हिंदी संस्करण
अध्याय 34
सब चले जाने के बाद, एलिज़ाबेथ मानो जानबूझकर मिस्टर डार्सी के प्रति अपना ग़ुस्सा और बढ़ाने पर तुली थी। केंट आने के बाद से जेन ने उसे जो चिट्ठियाँ लिखी थीं, उन सबको वह फिर से पढ़ने में जुट गई। चिट्ठियों में कोई खुली शिकायत नहीं थी। न पुरानी बातें दोहराई गई थीं, न मौजूदा तकलीफ़ का कोई ज़िक्र था। पर लगभग हर चिट्ठी की हर पंक्ति में, जो चंचलता पहले जेन के लेखन में भरी रहती थी, वह ग़ायब थी। ख़ुद शांत रहने और सबके लिए मन में गर्मजोशी रखने से जो चंचलता आती है, वह पहले शायद ही कभी धुँधली पड़ती थी। एलिज़ाबेथ ने वे पंक्तियाँ एक-एक करके ग़ौर से पढ़ीं, जिन्हें पहली बार पढ़ते वक़्त उसने मामूली समझकर छोड़ दिया था। उनमें एक बेचैन मन झलक रहा था। मिस्टर डार्सी ने डींग मारते हुए कहा था कि वे कितनी बड़ी तबाही ला सकते थे — यह शर्मनाक बात याद आते ही जेन की तकलीफ़ और तीखी महसूस होने लगी। इस बात से थोड़ी तसल्ली मिली कि डार्सी का रोज़िंग्स प्रवास परसों ख़त्म हो रहा है। और इससे भी बड़ी तसल्ली इस ख़याल से मिली कि दो हफ़्ते बीतने से पहले वह फिर से जेन के पास लौट जाएगी, और मुहब्बत से जो कुछ भी हो सके, वह सब करके अपनी बहन का हौसला लौटा देगी। डार्सी के केंट छोड़ने का ख़याल आते ही, यह सोचे बिना नहीं रह पाई कि उनके चचेरे भाई भी साथ ही जा रहे हैं। पर कर्नल फ़िट्ज़विलियम ने साफ़ जता दिया था कि उनका कोई इरादा नहीं। वे कितने भी सुहावने क्यों न हों, उनकी वजह से दुखी होने का उसका कोई मन नहीं था। इन्हीं ख़यालों को सुलझाते हुए, अचानक दरवाज़े की घंटी बजी और उसकी तंद्रा टूटी। मन में हल्की-सी हलचल हुई कि शायद ख़ुद कर्नल फ़िट्ज़विलियम आए हों। वे पहले भी शाम ढले आ चुके थे, तो इस बार भी शायद ख़ास तौर पर उसकी तबीयत पूछने आए हों। पर यह ख़याल जल्दी ही टूट गया। हैरानी की बात, कमरे में मिस्टर डार्सी आए। उन्हें देखते ही मन बिल्कुल अलग ढंग से हिल गया। उन्होंने जल्दी से पहले तबीयत के बारे में पूछा। कहा कि हालत सुधरी है, यह सुनने की उम्मीद में आए हैं। एलिज़ाबेथ ने ठंडे पर शालीन लहज़े में जवाब दिया। डार्सी कुछ देर बैठे रहे, फिर उठकर कमरे में टहलने लगे। एलिज़ाबेथ हैरान थी, पर उसने एक शब्द भी नहीं कहा। कुछ मिनट की चुप्पी के बाद, वे बेहद बेचैन दिखते हुए पास आए और बोलने लगे।
'मैंने बेकार ही कोशिश की है। अब कोई फ़ायदा नहीं। मैं अपनी भावनाओं को दबा नहीं पा रहा। मुझे यह कहने की इजाज़त दीजिए कि मैं आपको कितनी शिद्दत से चाहता हूँ, कितना प्यार करता हूँ।' एलिज़ाबेथ की हैरानी शब्दों में बयान नहीं हो सकती थी। वह उन्हें एकटक देखती रही, फिर उसका चेहरा लाल हो गया। अपने कानों पर यक़ीन न करते हुए वह चुप रही। डार्सी ने इसे काफ़ी बढ़ावा मान लिया। उन्होंने उसके सामने अभी जो महसूस कर रहे थे और बरसों से जो महसूस करते आए थे, दोनों तुरंत कह डाला। बोलने का ढंग बढ़िया था। पर मुहब्बत के अलावा भी कुछ भावनाएँ थीं, जिन्हें विस्तार से बताना ज़रूरी लगा। वे जितनी बेझिझक कोमलता की बात करते, उतनी ही बेझिझक अपने घमंड की भी बात करते। एलिज़ाबेथ की नीची हैसियत, उससे ब्याह करने पर अपनी हैसियत गिरने का ख़याल, और अक्ल से जिन बातों से हमेशा जूझते रहे — उसके परिवार की दिक़्क़तें — यह सब उन्होंने लंबे-चौड़े ढंग से बताया। यह जोशीला अंदाज़ उस हैसियत के मुताबिक़ ही था, जिसे वे ख़ुद ठेस लगी मानते थे। पर उससे प्रस्ताव क़बूल करवाने में मुश्किल ही मदद मिलती। एलिज़ाबेथ डार्सी को गहरे से नापसंद करती थी। फिर भी ऐसे आदमी के प्यार से मिलने वाली तारीफ़ के आगे बिल्कुल बेअसर नहीं रह सकती थी। उसका इरादा एक पल को भी नहीं डगमगाया। पहले तो उसे उनकी होने वाली तकलीफ़ पर तरस आया। पर उनकी अगली बातों से ग़ुस्सा भड़का, तो सारी दया ग़ायब हो गई। फिर भी उसने मन को थामा, ताकि वे बात ख़त्म करें तो सब्र से जवाब दे सके। डार्सी ने बताया कि तमाम कोशिशों के बावजूद जिस मुहब्बत पर वे क़ाबू नहीं पा सके, वह कितनी गहरी है। आख़िर में यह कहकर बात ख़त्म की कि अब वे चाहते हैं कि वह उनका हाथ थामकर उस मुहब्बत का जवाब दे। यह समझना आसान था कि उन्हें अच्छे जवाब पर रत्ती भर भी शक नहीं। शब्दों में डर और बेचैनी की बात कही, पर चेहरे पर साफ़ भरोसा झलक रहा था। यह देखकर एलिज़ाबेथ का ग़ुस्सा और भड़क उठा। डार्सी चुप हुए, तो गालों पर लाली लिए वह बोली।
'ऐसे मौक़ों पर मुझे मालूम है कि जिस दिल की बात सुनी हो, उसका वैसा ही जवाब न दे सकें, तब भी आभार जताना तय शिष्टाचार माना जाता है। आभार महसूस करना लाज़िमी भी होगा। अगर मैं आभार जता पाती, तो अभी शुक्रिया कहती। पर मैं ऐसा नहीं कर सकती। मैंने कभी आपकी मेहरबानी नहीं चाही। आपने भी उसे बड़े नाख़ुश मन से ही दी होगी, यह साफ़ है। किसी को भी तकलीफ़ देने का मुझे अफ़सोस है। पर मैंने यह जाने-बूझे बिना ही किया। उम्मीद है वह तकलीफ़ भी ज़्यादा दिन नहीं टिकेगी। जिस भावना ने आपको इतने लंबे समय तक मेरे लिए अपने मन की बात मानने से रोका, वह भावना इस स्पष्टीकरण के बाद उस पर क़ाबू पाना भी मुश्किल नहीं समझेगी।' चिमनी की चौखट पर टिककर उसका चेहरा देख रहे मिस्टर डार्सी यह बात हैरानी के साथ-साथ ग़ुस्से में भी सुनते जान पड़े। ग़ुस्से से उनका चेहरा फीका पड़ गया। मन की हलचल उनके चेहरे के एक-एक भाव से झलक रही थी। वे संयम पाने की कोशिश करते रहे। और तभी बोले, जब उन्हें लगा कि कोशिश कामयाब हो गई है। वह चुप्पी एलिज़ाबेथ के लिए झेलनी मुश्किल थी। आख़िर में उन्होंने ज़बरदस्ती शांत बनाई आवाज़ में कहा। 'मुझे मिलने वाला जवाब बस इतना ही है! शायद मैं यह पूछ भी सकता हूँ कि आपने मुझे इस क़दर बिना किसी शिष्टाचार की कोशिश के ठुकराने की वजह क्या है। पर यह कोई बड़ी बात नहीं।' 'तो मैं भी यही सवाल पूछ सकती हूँ,' उसने जवाब दिया। 'मुझे अपमानित और नाराज़ करने का इरादा इतनी साफ़ तरह दिखाते हुए, आपने अपनी मर्ज़ी, अपनी अक्ल, यहाँ तक कि अपने स्वभाव के ख़िलाफ़ जाकर मुझे पसंद करने की बात क्यों कहनी तय की? अगर मैं बदतमीज़ी से पेश आई, तो क्या यह बात मेरी बदतमीज़ी को थोड़ा जायज़ नहीं ठहराती? पर मेरे पास ग़ुस्सा होने की और भी वजहें हैं। आप ख़ुद जानते हैं। मैं अगर आपको नापसंद करने पर मन बना भी न पाती, कोई भावना न होती या शायद पसंद ही होती, तब भी क्या ऐसी कोई वजह है जो मुझे उस आदमी को क़बूल करने पर राज़ी कर सके, जिसने मेरी सबसे प्यारी बहन की ख़ुशी शायद हमेशा के लिए बरबाद कर दी?' यह सुनते ही मिस्टर डार्सी का चेहरा बदल गया। पर वह हलचल बस पल भर की थी। वे एलिज़ाबेथ के बोलते रहने के दौरान बिना टोके सुनते रहे। 'मुझे आपके बारे में बुरा सोचने की वजहें दुनिया भर में मिल सकती हैं। उस मामले में आपने जो नाइंसाफ़ी और तंगदिली दिखाई, वह किसी भी वजह से माफ़ नहीं हो सकती। आप यह मानने की हिम्मत नहीं करेंगे। नहीं, आप इसे नकार ही नहीं सकते। दोनों को अलग करने की सबसे बड़ी वजह, अगर इकलौती वजह न भी हों, तब भी आप ही हैं। एक को दुनिया ने चंचल और बेवफ़ा होने का इल्ज़ाम झेलने पर मजबूर किया। दूसरे को उम्मीद टूटने का मज़ाक़ झेलना पड़ा। दोनों को सबसे बुरी तकलीफ़ में डाल दिया।' एलिज़ाबेथ रुक गई। डार्सी को ज़रा भी पछतावे के बिना यह सब सुनते देखकर उसे बेहद ग़ुस्सा आया। वे जानबूझकर अविश्वास जताती-सी मुस्कान लिए उसे देखते रहे। 'क्या आप यह मानने से इनकार कर सकते हैं कि आपने यह किया?' उसने फिर पूछा। उन्होंने बनावटी शांति से जवाब दिया, 'मैं यह मानने से इनकार नहीं करता कि मैंने अपने दोस्त और आपकी बहन को अलग करने के लिए जो कुछ कर सकता था, वह सब किया, और इसमें कामयाब होने की ख़ुशी भी है। उनके लिए मैंने ख़ुद अपने प्रति भी उतनी भलाई नहीं दिखाई, जितनी उनके प्रति दिखाई।' एलिज़ाबेथ उस शालीन बात पर ग़ौर करने का भाव तक नहीं दिखाना चाहती थी। पर उसका मतलब उससे छूटा नहीं। इससे उसका मन नरम पड़ने का तो सवाल ही नहीं था।
'पर मुझे आपसे नफ़रत होने की वजह बस यही एक बात नहीं है,' वह बोलती रही। 'यह सब होने से बहुत पहले ही आपके बारे में मेरी राय बन चुकी थी। कई महीने पहले मिस्टर विकहम से सुनी बात में आपका असली स्वभाव सामने आ गया था। इस मामले में आप क्या कह सकते हैं? इस बार किस गढ़ी हुई दोस्ती की कहानी से अपना बचाव करेंगे, किस झूठ से लोगों को बहलाएँगे?' 'उस साहब के मामले में आप बड़ी शिद्दत से दिलचस्पी दिखा रही हैं,' डार्सी ने पहले से कम शांत आवाज़ में कहा। उनके चेहरे पर लालिमा और गहरी हो गई। 'जो कोई भी उनकी तकलीफ़ जानता हो, वह दिलचस्पी न दिखाए, यह कैसे मुमकिन है?' 'उनकी तकलीफ़!' डार्सी ने हिक़ारत से दोहराया। 'हाँ, सचमुच बड़ी तकलीफ़ झेली है उन्होंने।' 'वह तकलीफ़ आपकी ही दी हुई है,' एलिज़ाबेथ ज़ोर से चिल्लाई। 'आपने उन्हें आज की ग़रीब हालत में, या सही कहूँ तो दूसरों के मुक़ाबले ग़रीब हालत में धकेल दिया। उनके लिए जो फ़ायदा साफ़ तौर पर तय था, वह आपने नहीं दिया। जिस आज़ाद ज़िंदगी के वे हक़दार थे और जिसके लायक़ थे, वह उनकी जवानी के सबसे अच्छे बरसों में उनसे छीन ली। यह सब करके भी आप उनकी तकलीफ़ को हिक़ारत और मज़ाक़ के लहज़े में बता सकते हैं।' 'यही है,' डार्सी तेज़ क़दमों से कमरा पार करते हुए चिल्लाए, 'आपकी नज़र में मेरी तस्वीर! यही है मुझ पर आपका फ़ैसला! इतने विस्तार से बताने का शुक्रिया। इस हिसाब से तो मेरा क़सूर सचमुच बहुत भारी है! पर शायद,' वे रुककर उसकी तरफ़ मुड़े और जोड़ा, 'अगर मैंने साफ़ कहकर आपकी नीची हैसियत की वजह से अपने गंभीर फ़ैसले में लंबे समय झिझकने की बात कहकर आपकी अना को ठेस न पहुँचाई होती, तो शायद आप यह गुनाह नज़रअंदाज़ कर देतीं। कुछ ज़्यादा चालाकी से अपने मन की बात छुपाई होती, तो। बिना किसी शर्त, बिना कोई खोट के, बस अक्ल और सोच-विचार से उपजी शुद्ध मुहब्बत ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया — ऐसा यक़ीन दिलाकर, आपको ख़ुश करते हुए बात कहता, तो शायद यह कड़वी फटकार भी आप बर्दाश्त कर लेतीं। पर मुझे किसी भी बनावट से नफ़रत है। जो भावना मैंने बताई, उस पर मुझे शर्म नहीं। वह एक स्वाभाविक और वाजिब भावना थी। क्या मुझसे उम्मीद थी कि मैं आपके रिश्तेदारों की नीची हैसियत पर ख़ुश होऊँ? मुझसे साफ़ तौर पर नीची सामाजिक हैसियत वाले लोगों को रिश्तेदार बनाने की उम्मीद पर ख़ुद को बधाई दूँगा, ऐसा सोचा था?'
एलिज़ाबेथ का ग़ुस्सा पल-पल बढ़ता जा रहा था। फिर भी वह जितना हो सके, शांत लहज़े में बोलने की कोशिश करती रही। 'मिस्टर डार्सी, आपने जिस ढंग से प्रस्ताव रखा, उससे अगर मुझे कुछ महसूस हुआ है, तो बस यही — कि अगर आप कुछ और शालीनता से पेश आते, तो शायद ठुकराते वक़्त जो अफ़सोस होता, वह इस ढंग ने कम कर दिया। इसके अलावा इसका कोई और असर हुआ है, ऐसा सोचें तो आप ग़लत समझ रहे हैं।' उन्हें एक पल के लिए चौंकते देखा जा सकता था। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, और एलिज़ाबेथ आगे बोलती रही। 'आप चाहे किसी भी ढंग से प्रस्ताव रखते, मुझे उसे स्वीकार करने पर राज़ी नहीं कर सकते थे।' वे फिर से खुलकर चौंक गए। अविश्वास और अपमान से मिले-जुले भाव लिए उसे देखते रहे। एलिज़ाबेथ बोलती रही। 'शुरू से ही, लगभग पहली मुलाक़ात के पल से ही, आपके बरताव ने मेरे मन में यह पक्का यक़ीन बिठा दिया कि आप घमंडी हैं, अपने आप में मगन हैं, और दूसरों की भावनाओं को स्वार्थवश तुच्छ समझते हैं। यही यक़ीन मेरी नापसंदगी की नींव बना, और बाद में जो कुछ हुआ, उसने उसी नींव पर एक न हिलने वाली घृणा खड़ी कर दी। आपको जाने एक महीना भी नहीं बीता था कि मुझे लगने लगा था — दुनिया में जितने भी मर्द मुझे ब्याह के लिए राज़ी कर सकते हैं, उनमें आप आख़िरी शख़्स हैं।' 'आपने काफ़ी कुछ कह दिया, महोदया। मैं आपकी भावनाएँ पूरी तरह समझ गया। अब मुझे बस उन भावनाओं पर शर्मिंदा होना बाक़ी है, जो मैंने पाल रखी थीं। इतना वक़्त लेने के लिए माफ़ी दीजिए, और आपकी सेहत और ख़ुशी की दिल से दुआ के साथ यह विदाई क़बूल कीजिए।'
यह कहकर डार्सी जल्दी से कमरे से बाहर चले गए। अगले ही पल दरवाज़ा खुलने और घर से निकल जाने की आवाज़ सुनाई दी। एलिज़ाबेथ का मन अब तकलीफ़देह हद तक हिल चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था, ख़ुद को कैसे थामे। सच में हिम्मत टूट गई, और वह बैठकर तीस मिनट तक रोती रही। अभी-अभी जो हुआ, उसे याद करते हर बार हैरानी और बढ़ जाती। मिस्टर डार्सी का प्रस्ताव! वे कई महीनों से उससे मुहब्बत करते आ रहे थे! अपने दोस्त को उसकी बहन से ब्याह करने से रोका, और अपने ही मामले में कम-से-कम उतनी ही बड़ी रुकावटें होते हुए भी इतनी गहरी मुहब्बत की कि ब्याह करना चाहते थे! यक़ीन करना लगभग नामुमकिन था। अनजाने में इतनी गहरी मुहब्बत जगा देना — यह बात सुकून देने वाली थी। पर फिर उनका घमंड याद आया, वह घिनौना घमंड। जेन के साथ जो किया, उसे बिना किसी शर्म के क़बूल किया था। जिसे जायज़ भी नहीं ठहराया जा सकता, उसे बेझिझक मानने की वह न माफ़ी लायक़ बेशर्मी भी याद आई। मिस्टर विकहम के बारे में जिस बेरहमी से बात की, वह भी याद आई। उन्होंने उनके साथ क्रूरता से पेश आने की बात नकारने की कोशिश तक नहीं की। इससे उनकी मुहब्बत के ख़याल से पल भर को जो तरस उमड़ा था, वह भी जल्दी ग़ायब हो गया। एलिज़ाबेथ बुरी तरह हिली हुई हालत में सोच में डूबी रही। आख़िरकार लेडी कैथरीन की गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी। शार्लट की नज़रों का सामना करने की हालत में न होने का एहसास होते ही, वह जल्दी से अपने कमरे में जा छिपी।