हिंदी संस्करण
अध्याय 24
मिस बिंगली की चिट्ठी आते ही सारा शक ख़त्म हो गया। पहले वाक्य से ही साफ़ हो गया कि वे सब जाड़ा बिताने लंदन में बस चुकी हैं। और चिट्ठी इस अफ़सोस पर ख़त्म हुई कि भैया इस इलाक़े से जाने से पहले हर्टफ़र्डशायर के दोस्तों से मिलने का वक़्त नहीं निकाल सके। उम्मीद ख़त्म हो गई। पूरी तरह ख़त्म। जब जेन बाक़ी चिट्ठी पढ़ने का हौसला जुटा सकी, तो उसमें लिखने वाली के अपने प्यार जताने के अलावा शायद ही कोई तसल्ली की बात मिली। ज़्यादातर चिट्ठी मिस डार्सी की तारीफ़ में ख़र्च हुई थी। उनके ढेरों गुण फिर लंबे-चौड़े गिनाए गए थे। कैरोलाइन बड़े फ़ख़्र से बता रही थी कि दोनों की नज़दीकी दिन-ब-दिन बढ़ रही है। पिछली चिट्ठी में जताई अपनी उम्मीद के सच होने की भी दिलेरी से भविष्यवाणी की गई थी। भैया के मिस्टर डार्सी के घर ठहरने की बात भी बड़े ख़ुश होकर लिखी गई थी। मिस्टर डार्सी की नए फ़र्नीचर को लेकर बनाई कुछ योजनाओं का ज़िक्र भी बड़े मुग्ध लहजे में किया गया था। जेन ने जल्दी ही इस सारी बात का सार एलिज़ाबेथ को बता दिया। एलिज़ाबेथ चुपचाप ग़ुस्सा पीकर सुनती रही। एक तरफ़ उसे बहन की फ़िक्र थी, दूसरी तरफ़ बाक़ी सबसे ग़ुस्सा था। भैया का मन मिस डार्सी की तरफ़ है, कैरोलाइन की यह बात उसे यक़ीन नहीं आई। भैया सचमुच जेन को चाहते थे, इसमें उसे पहले जैसा कोई शक नहीं था। एलिज़ाबेथ हमेशा बिंगली को पसंद करना चाहती थी। पर उन्हें चालाक दोस्तों की कठपुतली बना देने वाला, और उनकी ख़ुशी उन्हीं की सनक पर छोड़ देने वाला वह नरम स्वभाव और कमज़ोर इरादा सोचकर उसे ग़ुस्सा आता। नहीं, उसे लगभग हिक़ारत ही महसूस होती। अगर इसमें सिर्फ़ बिंगली की अपनी ख़ुशी दाँव पर होती, तो उन्हें भले जैसे चाहे खिलौना बनाने देती। पर बहन की ख़ुशी भी इसमें जुड़ी थी। बिंगली को भी यह बात ज़रूर पता होगी। यह ऐसा मसला था जिसे सोचने का कोई फ़ायदा नहीं था, फिर भी सोचते रहना पड़ता। एलिज़ाबेथ कुछ और सोच ही नहीं पाती। बिंगली का प्यार सचमुच ठंडा पड़ गया है, या दोस्तों के दख़ल से दब गया है, वे जेन का दिल जानते थे या कभी भाँप ही नहीं पाए — जवाब जो भी हो, उसकी नज़र में बिंगली की छवि बहुत बदल जाती। पर बहन की हालत हर सूरत में एक जैसी ही थी, और उसके मन का चैन भी उतना ही चोटिल।
जेन को एलिज़ाबेथ से अपने दिल की बात कहने का हौसला जुटाने में एक-दो दिन लग गए। आख़िर एक दिन, श्रीमती बेनेट नेदरफ़ील्ड और उसके मालिक को लेकर हमेशा से ज़्यादा देर तक कुरेदती रहीं। फिर वे दोनों को अकेला छोड़कर बाहर चली गईं, तो जेन ख़ुद को रोक न सकी और बोली। 'आह, काश माँ थोड़ा और सब्र रख पातीं! उनकी बात लगातार करते हुए उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं कि मुझे कितना दुख होता है। फिर भी मैं शिकायत नहीं करूँगी। ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। मैं उन्हें भूल जाऊँगी, और हम सब पहले जैसे हो जाएँगे।' एलिज़ाबेथ ने अविश्वास और फ़िक्र भरी नज़रों से बहन को देखा। पर कुछ न बोली। 'तुझे मेरी बात का यक़ीन नहीं आ रहा,' जेन ने चेहरा हल्का-सा लाल करते हुए कहा। 'सच में इसकी कोई वजह नहीं है। शायद वे मेरी याद में सबसे भले इंसान बनकर रह जाएँ, बस इतना ही। अब न कुछ चाहने को है, न कुछ डरने को। उन्हें दोष देने की भी कोई बात नहीं। ईश्वर का शुक्र है कि इतनी तकलीफ़ तो नहीं है। तो बस थोड़ा वक़्त गुज़रने दे, मैं ज़रूर ख़ुद को सँभालने की कोशिश करूँगी...' जेन ने जल्दी ही ज़रा मज़बूत आवाज़ में जोड़ा। 'एक बात अभी भी तसल्ली देती है। यह बस मेरी अपनी ग़लत कल्पना थी, और मेरे सिवा किसी और को इससे कोई नुक़सान नहीं हुआ।' 'प्यारी जेन,' एलिज़ाबेथ बोल पड़ी। 'तू बहुत भली है। तेरी वह नरमी और बेग़रज़ दिल सचमुच किसी फ़रिश्ते जैसा है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ। मैंने अब तक तुझे ठीक से पहचाना ही नहीं। शायद तू जितने प्यार की हक़दार है, उतना मैंने तुझे कभी दिया ही नहीं।' मिस बेनेट ने फ़ौरन यह मान लेने से इनकार कर दिया कि उसमें कोई ख़ास गुण है। उसने यह तारीफ़ बहन के गर्मजोश प्यार पर टाल दी।
'नहीं,' एलिज़ाबेथ बोली। 'यह ग़लत बात है। तू दुनिया के हर इंसान को भला समझना चाहती है। मैं किसी की बुराई करूँ तो तुझे बुरा लगता है। मैं तो बस तुझे ही मुकम्मल समझना चाहती हूँ, और तू उसमें रोड़ा अटकाती है। मेरे हद से बाहर जाने की फ़िक्र मत कर, और अपना वह हुनर छिन जाने की भी फ़िक्र मत कर जिससे तू सबमें भलाई देख लेती है। ऐसा कभी नहीं होगा। जिन्हें मैं दिल से चाहती हूँ, वे गिनती के हैं। जिन्हें अच्छा समझती हूँ, वे उससे भी कम। दुनिया जितनी ज़्यादा देखती हूँ, उतना ही कम भाती है। रोज़ यह यक़ीन बढ़ता जाता है कि लोगों का स्वभाव कितना उलझा हुआ है, और ऊपर से दिखने वाली नेकी या समझ पर भरोसा करना कितना मुश्किल है। हाल ही में मुझे दो बातों से यह समझ आया। एक के बारे में नहीं बताऊँगी। दूसरी है शार्लट की शादी। इसे किसी भी तरह समझाया नहीं जा सकता! किसी भी नज़रिए से इसमें कोई तुक नहीं बैठता!' 'प्यारी लिज़ी, ऐसी सोच में मत डूब। इससे तेरी ख़ुशी बिगड़ेगी। तू यह पूरी तरह नहीं सोच रही कि हालात और स्वभाव कितने अलग-अलग होते हैं। ज़रा सोच, मिस्टर कॉलिन्स की इज़्ज़त होती है, और शार्लट का स्वभाव कितना सोच-समझकर, शांत रहने वाला है। यह भी याद कर कि शार्लट के भाई-बहन बहुत हैं। और यह भी सोच कि माल-असबाब के लिहाज़ से इससे बेहतर रिश्ता मिलना मुश्किल था। हम सबकी ख़ातिर भी यह मान लेना चाहिए कि शार्लट को अपने चचेरे भाई के लिए कुछ हद तक लगाव और इज़्ज़त महसूस हो सकती है।' 'तेरी ख़ातिर मैं लगभग कुछ भी मानने की कोशिश करूँगी। पर इस तरह मान लेने से किसी और का कुछ भला नहीं होगा। अगर मुझे यक़ीन हो जाए कि शार्लट को उस आदमी से ज़रा भी लगाव है, तो अभी बस उसके दिल को बुरा समझती हूँ। पर तब शार्लट की समझ को और भी बुरा समझने लगूँगी। प्यारी जेन, मिस्टर कॉलिन्स घमंडी और दिखावटी हैं। तंगदिल और बेवक़ूफ़ आदमी हैं। तुझे भी यह उतना ही पता है जितना मुझे। ऐसे आदमी से शादी करने वाली औरत ठीक से सोच नहीं सकती, यह भी तुझे मेरे जितना ही महसूस होगा। शार्लट लुकास को भी बचाकर नहीं रखा जा सकता। एक इंसान की ख़ातिर उसूल और सच्चाई जैसे लफ़्ज़ों का मतलब नहीं बदला जा सकता। न ख़ुद को, न मुझे यह मनाने की कोशिश करनी चाहिए कि ख़ुदग़रज़ी को समझदारी कहा जाए, या ख़तरा न दिखने वाली बेहिसी को ख़ुशी की गारंटी कहा जाए।' जेन ने जवाब दिया। 'दोनों के बारे में ऐसा कहना बहुत ज़्यादा है। मुझे उम्मीद है कि दोनों को साथ ख़ुशी से रहते देखकर तुझे भी यह समझ आएगा। पर यह बात यहीं छोड़ते हैं। तूने एक और बात का भी इशारा किया था। तूने कहा था दो बातें हैं। तेरा मतलब मुझसे छिपा नहीं है। पर प्यारी लिज़ी, यह कहकर मुझे मत दुखा कि उनमें कोई ख़ामी है या तू उन्हें छोटा समझती है। यह मान लेना बहुत आसान है कि किसी ने जान-बूझकर हमें दुख पहुँचाया। किसी जोशीले जवान से हमेशा सोच-समझकर, फूँक-फूँककर चलने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए। हमें अक्सर धोखा हमारी अपनी घमंड ही देती है। औरतें मान लेती हैं कि किसी मर्द के पसंद करने की बात में असल से कहीं ज़्यादा मतलब छिपा है।' 'और मर्द औरतों से ऐसा सोचवाते भी हैं।' 'अगर जान-बूझकर ऐसा करते हैं, तो कोई सफ़ाई नहीं चलेगी। पर मुझे यक़ीन नहीं कि दुनिया में उतनी जान-बूझकर बनाई चालें होती हैं, जितनी लोग सोचते हैं।' 'मैं यह हरगिज़ नहीं कह रही कि मिस्टर बिंगली का बर्ताव कुछ भी सोचा-समझा था,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'पर बिना ग़लती करने की नीयत के, बिना किसी को दुखी करने की चाल चले भी, ग़लती हो सकती है। दुख भी हो सकता है। बस लापरवाही, दूसरे के दिल का ख़याल न रखना, और इरादे की कमी ही काफ़ी है।'
'तुझे लगता है कि इनमें से कोई एक बात उनमें है?' 'हाँ, आख़िरी बात। पर अगर मैं आगे बोलती रही, तो जिन लोगों की तू इज़्ज़त करती है उनके बारे में मेरी राय से तुझे बुरा लगेगा। अभी रुक सकती हूँ, तो रुकने दे।' 'तो तू अब भी यही मानती है कि वे अपनी बहनों के असर में हैं?' 'हाँ। और उनके दोस्त भी साथ मिलकर।' 'मुझे यक़ीन नहीं होता। वे उन पर असर डालना क्यों चाहेंगी? वे तो बस यही चाहती होंगी कि वे ख़ुश रहें। और अगर वे मुझसे प्यार करते हैं, तो किसी और औरत के साथ ख़ुश नहीं रह सकते।' 'तेरी शुरुआती सोच ही ग़लत है। वे भाई की ख़ुशी के अलावा और भी बहुत कुछ चाह सकती हैं। शायद वे चाहती हों कि उनकी दौलत और रुतबा और बढ़े। शायद वे चाहती हों कि वे किसी ऐसी लड़की से ब्याह करें जिसके पास धन, बढ़िया ख़ानदान और घमंड की हर हैसियत हो।' जेन ने जवाब दिया। 'यह तो तय है कि वे चाहती हैं कि भैया मिस डार्सी को चुनें। पर हो सकता है वे तेरी सोच से कहीं बेहतर नीयत से ऐसा चाहती हों। वे मुझसे कहीं ज़्यादा वक़्त से उस लड़की को जानती हैं, तो उन्हें उससे ज़्यादा लगाव हो, इसमें हैरानी की क्या बात। पर उनकी जो भी चाहत हो, उनके भैया की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाने की गुंजाइश बहुत कम है। जब तक कोई सचमुच बड़ी ख़ामी न हो, कौन बहन ख़ुद को इसका हक़ समझेगी? अगर उन्हें यक़ीन होता कि भैया मुझसे प्यार करते हैं, तो वे हमें अलग करने की कोशिश ही न करतीं। और अगर की भी होती, तो वे कामयाब भी न हो पातीं। ऐसा प्यार मानने का मतलब है यह मान लेना कि सबने कुछ अस्वाभाविक और ग़लत किया। और मैं ख़ुद को दुनिया की सबसे बदनसीब मान बैठूँगी। मुझे ऐसी सोच से मत सताना। मुझे अपनी ग़लत सोच पर शर्म नहीं आती। कम-से-कम वह शर्म उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं, जो उन्हें या उनकी बहनों को बुरा समझने से होता। मुझे सबसे भला सोचने दे। जितना समझा जा सके, उतना अच्छा।' एलिज़ाबेथ उस चाहत के आगे कुछ नहीं कह सकी। उसके बाद दोनों बहनों के बीच मिस्टर बिंगली का नाम शायद ही कभी आया।
श्रीमती बेनेट अब भी उनके न लौटने को अजीब मानकर रोना-धोना करती रहीं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रता जब एलिज़ाबेथ इसकी वजह साफ़ न बताती। फिर भी लगता नहीं था कि माँ को कभी यह बात कम अजीब लगेगी। बेटी अपनी माँ को ऐसी बात से समझाने की कोशिश करती जिस पर उसे ख़ुद भी यक़ीन नहीं था — कि मिस्टर बिंगली ने जेन में जो दिलचस्पी दिखाई, वह बस आम और पल भर की पसंद थी, और मिलना बंद होते ही मिट गई। माँ यह सुनते वक़्त मान भी लेतीं कि बात ठीक लगती है। पर रोज़ यही बात फिर से सुनानी पड़ती। श्रीमती बेनेट को सबसे बड़ी तसल्ली यही ख़याल देता था कि मिस्टर बिंगली गर्मियों में ज़रूर लौट आएँगे। मिस्टर बेनेट ने इस बात को अलग ही ढंग से लिया। एक दिन वे बोले। 'तो लिज़ी, लगता है तुम्हारी बहन का दिल टूट गया। उसे मेरी तरफ़ से मुबारकबाद देना। शादी के बाद लड़कियों को सबसे ज़्यादा पसंद यही आता है कि कभी-कभार दिल टूटे। इससे सोचने को कुछ मिलता है, और दोस्तों के बीच थोड़ी अलग-सी अहमियत भी मिल जाती है। तुम्हारी बारी कब आएगी? जेन से ज़्यादा दिन पिछड़े रहना तुम्हें रास नहीं आएगा। अभी मौक़ा है। मेरिटन में इतने अफ़सर हैं कि इस इलाक़े की सारी लड़कियों को निराश करने के लिए काफ़ी हैं। विकहम को अपना आदमी बना लो। ख़ुशमिज़ाज साथी है, इज़्ज़त बचाकर ही तुम्हें छोड़ेगा।' 'शुक्रिया, पिताजी। पर मुझे इससे कम ख़ुशमिज़ाज आदमी से भी संतोष हो जाएगा। हम सब जेन जितने ख़ुशक़िस्मत हों, यह उम्मीद तो नहीं रखी जा सकती।' 'सच बात है,' मिस्टर बेनेट ने कहा। 'पर तुम पर चाहे जो बीते, यह सोचकर तसल्ली मिलती है कि तुम्हारी एक प्यारी माँ है जो उस बात को जितना हो सके उतना बड़ा बनाकर फैलाएगी।'
मिस्टर विकहम के साथ उठना-बैठना हाल की तकलीफ़देह बातों से लॉन्गबर्न के कई घरवालों पर छाई उदासी को दूर करने में काफ़ी मददगार रहा। उनसे अक्सर मुलाक़ात होती। उनके पहले वाले तमाम गुणों के साथ अब एक और गुण जुड़ गया था — अब वे कुछ भी नहीं छिपाते थे। एलिज़ाबेथ जो कुछ पहले ही सुन चुकी थी, मिस्टर डार्सी से हक़ माँगने की बात, उससे मिली तकलीफ़, अब यह सब खुलकर मान लिया गया था। लोगों के बीच भी इस पर खुलकर बातें होने लगीं। सबको यह सोचकर बड़ा सुकून मिलता कि पूरी बात जानने से पहले ही उन्हें मिस्टर डार्सी इतने नापसंद क्यों थे। बस मिस बेनेट को ही लगता था कि शायद कोई ऐसी बात हो जो हर्टफ़र्डशायर के लोग नहीं जानते, जिससे मिस्टर डार्सी की ग़लती कुछ हल्की पड़ जाए। अपने नरम और हमेशा एक-सी निष्पक्ष तबीयत के चलते वह हमेशा यही कहती कि कुछ बातें माफ़ी लायक़ हो सकती हैं। ग़लतफ़हमी होने की गुंजाइश भी वह सामने रखती। पर बाक़ी सब मिस्टर डार्सी को दुनिया का सबसे बुरा इंसान मानकर फ़ैसला सुना चुके थे।