हिंदी संस्करण

अध्याय 47

'मैंने फिर से अच्छी तरह सोचा है, एलिज़ाबेथ,' गाड़ी के गाँव से बाहर निकलते ही मामा ने कहा। 'गंभीरता से सोचूँ तो लगता है, तुम्हारी बड़ी बहन की राय पहले से कहीं ज़्यादा सही है। लिडिया को बचाने और उसका पक्ष लेने वाले लोग तो हैं ही। और यह भी बहुत कम संभव लगता है कि कोई नौजवान अपने कर्नल के परिवार के साथ रह रही लड़की के ख़िलाफ़ ऐसी चाल चले। मैं तो दिल से अच्छे अंत की उम्मीद रखना चाहता हूँ। क्या विकहम ने सोचा होगा कि उस लड़की के रिश्तेदार और दोस्त चुप बैठे रहेंगे? क्या उन्होंने सोचा होगा कि कर्नल फ़ॉर्स्टर का इतना अपमान करके भी रेजिमेंट उन्हें वापस ले लेगी? लालच के मुक़ाबले ख़तरा कहीं बड़ा है।' 'क्या आप सचमुच ऐसा सोचते हैं?' एलिज़ाबेथ का चेहरा खिल उठा और वह पुकार उठी। 'सचमुच,' श्रीमती गार्डिनर ने कहा। 'मैं भी तुम्हारे मामा की बात से सहमत होने लगी हूँ। ऐसा करना तो शिष्टाचार, मान-मर्यादा और अपने भविष्य — तीनों को हद से ज़्यादा ठोकर मार देना है। विकहम को इतना बुरा आदमी मैं मानना नहीं चाहती। लिज़ी, क्या तुमने उन्हें इस हद तक छोड़ दिया है कि उन्हें सचमुच ऐसा काम कर सकने वाला मान लो?' 'शायद वे अपना भविष्य न बिगाड़ें। पर बाक़ी हर चीज़ को वे छोड़ सकते हैं, यह मुझे लगता है। काश दोनों सचमुच ब्याह कर लेते! पर इतनी उम्मीद बाँधने की हिम्मत मुझमें नहीं। ऐसा होता तो वे सीधे स्कॉटलैंड तक क्यों न जाते?' 'पहली बात तो यह,' मिस्टर गार्डिनर ने जवाब दिया। 'इसका कोई पक्का सबूत तो है नहीं कि वे स्कॉटलैंड गए ही नहीं।' 'अरे, पर उन्होंने सफ़री गाड़ी छोड़कर किराए की गाड़ी ले ली थी न। यह तो बहुत मज़बूत आधार है। और बार्नेट के रास्ते पर उनका कोई सुराग़ भी नहीं मिला।' 'ठीक है। तो मान लो कि वे लंदन में हैं। छिपकर रहने के लिए ही वहाँ हों, यह हो सकता है। पर इससे बुरी किसी नीयत से नहीं, यह भी हो सकता है। दोनों के पास पैसा ज़्यादा तो लगता नहीं, सो शायद उन्हें लगा हो कि स्कॉटलैंड तक जाने से लंदन में ब्याह कर लेना सस्ता पड़ेगा। हाँ, वक़्त थोड़ा ज़्यादा लगेगा।' 'पर फिर इतना छिपाव क्यों? पकड़े जाने का डर क्यों? ब्याह चोरी-छिपे क्यों करना पड़े? नहीं, नहीं। यह बात जँचती नहीं। जेन की चिट्ठी देखिए — विकहम के सबसे नज़दीकी दोस्त तक को यक़ीन था कि उनका लिडिया से ब्याह करने का कोई इरादा नहीं। विकहम ऐसी लड़की से कभी ब्याह नहीं करेंगे, जिसके पास थोड़ा-बहुत भी पैसा न हो। उनकी हैसियत ही ऐसी नहीं। लिडिया के पास जवानी, सेहत और मीठे स्वभाव के सिवा है क्या? उसके लिए वे किसी धनी लड़की से ब्याह करके मिलने वाला सारा फ़ायदा छोड़ देंगे? रेजिमेंट में बदनामी का डर उन्हें कितना रोकेगा, यह मैं नहीं कह सकती। ऐसा करने पर क्या होता है, यह मुझे मालूम ही नहीं। पर मामा ने जो दूसरी वजह बताई, वह मुझे ठीक नहीं लगती। लिडिया के लिए खड़ा होने वाला कोई भाई तो है नहीं। और पिताजी अब तक जैसे रहे हैं, उसे देखकर विकहम ने शायद यही माना हो कि इस मामले में भी वे सबसे कम भागदौड़ और सबसे कम सोच-विचार करेंगे। पिताजी आलसी हैं, और घर के मामलों में उनकी दिलचस्पी कभी रही ही नहीं।'

'पर क्या तुम्हें लगता है कि लिडिया उनके प्यार में अपनी सारी समझ खो देगी, और बिना ब्याह किए उनके साथ रहने को तैयार हो जाएगी?' 'ऐसा हो सकता है — यही सोच सबसे भयानक लगती है,' एलिज़ाबेथ ने आँखों में आँसू भरकर जवाब दिया। 'ऐसे मामले में अपनी ही बहन की शालीनता और पवित्रता पर शक करना पड़े! पर सच कहूँ तो समझ नहीं आता कि क्या कहूँ। शायद मैं उसे ज़रूरत से ज़्यादा बुरा मान रही हूँ। फिर भी लिडिया बहुत छोटी है। गंभीर बातों पर सोचना उसने कभी सीखा ही नहीं। पिछले छह महीनों में, नहीं, पूरे एक साल में उसने मौज और दिखावे के सिवा किसी चीज़ पर ध्यान नहीं दिया। सबसे आलसी और सबसे हल्के ढंग से वक़्त बिताया, और सामने आने वाला हर ख़याल अपने मन में उतरने दिया। जब से मिलिशिया पहली बार मेरिटन आया, लिडिया के दिमाग़ में प्यार, इश्क़बाज़ी और अफ़सरों के सिवा कुछ रहा ही नहीं। वह लगातार यही सोचती और यही बोलती रही, और अपने पहले से ही चंचल मन को और आसानी से भड़क उठने वाला बना लिया। हम सब जानते हैं कि विकहम के पास रूप और तौर-तरीक़े — बस इतने भर से किसी स्त्री का मन जीत लेने का हर जादू मौजूद है।' 'पर जेन भी तो,' मामी ने कहा, 'विकहम को इतना बुरा नहीं मानती कि उन्हें ऐसा काम कर सकने वाला समझ ले।' 'जेन ने कभी किसी को बुरा माना है? पहले चाहे किसी ने कुछ भी किया हो, गुनाह सामने आने से पहले जेन किसे ऐसा काम कर सकने वाला मानेगी? पर विकहम का असली रूप जेन भी मेरी ही तरह जानती है। हम दोनों जानते हैं कि वे हर तरह से लंपट रहे हैं, उनमें न सच्चाई है न मान-मर्यादा, और लोगों का मन जीतने में जितने माहिर हैं, उतने ही झूठे और छल से भरे हैं।' 'यह सब तुम सचमुच जानती हो?' श्रीमती गार्डिनर अपनी उत्सुकता छिपा न पाईं और पूछ बैठीं। 'हाँ, सचमुच जानती हूँ,' एलिज़ाबेथ ने चेहरा लाल करते हुए जवाब दिया। 'मिस्टर डार्सी के साथ उन्होंने जो शर्मनाक बरताव किया, वह तो मैंने कुछ दिन पहले आपको बता ही दिया था। और पिछली बार जब आप लॉन्गबर्न में थीं, तब आपने ख़ुद सुना था कि जिस आदमी ने उन पर इतनी उदारता और इतनी भलाई की, उसी के बारे में विकहम कैसी बातें करते हैं। कुछ और बातें भी हैं, जो मैं खोल नहीं सकती। नहीं, वे कहने लायक़ भी नहीं। पर पेम्बरली के घराने के बारे में उन्होंने जितने झूठ फैलाए, उनका कोई अंत नहीं। मिस डार्सी का जैसा हुलिया उन्होंने बताया था, उसे सुनकर मैंने एक घमंडी, ठंडी और मन न लगने वाली लड़की से मिलने की पूरी तैयारी कर ली थी। पर विकहम ख़ुद जानते थे कि सच इसका उलटा है। जैसा हमने अपनी आँखों से देखा, वह लड़की मीठी और विनम्र है — यह उन्हें ज़रूर मालूम रहा होगा।' 'पर लिडिया इनमें से कुछ भी नहीं जानती? जो बात तुम और जेन इतनी अच्छी तरह जानती हो, वह उसे बिलकुल मालूम न हो, यह कैसे हो सकता है?' 'आह, हाँ! यही तो सबसे बुरा है। केंट जाकर मिस्टर डार्सी और उनके रिश्तेदार कर्नल फ़िट्ज़विलियम से बार-बार मिलने तक मुझे ख़ुद सच मालूम नहीं था। और जब मैं घर लौटी, तब मिलिशिया एक-डेढ़ हफ़्ते में मेरिटन छोड़ने वाला था। सो सारी बात सुन लेने के बाद जेन ने भी और मैंने भी यही समझा कि जो हम जानते हैं, उसे बताने की कोई ज़रूरत नहीं। पूरे इलाक़े के मन में विकहम के लिए जो अच्छी राय थी, उसे उसी वक़्त तोड़ देने से ऊपरी तौर पर किसका क्या भला होता? और जब लिडिया का श्रीमती फ़ॉर्स्टर के साथ जाना तय हुआ, तब भी यह ख़याल हमें छू तक नहीं गया कि उसे विकहम का असली स्वभाव बताकर सचेत कर देना चाहिए। लिडिया धोखा खाकर ख़तरे में पड़ सकती है — ऐसा सोचना तो मन में आया ही नहीं। ऐसा कुछ होगा, इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। यह आप आसानी से मान लेंगी।' 'तो जब सब लोग ब्राइटन गए, तब भी यह मानने की कोई वजह नहीं थी कि दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं?' 'ज़रा भी नहीं। दोनों में से किसी की तरफ़ से लगाव का कोई इशारा मुझे याद नहीं। ऐसा कुछ ज़रा भी दिखता, तो हमारे घर में वह अनदेखा रह ही नहीं सकता था — यह आप जानती हैं। विकहम जब पहली बार रेजिमेंट में आए, तब लिडिया भी उन पर ख़ूब रीझी थी। पर हम सब ही रीझे थे। पहले दो महीनों में मेरिटन और आसपास की सारी लड़कियाँ विकहम पर मन हार बैठी थीं। पर उन्होंने लिडिया पर कभी कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। कुछ समय तक ज़ोर-शोर से दीवानी रहने के बाद लिडिया का मन ठंडा पड़ गया, और जो अफ़सर उसे ज़्यादा ख़ास मानते थे, वह फिर उन्हीं को चाहने लगी।' इस दिलचस्प मामले को बार-बार दोहराने से डर, उम्मीद और अटकल में जोड़ने को कुछ ख़ास बचा नहीं था। फिर भी पूरे सफ़र में कोई और बात ज़्यादा देर टिकी नहीं, और लौट-लौटकर यही मामला सामने आ गया। ऐसा होना ही था। एलिज़ाबेथ के मन से यह बात एक पल के लिए भी नहीं हटी। सबसे तीखा आत्म-दोष उसके मन को जकड़े हुए था। न चैन का मौक़ा था, न भूलने का।

सब लोग जितनी जल्दी हो सका, उतनी जल्दी रास्ता तय करते रहे। रास्ते में एक रात रुके, और अगले दिन खाने के वक़्त तक लॉन्गबर्न पहुँच गए। इतनी तसल्ली ज़रूर रही कि जेन को लंबे इंतज़ार से थकना नहीं पड़ा होगा। गाड़ी देखकर खिंचे चले आए गार्डिनर के छोटे बच्चे, सबके चरागाह में आ पहुँचते ही घर के सामने की सीढ़ियों पर खड़े थे। गाड़ी दरवाज़े पर रुकी, तो बच्चों के चेहरे ख़ुशी और हैरानी से खिल उठे। पूरे शरीर से उछल-कूद करते उनके अंदाज़ ने सबसे पहला यह प्यारा संकेत दिया कि स्वागत गर्मजोशी से होगा। एलिज़ाबेथ गाड़ी से कूदकर उतरी। हर बच्चे को जल्दी-जल्दी एक-एक चुंबन देकर वह भीतर ड्योढ़ी की ओर लपकी। माँ के कमरे से सीढ़ियाँ उतरकर दौड़ी आई जेन ने वहीं उसे थाम लिया। एलिज़ाबेथ ने जेन को प्यार से गले लगाया। दोनों की आँखें आँसुओं से भरी थीं, फिर भी एलिज़ाबेथ ने तुरंत पूछ लिया कि भागे हुए दोनों की कोई ख़बर मिली या नहीं। 'अभी तक नहीं,' जेन ने जवाब दिया। 'पर प्यारे मामा आ गए हैं, तो उम्मीद है सब ठीक हो जाएगा।' 'पिताजी लंदन में हैं?' 'हाँ। जैसा मैंने चिट्ठी में लिखा था, मंगलवार को चले गए।' 'उनकी ख़बर बार-बार आती रही?' 'बस एक ही बार सुना। बुधवार को छोटी-सी चिट्ठी भेजी कि सही-सलामत पहुँच गए, और मैंने ख़ास तौर पर जो पूछा था, वह भी बता दिया। इतना और जोड़ दिया कि कोई ज़रूरी ख़बर मिलने तक दोबारा नहीं लिखेंगे।' 'माँ कैसी हैं? सब कैसे हैं?' 'माँ ठीक-ठाक ही लगती हैं। हाँ, मन बहुत हिल गया है। ऊपर हैं, और तुम सबको देखकर बहुत ख़ुश होंगी। अभी सोने के कमरे से लगे साज-शृंगार वाले कमरे से बाहर नहीं निकलतीं। मैरी और किटी अच्छी बात है कि बिलकुल भली-चंगी हैं।' 'पर तुम, तुम कैसी हो?' एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'चेहरा फीका पड़ा है। न जाने कितना कुछ सहना पड़ा होगा!' जेन ने भरोसा दिलाया कि वह बिलकुल ठीक है। गार्डिनर दंपती बच्चों से मिल रहे थे, तब तक चलती रही यह बातचीत भी सबके पास आ जाने पर ख़त्म हो गई। जेन दौड़कर मामा-मामी के पास गई। कभी मुस्कुराते, कभी रोते हुए उसने दोनों का स्वागत किया और शुक्रिया कहा। सब बैठक में पहुँचे, तो एलिज़ाबेथ जो पूछ चुकी थी, वही सवाल बाक़ी लोगों ने भी दोहराए। जल्दी ही पता चल गया कि जेन के पास बताने को कोई ख़बर नहीं है। फिर भी उसके भले मन से जन्मी उम्मीद ने अभी उसका साथ नहीं छोड़ा था। वह मानती रही कि सब कुछ अच्छे से निपट जाएगा। उसे हर सुबह यही आस रहती कि लिडिया या पिताजी की चिट्ठी आएगी, दोनों के इस क़दम की सफ़ाई देगी, और शायद ब्याह की ख़बर भी ले आएगी।

कुछ मिनट साथ बात करने के बाद सब लोग श्रीमती बेनेट के कमरे में गए। उन्होंने मेहमानों का स्वागत ठीक वैसे ही किया, जैसी उम्मीद थी। आँसू और पछतावे की आहें बरस पड़ीं। बदमाश विकहम को उन्होंने ख़ूब कोसा, और अपनी तकलीफ़ों तथा अपने साथ हुए अन्याय का रोना रोया। बेटी की ग़लती की सबसे बड़ी वजह उनका अपना बेसमझ लाड़ था, फिर भी उन्होंने ख़ुद को छोड़कर सबको दोष दिया। 'अगर मेरी चलती और पूरा परिवार ब्राइटन जा पाता,' उन्होंने कहा, 'तो यह सब होता ही नहीं। बेचारी प्यारी लिडिया को देखने वाला वहाँ कोई था ही नहीं। फ़ॉर्स्टर दंपती ने उसे अपनी आँखों से ओझल क्यों होने दिया? ज़रूर उनसे बहुत बड़ी लापरवाही हुई है। ठीक से नज़र रखी जाती, तो वह ऐसा करने वाली लड़की नहीं है। मुझे तो हमेशा से लगता था कि लिडिया को उनके भरोसे छोड़ना बिलकुल ठीक नहीं। पर हमेशा की तरह मेरी बात अनसुनी कर दी गई। बेचारी प्यारी बच्ची! और अब मिस्टर बेनेट भी चले गए हैं, सो विकहम जहाँ भी मिलेंगे, वे उनसे द्वंद्व लड़ेंगे। फिर मारे जाएँगे, और हम सबका क्या होगा? मिस्टर बेनेट की देह क़ब्र में ठंडी भी नहीं पड़ेगी कि कॉलिन्स दंपती हमें बाहर निकाल देंगे। भाई साहब हम पर मेहरबानी न करें, तो कैसे जिएँगे, यह मुझे नहीं सूझता।' सबने ज़ोर देकर उन्हें ऐसे भयानक ख़यालों से रोका। मिस्टर गार्डिनर ने कहा कि वे उन्हें और पूरे परिवार को प्यार करते हैं, और फिर बताया कि वे अगले ही दिन लंदन जाएँगे। उन्होंने कहा कि लिडिया को वापस लाने की मिस्टर बेनेट की हर कोशिश में वे साथ देंगे। 'बेकार के डर में मत डूबिए,' उन्होंने जोड़ा। 'सबसे बुरे के लिए तैयार रहना ठीक है। पर सबसे बुरा होकर ही रहेगा, यह मान लेने की ज़रूरत नहीं। दोनों को ब्राइटन छोड़े अभी एक हफ़्ता भी नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में ख़बर मिल सकती है। जब तक यह पता न चल जाए कि उन्होंने ब्याह नहीं किया और करने का इरादा भी नहीं, तब तक हम यह मानकर हार न बैठें कि सब ख़त्म हो गया। लंदन पहुँचते ही मैं बहनोई साहब के पास जाऊँगा और उन्हें ग्रेसचर्च स्ट्रीट पर अपने घर साथ ले आऊँगा। उसके बाद हम मिलकर तय कर सकेंगे कि क्या करना है।' 'आह, प्यारे भाई साहब,' श्रीमती बेनेट ने जवाब दिया। 'यही तो मैं सबसे ज़्यादा चाहती हूँ। लंदन पहुँचकर दोनों जहाँ भी हों, उन्हें ढूँढ़ निकालिए। अगर अब तक ब्याह नहीं हुआ है, तो ब्याह करा ही दीजिए। और ब्याह के कपड़ों के चक्कर में उन्हें रुकवाइए मत। लिडिया से कह दीजिए कि ब्याह के बाद कपड़ों के लिए जितना पैसा वह चाहेगी, उतना मिल जाएगा। सबसे बढ़कर, मिस्टर बेनेट को द्वंद्व मत लड़ने दीजिए। उन्हें बता दीजिए कि मेरी हालत कितनी बुरी है। डर के मारे मेरे होश उड़े जा रहे हैं, पूरा बदन काँपता और धड़कता है। पसली में ऐंठन है, सिर में दर्द है, और दिल इतनी ज़ोर से धड़कता है कि रात-दिन चैन नहीं मिलता। और मेरी प्यारी लिडिया से कहिएगा कि मुझसे मिले बिना कपड़े न मँगवाए। उसे तो पता ही नहीं कि कौन-सी दुकान सबसे अच्छी है। आह, आप कितने भले हैं! मुझे मालूम है, आप सब कुछ सँभाल लेंगे।' मिस्टर गार्डिनर ने दोबारा वादा किया कि वे इस काम में दिल से जुटेंगे। साथ ही यह सलाह दिए बिना भी न रह सके कि उम्मीद और डर, दोनों में हद से आगे न जाएँ। खाना लगने तक ऐसी ही बातें हुईं। फिर श्रीमती बेनेट घर की उस प्रबंधिका के साथ रह गईं, जो बेटियों की ग़ैरहाज़िरी में उनके पास रही थी। उसी के आगे वे अपने मन की सारी बात खुलकर उँडेल सकती थीं। भाई-भाभी को लगता था कि श्रीमती बेनेट के परिवार से अलग रहने की सचमुच कोई वजह नहीं। फिर भी उन्होंने रोका नहीं। वे इतनी सँभली हुई नहीं थीं कि खाना परोसते नौकरों के सामने चुप रह जातीं। इससे अच्छा यही लगा कि घर के लोगों में सबसे भरोसेमंद एक ही इंसान उनके सारे डर और सारी फ़िक्र जाने।

जल्दी ही मैरी और किटी भी खाने के कमरे में आ गईं। दोनों अपने-अपने कमरे में इतनी व्यस्त थीं कि पहले नहीं आ सकीं। एक किताब में लगी थी, दूसरी बनाव-शृंगार में। फिर भी दोनों के चेहरे काफ़ी शांत थे। हाँ, अपनी सबसे प्यारी बहन खो देने और इस मामले में डाँट भी सुनने के कारण किटी की आवाज़ रोज़ से कुछ ज़्यादा तीखी थी। मैरी बहुत सँभली हुई थी। सब लोग मेज़ पर बैठे ही थे कि उसने गंभीर चेहरा बनाकर एलिज़ाबेथ के कान में इतना कह देने का मौक़ा निकाल लिया। 'यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, और संभवतः लोगों की चर्चा का बड़ा विषय बनेगी। किंतु हमें द्वेष की लहरों का सामना करना होगा। और एक-दूसरे के आहत हृदय पर बहनों जैसी सांत्वना का मरहम रखना होगा।' एलिज़ाबेथ का जवाब देने का ज़रा भी मन नहीं है, यह भाँपकर मैरी ने आगे कहा। 'यह घटना लिडिया के लिए चाहे कितनी ही दुर्भाग्यपूर्ण हो, इससे शिक्षा अवश्य मिलती है। यह कि स्त्री की पवित्रता एक बार चली जाए तो लौटती नहीं। कि एक बार क़दम बहका, तो वह अनंत विनाश तक ले जाता है। और यह कि मान-मर्यादा जितनी सुंदर है, उतनी ही भंगुर भी। अयोग्य पुरुष के प्रति व्यवहार में कितनी भी सावधानी बरती जाए, वह अधिक नहीं होती — यही शिक्षा है।' एलिज़ाबेथ ने चौंककर नज़र उठाई। पर मन इतना दबा हुआ था कि वह कुछ कह न सकी। मैरी सामने पड़ी इस विपत्ति से ऐसी ही नैतिक शिक्षाएँ निकालती रही, और इसी से ख़ुद को तसल्ली देती रही।

दोपहर बाद दोनों बड़ी बहनें आधे घंटे के लिए अकेली बैठ सकीं। एलिज़ाबेथ ने तुरंत तरह-तरह के सवाल किए। जेन भी जवाब देने को बेताब थी। दोनों ने मिलकर इस मामले के भयानक अंत पर दुख जताया। एलिज़ाबेथ को वह अंत लगभग पक्का लगता था। जेन उसे पूरी तरह असंभव भी नहीं कह पाई। फिर एलिज़ाबेथ ने कहा। 'पर जो कुछ मैंने अब तक नहीं सुना, वह सब बताओ। एक भी बात छोड़े बिना पूरा ब्योरा दो। कर्नल फ़ॉर्स्टर ने क्या कहा? दोनों के भाग जाने से पहले किसी को शक तक नहीं हुआ? उन्हें हमेशा साथ-साथ तो देखा ही होगा।' 'कर्नल फ़ॉर्स्टर ने माना कि उन्हें अक्सर शक हुआ — ख़ास तौर पर लिडिया की तरफ़ से कुछ लगाव है। पर उन्हें लगा, चिंता की कोई बात नहीं। उनके बारे में सोचकर मेरा मन बहुत दुखता है। उन्होंने बहुत ध्यान और बहुत भलमनसाहत से काम किया। यह ख़याल आने से पहले ही कि शायद दोनों स्कॉटलैंड न गए हों, वे हमारे पास आकर अपनी चिंता कहने चले थे। और जैसे ही ऐसा शक फैला, वे जल्दी से निकल पड़े।' 'डेनी को यक़ीन था कि विकहम ब्याह नहीं करेंगे? क्या उन्हें दोनों के भाग जाने की योजना मालूम थी? कर्नल फ़ॉर्स्टर ख़ुद डेनी से मिले?' 'हाँ। पर कर्नल के पूछने पर डेनी ने कहा कि दोनों की योजना उन्हें मालूम नहीं। अपनी असली राय भी वे कहना नहीं चाहते थे। और यह भरोसा भी दोबारा नहीं जताया कि दोनों ब्याह नहीं करेंगे। इसी से यह उम्मीद बँधती है कि पहले डेनी की बात शायद ग़लत ढंग से पहुँचाई गई थी।' 'तो कर्नल फ़ॉर्स्टर के ख़ुद आने तक तुममें से किसी को इसमें संदेह नहीं रहा होगा कि दोनों सचमुच ब्याह कर रहे हैं?' 'ऐसा ख़याल हमारे मन में आता भी कैसे? हम जानते थे कि मिस्टर विकहम का बरताव हमेशा एकदम सही नहीं रहा, सो थोड़ी बेचैनी और फ़िक्र ज़रूर हुई कि उनसे ब्याह करके हमारी बहन सुखी रह पाएगी या नहीं। पिताजी और माँ को यह बात बिलकुल मालूम नहीं थी, वे बस यही सोचते रहे कि ब्याह कितना जल्दबाज़ी भरा है। तभी किटी ने हम सबसे ज़्यादा जानने के बिलकुल स्वाभाविक गर्व के साथ बताया। कि लिडिया ने अपनी आख़िरी चिट्ठी में इशारा कर दिया था कि वह ऐसा कुछ कर सकती है। लगता है, उसे मालूम था कि दोनों को एक-दूसरे से प्यार हुए कई हफ़्ते हो चुके हैं।' 'पर ब्राइटन जाने से पहले नहीं, है न?' 'हाँ, लगता तो नहीं।' 'कर्नल फ़ॉर्स्टर भी विकहम को बुरा मानते दिखे? उन्हें उनका असली स्वभाव मालूम है?' 'मानना पड़ेगा कि उन्होंने पहले जैसी अच्छी बात नहीं कही। उन्हें लगता था कि विकहम जल्दबाज़ हैं और पैसा बेहिसाब उड़ाते हैं। और इस दुखद घटना के बाद तो यह भी कहा जा रहा है कि मेरिटन छोड़ते वक़्त वे बहुत सारा क़र्ज़ छोड़ गए। पर उम्मीद है, यह झूठ हो।' 'आह, जेन। हमने कम छिपाया होता और विकहम के बारे में जो जानते थे, वह कह दिया होता, तो यह सब न होता!' 'शायद वही बेहतर रहता,' बड़ी बहन ने जवाब दिया। 'पर यह जाने बिना कि वे अब किस मन से जी रहे हैं, किसी की पुरानी ग़लतियाँ खोल देना ठीक नहीं लगा।' 'हमने जो किया, सबसे अच्छी नीयत से किया।' 'लिडिया ने उनकी पत्नी के नाम जो चिट्ठी छोड़ी थी, क्या कर्नल फ़ॉर्स्टर उसका ब्योरा बता सके?' 'वे उसे हमें दिखाने के लिए साथ ही ले आए थे।'

जेन ने अपनी जेबी किताब से चिट्ठी निकालकर एलिज़ाबेथ को दे दी। उसमें यह लिखा था। 'प्यारी हैरियट, मैं कहाँ गई हूँ, यह जानोगी तो हँस पड़ोगी। कल सुबह जब तुम्हें पता चलेगा कि मैं ग़ायब हूँ, तब तुम कितनी चौंकोगी — यह सोचकर मेरी भी हँसी रोके नहीं रुकती। मैं ग्रेटना ग्रीन जा रही हूँ। किसके साथ जा रही हूँ, यह भी न ताड़ सको तो तुम सचमुच बुद्धू हो। इस दुनिया में मैं सिर्फ़ एक ही मर्द से प्यार करती हूँ। वे तो फ़रिश्ता हैं। उनके बिना मैं कभी ख़ुश रह ही नहीं सकती, इसलिए मेरे भाग जाने को बुरा मत मानना। मन न हो तो लॉन्गबर्न में मेरे जाने की ख़बर मत भेजना। मैं ख़ुद चिट्ठी लिखूँगी और नीचे लिडिया विकहम लिख दूँगी, तो सबको और भी ज़्यादा हैरानी होगी। कितना मज़ा आएगा! हँसते-हँसते लिखा ही नहीं जा रहा। मिस्टर प्रैट से मेरी तरफ़ से माफ़ी माँग लेना कि मैं आज रात का वादा नहीं निभा पाई और उनके साथ नाच नहीं सकी। कह देना कि सब जान लेने पर वे मुझे माफ़ कर देंगे, मुझे यह भरोसा है। और यह भी कह देना कि अगले नाच में मिलेंगे, तो मैं बड़ी ख़ुशी से उनके साथ नाचूँगी। लॉन्गबर्न पहुँचकर मैं अपने कपड़े मँगवा लूँगी। पर बाँधने से पहले सैली से कह देना कि मेरी कढ़ाई वाली मलमल की पोशाक में जो बड़ा-सा चीरा पड़ा है, उसे सी दे। अलविदा। कर्नल फ़ॉर्स्टर को मेरा प्यार कहना। हमारी सलामत यात्रा के नाम का जाम उठा लेना। तुम्हारी प्यारी सहेली, लिडिया बेनेट।' 'आह, बेसमझ, बिलकुल बेसमझ लिडिया!' चिट्ठी पढ़ चुकने पर एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'ऐसे मौक़े पर ऐसी चिट्ठी! फिर भी इतना तो दिखता ही है कि उसके लिए इस सफ़र का मक़सद गंभीर था। विकहम ने बाद में जो भी कहकर उसे बहकाया हो, बदनामी का इरादा लिडिया की तरफ़ से नहीं था। बेचारे पिताजी! यह पढ़कर उन पर क्या बीती होगी!' 'इतना सदमा खाया हुआ इंसान मैंने कभी नहीं देखा। पूरे दस मिनट तक उनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। माँ तो उसी वक़्त बिस्तर पकड़ बैठीं, और पूरा घर गड़बड़ा गया!' 'आह, जेन,' एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'उस दिन के ख़त्म होने से पहले क्या एक भी नौकर ऐसा बचा था, जिसे यह बात मालूम न हो?' 'मालूम नहीं। उम्मीद है, कोई तो बचा होगा। पर ऐसे वक़्त में ज़बान सँभालना बहुत मुश्किल होता है। माँ को दौरा पड़ गया था। जितनी मदद कर सकती थी, सब करने की कोशिश की। फिर भी डर है कि जितना कर सकती थी, उतना नहीं कर पाई। आगे क्या होगा, इस डर से मेरा तो सोचना ही लगभग बंद हो गया था।' 'माँ की देखभाल में तुमने हद से ज़्यादा ज़ोर लगा दिया। रंगत अच्छी नहीं लग रही। आह, काश मैं तुम्हारे पास होती! सारी फ़िक्र और सारी बेचैनी तुमने अकेले उठा ली।' 'मैरी और किटी ने भी बड़ी भलाई से हाथ बँटाया, और कोई भी मेहनत ख़ुशी से साथ उठा लेतीं। पर दोनों में से किसी पर यह बोझ डालना मुझे ठीक नहीं लगा। किटी का शरीर कमज़ोर और नाज़ुक है, और मैरी इतना पढ़ती है कि उसके आराम के वक़्त में दख़ल देना ठीक नहीं। पिताजी के जाने के बाद फ़िलिप्स मौसी मंगलवार को लॉन्गबर्न आ गईं, और बड़ी भलाई से गुरुवार तक हमारे साथ रहीं। हम सबके लिए वे बड़ी मदद और बड़ी तसल्ली बनीं। लेडी लुकास भी बहुत भली रहीं। बुधवार सुबह पैदल आकर उन्होंने हमें दिलासा दिया, और कहा कि वे ख़ुद या उनकी बेटियों में से कोई भी काम आ सकें तो साथ देंगी।' 'वे घर पर ही रहतीं तो बेहतर था,' एलिज़ाबेथ पुकार उठी। 'नीयत भली रही हो, फिर भी ऐसी विपत्ति में पड़ोसियों से जितना कम मिलना हो, उतना अच्छा। मदद वे कर नहीं सकतीं, और उनकी दी हुई दिलासा सही नहीं जाती। वे दूर से ही हम पर इतराएँ और ख़ुश हो लें।'

इसके बाद एलिज़ाबेथ ने पूछा कि लंदन में बेटी को वापस पाने के लिए पिताजी क्या करने वाले थे। 'मेरे ख़याल से,' जेन ने जवाब दिया, 'वे एप्सम जाना चाहते थे — वहीं आख़िरी बार घोड़े बदले गए थे। वहाँ घोड़े हाँकने वालों से मिलकर देखना चाहते थे कि कुछ पता चलता है या नहीं। पर सबसे ज़रूरी है क्लैपहम में उस किराए की गाड़ी का नंबर ढूँढ़ना, जिसमें दोनों बैठे थे। वह गाड़ी सवारी लेकर लंदन से आई थी। उन्हें लगा कि एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी में बदलते किसी सज्जन और किसी महिला को शायद किसी ने ग़ौर से देखा हो, सो वे क्लैपहम में पूछताछ करना चाहते थे। कोचवान ने अपनी पिछली सवारी को किस घर पर उतारा था, यह किसी तरह मालूम हो जाए, तो वहाँ पूछा जा सकेगा। उन्हें उम्मीद थी कि गाड़ियों का अड्डा और उसका नंबर मालूम कर लेना बिलकुल नामुमकिन नहीं होगा। इसके अलावा उन्होंने और क्या सोचा था, यह मुझे नहीं मालूम। वे इतनी जल्दी में निकले, और मन भी इतना उलझा हुआ था कि इतना भी जान पाना मुश्किल हो गया।'