हिंदी संस्करण

अध्याय 40

जेन को क्या हुआ, यह बताने की चाह एलिज़ाबेथ अब और नहीं दबा पाई। आख़िर उसने तय किया कि बहन से जुड़ी हर बारीक बात पूरी तरह छुपा लेगी। फिर बहन को बड़े झटके के लिए तैयार करके, अगली सुबह उसने मिस्टर डार्सी और अपने बीच जो कुछ हुआ था, उसका मुख्य हिस्सा सुना दिया। मिस बेनेट को बहुत हैरानी हुई। पर जल्दी ही गहरी बहन-प्रेम ने उस हैरानी को नरम कर दिया — ऐसा प्यार, जिसे एलिज़ाबेथ से जुड़ी कोई भी बात बिल्कुल सहज लगती। कुछ ही देर में हैरानी की जगह पूरी तरह दूसरी भावना ने ले ली। मिस्टर डार्सी ने अपने दिल की बात जिस ढंग से कही, वह तरीक़ा अफ़सोसनाक था — इस बात का उसे दुख हुआ। पर बहन के इनकार से उन्हें जो पीड़ा पहुँची होगी, उसका दर्द उसे कहीं ज़्यादा सताया। 'सफल होने का इतना यक़ीन रखना ही उनकी ग़लती थी,' जेन ने कहा। 'और यह यक़ीन जताना भी नहीं चाहिए था। सोचो, इससे उन्हें कितनी बड़ी मायूसी हुई होगी।' 'सच कहूँ,' एलिज़ाबेथ ने जवाब दिया, 'मुझे भी उनके लिए दिल से अफ़सोस है। पर मेरी तरफ़ जो भावना है, उसे जल्दी ही कोई और भावना शायद हटा दे। तुम मुझे मेरे इनकार के लिए दोष तो नहीं दे रही न?' 'तुम्हें दोष दूँ! अरे, हरगिज़ नहीं।' 'पर विकहम की बात इतनी तीखी तरह से कहना, यह तो मुझे दोष देना ही था न?' 'नहीं। तुमने वह बात कही, यह ग़लत था या नहीं, मुझे यह पता नहीं।' 'ठीक अगले दिन क्या हुआ, यह सुनोगी तो ख़ुद समझ जाओगी।'

एलिज़ाबेथ ने चिट्ठी की बात छेड़ी, और जॉर्ज विकहम से जुड़ी हर बात दोहरा दी। बेचारी जेन के लिए यह कितना बड़ा झटका रहा होगा! जेन ऐसी थी जो यक़ीन ही नहीं करना चाहती थी कि दुनिया के किसी भी इंसान में इतनी बड़ी बुराई हो सकती है। डार्सी की बेगुनाही सामने आना उसे सुकून देता था। पर यह जानकर जो दुख हुआ, उसे यह सुकून मिटा नहीं सका। जेन किसी तरह यह मानने की गुंजाइश ढूँढ़ने लगी कि यह सब कोई ग़लतफ़हमी ही हो — एक की ग़लती में दूसरे को घसीटे बिना, दोनों में से कम-से-कम एक को तो बेक़सूर साबित कर सके। 'ऐसा नहीं हो सकता,' एलिज़ाबेथ ने कहा। 'दोनों को कभी भी अच्छा साबित नहीं किया जा सकता। किसी एक को चुनना ही होगा। दोनों को मिला भी दें, तो सिर्फ़ इतनी ही अच्छाई निकलेगी जितनी एक भले आदमी में होती है — इसलिए एक ही आदमी से संतोष करना होगा। आजकल यह अच्छाई दोनों के बीच काफ़ी इधर-उधर घूमती रही। मैं तो मानती हूँ, यह पूरी अच्छाई मिस्टर डार्सी के हिस्से की है। फिर भी तुम्हारी जो मर्ज़ी हो, वही सही।' फिर भी जेन को दोबारा हँसाने में थोड़ा वक़्त लगा। 'इससे ज़्यादा झटका मुझे कब लगा था, याद नहीं आता,' जेन ने कहा। 'विकहम इतना बुरा निकला! यक़ीन करना मुश्किल है। और बेचारे मिस्टर डार्सी! प्यारी लिज़ी, ज़रा सोचो उन्हें कितनी पीड़ा हुई होगी। इतनी बड़ी निराशा झेलना, ऊपर से यह जान जाना कि तुम उन्हें बुरा समझती हो! और अपनी बहन की वह बात भी बतानी पड़ी! सचमुच बड़ा तकलीफ़देह है। तुम्हें भी ज़रूर ऐसा ही लगता होगा।' 'अरे, नहीं। तुम्हारे मन में इतना पछतावा और तरस भरा देखकर तो मेरा सारा दर्द उड़ गया। तुम उनके साथ इतनी भरपूर इंसाफ़ से पेश आओगी कि मैं दिन-ब-दिन और बेपरवाह और उदासीन होती जाऊँगी। तुम इतना उड़ा दोगी, तो मुझे बचाना ही पड़ेगा। तुम बस थोड़ा और उनके लिए दुखी हो लो, मेरा दिल पंख जितना हल्का हो जाएगा।' 'बेचारे विकहम! चेहरे पर तो कितना भला भाव झलकता है! और तौर-तरीक़ा भी कितना सीधा और नरम है।' 'उन दोनों जवानों की परवरिश में ज़रूर कहीं बड़ी चूक हुई होगी। एक को पूरी अच्छाई मिली, और दूसरे को अच्छे दिखने का पूरा दिखावा।' 'मुझे तो कभी नहीं लगा कि मिस्टर डार्सी उतने अच्छे नहीं दिखते, जितना तुमने पहले कहा था।' 'फिर भी मैं बिना किसी वजह उनसे डटकर नफ़रत करती रही, और ख़ुद को बड़ा चतुर साबित करना चाहती थी। ऐसी नफ़रत नोक-झोंक को कितनी अच्छी हवा देती है, यह तो सोचो। तीखी बात कहने का कितना अच्छा मौक़ा मिलता है! एक भी सही बात कहे बिना लगातार बुराई की जा सकती है। फिर भी किसी एक आदमी का लगातार मज़ाक़ उड़ाओ, तो कभी-कभी कोई नुकीली बात यूँ ही हाथ लग जाती है।'

'लिज़ी, वह चिट्ठी जब पहली बार पढ़ी थी, तब तो यह बात इतनी हल्की तरह से नहीं ले पाई होगी, जैसे अभी लगती है।' 'सच में नहीं ले पाई थी। दिल बहुत बेचैन था। बहुत बेचैन — इतना कि उसे दुखी कहना ग़लत नहीं होगा। पर अपना मन कहने के लिए कोई नहीं था। न ही जेन थी, जो कहती कि मैं उतनी कमज़ोर, घमंडी और बेतुकी नहीं, जितना मैं ख़ुद को जानती थी! उफ़, तुम्हारी कितनी याद आई!' 'विकहम को लेकर मिस्टर डार्सी से इतनी सख़्त बात कहना सचमुच अफ़सोस की बात है। अब तो वह बिल्कुल बेबुनियाद लगती है।' 'बिल्कुल सही। पर वह कड़वी बात मुँह से निकलना, मेरे पाले हुए पूर्वाग्रह का बिल्कुल स्वाभाविक नतीजा था। तुमसे एक बात पर सलाह चाहिए। हमारे जान-पहचान के हर किसी को विकहम का असली स्वभाव बताना चाहिए या नहीं? बताओ।' मिस बेनेट कुछ देर चुप रही, फिर बोली। 'उन्हें इतनी बुरी तरह बेनक़ाब करने की कोई वजह है भला? तुम क्या सोचती हो?' 'मुझे लगता है नहीं करना चाहिए। मिस्टर डार्सी ने ख़ुद जो बताया, उसे उजागर करने की इजाज़त नहीं दी। बल्कि उनकी बहन से जुड़ी हर बात जितना हो सके, बस मुझ तक ही सीमित रहे, यही उनकी चाह थी। बाक़ी बर्ताव को लेकर लोगों की ग़लतफ़हमी दूर करने की कोशिश भी करूँ, तो मेरी बात कौन मानेगा? मिस्टर डार्सी के ख़िलाफ़ लोगों का पूर्वाग्रह बहुत गहरा है। उन्हें पसंद किए जाने लायक़ दिखाने की कोशिश करूँ, तो मेरिटन के आधे भले लोग सदमे से मर जाएँगे। यह मेरे बस की बात नहीं। विकहम जल्दी ही चले जाएँगे, तो यहाँ के लोगों के लिए यह मायने नहीं रखेगा कि वे असल में कैसे हैं। वक़्त के साथ सब सामने आ जाएगा। तब लोग अपनी नादानी पर ख़ुद हँस सकेंगे कि पहले क्यों नहीं पहचान पाए। फ़िलहाल मैं कुछ नहीं कहूँगी।' 'तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। ग़लती दुनिया को बता देने से वे हमेशा के लिए बर्बाद भी हो सकते हैं। शायद अभी वे अपने किए पर पछता भी रहे हों, और अपनी साख फिर से बनाना चाहते हों। उन्हें निराश करके तोड़ना ठीक नहीं।' इस बातचीत से एलिज़ाबेथ के मन की हलचल थम गई। दो हफ़्तों से मन पर दबे दो राज़ उसने उतार दिए। और अब भरोसा हो गया कि इनमें से किसी भी बात को दोबारा छेड़े, तो जेन ख़ुशी-ख़ुशी सुनेगी। पर एक बात अब भी बाक़ी थी, जो सावधानी की वजह से कही नहीं जा सकती थी। मिस्टर डार्सी की चिट्ठी का बाक़ी आधा हिस्सा वह बताने की हिम्मत नहीं कर पाई। यह भी नहीं बता पाई कि उनके दोस्त का प्यार बहन के लिए कितना सच्चा था। यह ऐसा राज़ था, जो किसी के साथ बाँटा नहीं जा सकता था। जब तक दोनों के बीच पूरी समझ न बन जाए, तब तक आख़िरी राज़ का यह बोझ भी उतारा नहीं जा सकता — यह उसे पता था। 'और,' उसने मन में सोचा, 'यह जो बात होने की गुंजाइश बहुत कम है, अगर सचमुच हो भी जाए, तो मैं बस वही दोहराऊँगी जो बिंगली ख़ुद कहीं ज़्यादा अच्छे ढंग से बता देंगे। जब मुझे बताने की आज़ादी मिलेगी, तब तक यह बात बेकार हो चुकी होगी!'

अब घर लौटकर टिक गई, तो बहन का मन असल में कैसा है, यह परखने की फ़ुरसत मिली। जेन ख़ुश नहीं थी। बिंगली के लिए वह बेहद कोमल प्यार अब भी दिल में लिए थी। इससे पहले उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वह प्यार में पड़ चुकी है। इसलिए उसके मन में पहले प्यार की पूरी तपिश समाई हुई थी। उम्र और स्वभाव की वजह से यह प्यार, पहले प्यार जिस बात पर अक्सर फ़ख़्र करता है, उससे कहीं ज़्यादा टिकाऊ भी था। जेन बिंगली की याद को दिल में गर्मजोशी से सँजोए रखती। बाक़ी हर आदमी से ज़्यादा उन्हें ख़ास मानती। इसलिए ऐसे दुख में पूरी तरह डूबने से बचने के लिए, जो सेहत और परिवार के चैन दोनों को बिगाड़ ही देता, जेन को अपनी पूरी समझ और परिवार की परवाह करने वाला हर गुण काम में लाना पड़ रहा था।

एक दिन श्रीमती बेनेट ने कहा। 'हाँ, लिज़ी। जेन की इस दुखद बात के बारे में अब तुम क्या सोचती हो? मैंने तो ठान लिया है, अब किसी से भी इसका ज़िक्र नहीं करूँगी। कुछ दिन पहले श्रीमती फ़िलिप्स से भी यही कहा था। पर जेन ने लंदन में उस आदमी से ज़रा भी मुलाक़ात की, ऐसी कोई ख़बर नहीं सुनी। सच कहूँ तो वह बहुत ही घटिया जवान है। अब तो लगता है, जेन को उसे पाने की उम्मीद दुनिया में ज़रा भी नहीं बची। गर्मियों में नेदरफ़ील्ड लौटने की भी कोई बात नहीं सुनी। जान-पहचान वाले हर किसी से मैंने पूछ लिया, फिर भी कुछ पता नहीं।' 'लगता तो नहीं कि वे दोबारा नेदरफ़ील्ड में रहने आएँगे।' 'अरे, चलो ठीक है! अपनी मर्ज़ी करे। किसी को उसके आने की परवाह नहीं। फिर भी मैं हमेशा यही कहूँगी कि उसने मेरी बेटी के साथ बहुत बुरा किया। मैं जेन की जगह होती, तो कभी सह नहीं पाती। हाँ, मुझे तो बस यही तसल्ली है कि जेन दुख से टूटकर ज़रूर मर जाएगी। तब उस आदमी को भी अपने किए पर पछतावा होगा।' पर एलिज़ाबेथ को इस उम्मीद से कोई तसल्ली नहीं मिली। इसलिए उसने कोई जवाब नहीं दिया।

थोड़ी देर बाद माँ ने फिर कहा। 'हाँ, लिज़ी। कॉलिन्स दंपती बड़े आराम से रहते हैं, है न? हाँ, हाँ। बस यही उम्मीद है कि यह लंबा चले। मेज़ कैसी सजाते हैं वे? शार्लट यक़ीनन घर बहुत अच्छे से सँभालती होगी। अपनी माँ की आधी भी समझदार हो, तो पूरी तरह अलमी होगी। उनके घर में फ़िज़ूलख़र्ची तो एक ज़रा भी नहीं होगी।' 'जी, बिल्कुल नहीं।' 'घर बहुत अलमी तरीक़े से चलाएँगे, यह तय है। हाँ, हाँ। वे इस बात का ध्यान रखेंगे कि आमदनी से ज़्यादा ख़र्च न हो जाए। पैसे की तंगी से उन्हें कभी जूझना नहीं पड़ेगा। हाँ, ख़ूब चैन से जिएँ! तो फिर तुम्हारे पिता के गुज़र जाने पर लॉन्गबर्न पर अपना हक़ जमाने की बात भी अक्सर करते होंगे। ऐसा हुआ, तो लॉन्गबर्न को अभी से पूरी तरह अपना मान बैठे होंगे।' 'मेरे सामने तो यह बात कभी नहीं छेड़ी गई।' 'हाँ, तुम्हारे सामने कहते, तो अजीब ही लगता। पर आपस में तो ज़रूर अक्सर बात करते होंगे। ख़ैर, जो जागीर क़ानूनन उनकी नहीं, उस पर क़ब्ज़ा जमाकर भी अगर मन शांत रहता है, तो उन्हीं के लिए अच्छा है। मैं होती, तो जो जागीर बस बेटों की ओर बँधी होने की वजह से मिली, उसे रखते हुए ज़रूर शर्म आती।'