हिंदी संस्करण

अध्याय 48

अगली सुबह सब मिस्टर बेनेट की चिट्ठी का इंतज़ार करते रहे। पर डाक में उनकी लिखी एक पंक्ति तक नहीं थी। घर के सब जानते थे कि चिट्ठी का जवाब देने में वे बहुत देर लगाते हैं और बड़ी लापरवाही भी करते हैं। फिर भी सबको आस थी कि ऐसे मौक़े पर तो वे कुछ कोशिश करेंगे ही। मानना ही पड़ा कि भेजने लायक़ कोई अच्छी ख़बर उनके पास नहीं है। पर इतना भी पक्का पता चल जाता, तो अच्छा रहता। मिस्टर गार्डिनर डाक का इंतज़ार करते रहे, और फिर तुरंत निकल पड़े। उनके जाने से इतना भरोसा तो बँधा कि आगे की ख़बरें लगातार मिलती रहेंगी। विदा लेते हुए मामा ने वादा किया कि मिस्टर बेनेट को जल्द से जल्द लॉन्गबर्न लौटा लाने के लिए वे उन्हें मना लेंगे। उनकी बहन के लिए यह बड़ी तसल्ली की बात थी — पति द्वंद्व में मारे न जाएँ, इसकी अकेली ज़मानत वे इसी को मानती थीं। श्रीमती गार्डिनर और बच्चों ने कुछ दिन और हर्टफ़र्डशायर में रुक जाना तय किया। उन्हें लगा कि उनके रहने से शायद भांजियों को कुछ सहारा मिले। वे श्रीमती बेनेट की देखभाल में हाथ बँटाती रहीं, और लड़कियों को फ़ुरसत मिलने पर बड़ी तसल्ली बनीं। दूसरी मौसी भी बार-बार आती रहीं। उनके अपने कहने के मुताबिक़, हर बार आना सबको हिम्मत और हौसला देने के लिए ही होता था। पर हर बार वे विकहम की फ़िज़ूलख़र्ची और बदचलनी का कोई न कोई नया क़िस्सा साथ ले आतीं। सो ऐसा कम ही होता कि वे सबको आने से पहले के मुक़ाबले और ज़्यादा उदास किए बिना लौट जाएँ। मेरिटन के लोग तो मानो उसी आदमी को नीचा दिखाने में जुट गए थे, जो बस तीन महीने पहले तक लगभग नूर का फ़रिश्ता था। कहा जाने लगा कि गाँव के हर दुकानदार का उन पर क़र्ज़ है। और उनके हर इश्क़ के क़िस्से को बहकाने का बड़ा नाम मिल गया, जो हर दुकानदार के घर तक फैल चुका था। हर कोई कहता कि वे दुनिया के सबसे बुरे नौजवान हैं। हर कोई अब नए सिरे से जान रहा था कि उनके भले-से दिखते चेहरे पर उसे पहले से ही शक था। एलिज़ाबेथ ने इन उड़ती बातों का आधा भी सच नहीं माना। फिर भी इतना मान लिया कि अपनी छोटी बहन का सत्यानाश — जिसका यक़ीन उसे पहले से ही था — अब और भी पक्का लगने लगा। जेन ने तो इससे भी कम माना, पर उम्मीद उसकी भी लगभग टूट चुकी थी। क्योंकि दोनों अगर स्कॉटलैंड गए होते — यह संभावना जेन ने पहले पूरी तरह छोड़ी नहीं थी — तो अब तक ख़बर ज़रूर आ चुकी होती।

मिस्टर गार्डिनर रविवार को लॉन्गबर्न से निकले। मंगलवार को उनकी पत्नी को जो चिट्ठी मिली, उसमें लिखा था कि पहुँचते ही उन्होंने अपने बहनोई को ढूँढ़ निकाला और ग्रेसचर्च स्ट्रीट आ जाने के लिए मना लिया। मिस्टर गार्डिनर के पहुँचने से पहले मिस्टर बेनेट एप्सम और क्लैपहम तक हो आए थे। पर तसल्ली देने वाली कोई ख़बर उन्हें नहीं मिली। अब उन्होंने लंदन के सारे बड़े होटलों में पूछताछ करने की ठानी थी। उनका ख़याल था कि लंदन पहुँचकर, अपना ठिकाना ढूँढ़ने से पहले, दोनों शायद किसी होटल में रुके हों। मिस्टर गार्डिनर को इस तरकीब से कामयाबी की कोई उम्मीद नहीं थी। फिर भी बहनोई की इतनी बेताबी देखकर उन्होंने साथ देने का मन बना लिया। यह भी लिखा था कि मिस्टर बेनेट अभी लंदन छोड़ने को ज़रा भी तैयार नहीं दिखते। जल्दी ही दोबारा लिखने के वादे के साथ चिट्ठी में यह बात भी जोड़ी गई थी। 'मैंने कर्नल फ़ॉर्स्टर को चिट्ठी लिखी है। रेजिमेंट में जो लोग उस नौजवान के क़रीब रहे, उनसे यह पता करने को कहा है कि विकहम का कोई रिश्तेदार या जान-पहचान वाला ऐसा है या नहीं, जिसे मालूम हो कि वे इस वक़्त लंदन में कहाँ छिपे हैं। ऐसा कोई सुराग़ देने वाला मिल जाए और उससे पूछा जा सके, तो यह बात निर्णायक साबित हो सकती है। अभी हमारे पास राह दिखाने वाला कुछ भी नहीं है। मुझे भरोसा है कि कर्नल फ़ॉर्स्टर भी यह पता लगाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे। पर फिर से सोचने पर लगा कि विकहम के कौन-कौन से रिश्तेदार इस वक़्त जीवित हैं, यह शायद लिज़ी ही सबसे अच्छी तरह बता सके।' एलिज़ाबेथ को समझते देर नहीं लगी कि वे उसकी जानकारी पर इस तरह क्यों टिके हुए हैं। पर उस भरोसे लायक़ तसल्लीबख़्श जानकारी वह दे नहीं सकती थी। विकहम के माँ-बाप के अलावा उनका कोई और रिश्तेदार भी है, ऐसा उसने कभी सुना ही नहीं था। माँ-बाप, दोनों को गुज़रे कई साल हो चुके थे। फिर भी हो सकता था कि मिलिशिया के कुछ साथी इससे ज़्यादा जानते हों। उम्मीद बहुत नहीं थी, पर इसी पूछताछ के बहाने इंतज़ार करने को कुछ तो मिल गया। अब लॉन्गबर्न का हर दिन बेचैनी में बीतता। उसमें भी सबसे तकलीफ़देह घड़ी रोज़ डाक के इंतज़ार की होती। हर सुबह सबसे पहला सवाल यही रहता कि कोई चिट्ठी आई या नहीं। ख़बर अच्छी हो या बुरी, आनी चिट्ठी से ही थी। सबको लगता कि अगले दिन ज़रूर कोई ज़रूरी ख़बर आ जाएगी।

पर मिस्टर गार्डिनर की अगली चिट्ठी आने से पहले, बिलकुल किसी और जगह से पिताजी के नाम एक चिट्ठी आ गई। वह मिस्टर कॉलिन्स ने भेजी थी। पिताजी की ग़ैरहाज़िरी में आने वाली हर चिट्ठी खोल लेने का हुक्म जेन को मिला था, सो उसी ने उसे पढ़ा। मिस्टर कॉलिन्स की चिट्ठियाँ हमेशा एक दिलचस्प तमाशा होती थीं। यह एलिज़ाबेथ भी जानती थी, इसलिए वह बहन के कंधे के ऊपर से साथ-साथ पढ़ती रही। उसमें यह लिखा था। 'प्रिय महोदय, हमारे बीच के नाते और मेरे सामाजिक पद को देखते हुए मैं यह अपना कर्तव्य समझता हूँ कि आप जिस हृदयविदारक विपत्ति से गुज़र रहे हैं, उसमें आपको सांत्वना दूँ। कल हर्टफ़र्डशायर से आई एक चिट्ठी से मुझे यह समाचार मिला। प्रिय महोदय, श्रीमती कॉलिन्स और मैं, आपकी तथा आपके समस्त आदरणीय परिवार की पीड़ा में गहरी सहानुभूति प्रकट करते हैं। यह दुख उस कारण से उपजा है, जिसे समय भी मिटा नहीं सकता, इसलिए यह सबसे कड़वी तरह का दुख ही हो सकता है। इतनी कठोर विपत्ति को हल्का करने वाला कोई भी वचन कहने से मैं पीछे नहीं हटूँगा। माता-पिता के हृदय को संसार की किसी भी बात से अधिक कष्ट देने वाली इस घड़ी में सांत्वना के शब्द भी मैं नहीं रोकूँगा। इसकी तुलना में तो आपकी पुत्री का मर जाना ही वरदान होता। प्रिय शार्लट बताती हैं, और ऐसा मानने के कारण भी हैं, कि आपकी पुत्री का यह उच्छृंखल आचरण अत्यधिक लाड़-प्यार का ही फल है — इससे यह और भी शोचनीय हो उठता है। किंतु आपको और श्रीमती बेनेट को सांत्वना देने के लिए इतना कहूँगा कि मेरा मन यही मानने की ओर झुकता है कि उसका स्वभाव जन्म से ही बुरा रहा होगा। अन्यथा इतनी छोटी आयु में वह ऐसा घोर पाप कर ही नहीं सकती थी। बात चाहे जो हो, आपकी दशा अत्यंत दयनीय है। इस मत में केवल श्रीमती कॉलिन्स ही नहीं, बल्कि लेडी कैथरीन और उनकी पुत्री भी मेरे साथ हैं — यह सारी बात मैंने उन्हें बता दी है। मेरी इस चिंता से भी दोनों सहमत हैं कि एक पुत्री का यह पथभ्रष्ट क़दम शेष सभी पुत्रियों के विवाह-भाग्य को हानि पहुँचाएगा। लेडी कैथरीन ने स्वयं कृपापूर्वक कहा, ऐसे परिवार से नाता कौन जोड़ना चाहेगा? यह सोचकर पिछले नवंबर की एक बात मुझे और भी अधिक संतोष से याद आती है। वह बात दूसरी तरह निपटी होती, तो आपके समस्त शोक और अपयश में मैं भी घसीट लिया जाता। इसलिए प्रिय महोदय, जितना हो सके अपने मन को सांत्वना दीजिए। इस अयोग्य संतान को अपने स्नेह से सदा के लिए निकाल बाहर कीजिए। और उसने जो जघन्य अपराध स्वयं किया है, उसका फल भी उसे स्वयं ही भोगने दीजिए — यही मेरा परामर्श है। आपका, प्रिय महोदय, इत्यादि।'

मिस्टर गार्डिनर ने दोबारा तभी लिखा, जब कर्नल फ़ॉर्स्टर का जवाब आ गया। उसमें भी ख़ुशी की एक भी बात नहीं थी। विकहम का ऐसा कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया, जिससे उनका आना-जाना बना हुआ हो। इतना पक्का था कि उनका कोई नज़दीकी रिश्तेदार जीवित नहीं है। पहले उनकी जान-पहचान बहुत थी। पर मिलिशिया में आने के बाद वे किसी से भी ख़ास मेल-जोल रखते नहीं लगे। सो उनकी ख़बर देने वाला भी कोई नहीं था। छिपकर रहने की एक मज़बूत वजह उनकी अपनी बदहाली भी थी, और लिडिया के रिश्तेदारों के हाथ पड़ जाने का डर भी। अभी-अभी यह खुला था कि वे ब्राइटन में जुए का बड़ा क़र्ज़ छोड़ आए हैं। कर्नल फ़ॉर्स्टर का ख़याल था कि ब्राइटन का उनका सारा हिसाब चुकाने में एक हज़ार पाउंड से ज़्यादा लगेगा। गाँव में भी उन पर बहुत उधार था। पर आन पर चुकाए जाने वाले जुए के क़र्ज़ उससे कहीं बड़े थे। मिस्टर गार्डिनर ने ये सब ब्योरे लॉन्गबर्न के लोगों से छिपाने की कोशिश नहीं की। जेन के होश उड़ गए। 'जुआरी!' वह पुकार उठी। 'यह तो मैंने सोचा भी नहीं था।' मिस्टर गार्डिनर ने चिट्ठी में यह भी जोड़ा कि अगले ही दिन, यानी शनिवार को, पिताजी घर लौट आएँगे। सारी कोशिशें बेकार जाने से हिम्मत हार चुके मिस्टर बेनेट ने परिवार के पास लौट जाना तय किया। और अपनी पत्नी के भाई की यह विनती मान ली कि खोजबीन जारी रखने में जो कुछ करना पड़े, वह सब उन्हीं पर छोड़ दिया जाए। यह ख़बर सुनकर श्रीमती बेनेट उतनी ख़ुश नहीं हुईं, जितनी उनकी बेटियों ने सोचा था — जबकि पहले वे पति की जान को लेकर इतनी घबराई हुई थीं। 'क्या! बेचारी लिडिया को साथ लिए बिना ही लौट आएँगे?' वे पुकार उठीं। 'दोनों को ढूँढ़े बिना तो वे लंदन नहीं छोड़ेंगे। और वे लौट आए, तो विकहम से लड़कर उन्हें लिडिया से ब्याह करने पर मजबूर कौन करेगा?' श्रीमती गार्डिनर का मन अब घर लौटने को होने लगा। सो तय हुआ कि मिस्टर बेनेट जिस दिन लंदन से लौटेंगे, उसी दिन वे और बच्चे लंदन के लिए निकल जाएँगे। गाड़ी उन्हें सफ़र के पहले पड़ाव तक छोड़ आई, और फिर अपने मालिक को लॉन्गबर्न ले आई। श्रीमती गार्डिनर वहाँ से उन सारे सवालों को साथ लिए हुए गईं, जो डर्बीशायर से ही एलिज़ाबेथ और उसके उस मित्र को लेकर उनके मन में थे। भांजी ने उनके सामने कभी ख़ुद से उनका नाम नहीं लिया था। श्रीमती गार्डिनर को हल्की-सी उम्मीद थी कि पीछे-पीछे उनकी कोई चिट्ठी आएगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। एलिज़ाबेथ के लौटने के बाद पेम्बरली से आई मानी जा सके, ऐसी एक भी चिट्ठी नहीं आई। परिवार पर पड़ी विपत्ति ही उसके उदास रहने की पूरी वजह थी। इसलिए उसे देखकर कुछ भी भाँपा नहीं जा सकता था। पर अब अपना मन ठीक-ठीक पहचानने लगी एलिज़ाबेथ ने साफ़ जान लिया। डार्सी को उसने बिलकुल न जाना होता, तो लिडिया के अपयश के आ पड़ने का डर वह कुछ बेहतर ढंग से सह पाती। उसे लगा कि तब दो में से एक रतजगा उसे कम झेलना पड़ता।

मिस्टर बेनेट पहुँचे, तो लगा कि उन्होंने अपनी वही पुरानी दार्शनिक शांति पूरी तरह वापस पा ली है। वे हमेशा की तरह बहुत कम बोले। जिस काम के लिए घर से निकले थे, उसका ज़िक्र तक नहीं किया। बेटियों को भी वह बात छेड़ने की हिम्मत जुटाने में कुछ समय लगा। दोपहर बाद चाय पर वे साथ आ बैठे, तभी एलिज़ाबेथ ने कहने की हिम्मत की। उसने उनके झेले हुए दुख पर छोटी-सी सांत्वना कही, तो मिस्टर बेनेट बोले। 'यह मत कहो। मेरे सिवा और कौन दुख भोगे? यह सब मेरा ही किया-धरा है, सो भोगना भी मुझे ही चाहिए।' 'अपने आपको इतना मत कोसिए,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'ऐसी बुराई से आगाह करना तो ठीक ही है। आदमी कितनी आसानी से ऐसी ग़लती में जा गिरता है! नहीं, लिज़ी। ज़िंदगी में एक बार तो मुझे महसूस कर लेने दो कि ग़लती मेरी कितनी बड़ी थी। इस भाव के नीचे दब जाने का मुझे डर नहीं। यह जल्दी ही अच्छी तरह मिट जाएगा।' 'आपको लगता है कि दोनों लंदन में हैं?' 'हाँ। इससे अच्छी छिपने की जगह और कहाँ मिलेगी?' 'लिडिया भी तो लंदन जाना चाहती थी,' किटी ने जोड़ा। 'तो वह ख़ुश ही होगी,' पिताजी ने सूखे स्वर में कहा। 'और शायद वहाँ अच्छी-ख़ासी लंबी भी रहेगी।' थोड़ी देर चुप रहकर उन्होंने कहा। 'लिज़ी, पिछले मई में तुमने मुझे जो सलाह दी थी, वह सही निकली — इसके लिए मैं तुम्हें दोष नहीं देता। जो कुछ हुआ है, उसे देखते हुए इसे बड़े दिल की बात ही कहना चाहिए।' माँ की चाय लेने आई मिस बेनेट के आने से बातचीत टूट गई।

'ऐसे ठाठ-बाट से बड़ी तसल्ली मिलती है,' वे पुकार उठे। 'दुख में कितनी शान भर देते हैं! अगली बार मैं भी यही करूँगा। सोने की टोपी और घर के लबादे में पुस्तकालय में जा बैठूँगा, और जितने लोगों को तंग कर सकूँ, करूँगा। या फिर किटी के भाग जाने तक टाल भी सकता हूँ।' 'मैं भागकर नहीं जाऊँगी, पिताजी,' किटी ने चिढ़कर कहा। 'मैं कभी ब्राइटन गई भी, तो लिडिया से अच्छा बरताव करूँगी।' 'तुम और ब्राइटन! पचास पाउंड भी मिलें, तो ईस्टबोर्न जितनी पास की जगह तक भी तुम पर भरोसा करके न भेजूँ! नहीं किटी। कम से कम सँभलना तो मैंने आख़िर सीख ही लिया है, और उसका नतीजा तुम भुगतोगी। कोई अफ़सर अब न हमारे घर में घुसेगा, न गाँव से होकर गुज़रेगा। बहनों में से किसी एक के साथ निकलो, तभी बात है — वरना नाच पर पूरी तरह रोक है। और जब तक यह साबित न कर दो कि हर दिन के दस मिनट तुमने समझदारी से बिताए हैं, तब तक घर से एक क़दम बाहर नहीं रखोगी।' इन सारी धमकियों को गंभीरता से लेकर किटी रोने लगी। 'अच्छा, अच्छा,' उन्होंने कहा। 'मन छोटा मत करो। अगले दस साल तक भली बनी रहो, तो उसके आख़िर में तुम्हें सैनिक परेड दिखाने ले चलूँगा।'