफ़िल ख़त्म होते ही लिडिया श्रीमती फ़ॉर्स्टर के साथ मेरिटन लौट गई। वहीं से अगली सुबह जल्दी निकलना तय था। परिवार से बिछड़ने का यह पल भावुक होने की बजाय शोरगुल भरा रहा। सिर्फ़ किटी की आँखों से आँसू बहे। पर वे दुख और जलन के आँसू थे। श्रीमती बेनेट बेटी की ख़ुशी की दुआएँ देते नहीं थकीं। ज़ोर देकर कहा कि मौक़ा मिले तो ख़ूब मज़े लूटने में कोई कसर न छोड़े। यक़ीन करने की पूरी वजह थी कि लिडिया यह नसीहत ज़रूर मानेगी। विदा लेते वक़्त लिडिया की ख़ुशी से भरी शोर भरी आवाज़ों के आगे, बहनों की धीमी विदाई सुनाई ही नहीं दी।